राजकोषीय घाटे, प्राथमिक घाटे तथा राजस्व घाटे 

प्रश्न: राजकोषीय घाटा, प्राथमिक घाटा और राजस्व घाटा के मध्य अंतर स्पष्ट करते हुए, अर्थव्यवस्था पर उच्च राजकोषीय घाटे के निहितार्थों की व्याख्या कीजिए।

दृष्टिकोण:

  • विभिन्न प्रकार के घाटों की परिभाषा के साथ उत्तर आरंभ कीजिए और राजकोषीय घाटे, प्राथमिक घाटे तथा राजस्व घाटे के अर्थों को समझाते हुए उनके मध्य अंतर स्पष्ट कीजिए।
  • अर्थव्यवस्था हेतु उच्च राजकोषीय घाटे के निहितार्थों की चर्चा कीजिए।
  • संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिए।

उत्तरः

अर्थव्यवस्था में घाटा तब होता है जब व्यय आय से अधिक हो जाता है। बजट के अंतर्गत प्राप्तियों और व्यय के प्रकारों के आधार पर घाटे को विभिन्न प्रकार के घाटों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

  • राजकोषीय घाटा (Fiscal deficit) एक वित्तीय वर्ष के दौरान कुल बजट प्राप्तियों (उधारियों को छोड़कर) के सापेक्ष कुल बजट व्यय के आधिक्य को दर्शाता है। राजकोषीय घाटा = कुल बजट व्यय – कुल बजट प्राप्तियां (उधारियों को छोड़कर)। = राजस्व व्यय + पूंजीगत व्यय – राजस्व प्राप्तियां – केवल गैर-ऋण पूंजीगत प्राप्तियां।

यदि हम ऋण सृजक (debt-incurring) पूंजीगत प्राप्तियों को जोड़ते हैं तो राजकोषीय घाटा शून्य हो जाएगा। सरल शब्दों में, राजकोषीय घाटा सरकार की ऋण आवश्यकताओं को दर्शाता है।

  • प्राथमिक घाटा (Primary deficit) बजट घाटे का एक प्रकार है, जिसे राजकोषीय घाटे में से ब्याज के भुगतान को घटाकर प्राप्त किया जाता है। राजकोषीय घाटे और प्राथमिक घाटे के मध्य अंतर अतीत में सृजित सार्वजनिक ऋण पर ब्याज के भुगतान के महत्त्व को दर्शाता है।
  • राजस्व घाटा (Revenue deficit) से आशय सरकार की कुल राजस्व प्राप्तियों पर कुल राजस्व व्यय के अधिशेष से है। यह दर्शाता है कि सरकार की उपार्जित आय स्वयं सरकारी विभागों के सामान्य कार्य-संचालन और सेवाओं संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति करने हेतु अपर्याप्त है।

अर्थव्यवस्था हेतु उच्च राजकोषीय घाटे के निहितार्थ:

  • ऋण पाश (Debt trap): उच्च राजकोषीय घाटे का अर्थ है- अधिक ऋण। जैसे-जैसे सरकार के ऋण की मात्रा में वृद्धि होती जाती है, उसी के अनुरूप भविष्य में ऋण के साथ-साथ ब्याज की देयता में भी वृद्धि होती जाती है। ब्याज भुगतान से राजस्व व्यय में वृद्धि होती है, जिससे राजस्व घाटा उच्च हो जाता है जो सरकार को और अधिक ऋण लेने के लिए बाध्य करता है।
  • मुद्रास्फीतिक दबाव: उच्च सरकारी व्यय से उत्पन्न मांग के परिणामस्वरूप उच्च मुद्रास्फीति की स्थिति व्युत्पन्न होती है। 
  • भविष्य की संवृद्धि को अवरुद्ध करना: ऋण और ब्याज राशि का भुगतान करना भावी पीढ़ियों पर एक वित्तीय बोझ होता है, जिससे अर्थव्यवस्था की संवृद्धि दर मंद हो जाती है।
  • कराधान में वृद्धि: उच्च राजकोषीय घाटे का अर्थ है कि सरकार व्यय के सापेक्ष आय सृजित करने में अक्षम हो रही है।
  • ब्याज दरें: भारत जैसी उभरती हुई अर्थव्यवस्था में उच्च राजकोषीय घाटे के कारण ब्याज दरों में कटौती किए जाने की संभावना कम होती है। भारत जैसी प्रगतिशील अर्थव्यवस्था में उच्च ब्याज दर निजी निवेश को प्रभावित कर सकती है।
  • विदेशी निर्भरता: सरकार को बाह्य ऋणों पर निर्भर रहना पड़ सकता है, जो अन्य देशों पर इसकी निर्भरता बढ़ाता है। इसके अतिरिक्त, उच्च राजकोषीय घाटा भारत की सॉवरेन रेटिंग को प्रभावित करता है और विदेशी निवेशकों के विश्वास में कमी करता है, जिससे ऋण की लागत में भी वृद्धि हो जाती है।
  • निजी क्षेत्र के निवेश पर प्रभाव: सरकार द्वारा बाजार से औसत से अधिक ऋण प्राप्त करने से निजी क्षेत्र हेतु ऋण प्राप्त करने हेतु कम भंडार (पूल) शेष रह जाता है, जिससे निजी क्षेत्र की विकास योजनाएं बाधित हो जाती हैं।

यदि राजकोषीय घाटे का उपयोग केवल राजस्व घाटे की पूर्ति हेतु किया जाता है, तो यह अर्थव्यवस्था के लिए अहितकर सिद्ध हो सकता है। हालांकि, यदि राजकोषीय घाटे से नवीन पूंजीगत परिसंपत्तियों का निर्माण होता है, तो इसके अर्थव्यवस्था पर सकारात्मक प्रभाव भी हो सकते हैं। इससे उत्पादक क्षमता में वृद्धि होती है और भविष्योन्मुखी आय के स्रोतों का सृजन हो सकता है।

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