वैज्ञानिक ज्ञान और तकनीकी विकास के अन्वेषण के मुद्दे : विज्ञान और प्रौद्योगिकी में नीतिशास्त्र (नैतिकता) को अपनाने की आवश्यकता

प्रश्न: वैज्ञानिक और तकनीकी विकास की तलाश में, नैतिक मूल्यों की उपेक्षा नहीं की जानी चाहिए। वर्तमान संदर्भ में चर्चा कीजिए।

दृष्टिकोण

  • संक्षेप में, वैज्ञानिक ज्ञान और तकनीकी विकास के अन्वेषण के मुद्दे पर प्रकाश डालिए।
  • विज्ञान और प्रौद्योगिकी में नीतिशास्त्र (नैतिकता) को अपनाने की आवश्यकता का वर्णन कीजिए। 
  • उपयुक्त उदाहरणों से अपने उत्तर की पुष्टि कीजिए। 
  • उपर्युक्त बिंदुओं के आधार पर निष्कर्ष दीजिये।

उत्तर

वैज्ञानिक ज्ञान का संचय और उसका तकनीकी अनुप्रयोग तीव्र गति से हो रहा है और इसका सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक जीवन सहित जीवन के लगभग सभी पहलुओं में दूरगामी प्रभाव पड़ रहा है। उदाहरण के लिए: सूचना और प्रौद्योगिकी (IT) ने संचार, राजनीतिक भागीदारी, आर्थिक एकीकरण आदि में क्रांति ला दी है। हालांकि, विज्ञान को प्राय: विशुद्ध ज्ञान माना जाता है, जो सत्य, वैधता, आदि जैसे ज्ञानात्मक मूल्यों से भिन्न अन्य मूल्यों से असंबंद्ध है। इसका उद्देश्य तर्कसंगत ज्ञान प्राप्त करना माना जाता है, जो मानवीय भावनाओं और प्रबल अनुरागों से अप्रभावित होता है। इस प्रकार, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को नैतिक रूप से उदासीन माना जाता है।

हालांकि, वैज्ञानिक साधनों और वैज्ञानिक विकास के मध्य अंतर है। साधनों को स्वयं मूल्य उदासीन माना जाता है। विकास को सदा नैतिक चिंतन की आवश्यकता वाला विषय क्षेत्र माना जाता रहा है – वर्षों से चला आ रहा विवेचन कि विज्ञान वरदान है या अभिशाप, सिद्ध करता है कि चिरकाल से वैज्ञानिक विकास की समीक्षा की जाती रही है। जिस तीव्र गति से हो रही प्रगति के साथ ही बीते कल के वैज्ञानिक विकास वर्तमान का साधन बन रहे हैं। इस संबंध में, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को अनुपूरित करने में नैतिक मूल्यों की भूमिका कभी भी इतनी अधिक नहीं रही है।

परमाणु प्रौद्योगिकी, आनुवंशिक अभियांत्रिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और रोबोटिक आदि के क्षेत्र में हो रही अभूतपूर्व प्रगति प्रत्येक व्यक्ति और सभी के अधिकारों को प्रभावित कर रही है। यह प्रश्न कि विज्ञान क्या कर सकता है।क्या नहीं कर सकता है, अब इस रूप में परिवर्तित हो गया है कि विज्ञान को क्या करना चाहिए/क्या नहीं करना चाहिए। इसके अतिरिक्त, अतीत में क्या गलत हुआ है और निकट भविष्य में क्या होने की आशा है, सामान्यत: इस बात को ध्यान में रखते हुए नियमों को बनाया जाता है। विकास की गति इतनी तीव्र हो गई है कि वैज्ञानिक विकास का मार्गदर्शन करने के लिए हमें नियमों से कहीं अधिक नैतिक सिद्धांतों की आवश्यकता है। नई तकनीकें हमसे मांग करती हैं कि हम वस्तुनिष्ठ रूप से उनके प्रभावों का आकलन करें,

रचनात्मक रूप से हमारी चिंताओं को उठाएं और लोगों को नुकसान पहुँचने पर जवाबदेही की माँग करें। इस संदर्भ में, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के लिए नीतिशास्त्रीय मूल्यों का अंगीकरण आवश्यक है।

एक और मुद्दा यह है कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विकास में सभी हितधारकों का कोई योगदान नहीं है। यह स्थापित करना कि कोई तकनीक उत्तम और लाभदायक है या नहीं, केवल उसके विकासकर्ता या वित्तपोषणकर्ता पर निर्भर करता है। उदाहरण के लिए, आनुवांशिक रूप से संशोधित फसलें उपज और उत्पादकता में वृद्धि करती हैं लेकिन साथ ही कहीं अधिक संसाधनों का उपभोग भी करती हैं। इस प्रकार, GM फसलें कई किसानों के लिए अवहनीय और पर्यावरण के लिए हानिकारक हैं।

तब इस प्रकार की फसलों के लिए नैतिक औचित्य यह सुनिश्चित करना होगा कि इसके सभी संभावित प्रभावों को ध्यान में रखा जाएगाक्या यह पहुंच में असमानता उत्पन्न करेगी और इस प्रकार, असमानता को बढ़ाएगी, क्या इससे प्राकृतिक रूप से विकसित किस्मों का विनाश होगा, क्या यह किसानों को कीटों के अप्रत्याशित प्रकोप के प्रति अधिक सुभेद्य बनाएगी, क्या इसका उपभोक्ताओं पर कोई दुष्प्रभाव पड़ेगा? इन सभी का उत्तर मुख्यत: नकारात्मक होने के बावजूद, खाद्य सुरक्षा के दृष्टिकोण से GM फसलों का समर्थन किया जा रहा है। अभी तक, शस्यन की पारंपरिक विधियों की पैदावार अनुवांशिक रूप से संशोधित फसलों के निकट कहीं भी नहीं टिकती है। इनके बिना इस बात की पूरी संभावना है कि शायद विश्व की भोजन की आवश्यकताओं की पूर्ति न हो पाए। यह तर्क अंतिम नहीं है किन्तु यह बताता है कि किस प्रकार नीतिशास्त्र विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में निर्णयों को अनुपूरित कर सकता है।

इस संदर्भ में उभरने वाले कुछ मुद्दों में सम्मिलित हैं:

  • देशों के बीच परमाणु हथियारों की दौड़: व्यापक मानव विनाश, पर्यावरणीय क्षति, परमाणु अपशिष्ट और प्रदूषण में वृद्धि आदि जैसे इसके संभावित परिणामों की उपेक्षा करते हुए देशों के मध्य परमाणु हथियारों की दौड़ चिंता का विषय है।
  • नैदानिक परीक्षण: नैदानिक परीक्षण रोगों की रोकथाम करने, उनकी जांच करने, पता लगाने या उपचार करने की श्रेष्ठतर विधियां खोजने में सहायता करते हैं। इनके साथ समस्या आचरण-संहिता का पालन न करने की है जिसका शोधकर्ताओं और नैदानिक अनुसंधान के अन्य हितधारकों को पालन करना चाहिए।
  • IT का प्रसार: IT के व्यापक संचार, सूचना तक पहुंच, ई-शासन, आदि जैसे अपरिमित लाभ हैं, लेकिन साथ ही इसने अभद्र घृणा फैलाने वाली भाषा, झूठे समाचारों, प्रतिशोधात्मक पॉर्न, ऑनलाइन बाल-शोषण आदि को भी जन्म दिया है।
  • गर्भपात: गर्भपात के नैतिक मुद्दे पर लोगों के विचार दो ध्रुवों में बंटे हुए हैं क्योंकि समर्थकों का तर्क है कि महिलाओं को यह तय करने का अधिकार है कि वे अपने शरीर के साथ क्या करना चाहती हैं, जबकि विरोधी भ्रूण हत्या को मानव हत्या के बराबर मानते हैं।
  • स्वचालन/कृत्रिम बुद्धिमत्ता: इससे दक्षता में वृद्धि, लागत में कमी आदि आएगी लेकिन इससे रोजगार की हानि भी होगी, विशेषकर अकुशल और अर्द्ध-कुशल श्रमिकों में।
  • आनुवंशिक अभियांत्रिकी: इसका परिणाम जीवन अवधि में विस्तार, तीव्र संवृद्धि दर, वांछित आनुवंशिक लक्षणों का विकास आदि हो सकता है। हालांकि इसकी प्रभावकारिता और संभावित हानिकारक प्रभावों के संबंध में कोई प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।

इस प्रकार, विज्ञान और नीतिशास्त्र को परस्पर अनन्य विषय क्षेत्र नहीं माना जाना चाहिए। सरकार ,निजी संगठनों और शोधकर्ताओं को वैज्ञानिक विकास से उत्पन्न होने वाले नैतिक मुद्दों के प्रति अधिक संवेदनशील होना चाहिए और उन्हें दूर करने के लिए एक साथ मिलकर काम करना चाहिए। उत्तरदायित्वपूर्ण ढंग से वैज्ञानिक ज्ञान और प्रौद्योगिकी का उपयोग करने में सहायता करने वाली नैतिक संहिता विकसित करना भी महत्वपूर्ण है। विज्ञान में नैतिक मूल्य हमारे विकास के लिए अभिप्रेत प्रौद्योगिकी का हानिकारक विचलन रोक सकते हैं। इस प्रकार, लंबी अवधि में और वृहत्तर शुभ के लिए – विज्ञान और नैतिकता के बीच सामंजस्य का विकास होना चाहिए।

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