शिक्षा का अधिकार अधिनियम : ‘फेल न करने की नीति’ (नो डिटेंशन पॉलिसी) का विश्लेषण

प्रश्न: शिक्षा के अधिकार के महत्व पर प्रकाश डालिए। साथ ही, ‘फेल न करने की नीति’ (नो डिटेंशन पॉलिसी) से जुड़े मुद्दों की चर्चा कीजिए।

दृष्टिकोण

  • शिक्षा का अधिकार अधिनियम की संक्षिप्त पृष्ठभूमि का वर्णन करते हुए इसके महत्व की चर्चा कीजिए।
  • इस अधिनियम के तहत ‘फेल न करने की नीति’ (नो डिटेंशन पॉलिसी) का विश्लेषण कीजिए और इस नीति से जुड़े मुद्दों को रेखांकित कीजिए।
  • फेल न करने की नीति (नो डिटेंशन पॉलिसी) से संबंधित मुद्दों के समाधान हेतु कुछ उपायों का सुझाव दीजिए।

उत्तर

नि:शुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 एक केंद्रीय कानून है। इसके अंतर्गत 6 से 14 वर्ष के आयु वर्ग के बच्चों के शिक्षा के अधिकार से संबंधित पहलुओं का उल्लेख किया गया है, अर्थात् 86वें संशोधन अधिनियम, 2002 द्वारा संविधान में निःशुल्क एवं अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा से संबंधित एक नया अनुच्छेद 21-A जोड़ा गया है।

यह अधिनियम एक आधारस्तंभ के रूप में कार्य करता है ताकि प्रत्येक बच्चे (बालक या बालिका) को गुणवत्तापूर्ण प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार (पात्रता के रूप में) प्राप्त हो सके। वास्तुतः यह अधिनियम निजी स्कूलों द्वारा कम से कम 25% बच्चों को बिना किसी शुल्क के प्रवेश दिए जाने का प्रावधान करता है। यह अधिनियम सीखने के एक प्रभावी वातावरण के रूप में अवसंरचना एवं शिक्षक संबंधी मानदंडों के अनुपालन जैसे उपायों के माध्यम से बच्चों के लिए अनुकूल स्कूली वातावरण को प्रोत्साहित करने का प्रयास करता है।

अधिनियम की धारा 30(1) के अनुसार प्राथमिक शिक्षा के पूर्ण होने तक किसी भी कक्षा में किसी बच्चे को फेल नहीं किया जा सकता है ताकि बच्चों के आत्म-सम्मान को क्षति पहुंचने, बढ़ते ड्रॉपआउट, भीख एवं छोटे अपराध (petty crime) जैसी बढ़ती सामाजिक समस्याओं को रोका जा सके। इसका उद्देश्य सकल नामांकन अनुपात में वृद्धि करना है।

हालाँकि हाल ही में लोक सभा द्वारा फेल न करने की नीति को समाप्त करने हेतु एक संशोधन विधेयक पारित किया गया। दो समितियों यथा गीता भुक्कल एवं टी. एस. आर. सुब्रमण्यम द्वारा भी इसे चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने की अनुशंसा की गई है।

  • यह नीति उस परिस्थिति का सृजन करती है जिसमें बच्चों को सीखने एवं अध्यापकों को शिक्षण कार्य सही से करने हेतु कोई प्रोत्साहन शेष नहीं रह जाता है। इसके फलस्वरूप बच्चों में उच्च कक्षा के लिए उपयुक्त शैक्षणिक क्षमता, ज्ञान और कौशल का अभाव पाया जाता है। उदाहरणार्थ, अधिकांश राज्यों में कक्षा 9 की परीक्षा में फेल होने वाले छात्रों की संख्या में वृद्धि हो रही है।
  • यह कक्षा अध्यापन की गुणवत्ता को भी प्रभावित करता है क्योंकि उच्च कक्षाओं में विभिन्न क्षमताओं एवं समझ वाले सभी छात्रों के प्रोन्नत होने के कारण शिक्षक अपेक्षित गति से पाठ्यक्रम को पढ़ाने में अक्षम होते हैं।
  • यह छात्रों को नियंत्रित करने की शिक्षकों की क्षमता को भी प्रभावित करता है क्योंकि शिक्षक का छात्रों पर नियंत्रण कमज़ोर हो जाता है। इस कारण से अधिकांश सरकारी स्कूल मात्र “मिड डे मिल” प्रदाताओं के रूप में परिवर्तित हो गए हैं।
  • अधिगम (सीखने के) परिणामों में गिरावट और बच्चों को स्वत: उत्तीर्ण करने से प्राथमिक शिक्षा के अंत में कक्षा 8 के स्तर पर तीव्र ड्रॉपआउटस की समस्या का केवल कुछ हद समाधान हुआ है।

उपर्युक्त परिप्रेक्ष्यों में ही फेल न करने की नीति को समाप्त किया जा रहा है। हालाँकि इसी क्रम में इस नीति को समाप्त न किए जाने पक्ष में भी इतने ही सशक्त तर्क प्रस्तुत किये जा रहे हैं, जैसे कि:

  • इसे समाप्त करने का अर्थ यह है कि सरकार कक्षा में सीखने में असफल होने के लिए विद्यार्थियों (जिनमें अधिकांश प्रथम पीढ़ी के विद्यार्थी हैं) को दोषी ठहरा रही है।
  • शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के तहत शिक्षण की गुणवत्ता का उन्नयन, सतत एवं व्यापक मूल्यांकन (CCE) के माध्यम से नियमित आंकलन जैसे कई अन्य प्रावधान किए गए थे। इन सभी प्रावधानों को फेल न करने की नीति के साथसाथ कार्यान्वित किया जाना था। फेल न करने की नीति का आशय यह नहीं था कि कोई मूल्यांकन नहीं किया जाएगा।
  • इसके अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में उपयुक्त कार्यात्मक सुधार किए बिना पूर्व की पास-फेल प्रणाली को पुनः लागू करने से RTE का समतावादी उद्देश्य कमज़ोर हो सकता है।

निष्कर्षतः, बच्चों को उपचारात्मक कोचिंग तथा अपनी क्षमता को सिद्ध करने के अतिरिक्त अवसर उपलब्ध कराने के पश्चात ही फेल न किये जाने की नीति को समाप्त किया जाना चाहिए। शिक्षा को समावेशी होना चाहिए तथा इसमें एक साझा पाठ्यक्रम होना चाहिए ताकि सभी बच्चे भारतीय शिक्षा प्रणाली की मूलभूत अवधारणाओं, तत्वों, सिद्धांतों और प्रकृति से परिचित हो सकें।

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