कृषि ऋण माफ़ी : कृषि ऋण माफ़ी की कमियां

प्रश्न: कृषि ऋण माफ़ी का अंतिम लक्ष्य संकटग्रस्त और सुभेद्य किसानों का ऋण बोझ कम करना और उन्हें नए ऋणों के लिए अर्ह बनाने में सहायता प्रदान करना है। हालाँकि यह चलन कई कमियों से ग्रस्त है। चर्चा कीजिए।

दृष्टिकोण

  • कृषि ऋण माफ़ी के उद्देश्यों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए तथा कुछ राज्यों के उदाहरण दीजिए जिन्होंने हाल ही में कृषि ऋण माफ़ किए हैं।
  • कृषि ऋण माफ़ी की कमियों का उल्लेख कीजिए।
  • समस्या के एक स्थायी दीर्घकालिक समाधान हेतु कृषि ऋण माफ़ी के विकल्पों का उल्लेख करते हुए निष्कर्ष दीजिए।

उत्तर

विगत वर्ष से उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पंजाब सहित विभिन्न राज्यों ने कृषि ऋण माफ़ी की घोषणाएं की हैं और ऐसी ही मांगें अन्य राज्यों में भी उठी हैं। ऐसी ऋण माफियाँ किसानों की चिंताओं एवं आत्महत्याओं को कम करने, उन्हें अल्पकालिक राहत प्रदान करने एवं नए ऋणों के लिए अर्ह बनाने का साधन बनी हैं।

परन्तु ऐसी ऋण माफियाँ निम्नलिखित कमियों से ग्रसित हैं:

  • लोकलुभावन उपाय: इनका प्रयोग ‘करदाताओं के धन की लागत पर चुनावों को जीतने के लिए चुनावी वायदों के रूप में किया जाता है।
  • नैतिक खतरा: ऋण माफियाँ अप्रत्यक्ष रूप से ईमानदार तथा कानून का अनुपालन करने वाले उन किसानों को दंडित करती हैं जो समय पर पुनर्भुगतान करते हैं। इस प्रकार ये पुनर्भुगतान संस्कृति को समाप्त करती हैं जिसके फलस्वरूप बैंकिंग प्रणाली पर अत्यधिक दबाव पड़ता है।
  • कमजोर अर्थशास्त्र: ये सरकारी उधारियों की बढ़ोत्तरी के रूप में राजकोषीय घाटे में वृद्धि करती हैं। ये उधारियां निजी क्षेत्र के निवेश को बाहर कर देती हैं तथा इनके परिणामस्वरूप ब्याज दरों में वृद्धि होती है। इस प्रकार इन ऋण माफियों के कारण आर्थिक संवृद्धि का मार्ग बाधित होता है।
  • समावेशन तथा अपवर्जन त्रुटियाँ: कैग (CAG) की रिपोर्ट ने ऐसी त्रुटियों को इंगित किया है जो दर्शाती हैं कि 2008 की ऋण माफ़ी ने छोटे और सीमांत किसानों की विशेष रूप से कोई सहायता नहीं की है।
  • उच्च ऋण जोखिम के कारण सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (PSBs) पर प्रभाव: सरकार द्वारा प्रतिपूर्ति के बावजूद ऐसी योजनाएं दुर्बल ऋण अनुशासन और निम्न ऋण उपलब्धता के रूप में द्वितीय कोटि का प्रभाव (second order impact) उत्पन्न करती हैं।
  • प्रकृति में चयनात्मक: कुछ ही प्रकार के ऋण (जैसे कि फसल ऋण) तथा किसानों के वर्ग या ऋण स्रोत ही अर्हता प्राप्त कर पाते हैं। सम्बद्ध गतिविधियों इत्यादि में निवेशों का अपवर्जन ऋण माफ़ी के प्रभाव को क्षीण कर देता है।

इन कमियों के समाधान हेतु निम्नलिखित दीर्घकालिक उपाय अपनाये जाने चाहिए:

  • ऋण के अनौपचारिक स्रोतों की समाप्ति हेतु ग्रामीण ऋण सहकारी समितियों को सुदृढ़ बनाना चाहिए।
  • प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना जैसी आकर्षक योजनाओं के माध्यम से फसल बीमा के सब्सिडीकरण और कवरेज को बढ़ाया जाना चाहिए।
  • भारतीय कृषि की लोचशीलता में वृद्धि हेतु रणनीतियों को अपनाना जैसे सिंचाई अवसंरचना निर्माण, नदियों को जोड़ना, शुष्क भूमि कृषि को अपनाना, भारतीय कृषि को जलवायु अनुकूल बनाना, फसल विविधीकरण, फसल प्रतिरूप में परिवर्तन, भूमि पट्टा तथा अनुबंध कृषि को प्रोत्साहित करना, आपूर्ति श्रृंखला संबंधी बाधाओं को हटाना, कृषि उत्पाद बाजार समितियों (APMCs) में सुधार इत्यादि।

कृषि ऋण माफियाँ अल्पकालिक समाधान हैं तथा इन्होंने संकटग्रस्त और सुभेद्य किसानों का ऋण बोझ कम करने में अल्प उपलब्धि ही प्राप्त की है। वस्तुतः कार्यनीति में परिवर्तन करते हुए, दीर्घकालिक स्थायी कदमों को लोकलुभावन उपायों पर वरीयता दी जानी चाहिए।

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