स्वतंत्रता के पश्चात राज्यों के भाषाई पुनर्गठन

प्रश्न: भले ही अग्रणी भारतीय राष्ट्रवादी लंबे समय से जागृत होने और आगे बढ़ने में मातृभाषा की शक्ति से अवगत रहे थे, लेकिन स्वतंत्रता के पश्चात राज्यों के भाषाई पुनर्गठन को वास्तविकता में परिणत होने में कुछ समय लगा। व्याख्या कीजिए।

दृष्टिकोण

  • ब्रिटिश शासन के दौरान राज्यों के भाषाई विभाजन पर नेताओं की स्थिति को स्पष्ट कीजिए।
  • भाषाई पुनर्गठन के लिए उनके विरोध के कारणों का उल्लेख कीजिए।
  • स्वतंत्र भारत में राज्यों के भाषाई पुनर्गठन की घटनाओं और मुद्दों तथा इसकी क्रमिक स्वीकृति के लिए उत्तरदायी कारणों की चर्चा कीजिए।

उत्तर

ब्रिटिश शासनकाल के दौरान राज्य की सीमाओं को निर्धारित किया गया था। इसका आधार या तो प्रशासनिक सुविधा थी या उन क्षेत्रों का सरकार द्वारा अधिकृत क्षेत्रों के अंतर्गत निहित होना था। भारतीय राष्ट्रवादी नेताओं द्वारा इन विभाजनों को कृत्रिम मानते हुए अस्वीकृत कर दिया गया था और राज्यों के गठन के आधार के रूप में भाषाई सिद्धांत का समर्थन किया गया था। इसके अतिरिक्त, 1920 में नागपुर के कांग्रेस अधिवेशन के पश्चात् प्रांतीय कांग्रेस समितियां भाषाई विभाजन पर आधारित थीं।

  • हालाँकि, भारत में स्वतंत्रता-पश्चात राज्यों के भाषाई पुनर्गठन के संबंध में निम्नलिखित चिंताएं व्यक्त की गईं:
  •  नेताओं ने यह महसूस किया था कि भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन से विघटन को बढ़ावा मिल सकता है। 
  • यह भारत के समक्ष व्याप्त सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों की उपेक्षा कर सकता है।
  • भारत सरकार (Gol) द्वारा 1948 में भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की व्यवहार्यता को निर्धारित करने हेतु धर आयोग और JVP समिति का गठन किया गया था। दोनों समितियों द्वारा राज्यों के पुनर्गठन के आधार के रूप में भाषा को अस्वीकृत कर दिया गया और प्रशासनिक सुविधा को वरीयता प्रदान की गयी।
  • किन्तु सरकार के इस दृष्टिकोण का विरोध किया गया और विभिन्न क्षेत्रों से भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन के लिए मांगें उठने लगीं। 1953 में, भारत सरकार को मद्रास राज्य से तेलुगु भाषी क्षेत्रों को पृथक कर प्रथम भाषाई राज्य के रूप में आंध्र प्रदेश के गठन हेतु बाध्य किया गया था। इसी मांग को लेकर पोट्टि श्रीरामुलु की अंततः मृत्यु के पश्चात लंबे समय तक चले आंदोलन ने इस मांग को और अधिक तीव्र कर दिया।
  • आंध्र प्रदेश के गठन ने भाषाई आधार पर अन्य राज्यों के गठन की मांग को तीव्र कर दिया। अतः इन परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में भारत सरकार द्वारा 1955 में फजल अली आयोग का गठन किया गया, जिसने भाषा को राज्यों के पुनर्गठन के आधार पर व्यापक रूप से स्वीकृति प्रदान की, लेकिन इसने ‘एक भाषा, एक राज्य‘ के सिद्धांत को अस्वीकृत कर दिया।
  • समय के साथ-साथ, राज्यों के भाषाई पुनर्गठन के आधार पर निर्माण की मांग निरंतर बनी रही और इसके परिणामस्वरूप 1960 में बंबई का क्रमशः मराठी भाषा और गुजराती भाषा बोलने वाली आबादी के आधार पर महाराष्ट्र और गुजरात में विभाजन किया गया। इसी प्रकार, 1966 में शाह आयोग द्वारा पंजाब राज्य के विभाजन हेतु हिंदी भाषी लोगों के लिए हरियाणा और पंजाबी भाषी लोगों के लिए पंजाब के गठन की अनुशंसा की गई थी।
  • अंततः, अन्य राज्यों का गठन सांस्कृतिक समरूपता, आर्थिक विकास आदि के आधार पर किया गया था। वर्तमान में भी, भाषा एक नए राज्य की मांग में एक महत्वपूर्ण कारक बनी हुई है। उदाहरण के लिए, नेपाली भाषी आबादी द्वारा गोरखालैंड राज्य की मांग, लेकिन इन मांगों को अलगाववादी प्रकृति का नहीं माना जाता है, बल्कि उन्हें सांस्कृतिक समरूपता के आधार पर पुनर्गठन की आवश्यकता से उत्पन्न मांग के रूप में देखा जाता है।

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