जैव-भू-रासायनिक चक्र की अवधारणा : पारिस्थितिकी तंत्र की कार्यशीलता में इसके महत्व

प्रश्न: जैव-भू-रासायनिक चक्र की अवधारणा और पारिस्थितिकी तंत्र की कार्यशीलता में उनके महत्व की व्याख्या कीजिए। मानवजनित कारकों के कारण उन्हें किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?

दृष्टिकोण

  • जैव-भू-रासायनिक चक्र की अवधारणा की व्याख्या करते हुए उत्तर का आरम्भ कीजिए।
  • पारिस्थितिकी तंत्र की कार्यशीलता में इसके महत्व की व्याख्या कीजिए।
  • मानव हस्तक्षेपों के कारण इन चक्रणों द्वारा अनुभव की जाने वाली चुनौतियों को सूचीबद्ध करते हुए उत्तर को समाप्त कीजिए।

उत्तर

जैव-भू-रासायनिक चक्र (biogeochemical cycle) कई प्राकृतिक चक्रों में से एक है, जिसके तहत संरक्षित पदार्थों का पारिस्थितिकी तंत्र के जैविक और अजैविक घटकों में प्रवाह होता है। चक्रण के मुख्य रासायनिक तत्व कार्बन (C), हाइड्रोजन (H), नाइट्रोजन (N), ऑक्सीजन (O), फास्फोरस (P) और सल्फर (S) हैं।

महत्वपूर्ण जैव-भू-रासायनिक चक्र निम्नलिखित हैं:

  • जल चक्र: वर्षा के रूप में या अन्य किसी भी रूप में पृथ्वी पर गिरने वाला समस्त जल तत्काल समुद्र में वापस प्रवाहित नहीं होता है। बल्कि इसकी कुछ मात्रा मृदा में रिसकर ताजे जल के रूप में भूजल का हिस्सा बन जाती है। इसमें से भूजल की कुछ मात्रा सोतों (springs) के माध्यम से सतह पर आ जाती है। साथ ही भूजल की कुछ मात्रा पौधों की जड़ों द्वारा ग्रहण कर ली जाती है और प्रकाश संश्लेषण के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। इसके उपरांत वाष्पन-उत्सर्जन के माध्यम से जल को वायुमंडल में मुक्त कर दिया जाता है या पौधों के भोजन बनाने के दौरान इसका उपभोग कर लिया जाता है।
  • नाइट्रोजन चक्र: “नाइट्रोजन स्थिरीकारक” जीव ऐसे जीव होते हैं जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन गैस को नाइट्रोजन यौगिकों में परिवर्तित कर सकते हैं ताकि अन्य जीव न्यूक्लिक एसिड, एमिनो एसिड आदि का उत्पादन करने हेतु इसका उपयोग कर सकें। ये नाइट्रोजन स्थिरीकारक, पारिस्थितिकी तंत्र के इतने महत्वपूर्ण भाग होते हैं कि इनके बिना कृषि कार्य संभव नहीं
  • ऑक्सीजन चक्र: वायुमंडल में ऑक्सीजन का उपयोग तीन प्रक्रियाओं अर्थात् दहन, श्वसन और नाइट्रोजन के ऑक्साइड के निर्माण में किया जाता है। ऑक्सीजन प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा वायुमंडल में वापस लौटा दी जाती है।
  • कार्बन चक्र: कार्बन सभी जीवित जीवों और निर्जीव वस्तुओं जैसे खनिज, वायुमंडल, महासागरों और भूगर्भ में विद्यमान है।
  • कार्बन चक्र: में दो मूलभूत प्रक्रियाएं सम्मिलित होती हैं।
  • तीव्र कार्बन जैव-भू-रासायनिक चक्र (Rapid Carbon Biogeochemical Cycle): यहाँ अकार्बनिक कार्बन, जो वायुमंडल में CO2 के रूप में विद्यमान है, स्वपोषियों (autotrophs) द्वारा ग्रहण किया जाता है। ये सामान्यतः पौधे, बैक्टीरिया और शैवाल जैसे प्रकाश संश्लेषी जीव होते हैं।
  • दीर्घकालिक कार्बन जैव-भू-रासायनिक चक्र (Long Term Carbon Biogeochemical Cycle): किसी जीव की मृत्यु के पश्चात् उसके शरीर के भीतर संगृहीत कार्बन को CO2 और अन्य कार्बनिक पदार्थों में अपघटकों द्वारा विघटित कर दिया जाता है। जहाँ इस कार्बन का कुछ भाग वायुमंडल में निर्मुक्त हो जाता है, वहीं एक बड़ा भाग मृदा के भीतर प्रच्छादित रहता है। इस प्रक्रिया के माध्यम से, मृदा कार्बन भंडारण हेतु एक विशाल भंडार गृह के रूप में कार्य करती।

मानवजनित गतिविधियों ने इन तत्वों के प्राकृतिक चक्रण को अव्यवस्थित कर दिया है। उदाहरण के लिए:

  • जीवाश्म ईंधनों ने अनेक वर्षों से कार्बन को संगृहीत कर के रखा हुआ है किन्तु इनके दहन की दर पर्यावरण की इसे पुनः अवशोषित करने की क्षमता की तुलना में बहुत अधिक है। इसके कारण ग्रीनहाउस प्रभाव उत्पन्न हुआ है, परिणामस्वरूप वैश्विक तापन में वृद्धि हो रही है।
  • निर्वनीकरण के कारण पौधों में संगृहीत कार्बन निर्मुक्त हो रहा है और इसे पुन: संगृहीत करने वाले पौधों की संख्या में कमी हो रही है।
  • कृत्रिम नाइट्रेट उर्वरकों को जब जल स्रोतों में प्रवाहित किया जाता है तो “रेड टाइड”, “ब्राउन टाइड” और फिएस्टेरिया (Pfiesteria) बैक्टीरिया की वृद्धि हेतु अनुकूल परिस्थितियां बनती हैं। ये सभी विषाक्त पदार्थ उत्पन्न करते हैं जिसके कारण मनुष्य एवं अन्य पशु या तो रोगग्रस्त हो जाते हैं या उनकी मृत्यु हो जाती है।

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