किसी कार्यवाही को उसके साधनों और परिणामों के आधार पर नैतिक माने जाने के विचार पर संक्षिप्त चर्चा

प्रश्न: जहाँ कुछ नैतिक दृष्टिकोण किसी कार्यवाही को उसके परिणामों के आधार पर नैतिक मानते हैं, वहीं दूसरे विचारक साधनों पर ध्यान केन्द्रित करते हैं। भारतीय नौकरशाही का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए तुलनात्मक परीक्षण कीजिये कि इन दृष्टिकोणों ने नागरिकों को लाभान्वित करने में किस प्रकार अपनी भूमिका का निर्वाह किया है।

दृष्टिकोण

  • किसी कार्यवाही को उसके साधनों और परिणामों के आधार पर नैतिक माने जाने के विचार पर संक्षिप्त चर्चा कीजिए।
  • भारतीय नौकरशाही का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए दोनों का तुलनात्मक परीक्षण प्रस्तुत कीजिये।
  • चर्चा कीजिये कि दोनों दृष्टिकोणों ने नागरिकों को लाभान्वित करने में किस प्रकार अपनी भूमिका का निर्वाह किया है।

उत्तर

नैतिक दृष्टिकोणों के मध्य प्रायः साधन एवं परिणाम अथवा साध्य को लेकर विवाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। जहाँ कुछ विचारकों के अनुसार, यदि किसी कार्यवाही से मिलने वाला परिणाम नैतिक है तो उसके लिए प्रयोग में लाये जाने वाले साधनों का मूल्यांकन नहीं किया जाना चाहिए। वहीं अन्य के अनुसार साधनों की पवित्रता भी स्वयं में एक परिणाम है क्योंकि गलत साधन का प्रयोग, सही परिणाम को न्यायसंगत नहीं सिद्ध कर सकता।

भारतीय नौकरशाही के समक्ष साध्य बनाम साधन की यह दुविधा प्रायः उपस्थित होती है, चूंकि नौकरशाही में साधन-आधारित एवं साध्य-आधारित, दोनों प्रकार के मूल्य पाये जाते हैं। नियम, पदानुक्रम, विशेषज्ञता, श्रम का विभाजन, मेरिट आधारित भर्ती, औपचारिक आदेश, आदि लोक सेवा के वृहद् लक्ष्य की प्राप्ति हेतु नौकरशाही की अद्वितीय विशेषताएँ हैं। इन विशेषताओं ने नागरिकों को निम्नलिखित रूपों में सहायता प्रदान की है:

  • नियम और प्रक्रियाएं अनुरूपता बनाए रखती हैं। यह नौकरशाही की नागरिकों के साथ अंतक्रिया तथा नागरिकों के साथ व्यवहार करते समय तटस्थता एवं निष्पक्षता संबंधी मूल्यों के पालन को सुविधाजनक बनाती है।
  • कर्तव्यों और उत्तरदायित्वयों को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया जाता है। इससे दक्षता में वृद्धि तथा सार्वजनिक सेवाओं के वितरण में जवाबदेहिता निर्धारित करने में सहायता होती है।
  • चयन प्रक्रिया एवं प्रोन्नति, योग्यता और विशेषज्ञता पर आधारित होते हैं। इससे न्याय की एक आदर्श रूप में स्थापना सुनिश्चित होती है। इसके साथ ही मानव संसाधनों का इष्टतम उपयोग भी सुनिश्चित होता है।
  • श्रम के विभाजन से प्रदर्शन में काफ़ी सुधार होता है। इससे अर्थव्यवस्था और व्यापक स्तर पर जन कल्याण में वृद्धि होती है।
  • औपचारिक आदेश यह सुनिश्चित करते हैं कि कोई निर्णय लेने या निर्देश जारी करते समय हितों का कोई संघर्ष न उत्पन्न हो। यह नौकरशाही को ईमानदारी और सत्यनिष्ठा के आदर्श का पालन करने में सहायता प्रदान करता है।

इन साधन-आधारित मूल्यों ने नौकरशाही को नागरिकों की आकांक्षाओं की पूर्ति का एक उपकरण बना दिया है। नौकरशाही ने विकास एवं कल्याण की विशाल परियोजनाओं का दायित्व निभाते हुए भारत को संतोषजनक विकास एवं संवृद्धि के स्तर प्रदान किए गए हैं।

हालाँकि, इन साधनों पर अनुचित बल दिए जाने से समता, प्रगति, सामाजिक न्याय एवं समावेशी विकास को हानि पहुँची है। ऐसा करने से साधन ही स्वयं साध्य बन जाते हैं जिससे लोक सेवा प्रदायगी पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इन नियमों और प्रक्रियाओं के पालन की अनिवार्यता के कारण नागरिकों की समस्याओं एवं चिंताओं पर समुचित ध्यान देना संभव नहीं हो पाता है। किन्तु नौकरशाही इन सीमाओं के प्रति सचेत हो गई है। कई नौकरशाहों के द्वारा साधनों से आगे बढ़कर साध्य की प्राप्ति के प्रयास किए गये हैं; चाहे इसके लिए नौकरशाही की सामान्य विशेषताओं का त्याग करना पड़ा हो अथवा इन विशेषताओं के साथ ही कार्य किया गया हो।

  • कोंकण रेलवे जैसी विशाल विकास परियोजनाओं की सफलता यह इंगित करती है कि नौकरशाही नियमों और प्रक्रियाओं से आबद्ध नहीं थी बल्कि यह नवाचारी तथा कल्पनाशील भी थी। इस कार्य को संपन्न करने हेतु नौकरशाही की बहुत सी विशेषताओं का पालन नहीं किया गया था।
  • यद्यपि नियमों का उल्लंघन नहीं किया जा सकता, किन्तु ऐसे नवाचारी तरीके अपनाये जा सकते हैं जो वैसे उपायों का सहारा लें जिनका नियमों में उल्लेख नहीं किया गया है। उदाहरण के लिए, राज्य के स्पष्ट आदेश अथवा दिशानिर्देशों के बगैर बहुत से जिलों में सेवाओं का इलेक्ट्रॉनिक वितरण प्रारंभ किया जा चुका है। ये उत्साही नौकरशाह ही थे जिन्होंने राज्य और नागरिक के बीच सार्वजनिक कार्यालय के इंटरफेस के बगैर ही सार्वजिनक सेवाओं की आपूर्ति के उपाय खोज निकाले।
  • कई अधिकारियों ने बगैर किसी सरकारी सहायता के भी विकास परियोजनाएँ पूर्ण की हैं। उनके द्वारा क्राउड फंडिंग, इत्यादि उपायों का प्रयोग किया गया है।

लक्ष्य-उन्मुख अथवा साध्य-केन्द्रित होने का तात्पर्य यह नहीं है कि नियमों का उल्लंघन किया जाना चाहिए। इसका तात्पर्य यह है कि नियमों को लक्ष्य के साथ इस प्रकार कम किया जाना चाहिए कि वे अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति में बाधा न बनें।

इस प्रकार भारतीय नौकरशाही ने साध्य और साधन, दोनों का ही सार्वजनिक कल्याण के लिए उपयोग किया है। देश के उथलपुथल भरे इतिहास के बावजूद यह धीरे-धीरे नागरिक-केन्द्रित दृष्टिकोण की ओर बढ़ रही है और व्यापक स्तर पर जन कल्याण के लिए नौकरशाही संबंधी विशेषताओं के पालन करने की अनिवार्यता से उभर पाने में समर्थ हो रही है।

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