1857 के बाद उपनिवेशवाद तथा प्रशासनिक व्यवस्था का विकास

कंपनी की आर्थिक और प्रशासनिक नीतियों ने समाज के सभी वर्गों में व्यापक असंतोष उत्पन्न कर दिया। यही असंतोष अन्य घटकों के साथ मिलकर 1857 के विद्रोह का कारण बना। इस विद्रोह ने ईस्ट इंडिया कंपनी को हिला दिया। ब्रिटिश सरकार भी इससे चिंतित हुई। ब्रिटेन के राजनीतिक जगत में सभी इस बात पर एकमत थे कि ब्रिटिश सरकार को चाहिए कि वह भारत का शासन प्रबंध ईस्ट इंडिया कंपनी से ले ले और भारत के प्रशासन  का उत्तरदायित्व स्वयं ग्रहण करे। ब्रिटेन की सम्राज्ञी ने 1858 की एक घोषणा द्वारा भारत शासन को सीधे अपने नियंत्रण में ले लिया।

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1857 के बाद प्रशासनिक व्यवस्था

नई प्रशासनिक व्यवस्था

1858 के अधिनियम के अनुसार भारत को सीधे ब्रिटिश सम्राज्ञी के द्वारा शासित होना था। रानी के नाम पर भारत के शासन का काम इंग्लैंट में एक राज्य सचिव (Secretary of State)द्वारा किया जाना था। इस सचिव की सहायता के लिए पंद्रह सदस्यों की परिषद की व्यवस्था थी। इनमें से नौ सदस्य ऐसे होने चाहिए थे जो कम से कम दस वर्ष तक भारत में कार्य कर चुके हों और जिन्हें भारत छोड़े हुए दस वर्ष से अधिक समय न हुआ हो। किंतु देश का प्रशासन अब भी मुख्य रूप से गवर्नर जनरल के ही अधीन बना रहा । हाँ, गवर्नर जनरल के पद का नाम बदल कर वाइसराय कर दिया गया। उसकी सहायता के लिए एक कार्यकारिणी परिषद् बनाई गई। कार्यकारिणी परिषद्के सदस्य विभिन्न विभागों के प्रमुख होते थे तथा गवर्नर जनरल के सलाहकारों के रूप में कार्य करते थे।

1861 के इंडियन कांउसिल ऐक्ट ने गवर्नर जनरल की परिषद् का विस्तार किया। अब इसके सदस्यों की संख्या छह से बढ़ाकर बारह कर दी गई। इस विस्तार का उद्देश्य परिषद्को विधि निर्माण का अधिकार प्रदान करना था तथा इस रूप में इसे इंपीरियल लेजिस्लेटिव काउंसिल कहा जाता था। इसमें विधि निर्माण के लिए भारतीयों का सहयोग भी लिया जा सकता था।

1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई। कांग्रेस ने भारत के प्रशासन में अनेक परिवर्तनों की मांग की। इसके परिणामस्वरूप 1892 का अधिनियम पास किया गया। इस अधिनियम द्वारा कांउसिल के सदस्यों की संख्या बढ़ाकर सोलह कर दी गई। इस अधिनियम ने कांउसिल को वार्षिक वित्तीय विवरण पर बहस करने का अधिकार भी प्रदान किया। उन्हें बजट की प्रत्येक मद पर मत देने का अधिकार तो नहीं था किंतु वे सरकारी नीति की खुलकर आलोचना कर सकते थे। राज्य सचिव की भारत पर नियंत्रण एवं निगरानी बढ़ी। उसी अनुपात में ब्रिटेन की सरकार की तुलना में गवर्नर जनरल की शक्ति घट गई । नियंत्रण बोर्ड के अध्यक्ष तथा कंपनी के निदेशकों का दोहरा नियंत्रण समाप्त कर दिया गया तथा संपूर्ण सत्ताधिकार राज्य सचिव को सौंप दिया गया। 1877 केरॉयल टायटिल्स ऐक्ट ने राज्य सचिव के प्रति गवर्नर जनरल तथा उसकी कांउसिल की अधीनता को स्पष्ट कर दिया।

जैसे-जैसे राज्य सचिव की शक्ति बढ़ती गई वैसे-वैसे उसके सत्ताधिकार पर नियंत्रण भी ढीला पड़ता गया। इंडियन कांउसिल का कार्य सलाह देना मात्र रह गया। राज्य सचिव को “महान् मुगल” की तरह सम्मान दिया जाने लगा। जब भारत के वाइसराय लार्ड मेयो ने अपनी परिषद् के सत्ताधिकार को मनवाने का प्रयास किया तो स्पष्ट रूप से कह दिया गया किः

“सिद्धांत रूप से भारतीय मामलों का अंतिम नियंत्रण एवं निर्देशन बर्तानवी सरकार के हाथ में हैं, उन अधिकारियों के हाथ में नहीं जिन्हें सम्राज्ञी ने संसद में कानून द्वारा भारत में नियुक्त किया है।”

इन सब बातों को संभव बनाने के पीछे कतिपय कारण थे। 1870 में भारत और इंग्लैंड के बीच सीधी तार लाइन डाल दी गई थी तथा स्वेज नहर के खुल जाने तथा भाप के इंजन वाले जहाजों से दोनों देशों के बीच दूरी घट गई थी। इससे यातायात द्वारा तेजी से संबंध जोड़ने में सहायता मिली।

ईस्ट इंडिया कंपनी की समाप्ति कर दिये जाने के बाद इंग्लैंड की सम्राज्ञी ने भारतीय प्रशासन पर अपनी पकड़ मजबूत करनी आरंभ कर दी। वास्तव में, यह समय भारत में अंग्रेजी साम्राज्यवाद के विस्तार का समय था।

प्रशासन का विकेंद्रीकरण

विकेंद्रीकरण की दिशा में पहला कदम तो 1861 के अधिनियम के साथ उठ चुका था । इस अधिनियम द्वारा बम्बई तथा मद्रास की प्रेसीडेंसियों को विधि-निर्माण का अधिकार मिल चुका था। किंतु उन्हें किसी अधिनियम को पारित करने के लिए गवर्नर जनरल की अनुमति लेनी पड़ती थी। 1870 में लार्ड मेयो ने पहली बार प्रदेशों को निश्चित धन-राशियाँ प्रदान की जिन्हें वे अपनी इच्छानुसार पुलिस, जेल, शिक्षा, तथा स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च कर सकते थे। 1877 में और अधिक आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान की गई। जब लार्ड लिटन ने कुछ अन्य धन भी प्रदेशों को सौंप दिए । यह वन खर्द-भू-राजस्व, आबकारी, सामान्य प्रशासन इत्यादि के लिए थे।

1882 में प्रदेशों को निश्चित धनराशि देने की प्रथा समाप्त कर दी गई। इसके स्थान पर प्रदेशों को कहा गया कि वे अपने प्रादेशिक करों द्वारा एक निश्चित आय की व्यवस्था करे। इन व्यवस्थाओं के अनुसार राजस्व के कुछ स्रोत पूर्णतः तो कुछ अंशतः प्रदेशों को सौंप दिए गए और कुछ केंद्र के लिए सुरक्षित रखे गए। युद्ध और अकालों पर होने वाले खर्च की जिम्मेदारी केंद्र पर थी। यह व्यवस्था 1902 तक बनी रही।

स्थानीय संस्थाएँ (Local Bodies) वित्तीय समस्याओं के कारण सरकारने प्रशासन का और भी अधिक विकेंद्रीकरण किया तथा नगर निगमों और जिला परिषदों का कार्यक्षेत्र बढ़ा दिया। विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया का आरंभ 1864 में हुआ। आरंभ में अधिकांश सदस्य मनोनीत (Nominated) होते थे तथा जिला मैजिस्ट्रेट उनके प्रमुख होते थे। इन संस्थाओं को अपना खर्च चलाने के लिए राजस्व स्वयं जुटाना था।

1882 के आसपास इस स्थिति में सुधार हुआ। अब स्थानीय संस्थाओं का विकास कुछ शहरों में ही नहीं अपितु समस्त देश में किया जाता था। इन संस्थाओं के निश्चित कार्य होते थे तथा उनकी पूर्ति के लिए उन्हें निश्चित धनराशि प्रदान की जाती। थी। अधिकांश मनोनीत सदस्यों का स्थान अब चुने हुए सदस्यों ने ले लिया। सरकारी सदस्यों की संख्या एक तिहाई कर दी गई, शहरी संस्थाओं को स्वतंत्र कर दिया गया तथा गैर-सरकारी लोगों को भी परिषदों में बैठने का अधिकार दिया गया। किंतु इन संस्थाओं पर अब भी सरकारी नियंत्रण कठोर था। मतदान का अधिकार सीमित था तथा गैर-सरकारी सदस्यों की शक्ति बहुत कम थी। जैसा कि बिपन चंद्र ने लिखा है किः

“कलकत्ता, मद्रास और बम्बई जैसे प्रेसीडेंसी वाले शहरों को छोड़कर, स्थानीय संस्थाएँ ठीक सरकारी विभागों की तरह कार्य करती थीं और उन्हें किसी भी प्रकार स्थानीय स्वायत्त शासन का अच्छा उदाहरण नहीं कहा जा सकता।’

आर्थिक नीति

अंग्रेजों ने भारत की अर्थव्यवस्था का शोषण जारी रखा । जो धन पहले ईस्ट इंडिया कंपनी के लंदन स्थित कार्यालय के रखरखाव तथा इसके शेयर होल्डरों को आय देने में खर्च होता था वही अब, इंडिया आफिस के सैक्रेटरी पर खर्च होने लगा। कंपनी के सैन्य अभियानों तथा विद्रोहों को दबाने के फलस्वरूप लंदन में पहले ही भारतीय ऋण की मात्रा काफी थी परंतु अब वह और बढ़ गई क्योंकि कंपनी के शेयर होल्डरों को दी जाने वाली मुआवजे की रकम भी भारत सरकार के खाते में जोड़ दी गई। होम चार्जेस के अंतर्गत आने वाले खर्च थे भारत के ब्रिटिश अधिकारियों को दी जाने वाली पेंशन की रकम तथा सेना को प्रशिक्षित करने का व्यय आदि । 1901 में होम चार्जेस की राशि 170.30 लाख पौंड हो गई।

जैसा कि दादाभाई नौरोजी एवं अन्य परवर्ती अर्थशास्त्रियों ने दर्शाया है, होम चार्जेस एवं निजी हुंडियाँ भारतीय निर्यात द्वारा भुनाई जाती थीं। पहले भारत का आर्थिक दोहन व्यापारवादी था, अब वह मुक्त व्यापार के माध्यम से किया जाने लगा। आगे चलकर यही ब्रिटिश भारत के वित्त पूंजीवाद के ढाँचे से जुड़ गया । वास्तव में उन्नीसवीं शती के अंत तक भारत का अतिरिक्त निर्यात ब्रिटिश भुगतानों के संतुलन के लिए अनिवार्य सा हो गया । उन्नीसवीं शती में यूरोप में विकसित होते पूंजीवादी अर्थशास्त्र ने चुंगो-कर की ऊंची दीवारें खड़ी कर दी । अपने माल के निर्यात के लिए ब्रिटेन को बाजार मिलना कठिन हो गया। भारत में मुक्त व्यापार का अर्थ था कि लंकाशायर के कपड़े के लिए भारत में बिक्री के लिए बाजार, साथ ही भारत के अतिरिक्त निर्यात से ब्रिटेन के घाटे में पूर्ति भी होती थी। भारतीय साम्राज्य से ब्रिटेन को सैन्य एवं युद्धनीति संबंधी लाभ तो थे ही, साथ ही उसे आर्थिक लाभ भी था।

अंग्रेजी सरकार ने अनेक प्रकार की संरचनात्मक प्रतिबंध लगाकर देसी उद्योगों पर रोक लगाई तथा उन्हें कुंठित किया ।सरकारी नीतियाँ खुले तौर पर ब्रिटिश उद्यमों को प्रोत्साहन देती थी तथा भारतीयों के साथ भेदभाव का व्यवहार करती थी। रेलमार्ग तथा भारवहन के भाड़े भी बंदरगाहों पर होने वाले व्यापार को प्रोत्साहित करने की दृष्टि से बनाए गए थे। देश के भीतरी भागों में होने वाले व्यापार के अनुकूल नहीं थे। संगठित मुद्रा बाजार भी काफी हद तक अंग्रेजों के कब्जे में था। इसमें एकमात्र अपवाद थे पंजाब नेशनल बैंक तथा बैंक ऑफ इंडिया। विदेशों के साथ होने वाले अधिकांश व्यापार पर अंग्रेजों का तीव्र प्रभुत्व था क्योंकि विनिमय बैंक, आयात-निर्यात कंपनियों तथा जहाजरानी के प्रतिष्ठान उन्हीं के हाथ में थे।

अंग्रेज अपनी इस नीति को उचित ठहराते थे। उनका कहना था कि उन्होंने इस देश में रेलमार्गों, बागानों, खदानों एवं मिलों में पूंजी को लगाया है तथा ये सब बातें भारत को विकास एवं आधुनिकीकरण के मार्ग पर ले जाएँगी। किंतु सच्चाई तो यह है कि अंग्रेजों ने रेलमार्गों की स्थापना अपनी व्यापारिक एवं सामरिक आवश्यकताओं के अनुरूप ही की थी तथा बागान, खदानें एवं मिल अंग्रेजों के वित्तीय, व्यापारिक एवं औद्योगिक गतिविधि के सामंजस्य में सहायक थे। ये सब अंग्रेजों के हाथ में भारतीयों के पूंजीवादी शोषण के साधन थे।

भू-राजस्व नीति एवं वाणिज्य नीति एक दूसरे से जुड़ी हुई थीं। काफी समय तक सरकार ने कृषि में सुधार करने की दिशा में कोई ठोस प्रयत्न नहीं किए। इस दिशा में एकमात्र सरकारी प्रयास यही था कि 1870 से तकावी का नगण्य ऋण दिया जाने लगा था तथा एक नहर-व्यवस्था लागू कर गई थी जो पंजाब, पश्चिमी संयुक्त प्रांत (यू.पी.) तथा मद्रास प्रेसीडेंसी के कुछ भागों से गुजरती थी। वास्तव में उपनिवेशवादी ढाँचे ने देश को भीतर ही भीतर खोखला कर दिया था। जिसके उदाहरण थे 1870 एवं 1890 के दशकों में पड़ने वाले अकाल।

सैन्य संगठन

1857 के विद्रोह को देखते हुए सेना में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए। भारत का प्रशासन इंग्लैंड के सम्राज्ञी के हाथों में जाने के साथ ही कंपनी की सेना को इंग्लैंड की सेना के साथ मिला दिया गया। सेना का पुनर्गठन करते समय अंग्रेजों ने इस बात की ओर विशेष ध्यान दिया कि 1857 की घटनाओं की पुनरावृत्ति न होने पाए। इसके लिए अनेक कदम उठाए गए :

  • सेना में यूरोपियों का अनुपात बढ़ा दिया गया.(1857 में 40,000 यूरोपिय तथा 215,00 भारतीय थे) बंगाल में यह अनुपात 1:2 तथा मद्रास एवं बम्बई में 2:5 कर दिया गया।
  • सेना के महत्वपूर्ण अंगों जैसे तोपखाने इत्यादि में भारतीय सैनिकों की संख्या नगण्य रहती थी। बाद में टैंकों और बख्तरबंद गाड़ियों के संबंध में भी यही नीति अपनाई गई।
  • योद्धा और गैर-योद्धा जातियों के बीच भेद किया गया तथा लड़ाकू माने जाने वाली जातियों को बड़ी संख्या में सेना में भरती किया गया। बिहार, अवध, बंगाल तथा दक्षिण भारत के जिन सैनिकों ने 1857 के विद्रोह में भाग लिया था उन्हें गैर-लड़ाकू घोषित कर दिया गया। विद्रोह के समय अंग्रेजों का साथ देने वाली जातियों जैसे सिक्खों, गोरखाओं और पठानों को लड़ाकू घोषित किया गया।
  • सैनिकों में भेदभाव उत्पन्न करने के लिए उन्हें जाति पर आधारित अलग-अलग कंपनियों में रखा गया।
  • सैनिकों में क्षेत्रीय भावना को उभारा गया ताकि वे राष्ट्रीय मुद्दों पर एकजुट न हो सकें । इस प्रकार सेना की एकरूपता को भंग कर दिया गया। भारत से बाहर उन स्थानों के युद्ध में भी भारतीय सैनिकों को लगाया गया जहाँ अंग्रेजों को लाभ था।

प्रशासनिक सेवाएँ

कार्नवालिस ने भारतीयों को अंग्रेजों से निम्न स्तर का दर्जा दिया था। 1833 के चार्टर ऐक्ट तथा महारानी की घोषणा के बावजूद यह स्थिति नहीं बदली । सभी ऊँचे पद यूरोपियों के लिए आरक्षित थे। भारत की प्रशासनिक सेवा के लिए अधिकारियों का चयन एक प्रतियोगी परीक्षा द्वारा किया जाता था। कहने को तो चयन के द्वार भारतीयों के लिए भी खले थे किंत कभी एक या दो से अधिक भारतीय नहीं चुने गए क्योंकि :

  • परीक्षा का केंद्र लंदन में था जो भारत से बहुत दूर था।
  • परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए ग्रीक, लेटिन एवं अंग्रेजी भाषाओं का अच्छा ज्ञान होना आवश्यक था ।  भारतीय इसमें पिछड़ जाते थे।
  • पहले परीक्षा की अधिकतम आयु 23 वर्ष थी जो 1859 में घटाकर 19 वर्ष कर दी गई।

इन बाधाओं को हटाने की दिशा में भारतीयों ने जो भी प्रयत्न किए उसका कोई विशेष लाभ नहीं हुआ।

रजवाड़ों के साथ संबंध

1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने अनुभव किया कि भारतीय जनता के असंतोष को रोकने में रजवाड़े महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। अतः रियासतों को अंग्रेजी राज में मिलाने की नीति छोड़ दी गई तथा अंग्रेजी साम्राज्य को दृढ़ बनाने के लिए . उनका सहयोग प्राप्त करने की योजना बनाई गई । अनेक अधिकार जो पहले रजवाड़ों से छीन लिए गए थे उन्हें लौटा दिए गए तथा यह आश्वासन दिया गया कि यदि वे ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति वफादार बने रहें तो उन्हें कोई क्षति नहीं पहुँचाई जाएगी। किंतु रजवाड़ों को खुली छूट नहीं दी गई थी। सर्वोच्चता की नीति के माध्यम से उन पर कड़ा नियंत्रण रखा जाता था। कोई भी भारतीय राजा विदेशों के साथ स्वतंत्र रूप से कोई संबंध स्थापित नहीं कर सकता था।

रियासतों के रोजमर्रा के कामकाज में भी अंग्रेज अभिकर्ताओं (पोलिटिकल ऐजेण्ट) का हस्तक्षेप रहता था। ये अभिकर्ता रेजीडेंट्स कहलाते थे। लगभग सभी रियासतों में ब्रिटिश रेजीडेंट्स और मनोनीत (nominated ministers) मंत्री होते थे। उनका काम था अंग्रेजों के हितों की देखभाल करना तथा अंग्रेजी नीतियों को क्रियान्वित करना । राजाओं के उत्तराधिकारियों का निर्णय भी अंग्रेज सरकार के हाथ में था । यदि कोई राजा अंग्रेजों के मनोनुकूल व्यवहार नहीं करता तो वे उसे हटाकर अपने अनुकूल व्यक्ति को राजा बना  देते थे। 1873 में बड़ौदा तथा 1891 में मणीपुर के राजाओं को इसी प्रकार हटाया गया था। अन्य रियासतों में भी हस्तक्षेप की नीति अपनाई गई। अंग्रेजों की इन अपमानजनक नीतियों के बावजूद अधिकांश राजा अंग्रेजों का साथ देते थे ताकि उनका राज और विशेषाधिकार बना रहे।

विद्वेषपूर्ण प्रशासन

अपनी प्रशासनिक नीतियों के जरिए अंग्रेजों ने न केवल भारतीय संपदा का दोहन किया और यूरोपियों की श्रेष्ठता स्थापित की वरन् जानबूझकर भारतीयों के प्रति विद्वेषपूर्ण रवैया अपनाया। पहले की इकाइयों में इस बात का उल्लेख किया जा चुका है कि अंग्रेजी राज के क्या परिणाम हुए। यहाँ पर उन क्षेत्रों का अध्ययन करेंगे जहाँ यह भारत-विरोधी पक्षपात एवं विद्वेष अत्याधिक स्पष्ट दिखाई देता है।

  •  शिक्षाः सन् 1833 से अंग्रेजों ने भारत में सीमित शिक्षा को प्रोत्साहन देने की नीति अपनाई थी। किंतु कलकत्ता,बम्बई और मद्रास में विश्वविद्यालयों को स्थापना से उच्च शिक्षा की दिशा में नई प्रगति हुई। किंतु शिक्षा के प्रसार के साथ भारतीयों में जाग्रति आई । अंग्रेजी सरकार के प्रति उनका दृष्टिकोण आलोचनात्मक होने लगा और राष्ट्रीय आंदोलन का संगठन होने लगा। इससे अंग्रेज सतर्क हो गए और उन्होंने उच्च शिक्षा के प्रति विद्वेषपूर्ण रवैया अपना लिया।
  • जन-सेवाएँ: सेना और युद्धों पर तो अंग्रेज-सरकार अनाप-शनाप खर्च करती थी किंतु स्वास्थ्य, सिंचाई, सफाई तथा लोक निर्माण विभाग (पी.डब्लू.डी.) पर किया जाने वाला खर्च नगण्य था।
  • समाचार-पत्रों पर पाबंदी: भारत में छापेखाने के विकास का श्रेय अंग्रेजों को था। किंतु जैसे ही ये जनमत तैयार करने एवं लोगों में राष्ट्रीय चेतना जगाने का कार्य करने लगे। अंग्रेज सरकार ने इस पर रोक लगाने के लिए अनेक कानून बना डाले। 1878 का वर्नाक्यूलर प्रेस ऐक्ट समाचार-पत्रों की स्वतंत्रता को सीमित करने का ऐसा ही प्रयास था।
  • नस्लवादी भेदभावः प्रशासनिक एवं सैन्य अधिकारियों की नियक्ति में अंग्रेज भारतीयों के साथ भेदभाव पर्ण व्यवहार करते थे। अंग्रेजों को तो सभी विशेषाधिकार प्राप्त थे जबकि भारतीयों को उनके उचित अधिकार से भी वंचित रखा जाता था।
  • श्रम कानूनः बागानों एवं कारखानों में वृद्धि होने के साथ ही श्रमिकों की संख्या में भी वृद्धि हुई । इन श्रमिकों से बहुत अधिक काम लिया जाता था तथा इन्हें बहुत ही अस्वास्थ्यकर और खराब परिस्थिति में भी काम करना पड़ता था। बागानों और कारखानों के मालिक अधिकांशतया अंग्रेज होते थे जबकि वहाँ काम करने वाले श्रमिक भारतीय थे। श्रमिकों की सुख-सुविधा का कोई ध्यान नहीं रखा जाता था। 1881 एवं 1891 में पारित किए गए फैक्टरी अधिनियम मुख्यतः बाल-श्रम और स्त्रियों से संबंधित थे। इनसे श्रमिकों को अधिक राहत नहीं मिली। बागानों से संबंधित सभी कानून बागान मालिकों के पक्ष में थे और ये सभी मालिक यूरोपिय थे।

प्रशासन के इस विद्वेषपूर्ण रवैये ने भारतीयों को स्वायत्त शासन की मांग करने पर बाध्य किया। किंतु इस मांग का अनुकूल परिणाम नहीं हुआ। इसकी चर्चा हम आगे के अनुच्छेदों में करेंगे।

भारत में स्वायत्त शासन का प्रश्न

सन 1857 के बाद अंग्रेजों ने भारतीयों को स्वायत्त शासन देने का विचार बिल्कुल ही छोड़ दिया। सर चार्ल्स वुड ने जोकि भारत का सेक्रेटरी ऑफ स्टेट था, कहा कि भारत के लिए प्रतिनिध्यात्मक संस्था व्यावहारिक नहीं है । अंग्रेजों का कहना था कि भारत कोई राष्ट्र तो है नहीं। उन्होंने भेदभाव पैदा किए। ये भेदभाव मुख्यतः धार्मिक आधार पर प्रोत्साहित किए जाते थे किंतु अपने लक्ष्य के लिए अंग्रेजों ने जातीयता और क्षेत्रीयता की भावनाओं का भी प्रयोग किया । हंटर ने अपनी पुस्तक इंडियन मुसलमान्स (1870) में मुसलमानों का समर्थन करते हुए मुसलमानों की विशिष्टता और पृथकता पर बल दिया तथा उन्हें एकरूप समुदाय की संज्ञा दी। वायसरॉय लार्ड डफरिन ने 1888 में मुसलमानों को “पाँच करोड़ लोगों का राष्ट्र” कहा जिसके धार्मिक एवं सामाजिक रीति-रिवाज समान थे। वायसरॉय लार्ड एल्विन को लिखे गए एक पत्र में वुड ने लिखा, “हमने एक भाग को दूसरे के खिलाफ खड़ा करके अपनी शक्ति को बनाए रखा है और हमें यही नीति अपनाए रखनी चाहिए।”

किंतु भारत में घटनाएँ जो मोड़ ले रही थीं उसने अंततः सरकार को जनता की आकाक्षाओं की ओर ध्यान देने के लिए बाध्य किया । सत्तर का दशक बढ़ती हुई अशांति का समय था । उस अवधि में देश को अभूतपूर्व दुर्भिक्षों का सामना करना पड़ा। 1872 में ए.ओ. राम ने लार्ड नार्थबुक को सचेत किया कि अब “हमारे और सर्वहारा के बीच केवल संगीनों का फासला रह गया है।”

इस बीच राजनीतिक आंदोलन भी जोर पकड़ता जा रहा था। 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हई और वह लोगों की इच्छाओं और आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बन रही थी। कांग्रेस ने उत्तरदायी शासन व्यवस्था की मांग के समर्थन में आवाज उठाई । किंतु भारतीयों की आंकाक्षाओं की पूर्ति करने का अंग्रेज सरकार का कोई इरादा नहीं था ।

सन् 1892 में जब ब्रिटिश सरकार अधिनियम लाने पर बाध्य हुई तो स्पष्ट हो गया कि भारतीयों को सरकार में वास्तविक भागीदारी देने का उसका कोई इरादा नहीं था। राष्ट्रीय आंदोलन के जोर पकड़ने के साथ ही सरकार को फिर से सुलह की नीति अपनानी पड़ी जिसके परिणामस्वरूप 1909 का अधिनियम पारित हुआ। किंतु इसमें मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की व्यवस्था का प्रावधान किया गया तथा 27 सीटों में से 8 सीटें मुसलमानों के लिए आरक्षित रखी गईं।

भारत के राष्ट्रीय जीवन में गांधी जी के प्रवेश तथा राष्ट्रीय आंदोलन के देशव्यापी हो जाने के पश्चात् ही अंग्रेजों के दृष्टिकोण में अंतर दृष्टिगोचर होने लगा।

सारांश

ईस्ट इंडिया कंपनी की शुरुआत् एक व्यापारिक निगम के रूप में हुई थी किंतु 1857 तक इसका स्वरूप बदल गया और यह व्यापारिक निगम से राजसत्ता बन गई। तब ब्रिटेन की सरकार ने भारत संबंधी मामलों की व्यवस्था करने के लिए एक योजना तैयार की। यह योजना दासता और शोषण की उपनिवेशवादी योजना थी जिसके परिणामस्वरूप भारत की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था विघटित हो गई।

1857 के विद्रोह के बाद ब्रिटेन की सरकार ने भारत के प्रशासन का उत्तरदायित्व स्वयं ग्रहण कर लिया। विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने भारत में जो नीति अपनाई उसका मुख्य उद्देश्य था इस देश में अपने साम्राज्य को सुरक्षित रखना । इस बीच भारत में घटनाओं ने ऐसा मोड़ लिया कि सरकार को लोगों की इच्छाओं और आकांक्षाओं की ओर ध्यान देना पड़ा। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने स्वायत्त शासन के लिए किए जाने वाले जन आंदोलन का नेतृत्व किया। अंत में भारत को स्वाधीनता मिली किंतु देश का विभाजन हो गया।

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