सूखा बरगद : मध्यवर्गीय मुस्लिम समाज की मानसिकता

मंजूर एहतेशाम के ‘सूखा बरगद की प्रथम इकाई आपके सामने है। यह उपन्यास मुस्लिम मध्यवर्गीय समाज के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संघर्ष को उजागर करता है। इस इकाई में उन सभी महत्वपूर्ण पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला है।

पहले इसे पढ़ें:

इसे पढ़ने के बाद आप –

  • निम्न मध्यवर्गीय मुस्लिम समाज एक ओर कैसे रूढ़िवाद और परंपराओं में जकड़ा हुआ है तो दूसरी ओर आर्थिक सीमाओं के दबाव को झेल रहा है। इसे आप समझ सकेंगे;
  • अल्पसंख्यक समाज का अतीत के प्रति मोह उनके शैक्षणिक, आर्थिक प्रगति को रोकता है। इसके बावजूद मुस्लिम समाज में अपने अतीत के प्रति प्रचंड मोह क्यों है। इसके कारणों पर आप प्रकाश डाल सकेंगे;
  • अतीत के प्रति मोह के कारण अल्पसंख्यक समाज कुलीनता के दंभ, व्यर्थ का दिखावा, शिक्षा के प्रति उदासीन, अवैज्ञानिक सोच के कारण रूढ़िवाद और अंधविश्वास से ग्रसित है। मुस्लिम समुदाय के अतीत के प्रति मोह के कारणभूत तथ्यों का विवेचन कर सकेंगे;
  • हिंदू मुसलमान मध्यवर्ग की आर्थिक स्थिति एक सी है, उनका आर्थिक संघर्ष एक सा है। सुखों की तलाश और दुखों को झेलने की मानसिक स्थिति में भी फर्क नहीं है। इससे आप समझ सकेंगे कि हिंदू-मुस्लिम समाज को बाँटने वाले कारण धर्म की राजनीति में निहित हैं:
  • शिक्षित मुस्लिम नारी अधिक प्रगतिशील और क्रांतिकारी है। वह आत्मनिर्भर व अपने अस्तित्व के प्रति सचेत हो रही है और एक ऐसा समाज बनाना चाहती है जो धर्मनिरपेक्षता पर टिका हो। इस मानसिकता को गढ़ने वाले संस्कार और वैचारिक आधार से आप परिचित हो सकेंगे;
  • उदारवाद और आदर्श में विश्वास करने वाली पीढ़ी हिंदू-मुसलमान को “इंसान” के रूप में देखती थी और आज की नई पीढ़ी हिंदू-मुसलमान को एक वर्ग के रूप में देखना चाहती है। इन क्रांतिकारी और परिवर्तनकारी विचार से आप अवगत हो सकेंगे।

सुधी समीक्षकों और स्वयं रचनाकारों ने उपन्यास विधा से अनेक अपेक्षाएं की हैं। कभी इसे आधुनिक युग का महाकाव्य मान कर युगबोध और परिवेश के साथ जुड़ाव की दृष्टि से ‘उपन्यास’ को सर्वाधिक महत्वपूर्ण विधा माना गया है तो कभी बलपूर्वक यह कहा गया है कि हर श्रेष्ठ उपन्यासकार अपने समय का इतिहास लिखता है। रचना को समय का साक्ष्य बनाने के लिए उपन्यासकार अपने कथा-सूत्र, चरित्र, भाषा और कथन पद्धतियों का चयन अपने खुद के अनुभव-क्षेत्र से करता है। जलते कोयले की आग को जितना अंगुलियों से छू कर महसूस किया जा सकता है, उतना चिमटे से पकड़ कर नहीं। यही कारण है कि दलित वर्ग में जन्मे और बड़े हुए लेखकों की रचनाएं उस वर्ग की नियति को अधिक मार्मिक ढंग से प्रस्तुत कर सकी है। यही बात मध्य वर्ग से संबंधित उपन्यासकारों पर भी लागू होती है। हालांकि प्रेमचंद के जमाने से मुस्लिम समाज का यथार्थ हिंदी उपन्यास के कथ्य का हिस्सा बनता रहा है, लेकिन यह निश्चित है कि मुस्लिम समाज के संघर्ष, अंतर्विरोध, सदाशयता और भटकाव को जितने प्रामाणिक रूप में शानी, अब्दुल बिस्मिल्लाह, राही मासूम रजा, नासिरा शर्मा, असगर वजाहत आदि की रचनाओ में उभारा गया है, उतनी विश्वसनीयता गैर-मुस्लिम लेखकों के रचना-संसार में दुर्लभ है। मंजर एहतेशाम के उपन्यासों में भी अनुभव की प्रामाणिकता सर्जनात्मक विश्वसनीयता का रूप लेती दिखायी देती है।

हालांकि कोरे अनुभव किसी रचना को महत्वपूर्ण नहीं बना सकते, मानवीय सदाशयता से सम्पन्न जीवन दृष्टि भी बहुत जरूरी होती है। इसके बावजूद ‘सूखा बरगद’ को पढ़ते समय और पढ़ने के बाद यह महसूस किया जा सकता है कि मंजूर एहतेशाम ने मध्यवर्गीय मुस्लिम समाज के अपने प्रत्यक्ष अनुभवों का उपन्यास में भरपूर उपयोग किया है। विभाजन के बाद भारत में रह गये मुसलमानों विशेषतः शिक्षित मध्यवर्गीय मुसलमानों की मानसिकता का बयान ‘सूखा बरगद के कथ्य का एक अहम पक्ष है।

चाहे हिंदू समाज हो या मुस्लिम समुदाय, उसमें मध्यवर्ग का एक खास स्थान होता है। विशेषतः पढ़ा लिखा मध्यवर्ग समाज की उन्नति, बौद्धिक विकास और परिवर्तन में प्रायः नेतृत्व करता है। मध्यवर्ग का उदय औद्योगीकरणऔर नगरीकरण के समांतर हुआ है, अतः इसमें परिवर्तनकामी सोच के प्रमाण भी मिलते हैं। हालांकि मध्यवर्ग के अपने अन्तर्विरोध कुछ कम नहीं होते। एक ही समय में वह प्रगतिशीलता के प्रमाण देता है तो कहीं अंधविश्वास और . रूढ़िवाद का समर्थक भी होता है। सामाजिक संरचना में मध्यवर्ग की हैसियत ‘त्रिशंकु की तरह मानी गयी है। त्रिशंकु एक पौराणिक पात्र है, जीवित ही स्वर्ग जाना चाहता था। लेकिन वह स्वर्ग और धरती के बीच लटका रह गया। मध्यवर्ग की आकांक्षा होती है कि वह समाज के उच्चवर्ग के समकक्ष हो जाये। इसके लिए वह तरह-तरह के दिखावे करता है। लेकिन उच्च । वर्ग का अहंकार और आभिजात्य उसे स्वीकार नहीं करता। इसके फलस्वरूप वह निम्नवर्ग से तो कट ही जाता है, उच्च वर्ग उसे स्वीकारता नहीं है, वह अपनी जड़ों से भी उखड़ जाता है।

‘सूखा बरगद’ में मंजूर एहतेशाम ने शिक्षित मुस्लिम परिवार को केंद्र में रखा है। उदार विचारों के अब्ब और परम्परा प्रिय अम्मी के वैचारिक संघर्ष और उससे उत्पन्न व्यावहारिक कठिनाइयों के बीच बच्चों – रशीदा और सुहैल की परवरिश होती है। एक ओर माँ से प्राप्त संस्कार हैं, जो समाज में रूढ़ियों के रूप में प्रचलित है, दूसरी ओर अब्बू के माध्यम से नये सोच, नये जमाने की हवा है जो बच्चों के मानसिक-बौद्धिक विकास को सही दिशा देती है। उपन्यास की कहानी रशीदा के अवलोकन बिंद से अधिकतर कही गयी है। उसमें परिवार के दो तरह के मूल्यों के बीच में झूलते रहने और फिर अपना एक रास्ता चुन लेने का साहस है और वह बदले हुए जमाने की अपने पैरों पर खड़ी, अपने कैरियर के प्रति जागरूक मुस्लिम युवती के रूप में आश्वस्त करती है। उपन्यासकार ने दिखाया है कि अनेक बाधाओं से जूझते हुए वह न केवल उच्चशिक्षा प्राप्त करती है, बल्कि आकाशवाणी में नौकरी करने की हिम्मत भी करती है। रशीदा के माध्यम से उपन्यासकार ने मध्यवर्ग की मानसिकता पर कहीं सीधे तो कहीं संकेतों में अर्थपूर्ण टिप्पणियाँ की हैं। ये टिप्पणियाँ आरोपित और मात्र वैचारिक न होकर उपन्यासकार के अनुभव संसार से छन कर निकली लगती है। इनसे पता चलता है कि अनुभव की प्रामाणिकता ‘समय की प्रामाणिकता’ बन कर कृति में उपस्थित है और सतही न होकर पात्रों की गहरी संवेदना के रूप में व्यक्त हुई है।

मध्यवर्गीय अतीत मोह

खानदान और कुलीनता को लेकर रशीदा ने गहराई से सोचा है। खानदान के दरख्त जिसे मुसलमान परिवारों में ‘शजरा’ कहा जाता है, को आधार बना कर रशीदा ने मध्यवर्गीय मनोवृत्ति का अच्छा और सटीक विश्लेषण किया है। अपनी कुलीनता का दंभ, अपने रक्त की शुद्धता का आग्रह न केवल मुसलमान-मध्यवर्ग की विडम्बना है, अपितु यह पूरे मध्यवर्ग की सीमा है। मंजूर एहतेशाम ने इस मध्यवर्गीय दुराग्रह के स्वरूप को व्यक्त करने के साथ-साथ इसके दूरगामी परिणामों पर भी निगाह डाली है। इस सिलसिले में एक लंबा उद्धरण अनुचित न होगा

“इस खानदानी शजरे की काट-छाँट करने वाली इसे तरतीब देने और इस बात का फैसला करने वाली कि किस शाख को कहाँ खत्म हो जाना चाहिए, किसे याद रखना अथवा किसकी ओर से लापरवाह हो जाना चाहिए, एक विशेष मध्यवर्गीय मनोवृत्ति लगती है, जिसे न तो इस बात का गुमान या गलतफहमी होती कि उनमें कोई ऐसा भी पैदा हो सकता है जो अकेला सारे शजरों – सिलसिलों पर भारी पड़े, न ही इतनी हिम्मत और हौसला कि वह अपने खानदानी दरख्त पर चोरी, बदमाशी और एक सीमा से नीचे की गरीबी को हरा-भरा पनपता देख सके। जो मध्यवर्गीय संस्कारों की इज्जत-आबरू बचाये रखने के लिए किसी प्रकार की बेईमानी करने से भी नहीं चूकती और जिसकी मंशा बस इतनी ही होती है कि खम ठोंक कर दुनिया से कह सके – देखा! हमारा खून कितनी पीढ़ियों से बिना किसी मिलावट के चला आ रहा है।”

यह उद्धरण मुख्यतः दो प्रवृत्तियों – ‘नास्टेल्जिया’ ‘हिप्पोक्रेसी’ अर्थात् अतीत-मोह और आचरण के दोहरेपन की ओर संकेत करता है। यह केवल सैद्धांतिक कथन भर न होकर उपन्यास के पात्रों और संदर्भो से जुड़ा हुआ जीवन-सत्य है। रशीदा-सुहैल की मम्मी जब अपने पिता के बारे में बात करती है तो उनका चेहरा गर्व और खुशी से चमक उठता है। वे बहुत फक्र से बताती हैं कि पिता नवाब के महल के बाब खाने के मुहतमिम थे। नयी पीढ़ी का प्रतिनिधि सुहैल मज़ाक उड़ाता है “साफ-साफ कहिए न कि महल पर बावर्ची थे, खाना पकाते थे।’ अम्मी के साथ बातचीत में अबू तब और अब के फर्क को आसानी से कह जाते हैं – “हमारे बाप तो सवार थे रियासत में। आज उन्हें कोई सिपाही कहे तो क्या गलत है?’ सवार सुन कर यह मालूम होता है जैसे कोई बड़ी अफलातूनी चीज हो, और सिपाही कहने से खाकी में लाठी थामे सड़कों पर मारा फिरता बदहाल इंसान आँखों में घूम जाता है। मुहतमिये बावर्ची खाना कहलो या सिर्फ बावर्ची, क्या फर्क पड़ता है” अब्बू जैसे आधुनिक विचारों के व्यक्ति को फर्क नहीं पड़ता, लेकिन अतीत के व्यामोह में फंसे और अपनी हीनता-ग्रंथि को कुलीनता के दंभ से ढकने में समूचा मध्यवर्ग आज भी जुटा हुआ है।

सुहैल के मित्र विजय और रशीदा की बातचीत में इस महत्वपूर्ण सत्य को कहा गया है कि मध्यवर्गीय व्यक्ति यदि सामंती सोच से थोड़ा हटता है तो प्राचीन परंपरा और संस्कृति के गुणगान में लग जाता है। विजय का कथन है कि हिन्दुस्तान की संस्कृति पर गर्वित होना अनुचित नहीं है। यहाँ रशीदा का विचार स्वयं उपन्यासकार का विचार लगता है। वह साफ कहती है – “लेकिन क्या जो था बस उसी का कसीदा पढ़ते रहना काफी है? तुम नहीं समझते कि यह संस्कृति जैसे शब्द अगर डिक्शनरी से निकाल दिये जायें तो देश के लिए बहुत अच्छा होगा?” उसका सुझाव है

“सारे लोग पास्ट से नाता तोड़ कर किसी ऐसी चीज को अपनाएँ जो आज के इंसान के दिमाग के ज्यादा करीब हो।”

सिलसिले में रूस का उदाहरण उसके सामने है। दरअसल अतीत’-गौरव जब पात्र या वर्ग का मनोरोग बन जाता है तो अनेक तरह की समस्याएँ पैदा करता है। साम्प्रदायिक विद्वेष, उग्रवाद आदि इसी से जन्मते हैं। व्यक्ति के पैर बीसवीं सदी में होते हैं, दिमाग चौदहवीं-पंद्रहवीं सदी में कैद होता है। मध्यवर्ग के आचरण और कथनी में फर्क का एक कारण भी यही है। रशीदा का सोचना सही है कि मध्यवर्गीय परवरिश कुछ इस प्रकार की होती है कि वह ‘सोचने’ और ‘जीने’ में हमेशा एक दरार या खाईजी बनाये रखती है।

“देखा जाये तो हमें पाला-पोसा ही इस तरह से जाता है कि हम सोचें एक ढंग से और बोले और जिए दूसरे ढंग से। क्या मतलब है उन बड़े-बड़े लेखकों और किताबों का हमारे जीवन के संर्दभ में? हम पढ़ते उन लोगों के बारे में हैं जो हमारे भूगोल का हिस्सा नहीं। पढ़ने के बाद सोचने में उसका असर आना बिल्कुल स्वाभाविक है। पढ़ते हैं हम सीमन द बूवा को और रहते हैं एक ऐसे समाज में जहाँ की औरत अपने पति के लाख आग्रह के बाद भी पर्दा नहीं तोड़ पाती।’ अतीत जीविता केवल कम पढ़े-लिखे लोगों का मनोरोग नहीं है। सुहैल जैसे पढ़े लिखे संवेदनशील मुसलमान की स्वीकारोक्ति है कि हम लोग बीते हुए को याद करके मातम करने वाले हैं। पूंजीवादी मानसिकता के प्रसार ने मुस्लिम मध्यवर्ग को खूब प्रभावित किया है। जहाँ रक्त की शुद्धता निर्णायक हुआ करती थी, वहाँ अब रिश्तों का निर्धारण ‘सम्पन्न्ता से होने लगा है।’ ‘गरीबी’ को अभिशाप समझ कर गरीब रिश्तेदारों के प्रति उपेक्षा और अवज्ञा का भाव और अमीरों का सम्मान बढ़ जाना एक खतरनाक प्रवृत्ति है, जिसे उपन्यासकार ने गंभीरता से लिया है।

“मध्यवर्ग दुनिया की दूसरी सैकड़ों बुराइयों को फिर भी बर्दाश्त कर सकता है, उनकी ओर से आँखें मूंद सकता है, लेकिन एक बुराई ऐसी है, जिसे कबूल करने की कोशिश में लाख चाह कर भी कामयाब न हो सका। चोर-कातिल, बेईमान आदि काफी हद तक खंदा-पेशानी से कबूल – एक सीमा से नीचे की गरीबी पसंद नहीं।”

यही वजह है कि आज ‘खानदान’ का नाम लेते समय दूरदराज के ताल्लुक वाले अमीर लोगों की गणना तो होती है, खून के हिसाब से बेहद करीब रिश्तेदार गरीब होने से खानदान के बाहर गिने जाते हैं। यह सोच और इस सोच का व्यावहारिक रूप मध्यवर्गीय दोगलेपन का एक जीता जागता प्रमाण + मुस्लिम समाज के लिए तो यह और भी चिंताजनक है, क्योंकि वहाँ जाति और वर्ग पर आधारित विभाजन मान्य नहीं है। उपन्यासकार ने इस प्रकार की मनोवृत्ति को बहुत सलीके से खारिज किया है। उसने दिखाया है कि किस तरह अबू के समय में उनके परिवार को खानदान में महत्वपूर्ण दर्जा हासिल था क्योंकि वे सम्पन्नता की परिधि में आ जाते थे। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद परिवार की उपेक्षा शुरू हो जाती है। लोग बिना किसी जोखिम या डर के लापरवाही का सुलूक करने लगते हैं। परवेज जैसे कुछ रोशन दिमाग अवश्य इस मनोवृत्ति से बचे हुए हैं, इसलिए रशीदा और सुहैल से बहुत अपनेपन के साथ मिलते हैं। परवेज के आने पर उनके यहाँ रिश्तेदारों की भीड़ जुटने लगती है लेकिन परवेज इन अजनबी रिश्तों के बोझ को बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। उनके मुल्क छोड़ने के कारणों में एक यह भी प्रमुख कारण है – “कोई भी चला आ रहा है – यह चचा जान हैं! यह मामू जान हैं! दावतें हो रही हैं, रोज अजनबी और बेवकूफ लोगों को खफा करने के डर से आप उनकी खिदमत मे हाजिरी दे रहे हैं। मैं कहता हूँ – क्यों? मैं अपनी मर्जी से क्यों नहीं आ जा सकता? यह कथन संकेत देता है कि पढ़े-लिखे युवा अब मध्यवर्गीय दिखावे की प्रवृत्ति से ऊब चले हैं और अपनी शर्तों पर जीने के इच्छुक हैं।”

मध्यवर्ग की सभी प्रमुख प्रवृत्तियाँ मुसलमान समाज के मध्यवर्ग में भी मौजूद है। अतीत के प्रति मोह और व्यर्थ का दिखावा। ये दो प्रवृत्तियाँ कई तरह की जटिलताओं और अन्तर्विरोधों को जन्म देती है।

कुलीनता और रक्त की शुद्धता का दंभ मुस्लिम मध्यवर्ग में गौरव की वस्तु है। लेकिन ‘गरीबी’ की स्थिति में खानदानी जुड़ाव संकट में पड़ जाता है। गरीब रिश्तेदार हाशिये पर चले जाते हैं, जैसा कि ‘सूखा बरगद’ में अब्बू के परिवार के साथ हुआ है।

पढ़ा-लिखा मुसलमान मध्यवर्गीय मनोवृत्ति से उबरने की कोशिश में है। अब्बू परवेज, रशीदा, सुहैल आदि पात्रों का आत्मसंघर्ष इस संदर्भ में दर्शनीय है। ये सभी प्रगतिशील विचारों की रोशनी में नए रास्तों की ओर बढ़ रहे हैं।

रूढ़ियों और नये मूल्यों का द्वंद्व

मंजूर एहतेशाम ने देश-विभाजन, औद्योगीकरण, जनतांत्रिक व्यवस्था, नगरीकरण आदि परिवर्तनों की पृष्ठभूमि में मुस्लिम मध्यवर्ग की समस्याओं को विस्तार से बयान किया है। इस बयान के भीतर से ही समाधान की दिशाएँ भी खलती हैं। हालांकि अन्य समाजों की तरह मुस्लिम समाज भी आधुनिकता के संपर्क में आया है, सोच-विचार, खान-पान के तरीके बदले हैं, फिर भी उसकी खासी शक्ति आज भी धार्मिक-सामाजिक रूढ़ियों से टकराने और जूझने में जाया हो रही है। उपन्यासकार ने मामूली लगने वाले विवरणों से इस संघर्ष को गौरतलब बनाया है। दीनी तालीम देने वाली फफू तस्वीरों के बारे में पुराना नजरिया इन शब्दों में व्यक्त करती है।

“यह सब गुनाहगार हैं, चाहे तस्वीर बनाये या खिंचवायें और इनका घर जहन्नुम है!” अब्बू जैसे आधुनिक लोग इस दृष्टिकोण से असहमत हैं और वे अकेले मुसलमान हैं, जिनके घर तस्वीरें खुलेआम रखी रहती हैं। तस्वीर संबंधी प्रतिबंध समय के साथ-साथ शिथिल हो जाता है। हज यात्रा बिना पासपोर्ट के नहीं हो सकती और पासपोर्ट के लिए चित्र जरूरी है। हज यात्रा के इच्छुक किसी व्यक्ति का ‘चित्र’ को लेकर आपत्ति न करना जाहिर करता है कि फोटो। और जहन्नम का रिश्ता एक आरोपित रूढ़ि ही था। इस सिलसिले मे सहैल का अपने भोलेपन में पूछा गया सवाल इस रूढ़ि की निरर्थकता की पुष्टि करता है – “आप भी हज करने जाएँगी तो क्या फोटो खिंचवाना पड़ेगा? क्या नन्हे चचा पर भी गुनाह होगा, फोटो खिंचवाने का।”

अल्लाह ओर रसूल के हवाले से औरतों के मस्जिद में जाने की मनाही का उल्लेख उपन्यास  में है, जबकि फफू स्वयं मस्जिद में जाती है और कोई इस पर ध्यान नहीं देता है। मुसलमानों की नयी और पढ़ी-लिखी पीढ़ी नमाज और रोजे को लेकर उतनी पाबंद और सचेत नहीं है। अब्बू इंसान को सबसे बड़ा खुदा मानते हैं और परवेज पर मार्क्सवादी विचारधारा का असर है। जहाँ परिवार में स्त्रियाँ धार्मिक है, रूढ़ियों की कायल हैं और पुरुष अपेक्षाकृत आधुनिक ख्यालों के हैं, वहाँ एक वैचारिक-सांस्कृतिक तनाव बना रहता है। ऐसे माहौल में पलने वाले बच्चों को बहुत मुश्किल होती है। उन्हें दीनी तालीम और आधुनिक शिक्षा मे भी तालमेल बिठाना होता है। रशीदा ने अपने परिवार में स्थित विचार-व्यवहार के दो विरोधी सिरों और इनके द्वंद्व के बीच बदलाव की आहट को इस प्रकार अनुभव किया है।

“मैंने अब्बू को कभी बचपन में नमाज पढ़ते या मस्जिद में जाते नहीं देखा, मम्मी नमाज की खासी पाबंद थी। सारे खानदान से जुदा अब्बू आमतौर पर शेरवानी के बजाय कमीजपैंट या कोट पहनते थे। शेरवानी कभी यूँ ही किसी शादी-ब्याह या किसी तकरीब पर, लेकिन नमाज को तो मैंने उन्हें ईद पर भी कभी जाते नहीं देखा। यह सब अपनी जगह, लेकिन अम्मी शुरू से ही बुर्का ओढ़ती थीं।

इस गद्यांश से कई बातें जाहिर होती हैं। एक तो यह कि अब्बू रूढ़िवादी मुस्लिम मध्यवर्ग की हदों को फलांग कर नये जमाने से कदम मिलाने वाले व्यक्ति थे। दूसरे, वे व्यक्ति मात्र न होकर एक प्रतीक भी हैं। उन लोगों के प्रतीक, जो संख्या में कम थे, लेकिन रूढ़ियों को झटकने की जरूरत महसूस कर रहे थे। इस अवतरण से यह लग सकता है कि परिवर्तन की दस्तक पुरुषों तक ही सीमित थी। वस्तुतः ऐसा नहीं है। रशीदा के छोटे मामू अधिक रूढ़िवादी हैं, जबकि मुमानी अपनी बेटियों को स्कूली शिक्षा देने के पक्ष में हैं। मामू तो सहशिक्षा वाले स्कूल में रशीदा और सुहैल के भर्ती किये जाने की बात पर ही आग बबूला हो जाते हैं। जिन ताया अब्बा ने अब्बू को ‘आजाद-ख्याली’ के जुर्म में बहिष्कृत किया था, उनकी संतान पर्दा, नारी-शिक्षा आदि के मामले में खुलेपन का परिचय देती है “उनकी औलादें बिना किसी इंकलाब के ऐलान या शर्मिंदगी के आज कीमती इंग्लिश मीडियम स्कूलों में पढ़ रही हैं, आज के फैशन के मुताबिक पहन और जी रही है। बुर्का है तो सिर्फ खानदान में एक दूसरे के घर जाने को, वरना नार्मल लोगों की तरह लड़कियाँ बेपर्दा घूम-फिर रही हैं।” यह बदलाव मामूली नहीं है, अनेक कथित मजहबी हिदायतों और कायदों की उपेक्षा करके यह अस्तित्व में आया  है।

यद्यपि मुस्लिम मध्यवर्ग और हिंदू मध्यवर्ग की अधिकतर समस्याएँ एक जैसी हैं। लेकिन उपन्यासकार ने एक ऐसी समस्या उठायी है, जिसका संबंध मूलतः मुसलमानों के धार्मिक विश्वास है। इस विश्वास के तहत सूअर का मांस खाना मुसलमान-मात्र के लिए वर्जित है, ठीक वैसे, जैसे किसी हिंदू के लिए गाय का माँस। दोस्तों के उत्तेजित करने पर अबू सूअर के माँस की एक बोटी खा लेते हैं, क्योंकि धार्मिक वर्जना उन्हें मान्य नहीं। लेकिन उनका यह दुस्साहस उन्हें अपने खानदान से काट देता है। अब्बू इस मामले में कोई छद्म नहीं पालते हैं और केवल चिढ़ाने या चौंकाने के लिए सूअर खाने का ठिंढोरा भी नहीं पीटते। सुहैल को अब्बू के सुअर खाने की बात असगर साहब ने बताई थी क्योंकि असगर साहब जेसे व्यक्ति को यह बर्दाश्त नहीं है। वह इसे इस्लाम विरोधी कृत्य ही नहीं समझते बल्कि इसके आधार पर राजनीति भी करना चाहते हैं। सुहैल जब से इनके साथ संबंध रखने लगा है वह भी उनके इस तर्क से सहमत होता है। यह संदर्भ इसलिए भी गौरतलब है कि धर्म और सम्प्रदाय के नाम पर देश के विभाजन के जिम्मेदार मुहम्मद अली जिन्ना के बारे में कई साक्ष्य हैं कि वे सूअर का माँस बेहिचक खा लेते थे, लेकिन इसको सार्वजनिक करने से बचते थे (संदर्भ – असगर अली इंजीनियर का आलेख ‘स्वतंत्रता संग्राम : एक दृष्टिकोण , ‘कहन’, सितम्बर 1996)। असगर साहब की राजनीति एक जाति विशेष की विरोधी ही नहीं अपनी सोच में मानव विरोधी है। सुहैल के मन पर पड़े इस प्रभाव को दूर करना अब्बू जरूरी समझते है। आने वाली सुहैल की पीढ़ी को वे अधिक उदारवादी और वैज्ञानिक सोच वाली देखना चाहते हैं। सुहैल को इस बात के संदर्भ में वे कहते हैं “जब दो हिंदू एक दूसरे से लड़ते हैं या एक मुसलमान दूसरे के छुरा मार देता है, तो असगर साहब को उनकी जिहालत पर कोई दुख नहीं होता, लेकिन अगर एक हिंदू और मुसलमान में तू-तू मैं-मैं भी हो जाए तो उन्हें उसके पीछे सियासत-ही-सियासत नज़र आती है।”

इसी बहस के दौरान अब्बू सुहैल को बहुत महत्वपूर्ण बात बताते हैं। उनका यह पूर्ण विश्वास है कि शासकवर्ग धर्म का उपयोग अपने स्वार्थ के लिए करता है। इसके द्वारा शासनकर्ता जनता की गरीबी और अंधविश्वास का सहारा लेकर उन्हीं का शोषण करता है। जगह-जगह मस्जिद और मंदिर बनवा देना इसी शोषण की एक सुनियोजित साजिश है जिससे “आदमी हुकूमत करने वाले के भी हाकिम की इबादत करता रहे। सारे दुख मुकद्दर समझकर सहता रहे और उससे दुआ करे कि मरने के बाद जन्नत मिल जाए और यह समझदार लोग इसी दुनिया में जन्नत के मज़े लेते रहे, अवाम के साथ मनमानी करते रहे। धर्म के आधार पर राजनीति करने वालों में असगर साहब भी शामिल है। उनकी कोशिश यही है कि आदमी हिंदू या मुसलमान ही बना रहे। आदमी न रहे।

मंजूर एहतेशाम ने अब्बू के चरित्र द्वारा हिंदू-मुसलमान की समस्याओं को बहुत गहराई से समझाने का प्रयास किया है। आमतौर पर इस समस्या को बड़े ही सतही रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन इस समस्या की जड़े बहुत गहरे तक पहुंची है। धर्म को इस समस्या का केंद्र बनाया है। हमेशा एक धर्म का अपनी श्रेष्ठता को बनाए रखने की जी-तोड़ कोशिश में दूसरे धर्म को नीचा दिखाने का लगातार प्रयत्न करना, इसके मूल कारणों में शामिल है। धर्म का शोषण की संगठित संस्था के रूप में इस्तेमाल करने वाले तत्वों की ओर संकेत करते हुए अब्बू कहते हैं “मज़हब इनके लिए एक ख़ास रब की इबादत करना, या ख़ास तरह जिंदा रहना ही नहीं, सबसे पहल तो एक धंधा है। बिल्कुल ऐसा ही समझ लो जैसे जूते बेचना।’ धर्म के इस व्यावसायिकरण के कारण ही हिंदू-मुसलमान समस्या को शासन द्वारा कायम बनाए रखने की कोशिश दिखाई देती है।

मध्यवर्गीय परिवार के किशोरों और युवक-युवतियों के लिए “सेक्स’ का ज्ञान भी एक समस्या है। वे ‘सेक्स’ को आतंक के तौर पर झेलते हैं। एक खासी उम्र तक रशीदा यही समझती है कि बच्चे यूँ ही पति-पत्नी के साथ रहने से पैदा होते हैं। इसके लिए पति-पत्नी के शारीरिक संबंध की जरूरत नहीं होती। विजय के साथ सहवास के बाद रशीदा और स्वयं विजय जो कुछ महससते हैं, अपराधभाव को जिस तरह भोगते हैं, वह मध्यवर्गीय नैतिक सोच का एक अंग है। रशीदा को लगता है कि यह ऐसी भूल है, जिसका कोई प्रायश्चित संभव नहीं है। लेकिन शीघ्र ही वह इस घटना को एक स्वाभाविक घटना मान कर अपराध बोध से मुक्त हो जाती है। वह न केवल विजय के विवाह-प्रस्ताव को ठुकराती है, बल्कि अपने प्रति दया या करुणा दिखाने को भी अच्छा नहीं मानती। इस तरह वह मध्यवर्गीय नैतिकता का अतिक्रमण करने का प्रमाण देती है।

मध्यवर्ग का आर्थिक संघर्ष

रशीदा के माध्यम से बार-बार यह बात दोहराई गई है कि उनके परिवार की पहचान उनके सामाजिक-आर्थिक स्थिति के कारण निर्धारित होती है, ना कि एक संप्रदाय विशेष से होती है। रशीदा महसूस करती है कि जीवन के छोटे-छोटे सुखों को तलाशते या दुखों को झेलते हुए मध्यवर्गीय समुदायों के बीच में कोई बुनियादी फर्क नहीं है। फर्क केवल सांस्कृतिक स्तर पर नज़र आता है, क्योंकि वह संस्कारों से बहुत स्पष्ट रूप से बयान करने का ध्येय जुटा नहीं पाई है। वह यह कहते हुए अपने मन को तसल्ली दे रही है ‘हम लोग कल्लो और सईदा आपा की दुनिया और कुसुम, नसीमा या दीपक की दुनिया के अलावा एक तीसरी दुनिया में थे, जहाँ कभी ऊपर से बहुत दूर नीचे की दुनिया के पास खुद को पाते, किसी पल फिर एकदम ऊपर की दुनिया के पास पहुँच जाते। मैं सोचती हूँ, जहाँ मैं थी वहाँ से कल्लो या कुसुम तक बराबर की ही दूरी थी। आसपास की थोड़ी-सी-चीजें न होती तो मैं भी कल्लो हो जाती – इब्बू दादा की गालियाँ सुनती, भैंस के आगे चारा डालती। या कुछ और थोड़ा सा होता तो कुसुम – लड़कों से फ्लर्ट करती।’ रशीदा की सोच में हिंदू-मुसलमान की सामाजिकआर्थिक स्थिति को एकसा बनाने वाले कारण यहाँ की सामाजिक और आर्थिक नीतियों पर निर्भर है। लेकिन धर्म के आधार पर राजनीति करने वाले इसे नहीं मानते। वे इसका आधार धर्म में ही ढूँढते हैं और इसके लिए निरंतर कोशिश करने में लगे है कि हिंदू-मुसलमान संप्रदाय इस पर विश्वास करें और इस आधार पर आपसी-मतभेद बने रहे। सिर्फ हिंदू-मुसलमान को दो संप्रदायों में बाँटकर अपना महत्व बढ़ाना भ्रष्ट राजनीति का प्रथम मुद्दा बना हुआ है। मानवीय संवेदनाओं का लोप हो रहा है। कल तक भाई चारे से रहने वालों के मन में एक-दूसरे के प्रति विद्वेष भरने वाले प्रसंगों का बोलबाला बढ़ता जा रहा है।

हिंदू-मुसलमानों को दो संप्रदायों में विभाजित करके अपने स्वार्थ को पाने की होड़ धर्म के ठेकेदारों और भ्रष्ट नेताओं में बराबर देखी जा रही है। परिणामतः सांप्रदायिक सोच को बढ़ावा मिलने से संवेदनात्मक धरातल से आपसी भाईचास जैसे मानवीय मूल्य नष्ट हो रहे हैं। कल तक राष्ट्रीयवाद या देशभक्ति के खातिर एक साथै संघर्ष करने वाले समुदायों के बीच अब खोखली देशभक्ति या राष्ट्रीयवाद की परिभाषा बदल देने के कारण दरारे पड़ती नजर आती है। विद्वेष की ज्वाला इतनी अधिक भड़क उठती है कि उसकी लपटों में देशभक्ति व राष्ट्रीयवाद को तार-तार होकर सूली पर लटका हुआ पाते हैं। अब्बू जैसे प्रगतिशील सोच को अपनाने वाले बुद्धिजीवी के लिए मानवीय मूल्यों के हो रहे पतन को रोकने की चिंता करना स्वाभाविक हो जाता है ‘मैं इंसान के अलावा किसी खुदा में विश्वास नहीं रखता।’

धार्मिक कट्टरता के वे खिलाफ है। ‘बेगिनती मस्जिद और मंदिर बनवा दो। जहाँ यह आदमी, हुकूमत करने वाले के भी हाकिम की इबादत करता रहे। ताकि बुनियादी जरूरतों से लोगों का ध्यान हटाया जा सके।’ बहुसंख्यक समुदाय की यही कोशिश रही हैं कि यदि सत्ता हासिल करना है और सत्ता में बने रहना है तो साम्प्रदायिक राजनीति का खुलेआम इस्तेमाल किया जाए। सत्ता के साथ स्वार्थ जुड़ा हुआ है, वे जनतांत्रिक मूल्यों को पैरों तले कुचलकर, स्वार्थांधता के पीछे समाज के सबसे पिछड़े, दबे-कुचले तबके को सबसे पहले अपनी लपेट में ले लेता है।

राजनीतिक सत्ता को हासिल करने हेतु जिस धार्मिक उन्माद की स्थिति को बढ़ावा दिया जाता है और सांप्रदायिक कटुता को बढ़ाने वाली साजिशों के तहत दोनों समुदायों की देश के प्रति निष्ठा को लेकर आपस के भाईचारे को टूटने की स्थिति तक खींचा जाने लगता है, देश में सांप्रदायिक दंगों की स्थिति उत्पन्न होती है। ऐसी स्थिति में सबसे अधिक शोषण और उत्पीड़न को समाज के सबसे निम्न तबके को ही झेलना पड़ता है। सांप्रदायिकता की मार सबसे अधिक समाज के गरीब, असहाय तबके पर ही पड़ती है चाहे वह अल्पसंख्यक है अथवा बहुसंख्यक इससे कोई फरक नहीं पड़ता। क्योंकि ऐसे सांप्रदायिक दंगों में सुरक्षा देने वाला तंत्र व राज्य भी सांप्रदायिक बन जाता है। वह हिंदू और मुसलमानों में भेद करने लगता है। इंसान की सुरक्षा का मूलतत्व यहाँ पर धार्मिक कट्टरता में विलिन हो जाता है। अल्पसंख्यक समुदाय साम्प्रदायिक को किस तरह देखता है, उसकी मनःस्थिति को उपन्यास में सुहैल के माध्यम से अभिव्यक्त किया है। सुहैल चिंतित अंदाज में कहता है’जमशेदपुर कर्बला बना हुआ है। मुसलमानों को मार-मार कर नास कर डाला है। वह जो एक राइटर था – हिंदू-मुसलमान भाई-भाई की थीम पर उर्दू में जिंदगी भर कहानियाँ लिखता रहा, उसे भी निपटा दिया।’

मध्यवर्ग की सबसे प्रमुख समस्या आर्थिक है। मध्यवर्ग सुविधाओं में जीना चाहता है, लेकिन माली हालत इसके लिए इजाजत नहीं देती। ‘सूखा बरगद के अब्बू न तो फिजूलखर्च हैं और न समझौतापरक हैं। इसलिए उनके खाते-पीते परिवार को प्रायः अर्थाभाव का अहसास होता है। रशीदा-सुहैल के पास गिनती के यूनीफार्म हैं, जिन्हें वे सँभाल कर पहनते हैं। रशीदा को हमेशा डर लगता है कि कहीं उसका नाम फीस न दे पाने वाले बच्चों की लिस्ट में न हो। रशीदा का साइंस छोड़कर आर्ट्स में दाखिला लेना भी मध्यवर्गीय मजबूरी के तहत है। इस मजबूरी को आधार बना कर रशीदा ने अपनी हैसियत को जिस प्रकार से रेखांकित किया है, वह वस्तुतः मध्यवर्ग की नियति है। थोड़ा सा धन और सुविधाएँ होने, न होने से मध्यवर्ग का वर्ग चरित्र बदल जाता है। कल्लो (निम्न वर्ग) और कुसुम (सम्पन्न वर्ग) से तुलना करते हुए रशीदा का सोचना सही लगता है “मैं सोचती हूँ जहाँ मैं थी वहाँ से कल्लो या कुसुम तक बराबर की ही दूरी थी। आसपास की थोड़ी सी चीजें न होती तो मैं भी कल्लो हो जाती – इब्बू दादा की गालियाँ सुनती, भैंस के आगे चारा डालती। या कुछ और थोड़ा सा होता तो कुसुम – लड़कों से फ्लर्ट करती।” इस माहौल और मानसिकता में पल कर रशीदा का व्यक्तित्व धीरेधीरे अपनी स्वतंत्र पहचान बना लेता है। उपन्यास के अंत में यह देख कर अच्छा लगता है कि वह अपनी शर्तों पर जीने वाली कामकाजी महिला का जीवन बिता रही है। उसकी आत्मस्वीकारोक्ति है “धीरे-धीरे वक्त मुझे अपने साँचे में ढालता जा रहा है, जिसकी पहली शर्त जीना और दूसरी अपनी शर्तो पर जीना है।’ न केवल रशीदा अपितु सुहैल और परवेज के रूप में नया मध्य वर्ग अपनी शर्तों पर जी रहा है। पिछली पीढ़ी के मुकाबले उसका मानसिक विकास हुआ है, वह संकीर्णता से मुक्त हो रहा है। उपन्यास के शुरू में खानदान की साहित्यिक रूचि की सीमा, कविता में ‘गालिब’, ‘मोमिन’, ‘इकबाल’ और कथा साहित्य में प्रेमचंद और कृश्नचंदर तक सीमित है। कोई बुर्जुग ‘मंटो’ का नाम सुन लेता है तो उबल पड़ता है क्योंकि मंटो उनकी नजर में एक गाली थी। एक ख्याल यह भी था कि हिंदी में कोई लेखक हुआ ही नहीं। हिंदी के शब्दों या हिंदी भाषियों के उच्चारण का मजाक सामान्य बात थी। लेकिन सुहैल, परवेज के रूप में नयी पीढ़ी ‘दास्तोवस्की’, ‘स्टाइबैक’, ‘पर्लबक’ आदि के साहित्य पर बाकायदा बहस करती दिखायी देती है। यह नयी पीढ़ी का साहस है कि वह जोश मलीहाबादी को पैसों की लालच में मजहब खरीदने वाला करार देती है। इन सभी उदाहरणों से उपन्यासकार यह संकेत देता है कि मुस्लिम मध्यवर्ग अब कढ़मग्ज और संकीर्ण नहीं रहा। वह शिक्षा और अध्यवसाय के जरिए अपना कैरियर बनाने के साथ-साथ बेहतर इंसान बनने के प्रति भी सचेत है।

मध्यवर्गीय नारी का बदलता बिम्ब

“सूखा बरगद’ में ‘मंजूर एहतेशाम’ ने मुस्लिम मध्यवर्ग की नारी के सोच और व्यवहार में आ रहे परिवर्तन को विस्तारपूर्वक रेखांकित किया है। एक ओर रशीदा की माँ, और उनके समकालीनों की पीढ़ी है, जो अशिक्षा, पर्दाप्रथा आदि अनेक रूढ़ियों के बीच पली है, दूसरी ओर रशीदा और रजिया की पीढ़ी है जो उच्च शिक्षा प्राप्त कर चुकी है, जरूरी होने पर नौकरी भी करती है और जिसकी सोच कई मुद्दों पर रूढ़ि विरोधी है। उपन्यास में फफू जैसी औरते हैं, . जिन्होंने अपने पति के बिछोह को भुलाने के लिए खुद को ‘नमाज’ और ‘इबादत’ में डुबो दिया है। रशीदा की माँ भी मजहबी संस्कारों से जकड़ी हुई है। सुहैल और रशीदा की दीनी-तालीम माँ के आग्रह पर ही शुरू होती है। लेकिन उपन्यासकार ने इन नारी चरित्रों को स्थूल, सपाट और निर्जीव बना कर नहीं रखा है। अपनी रूढ़ियों और संकीर्णताओं में बँध कर भी रशीदा के व्यक्तित्व में इंसानियत की उष्मा आश्वस्त करती है। अब्बू की प्रगतिशीलता के कारण भाई मियाँ और परिवार के लोग अब्बू का बहिष्कार कर देते हैं, लेकिन उनकी पत्नी अपने शौहर का साथ मुफलिसी और मतभेद के बावजूद नहीं छोड़ती। हर स्थिति में पति का साथ निभाने की इस मानसिकता को नारी की दासता का सूचक भी माना जा सकता है। लेकिन उपन्यासकार ने उसके और पति के बीच के रिश्ते को इंसानियत के आधार पर टिका दिखाकर किसी तरह की भावुकता या रूढ़ि को प्रश्रय नहीं दिया है। अब्बू ने अपने और पत्नी के रिश्ते का विश्लेषण इस प्रकार किया है।

” न जाने कितनी बार मेरे साथ वह भी भूखी रही, मेरी वजह से आधे खानदान में कहीं भी आना-जाना छोड़ दिया। उन्हें तो अपने भाई के पास या जेठ के घर ही रुक जाना चाहिए था ताकि मैं सबक सीख कर, उन्हें मना कर, दूसरों के बताये तरीकों से जिंदगी गुजारने लगता। क्या यह सारी तकलीफें उन्होंने यूँ ही, औरत होने के नाते बेवकूफी में सही! इस्लाम भी तो काफिर शौहर से निकाह करने को मना करता है। फिर क्या था, जिसने उन्हें मेरे साथ यँ बाँधे रखा – उनकी नजर में मेरे तमाम कुफ्र और गुमराही के बावजूद? यकीन जानो, अगर यह ताल्लुक मुसलमान से मुसलमान तक ही होता तो कभी का खत्म हो चुका होता। तुम्हारी माँ अगर यह सब दुख और तकलीफ सहने के बाद भी आज इस घर में हैं, तो रिश्ता इंसान से इंसान का है। उन्हें यह यकीन है कि मैं बहुत बेइमान या बुरा इंसान हर्गिज नहीं हूँ। और मुझे अगर यकीन है तो सिर्फ इसी रिश्ते में यकीन है कि एक इंसान के लिए आप कैसे इंसान हैं।”

अब्बू द्वारा कही गई बात अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद एक मध्यवर्गीय मुस्लिम नारी ‘इंसानियत’ को अधिक महत्व देती है। यह तब और विश्वसनीय लगता है कि जब हम पाते है कि उसी दौर की हब्बा बुआ, शप्पा आपा बड़ी आसानी से दूसरे पुरुषों के साथ रहने का फैसला कर लेती हैं। रशीदा की माँ का अब्ब का हर तरह की । तकलिफों और आर्थिक समस्याओं में साथ देना, किसी प्रकार का गुस्सा न दिखाना, इस बात का संकेत है कि उनका संबंध केवल पति-पत्नी तक ही सीमित नही था। बल्कि एक इंसान का दूसरे इंसान के साथ जिस प्रकार संवेदनात्मक रिश्ता होता है वह यहाँ कायम है। रशीदा और रजिया की पीढ़ी अपने मध्यवर्गीय संस्कारों, वर्जनाओं और कमजोरियों से पीछा छुड़ाने की कोशिश करती है। रशीदा को समाज का दोहरापन अखरता है। वास्तविकता कुछ है और उसे दिखाया जाता किसी ओर रूप में है। विशेषतः पति-पत्नी के संबंध इसी त्रासदी से गुजर रहे हैं ‘पढ़ते हैं हम सीमोन द बूवा को और रहते हैं, एक ऐसे समाज में जहाँ की औरत अपने पति के लाख आग्रह के बाद भी पर्दा नहीं तोड़ पाती। और पति-पत्नी की बात पर सब ही तो ऐसा दिखाना चाहते हैं जैसे आशिक और माशूक हों। यह जानते हुए भी कि उनकी सच्चाई लोगों से छिपी नहीं हैं।’

कथन और आचरण, वास्तविकता र भ्रम की दूरी को रशीदा जैसी आधुनिक युवतियाँ पाटना चाहती हैं। विजय के साथ सहवास के बाद उसकी तात्कालिक प्रतिक्रिया एक औसत मध्यवर्गीय और रुढ़ संस्कारों से घिरी युवती जैसी ही है। वह एक पाप-बोध से भर गयी है : “एकदम ऐसा लगा जैसे मुझसे कोई बहुत बड़ी भूल हो गयी – ऐसी जिसका कोई प्रायश्चित कर पाना संभव नहीं है। सुहेल समझेगा, मैंने और विजय ने मिल कर उसकी पीठ में छुरा मार दिया। अब्बू? क्या जब अब्बू ने फैसला करने का अधिकार मुझे सौंपा था तो कहीं दूर-दूर तक भी उनके दिमाग में ऐसे फैसले की रूपरखा रही होगी? मैंने उनके विश्वास को ठग लिया।” इस प्रकार सोचना रशीदा की अपनी सोच नहीं है। उसके आसपास का परिवेश समाज व समाज द्वारा बनाए नीतिमूल्यों का यह स्वरूप था। एक अविवाहित युवती के लिए एक खास तरह से निर्धारित किए गए नीतिमूल्य व पवित्रता का आडंबर रचा गया है। अपने लिए अपनी तरह से सोचने या निर्णय लेने का भारतीय समाज में चाहे वह हिंदू या मुसलमान हो, नारी को अधिकार नहीं दिया है। ऐसी स्थिति में रशीदा का अपने जीवन में घटित इस घटना के बारे में सर्वप्रथम इसी प्रकार से सोचना उसके आसपास के परिवेश के दबाव और प्रभाव को दर्शाता है। लेकिन यह अपराधबोध और पाप बोध अधिक देर तक नहीं बना रहा। बाद में वह इसे एक सहज-स्वाभाविक घटना के रूप में लेती है और ऐसा नहीं सोचती कि इस घटना की परिणति केवल विजय के साथ विवाह के रूप में होनी चाहिए। जब विजय इस संबंध में गंभीरता दिखाता है तो वह इसे पुरुष का आदर्शवाद और उदारता का प्रदर्शन जान कर तिलमिला उठती है। यह तिलमिलाहट सकारात्मक होने के साथ-साथ शिक्षित मुस्लिम युवती के बदलते सोच का भी प्रतिनिधित्व करती है।

“ओफ यह आदर्शवादिता! मैं भीतर ही कहीं तिलमिला उठी थी। एकदम ऐसा लगा, विजय उदारता की एक मिसाल कायम करना चाहता है। अपना जीवन इस उदारता के खूटे पर सदके की बकरी की तरह बाँध कर केवल भविष्य के लिए एक मिसाल ही इस समय उसका मूल्य है। मैं वह खूटा में बनूँ?”

मुस्लिम नारी के सोच में क्रांतिकारी परिवर्तन आया है। वह भी कथित मजहबी संस्कारों की गुंजलक को ढीला करने में जुटी है। मुस्लिम लड़कियों को आधुनिक शिक्षा का अधिकार दिया जाना एक क्रांतिकारी परिवर्तन है। रशीदा का रेडियो स्टेशन पर नौकरी करना मुस्लिम युवतियों के आत्मनिर्भर होने की दिशा में एक सफल प्रयास है। ‘सेक्स’ को लेकर मध्यवर्गीय नैतिकता या यौन शुचिता को लेकर भी मध्यवर्गीय मानसिकता बदल रही है। मुसलमानों में बहुविवाह आम है। लेकिन इस उपन्यास में शायद ही किसी पात्र की एक से अधिक बीबियाँ हों। यह तथ्य भी नये परिवर्तन की गवाही देता है।

‘सूखा बरगद में मुस्लिम मध्यवर्गीय समाज की उन समस्याओं और कारणों को विस्तार से कहा गया है, जो उसकी मानसिकता को गढ़ने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं।

सकारात्मक धर्मनिरपेक्ष सोच

‘सूखा बरगद में मध्यवर्ग के डर और दहशत का एक विशेष आयाम चित्रित हुआ है, जिसका संबंध केवल मुसलमानों से है। विभाजन के बाद जो मुसलमान यहाँ रह गये, वे बराबर आशंकित रहे कि हिन्दुओं के वर्चस्व वाले हिन्दुतान में उनके साथ अच्छा सुलूक नहीं होगा। सारे आश्वासनों के बावजूद उन्हें असुरक्षा का भय बराबर सताता रहा। दंगे-फसाद होने पर उनका डर और पुष्ट हो जाता है। रही सही कसर कट्टरवादी तत्व पूरी कर देते हैं। पूरी कौम को मजहब के नाम पर एकजुट और दूसरे समुदायों से अलग-थलग रखने की प्रवृत्ति बहुत चिंताजनक है। अपेक्षाकृत पढ़ा-लिखा वर्ग इस दुष्प्रचार की पकड़ में जल्दी आ जाता है। यह समूची विडम्बना ‘सूखा बरगद के कथ्य की बुनावट में मुख्य भूमिका निभाती है। उपन्यासकार के अनुभव, सूक्ष्म निरीक्षण-शक्ति और उसका अपना सोच उपन्यास में संश्लिष्ट और प्रभावशाली रूप में सामने आये हैं। साधारण से साधारण विवरणों में उपन्यासकार ने महत्वपूर्ण संकेत छोड़े हैं। उसने दिखाया है कि अतिवादी और कट्टरतावादी तत्व किस तरह तत्वों को तोड़-मरोड़ कर बरगलाते हैं।

नकारात्मक और जहालत के माहौल में जब कुछ लोग सही ढंग से सोचते और करते हैं तो उन्हें अपमानित होना पड़ता है। अब्बू जैसे लोग उदार और संवेदनशील मुस्लिम मध्यवर्ग के प्रतिनिधि हैं और उपन्यासकार उन्हीं जैसे लोगों में संभावना के संदर्भ तलाशता है। मार्क्सवाद की दुहाई देने वाला परवेज भी इस उदार मध्यवर्ग का हिस्सा है, लेकिन उसका अंततः देश छोड़ देने का निर्णय उसे पलायनवादी करार देता है। लेकिन अब्बू की सोच सकारात्मक है। वे समस्याओं को प्रायः इंसान के संदर्भ में देखते-सोचते हैं। उन्होंने बँटवारे के समय का खूनखराबा देखा है और वकालत का पेशा सिर्फ इस उद्देश्य से अपनाया है कि इंसानियत को बनाये रखने में सहयोग कर सकें। उनके अनुसार “… इंसानों के लिए इंसानों का बनाया कानून ही ज्यादा बेहतर हो सकता है। इस कानून में हिन्दू-मुसलमान के बजाय एक बुनियादी इंसान का दुख-सुख समझने और परखने की गुंजाइश तो होगी, आसमानी जिंदगी और अगले जन्मों की जगह मौजूदा जिंदगी सही तरह गुजारने की हिदायतें तो होंगी। इंसान के बनाये कानून के साथ जो खिलवाड़ हो रही थी, उससे लड़ने का सोच कर मैंने यह पेशा चुना था …..”

लड़ने के इस क्रम में उन्हें मजहब, तंगनजरी और अपने आसपास के लोगों से भी लड़ना होता है। जहाँ दूसरों के लिए अपनत्व और आत्मीयता की कसौटी सिर्फ मुसलमान होना है, अब्बू इंसानियत की कसौटी पर संबंध बनाते हैं। इसीलिए वे अफीम के तस्कर रहीम का मुकदमा लड़ने से साफ मना कर देते हैं। वे विभाजन के संदर्भ में बातें करते हुए बहुत विश्वास से यह बात कहते हैं कि “यह आपसी नफरत का खेल अधिक दिन तक चलने वाला नहीं है।” वे यह भी मानते हैं कि ‘मज़हब नामी मिट्टी में अब नये पौधों की जडे पकड़ने की ताकत नहीं । रही।’ अब्बू के विचारों का ही असर है कि कुछ दिन तक सुहैल का दृष्टिकोण व्यापक हो जाता है। देश के बड़े समाज से कट कर रहने को वह उचित नहीं मानता “हम और हमारी आने वाली पीढ़ियाँ यहीं जियेंगी, यहीं मरेंगी, सच सिर्फ इतना है। जब मर कर इसी मिट्टी में मिलना है तो जीते जी यहाँ की जिंदगी से क्यों कटा जाए? देश को एक मिली-जुली तहजीब की जरूरत है, एक मिली जुली भाषा चाहिए, जिसे सब अपना समझ सकें। उसके लिए सबको थोड़ी-थोड़ी कुर्बानी देनी होगी। बात हिंदू और मुसलमान की नहीं वर्गों की है।”

उपन्यासकार ने उदार मध्यवर्ग की मानसिकता को बड़े ही स्पष्ट रूप से रेखांकित किया है। इसमें एक ओर धर्मनिरपेक्षता और ‘कंपोजिट कल्चर’ का पक्ष-समर्थन है, दूसरी ओर इस देश की मिट्टी से लगाव भी जताया गया है। वतन की मिट्टी वाला तर्क हिंदी के कई अन्य प्रसिद्ध उपन्यासों में भी है। फुन्नन खाँ (आधा गाँव) और खलील मियाँ (अलग-अलग वैतरणी) के विचार इस संदर्भ में देखे जा सकते हैं। उदार मुस्लिम मध्यवर्ग में प्रगतिशीलता के कारण नया सोच देखा जा सकता है। लेकिन निम्न मुस्लिम समुदाय पर कठमुल्लाओं की कट्टरता का प्रभाव अधिक जल्दी और गहरा दिखताहै। जिसके कारण मानसिकता में बहुत अधिक बदलाव नहीं आया है। या नही आता है तो उसका एक बड़ा कारण भविष्य की चिंता है। – ‘औलाद के वजूद का मसला व्यक्ति को संकीर्ण बना देता है।

इस उदार मानसिकता का सबसे बड़ा अन्तर्विरोध यही है कि जरा सी भावुकता इसे संकीर्णता की तंग गली में ला पटकती है। मंजूर एहतेशाम ने इस तथ्य को हिंदुओं – मुसलमानों के विवाह-संबंध के संदर्भ में उठाया है। रशीदा की स्मृति में इस तरह के थोड़े से विवाह हैं, जिनमें सहजता न होकर समझौते करने पड़े हैं। पढ़ा-लिखा मुसलमान भी नहीं चाहता कि कोई मुसलमान लड़की हिंदू का हाथ थामे। इसके विपरीत होने पर खुशी होती है कि एक काफिर का धर्म बदल गया “यह एक जीत का अहसास मुझे याद आता रहा, जब कोई मुसलमान लड़का एक हिंदू लड़की से शादी करके उसका धर्म बदल देता है तो सिर्फ कठमुल्ले ही नहीं, अच्छे-खासे पढ़े-लिखें समझदार मुसलमान भी महसूस करते हैं। खुद मुझे लाख न चाहने की कोशिश के बाद भी महसूस हुआ है और वह सदमा और निराशा जब कोई मुसलमान लड़की किसी हिंदू लड़के का हाथ थाम लेती है। कहीं इस्लाम खतरे में है का मनोभाव और दाँत पीस कर रह जाने की स्थिति।” उपन्यासकार का संकेत है कि उदार मुस्लिम मध्यवर्ग को अपनी प्रगतिशीलता को टिकाऊ बनाने की जरूरत है। अपने इन अंतर्विरोधों से जूझ कर ही वह तरक्की के रास्ते में आगे बढ़ सकता है।

उपन्यास में दर्शाया है कि शिक्षा के प्रसार, प्रगतिशील विचारों के संपर्क में आने और अपने अनुभवों से सबक लेते हुए मुस्लिम मध्यवर्ग में एक वैचारिक परिवर्तन आ रहा है। जो वैचारिक उदारता अब्बू में थी, वह अब थोड़ा विस्तृत हो रही है। इस वैचारिक बदलाव के कुछ संकेत . इस प्रकार हैं।

शिक्षित मध्य वर्ग यह सोचने लगा कि जब हमें इसी मिट्टी में दफन होना है तो इससे अलगाव और बेगानापन कयों? हमें इसके साथ आत्मीयता और लगाव सहित जुड़ना चाहिए। पुरानी पीढ़ी के समझदार-उदार मुसलमान, हिंदू-मुसलमान के संदर्भ में न सोचकर ‘इंसान’ के रूप में सबको देखने के कायल थे। नयी पीढ़ी हिंदू-मुसलमान के संदर्भ में समस्याओं को न देखकर वर्गों के रूप में देखना चाहती है। यह नयी पीढ़ी हिन्दुओं और मुसलमानों – दोनों से अपेक्षा करती है कि वे गंगा-जमुनी संस्कृति को बढ़ावा देंगे और अपने स्वार्थों को भूलकर कुछ न कुछ कुर्बानी अवश्य देंगे। हिन्दू-मुसलमानों के आपसी मेलजोल का एक संदर्भ विवाह-संबंध है। लेकिन नयी पीढ़ी पाती है कि अभी समाज इस क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए तैयार नहीं है। इसीलिए उपन्यास में विजय और रशीदा के प्रणय प्रसंग को विवाह के रूप में तब्दील होते नहीं दिखाया गया है।

सारांश

“सूखा बरगद में उपन्यासकार का सरोकार मुख्यतः दो मुद्दों से संबंधित है। एक ओर उपन्यासकार का पूरा ध्यान स्वातंत्र्योत्तर भारत में मध्यवर्गीय मुस्लिम समाज की मानसिकता के बयान के प्रति रहा है, दूसरी ओर अल्पसंख्यक समाज में असुरक्षा के कारणों की शिनाख्त करना भी उसका एक उद्देश्य है।

मध्यवर्गीय मुस्लिम समाज की मानसिकता के तीन विशेष पक्ष ‘सूखा बरगद के कथ्य से संबंधित हैं। मध्यवर्गीय मनोवृत्तियों – ‘अतीत मोह’ व्यर्थ का दिखावा और कथनी-करनी में भेद आदि को अल्पसंख्यक समाज में भी रूढ़ियों के रूप में रेखांकित किया गया है। कुलीनता, रक्त की शुद्धता के प्रति मुसलमानों में दंभ की हद तक पहुँचा हुआ आदरभाव है। लेकिन ‘गरीबी’ एक अभिशाप है। गरीब रिश्तेदार से दूसरों के संबंध क्रमशः शिथिल पड़ते जाते हैं। ‘सूखा बरगद’ में अब्बू के परिवार का खानदान में धीरे-धीरे हाशिये पर पहुँच जाना इस प्रवृत्ति का प्रमाण है। पढ़े-लिखे मध्यवर्गीय युवा जरूर इस मनोवृत्ति का उल्लंघन करने के लिए प्रयास कर रहे हैं।

मध्यवर्गीय मुस्लिम समाज की मानसिकता का दूसरा पक्ष उनकी प्रमुख समस्याओं और उनके समाधान से संबंधित है। मध्यवर्ग आर्थिक दृष्टि से कभी अपने को सम्पन्न वर्ग के निकट तो कभी निम्न वर्ग के पास अनुभव करता है। परिवार में एक साथ रूढ़िवाद और आधुनिकता की मौजूदगी और उनके फलस्वरूप जन्म लेने वाला तनाव मध्यवर्गीय व्यक्ति को दुलमुल बना देता है। कभी वह रूढ़िवादी बन जाता है तो कभी प्रगतिशील। सुहैल की नियति इस सिलसिले में ध्यान देने योग्य है। सुहैल की त्रासदी यह है कि वह विचार के स्तर पर न अल्लाह वाला बन सका और न ही पूरी तरह कम्युनिस्ट। दरअसल यह स्थिति उस संक्रमण से पैदा हुई है जहाँ नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी के आदर्शवादी मूल्यों को स्वीकार नहीं कर पाती है। वह अपने लिए कोई व्यवस्थित जीवन मूल्य की तलाश में है, जो उसे उसके अस्तित्व के अहसास का झूठा दिलासा नहीं दे। उसके संस्कारगत जीवन मूल्यों में और यथार्थ में जीते हुए आने वाले अनुभवों के कारण जिस उपेक्षा का अहसास नई पीढ़ी को होता है, उसे कम करने या नष्ट करने के कोई ईमानदार प्रयास सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर न होने के कारण यह भटके जा रही है। आदर्शवादी अब्बू के समय की स्थिति और सुहैल की स्थिति में अचानक बहुत बड़ा अंतराल दिखाई देता है। जिससे सुहैल के सारे मंल्य बिखर जाते है और वह दिशाहीन हो जाता है जिसकी परिणति उसके अराजक बनने में दिखाई देती है। भविष्य के प्रति उसका मोहभंग उसे दिशाहीन बना देता है। सुहैल आदर्श और यथार्थ के बीच कोई समझौता नहीं कर पाता। अब्बू की पीढ़ी ने जो स्वप्न देखे थे वह बाद की परिस्थितियों में टकराकर चूर हो गए।

रशीदा की त्रासदी दूसरे तरह की है, वह भीतर ही भीतर इस पीड़ा को सहती रहती है। वह जर्नलिस्ट होने का स्वप्न लेकर चलती है लेकिन आकाशवाणी में एनाउंसर हो जाती है। निम्न मध्य वर्ग की आर्थिक सीमाओं के दबाव को झेलकर भी वह अपने जीवन को यथार्थ की कठिन ज़मीन से टकराने देती है। सुहैल की तरह टूटकर बिखरती नहीं। अली हुसैन साहब द्वारा कहे गए कटु सत्य के अहसास से वह घबराती नहीं। आज हम लोग कहाँ है? कम्युनिस्ट होते हुए भी पहले मुसलमान हैं या हिंदू!’ यही कारण है कि विजय से प्रेम करके भी उसे दोनों के बीच एक अदृश्य दूरी का अहसास होता है। लेकिन चूंकि वह शिक्षित है और अपने जीवन के बारे में निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है। यही वह नई पीढ़ी है जो अंतर्विरोधों को केवल ‘मुसलमान के संदर्भ में नहीं देखती। वैज्ञानिक सोच ने इस वर्ग में विश्वास पैदा किया है कि वे एक मिली जुली संस्कृति का निर्माण करने में सफल हो सकेंगे। लेकिन इसके लिए उन्हें अपने स्वार्थों को बली चढ़ाना होगा। उपन्यास से उभरी यह सोच प्रगतिशील और प्रासंगिक है।

मंजूर एहतेशाम ने “सूखा बरगद’ में आजादी के बाद से लेकर आठवें दशक तक के राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक बदलाव की प्रवृत्ति को अभिव्यक्त करने की कोशिश की है और इस व्यापक संदर्भ में निम्न मध्यवर्ग के जीवन यथार्थ को चित्रित करना चाहा है। मुस्लिम जीवन के यथार्थ और उनकी बदलती सोच को वह बहुत गहराई और प्रामाणिकता के साथ चित्रित करने में सफल हुए है।

युवा पीढ़ी का शिक्षित होना और लडकियों का नौकरी करना संकेत देता है कि नयी पीढ़ी अंतर्विरोधों को केवल “मुसलमान” के संदर्भ में नहीं देखती। उसकी दृष्टि विज्ञान सघन है। इस वर्ग का विश्वास है कि एक मिलीजुली संस्कृति का निर्माण करने में हमें अपने स्वार्थों की बली दे देनी ही चाहिए। उपन्यास से उभरा यह सोच प्रगतिशील और प्रासंगिक है। “सूखा बरगद’ के प्रगतिशील विचारों के सुहैल का आजकल की तेजी से बदलती सामाजिकराजनीतिक स्थितियों के बढ़ते दबाव में रूढ़िवादी बन जाना प्रगतिशील विचारधारा की खामियों को स्पष्ट करता है।

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