रूसी क्रांति : कारण, अवस्थाएँ, महत्त्व

इसे पढ़ने के बाद आप –

  • विश्व को प्रभावित करने वाली घटना के रूप में रूसी क्रांति के महत्त्व का विश्लेषण कर सकेंगे,
  • रूसी क्रांति के कारणों की व्याख्या कर सकेंगे,
  • क्रांति के दौर में हुई घटनाओं का वर्णन कर सकेंगे,
  • भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से इसका संबंध जोड़ पायेंगे, और
  • समझ पायेंगे कि सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक शब्दावली में समाजवादी समाज का  क्या अर्थ है।

रूसी क्रांति अक्टूबर 1917 में हुई। यह बोल्शेविक क्रांति के नाम से भी जानी जाती है। यह समाजवादी क्रांति है। पिछली इकाई (इकाई 13) में आपने पढ़ा कि समाजवाद क्या है और यह पूँजीवादी समाज से कहीं अधिक विकसित न्यायसंगत और समानतावादी है। रूसी क्रांति का उद्देश्य रूस में एक ऐसे ही समाज की स्थापना करना था। इस क्रांति का नेतृत्व रूसी समाजवादी जनवादी मजदरी पार्टी (Russian Socialist Democratic Labour Party) (RSDLP) और खास तौर से बोल्शेविकों ने किया था।

आर. एम. डी. एल. पी. ने मजदूर वर्ग का प्रतिनिधित्व किया जो क्रांति की नेतृत्वकारी शक्ति थी। किसान वर्ग ने भी महत्वपूर्ण भमिका अदा की। वास्तविकता तो यह है कि रूसी क्रांति रूम के मजदूर वर्ग द्वारा ही लायी गयी क्योंकि वे ही सबसे अधिक शोषण से उत्पीड़ित थे। इसलिए उस सामाजिक व राजनैतिक व्यवस्था, जो उनका शोषण कर रही थी, का तख्ता पलटने में उन्हीं का हित । सबसे अधिक था।

रूसी क्रांति : कारण, अवस्थाएँ और महत्व

रूसी क्रांति के बारे में पढ़ने की आवश्यकता क्यों है

यहाँ यह प्रश्न उठता है कि आधुनिक भारतीय इतिहास के पाठ्यक्रम में आपको रूसी क्रांति के बारे में क्यों बताया जा रहा है?

आपके लिए यह जान लेना महत्वपूर्ण है कि सारी घटनाएँ, वह चाहे कितनी भी हिला देने वाली क्यों न हों, एक ऐतिहासिक संदर्भ में ही घटती है और फिर भविष्य में मानव विकास हेतु उस ऐतिहासिक संदर्भ का हिस्सा बन जाती हैं। समाजवादी विचारों की उत्पत्ति ने खासतौर से साम्यवाद ने मनुष्य की सामाजिक व राजनैतिक बनावट की वास्तविकता की समझ के साथ-साथ मानव इतिहास को ही बदल डाला।

रूसी क्रांति ने अपने आचरण से बता दिया कि शोषित समाज को मिटा कर नये मक्त और न्यास संगत समाज की स्थापना संभव है। इसका भारी असर तब से ही हो रहे सभी मुक्ति आंदोलनों तथा विदेशी शासन और साम्राज्यवाद से स्वतंत्रता पाने वाले आंदोलनों पर पड़ा। इसने भारत में हो रहे राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन और खास तौर से मजदर जनता के क्रांतिकारी संघर्ष को भी प्रोत्साहन दिया इसलिए आपके लिए रूसी क्रांति का अध्ययन आवश्यक है।

रूसी क्रांति के कारण

1917 तक रूस की मजदूर जनता अपनी अमानवीय स्थिति को और ज्यादा सहन करने के लिए तैयार नहीं थी। साथ ही तब तक उनका राजनैतिक स्तर पर संगठन हो चुका था। इसलिए वे परानी सामाजिक व राजनैतिक व्यवस्था को पलटने में समर्थ थे। किन्तु प्रश्न यह उठता है कि तब ही क्यों?

1917 के पर्ववर्ती दशकों में रूसी समाज एक महत्वपूर्ण बदलाव के दौर से गुजर रहा था तथा ये बदलाव पुरानी व्यवस्था के लिए खतरा बन चुके थे। इन बदलावों से उत्पन्न नयी सामाजिक व आर्थिक शक्तियों के हित व महत्वाकांक्षाए भिन्न थीं। अतः 1971 तक रूस में नये और पुराने के बीच एक तीव्र अन्तर्विरोध और ध्रुवीकरण पैदा हो गया। रूसी क्रांतिकारी  आंदोलन ने नयी शक्तियों की जनवादी आशाओं का प्रतिनिधित्व किया जबकि दूसरी ओर रूसी शासन पुराने शासक वर्ग के हितों का प्रतिनिधित्व कर रहा था। रूस में 1917 तक एक तंत्रीय सत्ता रही, जहाँ किसी भी किस्म के प्रतिनिधित्व की व्यवस्था नहीं थी।

राजनैतिक संगठन बनाने का अधिकार नहीं था। नियंत्रण बहुत सख्त था और मनमाने ढंग से । गिरफ्तारियां हुआ करती थीं। धार्मिक सहिष्णुता नहीं थी तथा रूसी के अलावा अन्य जातियों का शोषण होता था। रूसी साम्राज्य एक बह राष्ट्रीय साम्राज्य था वजिसने अपनी शक्ति का प्रयोग यूरोप के तमाम जनवादी आंदोलनों के विरुद्ध किया।  यह यूरोप के “सिपाही” (पुलिसमैन) के नाम से भी जाना जाता था।

रूसी एकतंत्र भूमिसम्पन्न कुलीन वर्ग तथा बुर्जुआ वर्ग के समर्थन से मजबूत बना रहा। इसके बदले में एकतंत्र सत्ता की जिम्मेदारी थी कि रूसी समाज में इन वर्गों के विशेषाधिकार की स्थिति बनी रहे अतः 1917 तक न केवल नयी और परानी शक्तियों के बीच अपित इन नयी सामाजिक शक्तियों तथा रूसी शासन के बीच भी अन्तर्विरोध था। इसलिए रूसी क्रांतिकारी आंदोलन ने रूसी एकतंत्रीय सत्ता का तख्ता पलटने का प्रयास किया।

कृषि संबंधी स्थिति तथा किसान-वर्ग

कृषि दासता से मुक्ति के बावजूद भी रूसी किसान वर्ग समाज का सबसे अधिक शोषित हिस्सा रहा। भूमि-सम्पन्न कुलीन वर्ग की प्रभुसत्ता कायम रही। हालाँकि किसान वर्ग स्वतंत्र हो गया किन्तु किसानों को अपनी स्वतंत्रता का मूल्य चुकाना पड़ रहा था वह भी इतना ज्यादा कि वे लगातार कर्ज से दबे रहते थे। किसान वर्ग राज्य को दिये जाने वाले करों के बोझ से भी दबा हुआ था। परिणामस्वरूप किसान-वर्ग में भारी असंतोष को बढ़ावा मिला और बीसवीं शताब्दी के शरू के वर्षों में किसान आंदोलनों की उग्रता व उनकी संख्या बढ़ी। कृषि पिछड़ी हुई दशा में ही रही क्योंकि किसानों के पास अपनी जमीन को उपजाऊ बनाने के लिए पूँजी नहीं थी। भूमि सम्पन्न कुलीन वर्ग नई तकनीक लगाना नहीं चाहता था क्योंकि उनके पास गरीब किसानों के रूप में सुलभ श्रमिक उपलब्ध थे।

पूँकि कृषि रूसी अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख हिस्सा था और किसान इसकी जनसंख्या का एक बड़ा भाग, कृषि संबंधी और किसान वर्ग की समस्याएँ रूसी क्रांति का एक महत्वपूर्ण कारण बन गयीं और इसीलिए किसान वर्ग भी क्रांतिकारी आंदोलन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

मजदूर, उद्योगीकरण और क्रांति

रूस में उद्योगीकरण की प्रकृति ने एक ऐसे मजदूर आंदोलन को जन्म दिया जो अन्य देशों की अपेक्षा कहीं अधिक राजनैतिक और जझारू था। उद्योगीकरण के प्रथम चरणों में ही बड़े-बड़े उद्योगों की स्थापना हुई जिनमें एक बड़ी संख्या में मजदूरों को रखा गया। इस कारण एक बड़ी मजदूर संख्या के बीच सर्वमान्य शिकायतों और साथ ही एक समान संघर्ष को उभरने का मौका मिला।

इसके अलावा सत्ता ने उद्योगीकरण प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। रूसी बर्जआ वर्ग उतना मजबूत और विकसित नहीं था जितना पश्चिम यूरोपीय देशों में, वहाँ बुर्जुआ वर्ग ने उद्योगीकरण प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। अतः रूसी बुर्जुआ वर्ग का एकतंत्रीय सत्ता से मजबूत संबंध था। उसके विपरीत रूसी मजदूर वर्ग का आंदोलन एकतंत्रीय सत्ता और रूसी बुर्जुआ वर्ग यानी पूँजीपति दोनों के ही खिलाफ था।

राष्ट्रीयता का प्रश्न

रूसी साम्राज्य बहुराष्ट्रीय साम्राज्य था। शासन करने वाला राजवंश साम्राज्य के रूसी भाग से उभरा था तथा इसने रूसीकरण की नीति का अनुसरण किया यानी दूसरी जातियों अर्थात् राष्ट्रों की भाषा, साहित्य और संस्कृति को दबाया। इन क्षेत्रों का आर्थिक रूप से भी शोषण होता था। यह संबंध वास्तव में औपनिवेशिक प्रकृति का था। इन क्षेत्रों का उपयोग केवल रूस के निजी औद्योगिक विकास के लिए कच्चा माल प्राप्त करने भर के लिए किया गया। ये राष्ट्रगत जातियों जैसे कोकेशियन, कजाक, करागिज, पोलिश इत्यादि अत्यधिक असन्तुष्ट थीं और उन्होंने मौजूदा सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था को पलटने के क्रांतिकारी आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमि अदा की।

राजनैतिक दल : नेतृत्व

कोई भी क्रांतिकारी दल तभी सफल हो सकता है जबकि वह मौजूदा परिस्थितियों की सही समीक्षा कर सके, उचित योजना बना सके और उसके पास जनसाधारण के लाभ के लिए कछ हो। रूसी क्रांति में भी अनेक राजनैतिक दल सक्रिय थे, उन्होंने जनसाधारण खासकर मजदर और किसान वर्ग की चेतना को राजनैतिक शिक्षा, राजनैतिक प्रचार व आंदोलन द्वारा जागरूक करने में एक सार्थक भूमिका निभायी।

उन्होंने क्रांतिकारी आंदोलन की एकता बनाये रखने के लिए तथा उसके दिशानिर्देश के लिए मजदूरों और किसानों के संगठन भी बनाये, उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में निम्नलिखित महत्वपूर्ण राजनैतिक प्रवृत्तियाँ विद्यमान थी जैसे जनप्रिय प्रवृति, समाजवादी क्रांतिकारी, उदारवादी तथा सामाजिक-जनवादी मार्क्सवादी खासतौर से बोल्शेविक क्रांति के बाद के दा’ , में लेनिन बोल्शेविक पार्टी और रूसी क्रांति के महत्वपूर्ण नेता थे। अन्य महत्वपूर्ण नंताओं में त्रोत्सकी, बुखारिन और स्तालिन थे।

 क्रांति के चरण

रूसी क्रांतिकारी आंदोलन उन्नीसवीं शताब्दी में उभंरी । शुरू में इसमें केवल मध्यम-वर्गीय बुद्धिजीवी शामिल थे। जैसे-जैसे मजदूरों और किसाना का असंतोष बढ़ने लगा तथा वे अपनी शोषित परिस्थितियों के प्रति जागरूक होने लगे उन्होंने भी रूसी एक तंत्रीय सत्ता के खिलाफ संघर्ष शुरू किया। बीसवीं शताब्दी के आरंभ तक रूसी क्रांतिकारी आंदोलन जनसाधारण पर आधारित आंदोलन बन गया, जिसमें मजदूरों व किसानों ने निर्णायक व निश्चित भूमिका निभायी।

एकतंत्रीय सत्ता पर पहला प्रमख हमला 1905 में हुआ। इसे 1905 की क्रांति या 1917 की क्रांति के “ड्रेस रिहर्सल” के नाम से भी जाना जाता है। मजदूर और किसान “जनतांत्रिक गणराज्य” की माँग करने लगे। पहली बार एक विशाल आम हड़ताल हई। सेना की कुछ टुकड़ियों ने भी विद्रोह कर दिया। 1905 की क्रांति के दौरान ही पहला सोवियत अस्तित्व में आया। यह मजदूरं जनता का क्रांतिकारी संगठन था। यह क्रांति एकतंत्रीय सत्ता का तख्ता पलटने में कामयाब नहीं हुई, किन्तु मजदूरों और किसानों द्वारा एक क्रांति के दौर में प्राप्त किये अनुभव उनके लिए मूल्यवान साबित हुए।

इस क्रांति के बाद के 5-6 वर्ष अत्यधिक दमन के वर्ष थे। इन वर्षों में बहुत से क्रांतिकारी गिरफ्तार कर लिये गये और मजदूर संगठनों को भी भंग कर दिया गया। प्रथम विश्व युद्ध, जिसका रूसी अर्थव्यवस्था और रूसी जनता दोनों पर प्रतिकूल असर पड़ा, ने भी जनता को राजनीति से जोड़ा तथा साथ ही एकतंत्रीय सत्ता विरोध सभी राजनैतिक ताकतों को एक सूत्र में पिरो दिया।

इस राजनैतिक वातावरण में, पेत्रोग्राद में ब्रेड की कमी से, फरवरी क्रांति भड़क उठी। कुछ ही दिन बाद एकतंत्रीय सत्ता नष्ट हो’ की आवाज गूंज उठी। पूरे शहर में लाल झंडे फहरा रहे  थे। जल्द ही यह लहर दसरे शहरों व गाँवों में भी फैल गयी। अंत में सेना भी क्रांतिकारियों के पक्ष में हो गयी। एकतंत्रीय सता को कोई समर्थन न मिल सका! फरवरी क्रांति के परिणामस्वरूप एकतंत्रीय सत्ता का तख्ता पलट गया और अस्थायी सरकार की स्थापना हुई। इस क्रांति में मजदूरों और किसानों ने प्रमुख भूमिका निभायी और बर्जआ वर्ग ने भी इसका समर्थन किया। यह बर्जुआ जनवादी क्रांति थी। अब जिस अस्थायी सरकार की स्थापना हई वह बुर्जुआ व भूमि सम्पन्न कुलीन वर्ग द्वारा ही शासित थी और उन्हीं के हितों का प्रतिनिधित्व करती थी। ।

इसी कारण अस्थायी सरकार ने एकतंत्रीय सत्ता की नीतियों में कोई परिवर्तन नहीं किया। फिर भी वह राजनैतिक स्वतंत्रता देने को मजबूर थी क्योंकि फरवरी क्रांति के फलस्वरूप किसानों व सैनिक प्रतिनिधियों के सोवियतें बन चुके थे, जैसा कि 1905 में हुआ। इनमें रूस की कामगार जनता के हितों का प्रतिनिधित्व हुआ। इस कारण शुरू से ही दोनों के बीच अन्तर्विरोध था जो 1907 की क्रांति तक बना रहा। 1917 में अस्थायी सरकार का भी तख्ता पलट दिया गया।

अतः फरवरी 1917 और अक्टूबर 1917 के बीच के समय में सर्वहारा समाजवादी क्रांति के लिए परिस्थितियाँ विद्यमान थीं। मजदर, किसान व सैनिक अपनी परस्पर निर्भरता समान हितों और अस्थायी सरकार के खिलाफ अपने विरोध के प्रति सचेत हए। अस्थायी सरकार अब उनके सामने स्पष्टतः शासक वर्ग के दलाल के रूप में प्रकट हो चुकी थी। इस दौरान कई क्रांतिकारी दल लड़खड़ा गये। उदाहरण के लिए समाजवादी क्रांतिकारी व मेन्शेविक दल जिनके विषय में हम पहले भी बतला चके हैं, जनसाधारण के हितों का ही प्रतिनिधित्व करते थे किन्तु वे यह नहीं समझ पाये कि जनसाधारण उनसे कहीं ज्यादा आगे निकल चुका है।

वे यह समझ नहीं सके कि समाजवादी क्रांति यानी क्रांति के दूसरे चरण के लिए यही समय उचित था। उन्होंने यह नहीं सोचा कि बर्जआ वर्ग पहले से ही क्रांति को आगे बढ़ाने के खिलाफ था। सिर्फ बोल्शेविक ही यह सब समझ पाये। वह एकमात्र राजनैतिक दल था जो समय की मांग को पूरा कर सका। उन्होंने तत्काल बिना संयोजन किये व बिना हरजाना लिये युद्ध खत्म करने की माँग के साथ यह भी माँग की कि किसानों को भूमि मिले, उद्योगों पर मजदूरों का नियंत्रण हो, राष्ट्रीयताओं को आत्मनिर्णय का अधिकार हो और सबसे मुख्य माँग रोटी की थी। शांति, भमि, रोटी और जनतंत्र तात्कालिक और सर्वव्याप्त नारा बन गया। अतः बोल्शेविक दल जनसाधारण का नेतृत्व करने, जनसाधारण के आम संगठनों में बहमत पाने, तथा मजदूरों, किसानों और सैनिकों को अपने पक्ष में रखने में कामयाब हुआ। अक्टूबर 1917 की क्रांति सफल हो पायी क्योंकि यह जनप्रियता पर आधारित थी।

रूसी क्रांति की प्रकृति और महत्व

अक्टूबर क्रांति ने रूस में पूँजीवाद के आधार को मिटा कर समाजवाद की नींव डाली किन्तु नीतियों के स्तर पर इन सबका क्या अर्थ है?

आर्थिक पक्ष

अर्थव्यवस्था की दृष्टि से रूसी क्रांति का अर्थ है निजी सम्पत्ति का अंत तथा सभी सम्पत्ति के मालिकाना हकों का राज्य के आधीन हो जाना, किन्तु आपको यह समझना चाहिए कि इसका अर्थ यह नहीं था कि लोगों का निजी माल-असबाब उनसे छीन लिया गया। निजी सम्पत्ति के उन्मूलन से अर्थ है कि उत्पादन के सभी साधनों जैसे लाभ आय देने वाले साधनों को राज्य की सम्पत्ति बना दिया गया। इनमें फैक्ट्रियों भूमि तथा बैंक इत्यादि आते हैं। अब कोई भी व्यक्ति इन उत्पादन के साधनों का निजी मालिक बनकर श्रम से लाभ नहीं उठा सकता था।

इस क्रांति द्वारा उद्योगों पर मजदूरों के नियंत्रण की स्थापना भी हुई। इसका अर्थ है कि वे अपने प्रतिनिधियों द्वारा उत्पादन प्रक्रिया पर नियंत्रण रख सकते थे तथा फैक्ट्री में मजदूरों के अधिकारों की भी सुरक्षा कर सकते थे। इस कदम का आधार यह विचार था कि जो उत्पादन करता है उसे अपने प्रतिनिधियों द्वारा निर्णय लेने में (केन्द्रीय स्तर तक) हिस्सेदार होना चाहिए।

अतः मजदूरों के नियंत्रण से संबंधित एक महत्वपूर्ण कदम यह भी था कि पूरे देश खासतौर से कामगार जनता की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर एक अर्थव्यवस्था की स्थापना करना।

इस केंद्रित अर्थव्यवस्था द्वारा उनका प्रयास आर्थिक विकास की गति को बढ़ाना तथा इस विकास के लाभ को बहुसंख्यक जनता तक पहुँचाना था। इसके द्वारा उन्होंने उत्पादन में अराजकता तथा अपव्यय को रोकने का प्रयास किया। हालांकि पंचवर्षीय योजना देर से यानि 1928 में शुरू की गई। वास्तव में योजना एक महत्वपूर्ण योगदान था जो रूसी क्रांति ने विश्व को दिया। भारत में भी योजनाबद्ध आर्थिक विकास के लिए उसी आदर्श को अपनाया गया।

कृषि के क्षेत्र में भूमि का राष्ट्रीयकरण हुआ। इसका अर्थ है कि भूमि के मालिकाना हक केवल राज्य को ही थे और भूमि किसानों के बीच केवल उपयोग के लिए बाँटी जाती थी। किन्तु किसान उसे बेच या गिरवी नहीं रख सकता था और न ही वह इसका उपयोग दूसरों के श्रम का शोषण कर अपने लाभ हेतु कर सकता था। नवम्बर 1917 के भूमि आदेश द्वारा जमींदारी प्रथा समाप्त कर दी गई और भूमि किसानों को हस्तान्तरित कर दी गई। 1928 में कृषि के सामूहिकीकरण से सामूहिक उत्पादन और कृषि क्षेत्र में सामाजिक संबंधों में विकास हुआ।

सामाजिक पक्ष

उत्पादन-प्रक्रिया में निजी संपत्ति को समाप्त कर क्रांति ने सामाजिक असमानता की जड़ें ही काट दी। इसने एक वर्ग विहीन समाज की नींव डाली। हर एक व्यक्ति को अपने कार्य के अनुसार ही वेतन मिलता था एक मजदूर और प्रबंधक के वेतन में या एक मजदूर और कलाकार या अध्यापक के वेतन में ज्यादा अंतर नहीं था। जैसा कि आप जानते हैं कि पूँजीवादी समाज में एक ही कार्य-स्थान पर काम करने वाले मजदूर व संचालकों के या मजदूर तथा डॉक्टर, अध्यापक, इंजीनियर इत्यादि के जीवन स्तर में जमीन-आसमान का फर्क होता है।

सोवियत राज्य ने सभी नागरिकों के लिए कछ निश्चित सविधाओं जैसे मुफ्त चिकित्सा, सबके लिए मुफ्त और समान शिक्षा, बेरोजगारी भत्ता, संस्कृति और संस्कृति विकास के लिए समान अवसर इत्यादि की भी जिम्मेदारी ली। ये वास्तव में जनता संविधान द्वारा दिये गये अधिकार थे। सोवियत जनता के लिए यह सब तत्काल ही प्राप्य नहीं था। चूँकि इन सबके लिए उत्पादन और बाह्य ढाँचा साथ-साथ ही तैयार हो रहा था। किन्त यह महत्वपूर्ण है कि राज्य ने व्यक्ति के अच्छे जीवन स्तर की जिम्मेदारी ली बशर्ते वह अपनी क्षमता के अनुसार कार्य करें।

संविधान द्वारा स्त्रियों के समान अधिकार की न केवल जिम्मेदारी ली गई बल्कि इस समानता को लागू करने के लिए भौतिक आधार तैयार किया गया। छः महीने के प्रसूति अवकाश, कार्य-स्थलों पर क्रेचों, सार्वजनिक कैंटीनों (जहाँ खाना सस्ता व उचित दर का था) इत्यादि की व्यवस्था थी। इन सबका उद्देश्य सार्वजनिक जीवन में स्त्रियों की पूर्ण हिस्सेदारी को संभव बनाना था। इसका पूँजीवादी समाज पर भारी असर पड़ा। समाजवादी समाज की इस चनौती का सामना करने के लिए उन्हें भी कछ निश्चित सधार कार्यवाहियाँ करनी पड़ीं। वास्तव में पश्चिम में कल्याण राज्य की धारणा रूसी क्रांति द्वारा जनता को दिए गए लाभ की ही प्रतिक्रिया है। अन्यथा पश्चिम की मजदूर जनता समाजवादी समाज की उत्तमता को फौग्न पहचान जाती।

रूसी क्रांति का एक अन्य महत्वपूर्ण योगदान था धर्म का राजनीति तथा राज्य से अलगाव। यह माना गया कि धर्म एक विशद्ध निजी मामला होना चाहिए. विद्यालयों में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जानी चाहिए, धर्म का कोई सार्वजनिक उपयोग नहीं होना चाहिए, जब आप इस बात पर गौर करेंगे कि हमारे देश में धर्म के नाम पर क्या कुछ नहीं घटा है तब आप इस कदम की महत्ता को पहचानेंगे। धर्म खत्म नहीं हुआ था, धार्मिक व्यक्तियों पर मुकदमें नहीं चलाए गए थे, जैसी कि आम धारणा है।

राजनैतिक पक्ष

राजनैतिक तौर पर रूसी क्रांति के फलस्वरूप सर्वहारा अधिनायकवाद के सिद्धांत पर आधारित मजदूर जनता के राज्य की रचना हुई। यह स्पष्ट किया गया कि क्रांति के विरोधी जनता के हित को खत्म कर सकते थे वास्तव में रूसी क्रांति के तरंत बाद दस अन्य देशों ने रूसी भूमिसम्पन्न कुलीन वर्ग और बुर्जुआ वर्ग का पक्ष लिया तथा क्रांति और रूस के मजदूरों का विरोध किया। इसीलिए, कुछ समय के लिए राजनैतिक व्यवस्था में मजदूर वर्ग का प्रभुत्व होना आवश्यक हो गया।

किन्तु यह राज्य अन्य पूँजीवादी राज्यों की तुलना में कहीं अधिक जनतांत्रिक था क्योंकि इसमें अल्पमतों (जिन्हें कि क्रांति से पूर्व विशेषाधिकार प्राप्त थे) के ऊपर जनता के बहुमत (किसी भी समाज की बहुमत मजदूर जनता ही होती है) का शासन सुनिश्चित था। इसके अलावा इसे तब तक एक अस्थायी अव्यवस्था के रूप में देखा गया जब तक कि शासक वर्ग कि शक्ति पूरी तरह से नष्ट नहीं हो जाती तथा वे क्रांति को नष्ट करने में पूर्णतः असमर्थ नहीं हो जाते। अतः बुर्जुआ जनतंत्र को समाजवादी जनतंत्र में बदलना था।

रूसी नागरिकों द्वारा उपयोग की जाने वाली स्वतंत्रता न केवल राजनैतिक स्वतंत्रता थी अपितु अर्थिक स्वतंत्रता भी थी। रूसी नागरिकों से न केवल कानूनी और सामाजिक स्वतंत्रता प्राप्त हुई बल्कि आर्थिक समानता भी मिली। अतः रूसी क्रांति द्वारा नयी व्यवस्था में स्वतंत्रता का दायरा भी बढ़ गया।

अन्तर्राष्ट्रीय पक्ष

अन्तर्राष्ट्रीय संबंधों में भी रूसी क्रांति युगान्तकारी थी। सबसे पहले बोल्शेविकों ने राजतंत्र सत्ता तथा अस्थायी सरकार द्वारा किये गये सभी गुप्त समझौतों को समाप्त कर दिया। ऐसा महसूस किया गया कि जनता को सरकार की कार्य पद्धति के विषय में जानने का अधिकार है और किसी भी देश की जनता को वाद-विवाद तथा हस्तक्षेप द्वारा अपने देश की विदेश नीति को प्रभावित करने का अधिकार होना चाहिए।

दूसरे बोल्शेविकों ने एक आज्ञाप्ति द्वारा बिना संयोजन किये और बिना हरजाना लिये तुरंत युद्ध समाप्त का प्रस्ताव रखा। पूरे विश्व में वह ही एक ऐसा राजनैतिक दल था जिसने इस तरह की घोषणा को लागू किया। उन्होंने निकटवर्ती तथा दूरवर्ती पूर्व के कई इलाकों से जिनके लिए रूसी सरकार लड़ रही थी, अपना दावा वापिस ले लिया। उन्होंने अपने आपको साम्राज्यवाद का विरोधी घोषित कर दिया तथा विदेशी आधिपत्य के खिलाफ चल रहे राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलनों को अपना सहयोग दिया।

बोल्शेविकों ने उन इलाकों में, जहाँ जार का साम्राज्य था, सभी राष्ट्रीयताओं में आत्म निर्णय साथ ही संबंध-विच्छेद के अधिकारों को भी मान्यता दी। उन इलाकों में, जहाँ भूमिसम्पन्न कुलीन वर्ग तथा बुर्जुआ वर्ग तो अलग होना चाहता था किन्तु मजदूर और किसान सोवियत रूस का ही हिस्सा होना चाहते थे, बोल्शेविकों ने जनसाधारण की इच्छा को मान्यता दी और अक्टूबर क्रांति को सुदृढ़ करने में उनके साथ लड़ाई लड़ी। अधिकतर राष्ट्रों के मजदूर और किसान बोल्शेविकों के साथ थे क्योंकि वे जानते थे कि बोल्शेविकों की हार का मतलब है जमीदारों और पूंजीपतियों के शोषण का खात्मा।

भारत के राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन पर रूसी क्रांति का प्रभाव

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा उत्पन्न सामाजिक परिस्थितियों, इसके शोषण की व्यवस्था तथा इस शोषणपूर्ण व्यवस्था द्वारा उत्पन्न सामाजिक और आर्थिक ताकतों का ही परिणाम था। किन्तु साथ ही वह समकालिक विश्व की महत्वपर्ण लहर से भी प्रभावित था, जिसमें से सबसे महत्वपर्ण थी समाजवादी शक्तियाँ जो कि रूसी क्रांति की देन थीं।

1905 की क्रांति भारतीय नेताओं के लिए महान प्रेरणा थी। बंगाल के विभाजन के खिलाफ उठी उत्तेजना जो कि स्वदेशी आंदोलन में प्रकट होती है 1905 की क्रांति के तुरंत बाद हुई। 1912 में मजदूर वर्ग ने बाल गंगाधर तिलक की रिहाई की मांग पर आधारित प्रथम राजनैतिक हड़ताल आयोजित की।

अक्टूबर क्रांति का भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन पर प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं पड़ा किन्तु रूसी क्रांति की सफलता के बाद भारतीय नेताओं ने यह महसूस किया कि न तो संवैधानिक तरीकों से कुछ पाया जा सकता है और न बम की राजनीति से ही कछ हासिल किया जा सकता है। अब यह स्पष्ट हो गया कि जनसाधारण का राजनैतिक संघर्ष में सम्मिलित होना जरूरी और निर्णायक है। अतः 1920 में मजदूर और किसान पार्टियाँ, आल इंडिया ट्रेड यनियन कांग्रेस तथा मजदूरों किसानों के बढ़ते संघर्ष असहयोग आंदोलन इन विचारों और संगठनों का प्रत्यक्ष परिणाम था।

रूसी क्रांति द्वारा भारत में समाजवादी विचारों का प्रचार व प्रसार भी बढ़ा। वस्तुतः शुरू में भारतीय कम्युनिस्टों का प्रशिक्षण सोवियत रूस में ही हुआ था। भारत में भी मार्क्सवाद के । प्रभाव से तथा जनसाधारण के संघर्ष में हिस्सा लेने के फलस्वरूप बहुत कांग्रेसी जन कांग्रेस से अलग हो गये और उन्होंने भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन की नींव डाली। ए.के. गोपालन व ई.एम.एस. नम्बदरीपाद ऐसी दो प्रमुख हस्तियाँ हैं। कम्युनिस्ट आंदोलन के बढ़ने से भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को एक बिल्कुल ही नया आयाम मिल गया। तब से वर्ग संघर्ष यानी भारतीय पूँजीपति वर्ग के खिलाफ मजदूरों का संघर्ष भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का एक अभिन्न अंग बन गया।

वामपंथ के विकास ने सम्पूर्ण स्वतंत्रता आंदोलन को उग्रता प्रदान की। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के भीतर ही एक कांग्रेस समाजवाद गट बना। जवाहरलाल नेहरू सोवियत रशिया खासतौर पर उसके साम्राज्यवाद विरोधी प्रयासों से प्रभावित हुए। इस समय के भारतीय नेताओं की शब्दावली में समाजवाद एक व्यापक शब्द बन गया। तीसरे दशक में भारतीर राष्ट्रीय आंदोलन एक ऐसे स्तर पर पहुँच गया जहाँ वामपंथ ने राष्ट्रीय आंदोलन के जीवादी नेतृत्व को गम्भीर चुनौती दी। वामपंथी विचारों से प्रभावित विद्यार्थियों और लेखकों ने संगठन भी बनाये।

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन सोवियत यनियन के नेतत्व में साम्राज्यवाद के खिलाफ विश्वस्तरीय संघर्ष का एक हिस्सा बन गया और भारतीय नेताओं द्वारा भी यह इसी रूप में पहचाना जाने लगा। यदि रूसी क्रांति जिसने साम्राज्यवाद को विश्व स्तर पर कमजोर कर दिया, सफल न होती तो भारतीय जनता की ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ लड़ाई और अधिक कठिन साबित होती। यह कोई संयोग नहीं था कि फ़ासीवाद की हार तथा द्वितीय विश्व युद्ध के बाद उत्पन्न पूँजीवादी संकटों के पश्चात् औपनिवेशिकता की समाप्ति की प्रक्रिया में तेजी आई।

चीनी क्रांति, यरोप में जनतंत्रों की स्थापना तथा भारतीयों की स्वतंत्रता की प्राप्ति, सोवियत यूनियन के साम्राज्यवाद के खिलाफ अटल संघर्ष से दृढ़ प्रतिज्ञ ही हुई।

भारत में आर.आई.एन. विद्रोह तथा तेभागा और तेलंगाना आंदोलनों ने (1946-48) जिसके बारे में आप बाद में पढ़ेगे, भारतीय राजनैतिक स्वतंत्रता के इतिहास में प्रमख भमिका निभाई। ये आंदोलन भारतीय कम्युनिस्टों के नेतृत्व में हुए जो अपने आपको कम्युनिस्ट इन्टरनेशनल के नेतृत्व में आयोजित आंदोलन का हिस्सा मानते थे। भारतीय कम्यनिस्ट पार्टी ने अपनी योजना व रणनीति भारतीय परिस्थितियाँ तथा भारत के वर्ग शक्तियों की अंतर्संबंधो के आधार पर बनायी, परंतु फिर भी इसका नेतृत्व रूसी एकतंत्र सत्ता के खिलाफ हये सफल क्रांतिकारी आंदोलनों से प्राप्त अनभवों ने किया। रूस भारत की तरह आर्थिक रूप. से एक पिछड़ा हुआ देश था इसलिए रूसी क्रांति के अनुभव भारत के लिए प्रासंगिक थे, रूसी अनभव और विशिष्ट भारतीय परिस्थितियों में इसकी अनप्रयोगता की संभावना के कारण भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने भारतीय जनता के संघर्ष को द्वि-स्तरीय क्रांति के रूप में पहचाना।

अंग्रेजों ने भारत में जनसाधारण के प्रत्येक संघर्ष को कम्यूनिस्टों के द्वारा चलाया गया संघर्ष माना और उसे बोल्शेविक साजिश समझा। रूसी क्रांति के कुछ महीनों के बाद वे एक घोषणा पत्र जारी करने पर मजबूर हो गये। यह घोषणा पत्र मोंटाग्य घोषणा के नाम से जाना जाता है तथा इसमें उन्होंने स्व-सरकार की संस्थाओं के क्रमशः विकास का वायदा किया। वे स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत राष्ट्रों की बोल्शेविक शांति आज्ञाप्ति पर हुई प्रतिक्रिया से बुरी तरह बौखला गये।

1921 में जब पूरे उत्तर प्रदेश में किसान सभा की स्थापना हुई तब टाइम्स के संवाददाता ने लिखा कि भारत में किसान सोवियत की स्थापना हो गई है। कम्युनिस्ट ज्यादातर भूमिगत हो कार्य करने पर मजबूर थे और उन्हें भीषण दमन का सामना करना पड़ता था। मेरठ साजिश जाँच केस उसी का एक उदाहरण है। इसके द्वारा वे बोल्शेविक खतरे से बचने का प्रयास कर रहे थे अतः भारत में रूसी क्रांति का सकारात्मक और तीव्र प्रभाव पड़ा। भारतीय राष्ट्रीय । आंदोलन में उग्रता आयी। इसके अलावा भारत में ब्रिटिश नीतियों पर भी इस क्रांति का असर हुआ। राष्ट्रीयता की लहर के प्रति ब्रिटिश ने दमनकारी रवैया अपनाया।

अंग्रेजों ने भारतीय समाज के प्रतिक्रियावादी हिस्से को अपने पक्ष में शामिल करने का प्रयास किया। बोल्शेविक खतरे से निपटने में असमर्थता के कारण उन्होंने भारतीय कम्युनिस्टों को राष्ट्र विरोधी के रूप में दर्शाया ताकि उन्हें राष्ट्रीय आंदोलन की प्रमुख धारा से काटकर अलग किया जा सके। रूसी क्रांति ने एक सुदृढ़ साम्राज्यवाद विरोधी परिपेक्ष्य के विकास में सहयोग दिया तथा स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भारतीय राष्ट्रीय नेता भी स्पष्ट और निश्चित रूप से विश्व के जनतांत्रिक संघर्ष के पक्ष में थे। इन सबसे अधिक महत्वपूर्ण है कि रूसी क्रांति की सफलता और इसके द्वारा सोवियत जनता को प्राप्त उपलब्धियों से भारत सहित बहुत से विकासशील देशों के सामने नये प्रश्न उभर कर सामने आये-प्रश्न जैसे किस तरह का विकास, किसके लिए विकास आदि।

इसने ठोस यथार्थ के धरातल पर इसी विचार को प्रतिपादित किया कि किसी भी विकास का आधार बहुसंख्यक जनता के हित और उनकी सुरक्षा की भावना ही होनी चाहिए। इसे जनता की महत्त्वाकांक्षाओं को किसी न किसी रूप में परा करना ही चाहिए। उत्तमता के स्तर पर एक भिन्न समाज का निर्माण भारत जैसे देशों में विकास और सामाजिक न्याय जैसी समस्याओं के समाधान के रूप में क्रांति और समाजवाद की आवश्यकता को सर्वोपरि बना दिया।

सारांश

1917 की घटनाएँ विभिन्न कारणों से महत्वपूर्ण हैं : प्रथम वे रूस की राजनैतिक, सामाजिक व आर्थिक ढाँचे में क्रांतिकारी परिवर्तन का प्रतिनिधित्व करती है। दूसरे उन्होंने न्यायसंगत व समान समाज की स्थापना के लिए कार्यरत शक्तियों को सक्रिय बना दिया। क्रांति के बाद का रूसी समाज सबके लिए स्व-विकास के समान अवसर के सिद्धांत पर आधारित था। तीसरे, रूसी क्रांति ने विश्व की तमाम उत्पीड़ित जनता व राष्ट्रों की स्वाधीनता व उत्तम व्यवस्था के लिए होने वाले संघर्षों को प्रोत्साहन दिया। खासतौर से भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष ने रूसी क्रांति से गति और एक निश्चित दिशा निर्देश पाया। और अंत में, रूसी क्रांति के अनुभवों ने विश्व को सामाजिक मक्ति, आर्थिक विकास और राजनैतिक परिवर्तन का नया आदर्श दिया।

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