वेबर की नौकरशाही : समालोचनात्मक चर्चा

प्रश्न: वेबर की नौकरशाही की एक विशिष्ट विशेषता, अवैयक्तिक प्रबंधन, समय के साथ विशेष रूप से समाज के कमजोर वर्गों के संबंध में उदासीनता के रूप में विकसित हो जाती है। समालोचनात्मक चर्चा कीजिए।

दृष्टिकोण

  • अवैयक्तिक प्रबंधन का संक्षिप्त परिचय दीजिए तथा वेबर की नौकरशाही में इसके महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
  • वेबर की नौकरशाही को कमजोर वर्गों के प्रति संवेदनशील बनाने हेतु कुछ सुझाव दीजिए।

उत्तर

अवैयक्तिक प्रबंधन वैयक्तिक संलिप्तता, भावनाओं और मनोभावों की बजाय आधिकारिक प्राधिकार एवं पूर्व-परिभाषित नियमों की प्रणाली के माध्यम से संचालित प्रबंधन है। यह वेबर की नौकरशाही (जो दक्षता को अधिकतम करने का प्रयास करती है) के सबसे महत्वपूर्ण भाग का निर्माण करता है।

अवैयक्तिक प्रबंधन की आवश्यकता 

  • लोगों के प्रति व्यवहार में बिना किसी पक्षपात अथवा घृणा के समानता सुनिश्चित करने हेतु। 
  • नौकरशाही की कार्यप्रणाली में न्यायसंगति और निष्पक्षता सुनिश्चित करने हेतु।
  • भविष्यगामी निर्णय निर्माण प्रक्रिया को आकार प्रदान करने हेतु संस्थागत स्मृति/दृष्टान्तों का सृजन करने हेतु।
  • वैधानिक रूपरेखा के अंतर्गत वैयक्तिक कारकों के स्थान पर तार्किक कारकों द्वारा निर्णय निर्माण हेतु।

अवैयक्तिक सिद्धांत की समस्याएं

कुछ विचारकों द्वारा यह तर्क दिया गया हैं कि वेबर की नौकरशाही नियमों के विवेकशून्य एवं कठोर अनुपालन के कारण जटिल परिवेश (जैसा कि विकासशील देशों में दृष्टिगोचर होता है) में एक अपरिहार्य विफलता से ग्रसित है। नियमों का यह विवेकशून्य एवं कठोर अनुपालन ‘अंध तार्किकता’ को उत्पन्न करता है। ‘असमानों’ के साथ समानतापूर्ण व्यवहार अधिक असमानता का सृजन करता है। विविधतापूर्ण विकासशील समाजों में प्रशासनिक कार्यप्रणाली में कार्यसंचालन में लोचशीलता/स्वायत्तता प्रदान करने की आवश्यकता होती है।

वेबर की नौकरशाही एक ऐसी संरचना में संचालित होती है जिसमें मानवीय भावनाओं, संतुष्टि, आवश्यकताओं और मूल्यों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता है। इसके कारण कर्मचारियों में संगठन के प्रति एक अपनत्व की भावना का विकास नहीं हो पाता और वे लोगों की उन आवश्यकताओं के प्रति भी उदासीन हो जाते हैं जिनकी पूर्ति की अपेक्षा संगठन से की जाती है। नियमों पर अत्यधिक निर्भरता प्रणाली में न केवल गत्यात्मकता की आवश्यकता की उपेक्षा करती है बल्कि पहलों को बाधित करती है और साथ ही यह कर्मचारियों के विकास को भी अवरुद्ध करती है।

कमजोर वर्गों के प्रति व्यवहार के संदर्भ में यह समस्या और अधिक चुनौतीपूर्ण बन जाती है क्योंकि वे निम्नलिखित कारणों से अपनी मांगों को प्रभावशाली रीति से प्रस्तुत करने में असमर्थ होते हैं-

  • अपने अधिकारों की मांग करने हेतु जागरुकता और पर्याप्त सामर्थ्य का अभाव।
  • सरकारी अधिकारियों की उदासीनता।
  • सशक्त अभिव्यक्ति अथवा दबाव समूह का अभाव।
  • संभवतः नवीन नियमों, उपकरणों और प्रौद्योगिकियों के प्रति अनभिज्ञता।

इसलिए नौकरशाही को अलग-अलग मामलों के अनुसार गत्यात्मकता के साथ ‘प्रणालीगत तार्किकता’ की आवश्यकता होती है।

आगे की राह 

  • नौकरशाही की कार्यप्रणाली को कमजोर वर्गों के साथ व्यवहार के संदर्भ में आवश्यक लोचशीलता के साथ अनुकूलित होते हुए नागरिकों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। सिद्धांत निर्देशित लोचशीलता विवेकशून्य ‘समानता’ के स्थान पर विवेकसंगत ‘निष्पक्षता’ है। इस सिद्धांत को भारतीय संविधान द्वारा “विधि के समान संरक्षण” तथा कमजोर वर्गों हेतु सकारात्मक कार्यवाही के रूप में अपनाया गया है।
  • नौकरशाही को परिवर्तक प्रतिनिधि के रूप में कार्य करना चाहिए तथा परिस्थितियों के अनुसार कुछ “विवेकसम्मत कार्य” करने में सक्षम होना चाहिए अर्थात् उन्हें नियमों के बहाने विलंब और अवरोध उत्पन्न करने के स्थान पर कुछ नवाचारी उपायों को प्रारंभ करने हेतु तत्पर होना चाहिए।

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