हिन्दी निबंध: सामाजिक सशक्तिकरण

शक्तिकरण का मतलब एक शख्स के रूप में अपनी जिंदगी पर खुद के नियंत्रण से है। और सामाजिक सशक्तिकरण से आशय समाज के सभी तबकों के लिए अपनी जिंदगी पर एक समान नियंत्रण और अहम फैसले लेने के लिए अवसर की उपलब्धता है। बहरहाल, अलग-अलग लोगों के लिए इसका अलग-अलग अभिप्राय है। युवाओं के लिए इसका मतलब सामाजिक नियमों और परंपराओं की परवाह किए बिना अपनी मर्जी के हिसाब से कुछ भी करना होगा, जबकि बुजुर्गों के लिए यह होगा कि अपने जीवन की सांध्यकालीन बेला में वे गरिमा और आत्म-सम्मान के साथ जी सके। पुरुषों के लिए इसका मतलब वित्तीय आजादी हो सकता है, जबकि महिलाओं के लिए इसके मायने जेंडर आधारित भेदभाव से छुटकारा हो सकते हैं।

किसी भी देश के आगे बढ़ने के लिए पहली और सबसे जरूरी शर्त है कि समाज के सभी तबके का एक समान सशक्तिकरण हो। यह तभी हासिल हो सकता है, जब एक समान विकास का मौका सुनिश्चित करने के लिए अलग-अलग योजनाओं और नीतियों का एकीकरण हो। सरकार बहुआयामी रणनीति पर काम कर समाज के इन अलग-अलग तबकों के सशक्तिकरण की कोशिश कर रही है।

किसी देश का विकास सुनिश्चित करने में महिलाएं सबसे अहम माध्यम हैं। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के शब्दों में कहें तो, महिलाओं का सशक्तिकरण पूरे परिवार के सशक्तिकरण के बराबर है’। हालांकि, भारत में सशक्तिकरण के लिए महिलाओं का संघर्ष जन्म से ही शुरू हो जाता है – इस हकीकत के साथ कि बच्चियों को जन्म लेने के अपने अधिकार के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। इस बात को महसूस करते हुए सरकार ने महिला सशक्तिकरण को मुख्य फोकस बनाने के लिए कई तरह की पहल की है। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, सुकन्या समृद्धि योजना, प्रधानमंत्री वय वंदना योजना और इस तरह की कई अन्य योजनाएं समाज में महिलाओं का दर्जा सुधारने में काफी कारगर होंगी।

अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग जैसे असहाय और हाशिए पर मौजूद तबकों के लिए सशक्तिकरण का मतलब वैसी कई चीजों की उपलब्धता है, जिन्हें हमारे जैसे ज्यादातर लोग आसानी से उपलब्ध होने वाला मानते हैं; मसलन बुनियादी शिक्षा; आजीविका की उपलब्धता और आगे बढ़ने के लिए मौके। प्रधानमंत्री जन धन योजना, मुद्रा, वेंचर कैपिटल फंड योजना, स्टार्ट-अप इंडिया, स्टैंड-अप इंडिया, स्किल इंडिया, शिक्षा हासिल करने के लिए छात्रवृत्ति योजनाएं, नौकरियों में आरक्षण आदि ने इन तबकों को विकास के संसाधनों के लिए एक समान उपलब्धता और समावेशी मौके मुहैया कराए हैं।

वरिष्ठ नागरिक अनुभव और ज्ञान का खजाना होते हैं। हालांकि, अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में वे उपेक्षित महसूस करते हैं। वरिष्ठ नागरिकों के लिए समेकित कार्यक्रम, राष्ट्रीय वयोश्री योजना, अटल पेंशन योजना, वय वंदना योजना आदि ने देश के बुजुर्ग नागरिकों के लिए आर्थिक आत्मनिर्भरता के साथ सम्मानित जीवन जीने की राह बनाई है।

दिव्यांग जनों के लिए जीवन पूरी तरह से अलग कहानी है। उनकी अक्षमता से उन्हें अक्सर यह महसूस होता है कि वे समाज पर बोझ हैं। सशक्तिकरण के लिए उनकी जरूरतें बिल्कुल अलग हैं यानी कार्यक्रमों को उनकी जरूरतों के हिसाब से बनाने की दरकार है। मिशनरी अंदाज में तकनीकी विकास परियोजनाएं, माध्यमिक स्तर पर दिव्यांगों के लिए समावेशी शिक्षा, सुगम्य भारत अभियान, दीनदयाल दिव्यांग पुनर्वास योजना आदि ने दिव्यांगों को बेहतर गुणवत्ता वाला जीवन हासिल करने के लिए प्रोत्साहित किया है।

जनजातीय लोगों के लिए सशक्तिकरण एक अलग प्रजाति के तौर पर उनके अस्तित्व के अधिकार से शुरू होता है। राष्ट्रीय मुख्यधारा की नीतियों और मजबूरियों के परिणामस्वरूप अक्सर जनजातीय समुदाय मुख्यधारा से अलग-थलग महसूस करने लगता है। या उसे अपनी पहचान खोने जैसा अहसास होता है। अनुसूचित जनजाति के छात्र-छात्राओं की उच्च शिक्षा के लिए राष्ट्रीय फेलोशिप और छात्रवृत्ति, व्यावसायिक प्रशिक्षण के लिए योजना, छोटे-मोटे जंगली उत्पादों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य, विशेष तौर पर कमजोर जनजातीय समूहों के लिए विकास की योजना और वन अधिकार कानून जैसे सरकार के हालिया कदमों ने जनजातिय लोगों के आर्थिक सशक्तिकरण में योगदान किया है।

आम तौर यह माना जाता है कि जब कोई विकास की तरफ बढ़ने का इरादा जताता है, तो उसे अपने साथ सबसे कमजोर को साथ लेकर चलना पड़ता है। हर शख्स बदलाव कर सकता है, बशर्ते वह कोशिश करे। सरकार ने समावेशी विकास सुनिश्चित करने के लिए अपनी नीतियों के जरिए पहले ही बदलाव लाना शुरू कर दिया है।

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