मुक्तिबोध का काव्य शिल्प : फैंटेसी के संदर्भ में

यह इकाई गजानन माधव मुक्तिबोध के काव्य शिल्प के अध्ययन से संबंधित है। मुक्तिबोध के काव्य शिल्प को फैंटेसी के विशेष संदर्भ में समझाने का प्रयास इस इकाई में किया गया है। इस इकाई के अध्ययन के बाद आपः 

  • काव्य शिल्प के रूप में फैंटेसी के महत्व को समझ सकेंगे,
  • फैंटेसी के स्वरूप और प्रकृति की जानकारी प्राप्त कर सकेंगे,
  • फैंटेसी के शिल्प की विशेषताएँ जान सकेंगे,
  • मुक्तिबोध ने फैंटेसी शिल्प का अपनी काव्य-रचना में किस प्रकार सर्जनात्मक उपयोग किया है – यह समझ सकेंगे, और
  • फैंटेसी के संदर्भ में मुक्तिबोध के काव्य शिल्प की अन्य विशेषताएँ जान सकेंगे।

इस इकाई के अंतर्गत हम मुक्तिबोध के काव्य-शिल्प पर विस्तार से विचार करेंगे। मुक्तिबोध ने अपने लिए फैंटेसी के शिल्प को चुना था, जिसमें मिथक, प्रतीक, रूपक, उपमा, बिंब आदि अभिव्यक्ति के विभिन्न उपकरण घुल-मिलकर आए हैं। अत: इस इकाई के अंतर्गत ही उपर्युक्त उपकरणों के महत्व पर भी प्रकाश डाला जाएगा। वस्तुत: “फैंटेसी‘ आपके लिए एक नया शब्द है, जो हिंदी का अपना न होकर अंग्रेज़ी का शब्द है। अत: इसके अर्थ के साथ ही फैंटेसी के स्वरूप, उसकी प्रकृति के विषय में मनोविश्लेषणवादी मनोवैज्ञानिकों, क्रिस्टोफर काडवेल जैसे समर्थ साहित्यिक चिंतकों की मान्यताओं पर भी विचार करना ज़रूरी है। फैंटेसी का मुक्तिबोध-सम्मत अर्थ “एक साहित्यिक की डायरी’ के “तीसरा क्षण” शीर्षक निबंध और “कामायनी : एक पुनर्विचार’ शीर्षक समीक्षात्मक ग्रंथ में विस्तार से स्पष्ट हुआ है।

यहाँ उसे संक्षेप में ही प्रस्तुत किया जाएगा। लेकिन इससे पूर्व विषय-वस्तु, रूप या शिल्प के संबंध को लेकर मुक्तिबोध की मान्यताओं से आपका परिचय होना आवश्यक है। कथ्य और शिल्प के पारस्परिक संबंध के विषय में मुक्तिबोध की यह मान्यता रही है कि इन दोनों को एक-दूसरे से पूरी तरह अलग-थलग कर के हम इनका वास्तविक मूल्यांकन नहीं कर सकते। इस तथ्य को समझने के लिए उनकी समीक्षात्मक कृतियों के हवाले की अपेक्षा एक कवितांश को उद्धरण के रूप में विवेचित विश्लेषित करना अधिक व्यावहारिक होगा :

“अधूरी और सतही ज़िन्दगी के गर्म रास्तों पर

हमारा गुप्त मन

निज में सिकुड़ा जा रहा

जैसे कि हब्शी एक गहरा स्याह

गोरों की निगाहों से अलग ओझल

सिमिट कर सिफर होना चाहता हो जल्द।।

मानो कीमती मजमून

गहरी गैर कानूनी किताबों, जब्त पर्चों

को कि पाबंदी लगे से भेद सा बेचैन

दिल का खून

जो भीतर

हमेशा टप्प टप कर टपकता रहता

तड़पते से खयालों पर

यही कारण कि सिमटा जा रहा सा हूँ

स्वयं की छाँह की भी छाँह सा बारीक

होकर छिप रहा सा हूँ

समझदारी व समझौते

विकट गड़ते।

हमारे आप के रास्ते अलग होते।

व पल भर मात्र

आत्मलोचनात्मक स्वर प्रखर होता।”

(चकमक की चिनगारियाँ” पहला बंद)

यहाँ कवि ने बाह्यमन, जो अधिकांशत: दुनियादार होता है, उस के दबाव से गुप्त मन (अन्तरात्मा) के संकुचित होने, छिप जाने को बहुत से गोरों की निगाहों से बचने-छिपने वाले हब्शी की स्थिति और सरकारी पाबंदी लगे हुए सत्य की अभिव्यक्ति की छटपटाहट की स्थिति जैसे दो उपमानों द्वारा प्रस्तुत किया है। आप गौर करें कि यद्यपि अंतिम दोनों स्थितियाँ जो अभिव्यक्ति का उपकरण बन कर आयी हैं, अप्रस्तुत हैं, और प्रस्तुत का बिंब-ग्रहण कराने के लिए इनकी योजना की गयी है, फिर भी ये उपकरण कथ्य का अभिन्न अंग बनकर उसे और अधिक सम्पन्न करते हैं। इनके माध्यम से मुक्तिबोध का आत्मसंघर्ष, उसकी दिशा, दृष्टि और मूल्य-भावना भी संकेतित हुई है। यदि इन दोनों उपमानमूलक उपकरणों को काव्यांश से निकाल दिया जाए तो भी लाक्षणिक प्रयोगों और बिंबात्मक शिल्प के माध्यम से मूल कथ्य की अभिव्यक्ति तो हो जाती है।

लेकिन इन्हें निकाल देने पर मुक्तिबोध की निजी वेदना और छायावादी कवियों, नयी कविता के कवियों की वेदना के मध्य जो अंतर है, वह पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। “गोरों की निगाहों से छिपकर सिफर होने वाला हशी” आज के विश्व-व्यापी उत्पीड़न और शोषणचक्र का एक सत्य है, जो कवि के गहन सामाजिक सरोकार से भी जुड़ा हुआ है। ”गैर कानूनी किताबों और जब्त परचों में छिपा हुआ “कीमती मजमून’ केवल आज की दुनिया भर की सच्चाई ही नहीं, वरन् मुक्तिबोध के व्यक्तिगत अनुभव का भी एक अंग है। सन् 52 में ‘कामायनी” पर लिखी गई उनकी प्रथम समीक्षात्मक रचना मुद्रित होकर भी प्रकाशक की अनुदारता से प्रकाश में नहीं आई और दूसरी रचना “भारत:इतिहास और संस्कृति” सन् 62 ई० में मध्य प्रदेश सरकार के शिक्षा विभाग द्वारा पाठ्यक्रम में निर्धारित होने के बावजूद उसी सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा गैर कानूनी (प्रतिबंधित) घोषित कर दी गई थी।

अत: इन उपमानों का संबंध “अधूरी और सतही जिंदगी के गर्म रास्तों पर चलने’ की व्यक्तिगत पीड़ा से भी है, जिसके संबंध में मुक्तिबोध ने लिखा है, “उस पुस्तक में

  • क्रांतिकारी आह्वान नहीं है, 
  • हिंसा का प्रचार नहीं है, 
  • वह अश्लील भी नहीं है।

फिर भी उसमें कुछ ऐसे महत्वपूर्ण सत्यांश हैं, जो नागवार गुज़रे।” – (नये साहित्य का सौंदर्यशास्त्र, पृ0 156)। कहने का तात्पर्य यह है कि इस कवितांश में अभिव्यक्ति के उपकरण भी मुक्तिबोध के व्यक्तित्व के, जीवन के और उनकी निजी दृष्टि के संदर्भ लिए हुए हैं। मुक्तिबोध के सम्पूर्ण काव्य में वस्तु (कान्टेंट) और रूप (फार्म) का यह संबंध स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

फैंटेसी का स्वरूप और उसकी प्रकृति

फैंटेसी मूलत: मनोविश्लेषण शास्त्र से संबद्ध शब्द है, जिसकी व्याख्या स्वप्न के संदर्भ में फ्रायड और युंग ने की है। यद्यपि इन दोनों मनोविश्लेषणवादियों ने स्वप्न से फैंटेसी को अलग करने का प्रयास किया है, लेकिन युंग ने “अभिप्रेरित चिंतन” (डायरेक्टेड थींकिंग) के रूप में विवेक द्वारा नियंत्रित सत्य के सामाजिक मानदंड के रूप में इसे स्वीकार किया है। प्रसिद्ध मार्क्सवादी समीक्षक क्रिस्टाफर काडवेल ने इस व्याख्या को अंशत: स्वीकार किया है और इसे “अभिप्रेरित अनुभूति” (डायरेक्टेड फीलिंग) सिद्ध करते हुए सौंदर्य या अच्छाई का सामाजिक मानदंड माना है। (इल्यूजन एंड रिएलिटी, पृ0 160-61) फैंटेसी विवेक-प्रक्रिया द्वारा अनुशासित न होकर हृदय या मन द्वारा अनुशासित होती है। फैंटेसी से संबद्ध विस्तृत जानकारी के लिए आप अशोक चक्रधर की पुस्तक ‘मुक्तिबोध की काव्यप्रक्रिया के पृष्ठ 72 से 84 तक अवश्य देख लें।

मुक्तिबोध ने फैंटेसी के संदर्भ में काडवेल की व्यवस्था को अधिकांशत: स्वीकार किया है किंतु “अभिप्रेरित अनुभूति(डायरेक्टेड फीलिंग) के स्थान पर उसे “संवेदनात्मक उद्देश्य’ से नियंत्रित एक सक्रिय-सर्जनात्मक इकाई के रूप में ग्रहण किया है ‘फैंटेसी डायनेमिक होती है। कला के प्रथम क्षण के अंतिम सिरे पर उत्पन्न होते ही उसकी गतिमानता शुरु हो जाती है।” (एक साहित्यिक की डायरी, पृ0 20) कला के प्रथम क्षण अर्थात् “जीवन के उत्कट तीव्र अनुभव क्षण’ के अंतिम सिरे और कला के दूसरे क्षण अर्थात् सौंदयानुभूति के आरंभिक सिरे पर उत्पन्न फैंटेसी वस्तुत: निर्वैयक्तिकता की ही . एक स्थिति को संकेतित करती है। निर्वैयक्तिकता की यह स्थिति ही मुक्तिबोध द्वारा निरूपित कला का दूसरा क्षण अर्थात् फैंटेसी का क्षण है, जिसके संबंध में मुक्तिबोध ने लिखा है, “जो फैंटेसी अनुभव की व्यक्तिगत पीड़ा से स्वतंत्र होकर, अनुभव के भीतर की ही संवेदनाओं के द्वारा उत्सर्जित और प्रक्षेपित होगी वह एक अर्थ में वैयक्तिक होते हुए भी निर्वैयक्तिक होगी। उस फैंटेसी में अब एक भावनात्मक उद्देश्य की संगति आ जाएगी, इस संवेदनात्मक उद्देश्य के द्वारा ही वस्तुत: फैंटेसी को रूप-रंग “मिलेगा।”- 

‘फैंटेसी” के शिल्प की विशेषताओं का अत्यंत स्पष्ट और व्यावहारिक विवेचन मुक्तिबोध ने “कामायनी : एक पुनर्विचार’ में किया है। फैंटेसी और जीवन के संबंध को स्पष्ट करते हुए मुक्तिबोध ने लिखा है, ‘फैंटेसी में प्रतिच्छायित जीवन-तथ्य – फैंटेसी के अपने फ्रेम के अंग ही हों, यह आवश्यक नहीं। आवश्यक इतना ही है कि फैंटेसी के रंग जीवन-तथ्यों के रंग से मिलते-जुलते हों अथवा उन तथ्यों के रंग से अनुस्यूत हों। हम मनु के कथन का एक उदाहरण लें :

“तुम हो कौन और मैं क्या हूँ

इसमें है क्या धरा सुनो,

मानस जलधि रहे चिर-चुम्बित,

मेरे क्षितिज उदार बनो।’

“इस फैंटेसी का फ्रेम, उसका ढाँचा वस्तुत: अध्यात्मवादी है। इसलिए प्रिय-सौंदर्य को क्षितिज कहा गया है। “तुम कौन”? ”मैं कौन”? ये प्रश्न भारतीय दर्शन के अंग रहे हैं। इन प्रश्नों में आत्मा-परमात्मा का प्रश्न द्योतित है। किंतु उपर्युक्त काव्य-पंक्तियों की सारी अर्थ दीप्ति कहाँ से स्फुरित हुई है? प्रियतम और प्रेयसी के परस्पर संबंधों के जीवन-तथ्य से। संक्षेप में, कवि जीवन के प्रणय-तथ्य का उद्घाटन कर रहा है। तुम कौन हो मैं कौन हूँ, हमारी वास्तविक स्थिति और स्तर क्या है इससे हमें मतलब नहीं। हम प्रेम करते हैं, इतना काफी है, इस फैंटेसी का ढांचा अध्यात्मवादी-रहस्यवादी है, किंतु उसका मूल तथ्य प्रणय-तथ्य है।

निष्कर्ष यह है कि फैंटेसी का आकार (ढाँचा) तो अपना होता है, किंतु उसमें रंग जीवन-तथ्यों से उद्गत होते हैं।”यह विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है कि यहाँ प्रसाद जी ने केवल सामान्य जीवन-तथ्य ही नहीं प्रस्तुत किए हैं। प्रेम संबंधी परिकल्पना में अपनी जीवन-दृष्टि और विश्व-दृष्टि भी प्रस्तुत कर दी है। यह लम्बा उद्धरण फैंटेसी के स्वरूप और उसके व्यावहारिक उपयोग को अच्छी तरह स्पष्ट कर देता है। यह फैंटेसी के संदर्भ में मुक्तिबोध की शिल्पगत विशेषताओं के विवेचन-विश्लेषण में भी पर्याप्त सहायक होगा।

फैटेसी के शिल्प की शक्ति और सीमा

मुक्तिबोध की शिल्पगत विशेषताओं पर विचार करने से पूर्व फैंटेसी के शिल्प की शक्ति एवं सीमाओं पर भी विचार कर लेना आवश्यक. है। मुक्तिबोध ने स्वयं इसे भाववादी बुर्जुआ शिल्प माना है। यथार्थवादी शिल्प और यथार्थवादी दृष्टि तथा भाववादी शिल्प और भाववादी दृष्टि के अंतर को स्पष्ट करते हुए मुक्तिबोध ने लिखा है, “यथार्थवादी शिल्प के अंतर्गत यथार्थ के बिंब, यथार्थ के स्वरूप और गति के नियमों में बंधकर प्रस्तुत होते हैं। दूसरे शब्दों में यथार्थवादी शिल्प के अंतर्गत विभाव-पक्ष (वस्तुपक्ष या मूल कथ्य) का चित्रण होता है, उस पक्ष के आधार पर भाव-पक्ष का उद्घाटन। इसके विपरीत भाववादी रोमैंटिक शिल्प के अंतर्गत भाव-पक्ष का ही चित्रण होता है और विभाव-पक्ष (वस्तु-पक्ष) को नेपथ्य (पद) में डाल दिया जाता है। संक्षेप में यथार्थवादी शिल्प और यथार्थवादी दृष्टिकोण में अंतर है। यह बहुत संभव है कि यथार्थवादी शिल्प के विपरीत, जो भाववादी शिल्प है उस शिल्प के अंतर्गत जीवन को समझने की दृष्टि यथार्थवादी रही हो।”-जहाँ तक मुक्तिबोध का प्रश्न है, उन्होंने भाववादी शिल्प अर्थात फैंटेसी के शिल्प में अपनी यथार्थवादी दृष्टि के साथ ही अपनी द्वंद्वात्मक भौतिकवादी समझ को कुशलतापूर्वक प्रस्तुत किया है।

फैंटेसी और भाववादी शिल्प के संबंध में मुक्तिबोध की उक्त मान्यताओं को ध्यान में रखते हुए यदि हम उनकी कविताओं का विश्लेषण करें तो हमें स्पष्ट पता चलेगा कि फैंटेसी के शिल्प का उन्होंने अपने ढंग से विकास किया है। वे कभी अपने अनुभूत जीवन-तथ्यों को सुदूर अतीत के साथ संबद्ध कर, फैंटेसी को स्वतंत्र दिक्काल (दिशा और समय) देते हुए, वर्तमान से आकर्षक दूरी पैदा करते हैं, तो कभी उसे वर्तमान के किन्ही अन्य तथ्यों या भिन्न स्थितियों के साथ संबद्ध करं मात्र स्थानगत (स्पेस) दूरी पैदा करते हुए एक रहस्यलोक की सृष्टि करते हैं।

यही नहीं, वरन् कहीं-कहीं वे वर्तमान जीवनतथ्यों को भविष्य के स्वप्निल आदर्श-लक्ष्यों के साथ जोड़ कर एक गहरी जिज्ञासा पैदा करते हैं। ये तीनों स्थितियाँ कभी अलग-अलग और कभी एक साथ भी बहुत सी कविताओं में मिलती हैं। फैंटेसी की इस बहमुखी प्रकृति के कारण उनकी अधिकांश कविताओं में उनका पूरा व्यक्तित्व, सम्पूर्ण अनुभूत जीवन-सार और एक इच्छित जीवनादर्श ही नहीं समाविष्ट हुआ है, वरन् वह मानवी-सामाजिक संबंध क्षेत्र भी अभिव्यक्त हुआ है, जिसमें रहकर कवि ने सांस ली है और अपनी वर्ग दृष्टि के अनुकूल उन मानव-संबंधों के मूल्य-मानों को संशोधित-संपादित कर एक विश्व दृष्टि का रूप दिया है। इस ओर स्पष्ट संकेत करते हुए उन्होंने लिखा है :

उपमाएँ उद्घाटित-वक्षा मृदु स्नेहमुखी

एक टक देखतीं मुझको-प्रियतर मुसकातीं।

वे जगत-समीक्षा करते से मेरे प्रतीक-रूपक सपने फैलाते

आगामी

के दरवाज़े दुनिया के सारे खुल जाते

प्यार के किस्सों की

उदास गलियाँ

गम्भी-करुण मुसकराहट में

अपना उर का सब भेद खोलती हैं

अनजाने हाथ मित्रता के

मेरे हाथों में पहुँच ऊष्मा करते हैं

मैं अपनों से घिर उठता हूँ

मैं विचरण करता सा हूँ एक फैंटेसी में

यह निश्चित है कि फैंटेसी कल वास्तव होगी।” – (एक अंतर्कथा)

इस कविता में परंपरा का शोघ करते हुए, उसके मूल्य को समझ लेने के बाद ये पंक्तियाँ आयीं हैं। इनमें आए अभिव्यक्ति के विभिन्न उपकरणों के साथ मुक्तिबोध ने एक गहरी आत्मीयता प्रकट की है। इसके साथ ही इन उपकरणों का आत्मानुभूत जीवन के साथ गहरा रिश्ता भी संकेतित हुआ है। कहने का अभिप्राय यह है कि मुक्तिबोध ने जिस प्रकार फैंटेसी को जीवन मर्मों के साथ लिपटी हुई माना है, उसी प्रकार उपमा, रूपक, प्रतीक, बिंब आदि को जीवन के गहरे स्पर्श से युक्त माना है। इस संबंध में अपनी धारणा को स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा है कि “ध्यान में रखने की बात है कि कोई प्रतीक तभी तक भावोत्तेजना की शक्ति रखता है, जब तक किं उसकी जड़ें सामाजिक-सामूहिक अनुभवों की धरती में समायी हुई हों। मात्र व्यक्तिगत धरातल पर तो हज़ारों प्रतीक खड़े किए जा सकते हैं।”वस्तुत: यह बात सिर्फ प्रतीकों पर ही नहीं, उपमाओं, रूपकों, मिथकों, बिंबों आदि पर भी समान रूप से लागू होती है। इन सबको साथ लेकर ही फैंटेसी गतिशील होती है।

फैंटेसी : कविताओं के विश्लेषण के संदर्भ में

उपर्युक्त सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए फैंटेसी के शिल्प की दृष्टि से ‘अंत:करण का आयतन” शीर्षक कविता के विश्लेषण द्वारा हम मुक्तिबोध की शिल्पगत विशेषताओं को आसानी से समझ सकते

“अंत:करण का आयतन” कविता का आरंभ अत्यंत सहज, आत्मीय ढंग से, किंतु असंतोषपूर्ण आत्मस्वीकृति के माध्यम से इस प्रकार होता है :

‘अन्त:करण का आयतन संक्षिप्त है

आत्मीयता के योग्य

मैं सचमुच नहीं।

आगे भी अंत तक काव्य-नायक ”मैं” के माध्यम से कविता आत्मकथन शैली में प्रस्तुत हुई है। काव्यनायक “मैं” आरंभ में ही अपनी “सर्वगामी छाया’ के माध्यम से एक रहस्यमय वातावरण की सृष्टि करता है :

“पर क्या करूँ यह छाँह मेरी सर्वगामी है।

हवाओं में अकेली सांवली बेचैन उड़ती है

कि श्यामल-अंचला के हाथ में ,

तब लाल कोमल फूल होता है

चमकता है अंधेरे

में प्रदीपित द्वंद्व चेतस् एक

सत्-चित्-वेदना का फूल

उसको ले

न जाने कहाँ किन-किन सांकलों को

खटखटाती वह।’

यहाँ तक उस रहस्यमय छाया रूप फैंटेसी का वास्तविक रूप यद्यपि पूरी तरह उद्घाटित नहीं हुआ है, फिर भी उसके हाथ में स्थित प्रकाशमान “सत-चित-वेदना का द्वंद्व-चेतस फूल’ रहस्य के आवरण में वस्तुत: द्वंद्वात्मक भौतिकवादी समझ है, जिसके प्रकाश में काव्य-नायक की छाया अपनी यात्रा सम्पन्न करती है। फैंटेसी की प्रकृति के अनुसार इसे संवेदनात्मक उद्देश्य की संज्ञा दी जा सकती है। काव्यनायक ”मैं’ की छाया द्वारा सांकलों को खटखटाने के बाद भी :

“नहीं इनकार वाले द्वार खुलते, किंतु

उन सोतों हुओं के गूढ़ सपनों में

परस्पर विरोधों का उ-विदारक शोर होता है

विचित्र प्रतीक गुंथ जाते, (अनिवार्य का भवितव्य)।

नीलाकाश 

नीचे – और नीचे उतरता आता

उस नीलाभ छत से शीश टकराता

कि सिर से खून चेहरा रक्त-धाराओं भरा।’

यहाँ दरवाज़ा बंद कर सोने वाले लोग वर्गीय विषमता से ग्रस्त समाज के प्रतीक हैं। उनके गूढ स्वप्न परस्पर-विरोधी आशाओं-आकांक्षाओं के प्रतीकाभास हैं, जिन्हें “उर-विदारक’ शोर के रूप में सुनकर काव्य-नायक एक “अनिवार्य भवितव्य’ (अवश्यंभावी घटना) का अनुभव करता है। यह अनिवार्य भवितव्य वस्तुत: वर्ग-संघर्ष की अनिवार्यता है, जिसका दबाव एक गंभीर दायित्व के रूप में काव्यनायक “मैं” को आक्रांत करता है। नीलाभ आकाश से टकराकर सिर का फूटना चेहरे का रक्तस्नात् होना, उपर्युक्त तथ्य का संकेतक है। ‘अंधेरे में’ कविता का कर्ता “रक्तलोक-स्नात पुरुष’ भी “आत्मा की प्रतिमा” के रूप में प्रकट होकर काव्य-नायक ”मैं’ को अपने कठिन दायित्व का अनुभव : कराता है। (‘अंधेरे में” कविता के प्रथम खंड के अंतिम अंश को देखें)।

यहाँ आकर फैंटेसी की गति एक विराम लेती है, दूसरी दिशा में मुड़ने के लिए। इस तथ्य को पहले भी संकेतित किया जा चुका है कि फैंटेसी एक “संवेदनात्मक उद्देश्य” को लेकर गतिशील होती है, जिसमें प्रतीक, रूपक, बिंब आदि उसके अनुगत बन कर आते हैं। अत: फैंटेसी के विश्लेषण की प्रक्रिया में इनका भी विश्लेषण आवश्यक है। दूसरी बात यह कि मुक्तिबोध एक क्रांतिकारी चेतना के कवि हैं।

अत: उनके लिए सामाजिक अंतर्विरोधों का ज्ञान मात्र ही सामाजिक क्रांति की शर्त नहीं है। उस पर और अधिक सोचने-विचारने तथा वैमनस्यपूर्ण अंतर्विरोध के निषेध के लिए “वंद्वात्मक निषेध” की वास्तविकता से परिचित होना और उसके अनुकूल वातावरण के निर्माण का प्रयास भी आवश्यक है। सामाजिक अंतर्विरोधों के “उर-विदारक शोर से जागृत चेतना चिंताक्रांत होकर सोचने के लिए विवश करती है :

“कि बेबीलोन सचमुच नष्ट होगा क्या?

प्रतिष्ठित राज्य संस्कृति के प्रभावी दृश्य

सुंदर सभ्यता के तुंग स्वर्ण-कलश

सब आदर्श

उनके भाष्यकर्ता ज्ञानवान महर्षि

ज्योतिर्विद्, गणितशास्त्री, विचारक, कवि,

सभी वे याद आते हैं।

प्रतापी सूर्य हैं वे सब प्रखर जाज्वल्य।”

”बेबीलोन” सचमुच नष्ट होगा क्या? इस प्रश्न के माध्यम से फैंटेसी यहाँ एक नया मोड़ लेती है। वैसे बेबीलोन यहाँ प्राचीन-मध्यकालीन सामाजिक शोषण पर आधारित राज्याश्रयी संस्कृति और सभ्यता का प्रतीक है, लेकिन अपनी रूपकीय मुद्रा के कारण वह पूँजीवादी शोषण पर आधारित आधुनिक राज्याश्रयी संस्कृति का प्रतीक भी बन जाता है। इस प्रकार मुक्तिबोध ने वर्तमान जीवन-तथ्यों और उसके मूलभूत प्रश्नों को सुदूर अतीत में प्रक्षेपित कर वर्तमान से एक आकर्षक दूरी पैदा की है। यही कार्य प्रसाद जी ने अपनी “कामायनी” में फैंटेसी के माध्यम से किया है। यहाँ भी फैंटेसी का अपना स्वतंत्र ढाँचा है, अपना स्वतंत्र दिक्काल और निजी इतिहास-भूगोल है, जो पूरी तरह प्राचीन-मध्यकालीन वातावरण पर आधारित है। यह कार्य कवि ने ”भाष्य कर्ता ज्ञानवान महर्षि, ज्योतिर्विद, गणित शास्त्री, विचारक, कवि” आदि शब्दों के माध्यम से भी बखूबी सम्पन्न किया है। लेकिन इस ढांचे में भरे गए रंग वर्तमान जीवन-तथ्यों द्वारा उपस्थित किए गए हैं। आगे का चित्रण भी इस रहस्य को बनाए रखने में सहायक होता है :

“पर यह क्या? अंधेरे स्याह धब्बे सूर्य के भीतर

बहुत विकराल

धब्बों के अंधेरे विवर-तल में से

उभर कर, उमड़कर दल बांध

उड़ते आ रहे हैं गिद्ध

पृथ्वी पर झपटते हैं

निकालेंगे नुकीली चोंच से आंखें।

कि खायेंगे हमारी दृष्टियाँ ही वे।”

(इन पंक्तियों को निराला की कविता “राजे ने अपनी रखवाली की” से मिला कर यदि आप देखें तो इनका मूल आशय स्वयं स्पष्ट हो जाएगा) – यहाँ “प्रखर सूर्य’ के भीतर स्याह धब्बों के अंधेरे विवरतल से निकलकर पृथ्वी की ओर झपटने वाले गिद्धों की पंक्तियाँ’ जहाँ जन विरोधी प्राचीन-सामंतीय चिंतन के दूषित प्रभाव को संकेतित करती हैं, वहीं वर्तमान पूँजीवादी औद्योगिक सभ्यता और संस्कृति की छाया-माया में विकसित होने वाले तथाकथित महान चिंतन के जन-विरोधी स्वरूप को भी संकेतित करती हैं। वस्तुत: पूँजीवाद अपनी छत्र-छाया में पलने वाले सभी क्षेत्रों के चिंतकों-विचारकों की भावधारा, विचारधारा को अपने प्रचार-प्रसार के सशक्त माध्यमों द्वारा जिस प्रकार दृष्टिविहीन करता है, उसका स्पष्ट संकेत इन पंक्तियों में हुआ है। अत: उक्त “प्रतापी सूर्यों” की प्रखरता से उत्पन्न चिंताधारा के प्रति काव्य-नायक की प्रतिक्रिया है : 

“मन में ग्लानि, गहन विरक्ति, मितली के बुरे चक्कर

भयानक क्षोभ

पीली धूल के बेदम बगूले, और

गंदे कागजों का मुन्सिपल कचरा।”

यहाँ मुक्तिबोध ने पूँजीवाद, उसकी औद्योगिक-व्यावसायिक सभ्यता का कहीं नाम नहीं लिया है। अत: व्याख्या में इन शब्दों के प्रयोग को देख कर आप चौंक सकते हैं और यह भी सोच सकते हैं कि हमने इन्हें अपनी ओर से मुक्तिबोध पर आरोपित कर दिया है। लेकिन ऐसा सोचना-समझना उचित नहीं होगा। वस्तुत: फैंटेसी के शिल्प की, यह विशेषता है कि उसमें विभाव-पक्ष (वस्तु पक्ष या कथ्य) को नेपथ्य (पर्द) में डाल दिया जाता है और कल्पना के माध्यम से उपमाओं, प्रतीकों, रूपकों, बिंबों आदि के सहारे-संक्षेप में कहना चाहें तो काल्पनिक घटनाओं, वस्तुओं, दृश्यों आदि के सहारे केवल भाव या प्रभाव-पक्ष का चित्रण किया जाता है। इसी कविता में आगे एक स्थान पर सर्वहारा की चेतना की विजय की घोषणा करते हुए मुक्तिबोध ने लिखा है, “सब सूर्य फूटेंगे व उनके केंद्र टूटेंगे।” “अंधेरे में” कविता में उन्होंने लिखा है :

“मुझे तो जिंदगी की सरहद

सूर्यों के प्रांगण (आंगन) पार जाती सी दीखती है।”

इनका अभिप्राय है कि पूँजीवादी जीवन-दर्शन, कला-दर्शन संपूर्ण चिंतन-प्रणाली कोई शाश्वत और अकाट्य नहीं है। अपने जन विरोधी स्वरूप के कारण उसकी समाप्ति अवश्यंभावी है। यदि मुक्तिबोध यहाँ यथार्थवादी शिल्प का सहारा लेते तो यह कवितांश “तार सप्तक’ में संग्रहीत उनकी “पूँजीवादी समाज के प्रति’ शीर्षक कविता की तरह इस प्रकार होता :’

“इतने प्राण इतने हाथ, इतनी बुद्धि,

इतना ज्ञान, संस्कृति और अंत: शुद्धि

इतना काव्य, इतने शब्द, इतने छंद

इतना गूढ़, इतना गाढ़, सुंदर जाल

– केवल एक जलता सत्य देने टाल

तेरे रक्त से भी घृणा आती तीव्र

तुझको देख मितली उमड़ आती शीघ्र .

तू है मरण, तू है रिक्त, तू है व्यर्थ

तेरा ध्वंस केवल एक तेरा अर्थ।’

इसे “अंत:करण का आयतन” कविता के उपर्युक्त अंश के साथ मिलाकर आप देखें तो भाववादी शिल्प और यथार्थवादी शिल्प के अंतर को समझने के साथ ही मुक्तिबोध की एक कलाकार के रूप में सही पहचान भी कर सकते हैं।

अपनी अधिकांश कविताओं की भांति मुक्तिबोध ने इस कविता को खंडों में विभक्त नहीं किया है, लेकिन विश्लेषण के दौरान वे खंड स्पष्ट रूप से दिखायी देते हैं। यहाँ से कवि की वाचक रूप फैंटेसी वर्तमान जीवन-तथ्यों से निष्कर्ष ग्रहण कर एक भिन्न दिशा में प्रवृत्त होती है :

“मेरी छाँह सागर-तरंगों पर भागती जाती,

दिशाओं पर हलके पांव

नाना देश-दृश्यों में

अजाने प्रियतरों का मौन चरण स्पर्श,  वक्ष स्पर्श करती मुग्ध

घर में घूमती उनके,

लगाती लैम्प, उनकी लौ बड़ी करती।

अपने प्रियतरों के उजलते मुख को मधुर एकांत में पाकर

किन्हीं संवेदनात्मक ज्ञान अनुभव के

अचानक मुग्ध आलिंगन

मनोहर बात, चर्चा, वाद और विवाद

उनका अनुभवात्मक ज्ञान संवेदन

समूची चेतना की आग

पीती है।’

यहाँ पहुँच कर फैंटेसी की यथार्थमयी रहस्यमयता पूरी तरह उद्घाटित हो जाती है। वस्तुत: “अंत:करण का आयतन’ कविता को समग्र रूप से समझने के लिए “नयी कविता का आत्म-संघर्ष तथा अन्य निबंध’ शीर्षक ग्रंथ में दिया गया “अंतरात्मा की पक्षधरता’ शीर्षक मुक्तिबोध का लेख पर्याप्त सहायक है। इसमें मुक्तिबोध ने लिखा है, “हर एक समस्या का एक समाधान है – चाहे अधूरा ही क्यों न सही। इसलिए मैं अपने आस-पास के लोगों, अपने मित्रों, आत्म संबंधियों और अपने सहयोगियों तथा परिचितों में उसे ढूंढने लगता हूँ। और, उनसे बहस छिड़ जाती है, और बहुत बार धरित्री अपने रत्न उगल देती है, और मैं अपने अभाव में भी अत्यंत सम्पन्न अनुभव करने लगता हूँ। किंतु देश-विदेश में हो रहे प्रयत्नों की संभावना की उपेक्षा मैं नहीं कर पाता। और इस तरह मेरी छाया पृथ्वी पर भटकती रहती है। “अंत:करण का आयतन संक्षिप्त है’ नामक एक मेरी कविता में मेरी इस प्रवृत्ति का चित्रण है। मेरे अपने लेखे उसमें एक लिरीसिज्म (प्रगीतात्मकता) है, एक यथार्थ-प्रवण रुमानी किस्म की कल्पनाशीलता है, एक आवेश है और अंतस में आत्मालोचन। इस प्रकार, मैं द्वंद्व-स्थिति में पड़कर मैत्री ही प्राप्त करता हूँ। 

उपर्युक्त काव्यपंक्तियों के संदर्भ में इस वक्तव्य को देखें तो यह आत्म-छाया कोई अन्य नहीं, अपनी चेतना या अन्तरात्मा ही है, जिसकी यात्रा या भ्रमण सोद्देश्य है। “स्व” से ऊपर उठकर, आत्मबद्धता की स्थिति से मुक्त होकर वह अपने जैसे अन्य लोगों के साथ एकाकार होती है, एक आत्मीय स्वजन की भांति उनके चरण का स्पर्श करती है, उन्हें सीने से लगाती है, उनके घर-आंगन में घूमते हुए उन्हें ज्ञान का प्रकाश देती है और इस प्रकाश में मुग्ध भाव से उनका आलिंगन करती है, उनसे चर्चा और वाद-विवाद करते हुए उन्हें शिक्षित करती है, उनसे स्वयं शिक्षा लेती है। वस्तुत: मुक्तिबोध ने निर्वैयक्तिकता की इस दशा को आत्म-प्रसार की स्थिति के रूप में स्वीकार किया है।

इस लम्बी कविता में कवि की वाचक आत्मछाया रूप फैंटेसी उन्मुक्त भाव से सहानुभूतिपूर्ण कल्पना के सहारे समूचे विश्व का भ्रमण करती है। वह खेतों-खलिहानों, खदानों, पहाड़ों, घाटियों में विचरण करते हुए :

‘सिखाती-सीखती रहती,

परखती, बहस करती और ढोती बोझ

मेहनत से, ज़मीनें साफ करती है,

दिवालों की दरारें परती-भरती,

व सीती फटे कपड़े, दिल रफू करती,

किन्हीं प्राणांचलों पर वह कसीदा काढ़ती रहती

स्वयं की आत्मा की फूल-पत्ती के नमूने का।”

इस प्रकार यह यात्रा सार्थक और सप्रयोजन है, जिस पर अपनी ओर से टिप्पणी न कर आपके सम्मुख मैं मुक्तिबोध की ही एक टिप्पणी प्रस्तुत करना चाहूँगा, “आज एक ऐसे कवि-चरित्र की आवश्यकता है, जो मानवीय वास्तविकता का बौद्धिक और हार्दिक आकलन करते हुए सामान्य जनों के गुणों और उनके संघर्षों से प्रेरणा और प्रकाश ग्रहण करें उनके संचित जीवन-विवेक को स्वयं ग्रहण करे तथा उसे और अधिक निखार कर, कलात्मक रूप से उन्हीं की चीज को उन्हें लौटा दे। सामान्य जनों की अपार आध्यात्मिक और बौद्धिक क्षमता में यदि हमारा विश्वास है, हमारी आस्था है तो हम अपने ही पिता के सच्चे पुत्र होंगे। …कवि-चरित्र के विकास का हमारा यह संघर्ष, युग की विवेक-चेतना बनने का हमारा यह मौन प्रयास अपने-आप में आध्यात्मिक महत्व रखता है, इससे कौन इनकार करेगा।” – 

अपने व्यापक सर्वेक्षण की प्रक्रिया में छायाभास रूप फैंटेसी आत्मचेतस् से विश्वचेतस बनते हुए एक निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचती है, जिसे कवि का वाचक “मैं” इस प्रकार प्रस्तुत करता है :

“मैं देखता क्या हूँ कि –

पृथ्वी के प्रसारों पर जहाँ भी स्नेह या संगर

वहाँ पर एक मेरी छटपटाहट है, ..

.एक मेरा भी वहाँ पर प्राण-प्रतिनिधि है

अनुज, अग्रज, मित्र, कोई आत्म छाया-चित्र

धरती के विकासी द्वंद-क्रम में एक मेरा छटपटाता वक्ष, .

..स्नेहाश्लेष या संगर कहीं भी हो

कि धरती के विकासी द्वन्द्व-क्रम में एक मेरा पक्ष,

मेरा पक्ष नि:संदेह।”

यह दूसरा निष्कर्ष है। पहला निष्कर्ष था – वर्ग विभक्त समाज में वंद्व की स्थिति। लेकिन यहाँ उस द्वंद्व में अपने पक्ष का निर्धारण है। इस पक्षधरता को मुक्तिबोध ने किस प्रकार अपनी अंतरात्मा का प्रश्न बनाया है, इस पर हमने पिछली इकाई में विस्तार से विचार कर लिया है। यहाँ आपका ध्यान केवल इस तथ्य की ओर दिलाना है कि आरंभ में जो फैंटेसी “सत्-चित्-वेदना का द्वंद्व-चेतस फूल” लिए हुए एक सांवली छाया के रूप में उपस्थित हुई थी, वह किस प्रकार चित्रों और परस्पर संबद्ध स्थितियों की एक सुसंगत पंक्ति बनाते हुए आगे बढ़ रही है। काव्य की इस जटिल शिल्प-विधि में वर्णनात्मकता और लाक्षणिकता, भाव-चित्रण और वस्तु-संकेत, आत्मकथन और संबोधन, प्रतीक-बिंब और रूपक-योजना, रहस्यमय वातावरण की सृष्टि आदि भाववादी शिल्प के अनेक परस्पर संबद्ध और असंबद्ध उपकरण . गुंफित हुए हैं। इसके साथ ही मुक्तिबोध ने लक्षणा-व्यंजना, रूपक-उपमा, प्रतीक-बिंब-मिथक आदि के बने-बनाए शास्त्रीय ढांचे को छिन्न-भिन्न करके फैंटेसी के शिल्प के माध्यम से उन्हें एक नयी तरतीब और तहजीब प्रदान की है। वस्तुत: इसे भाववादी बुर्जुआ शिल्प का जनवादी शिल्प में रूपांतरण भी कहा जा सकता है।

अपने पक्ष का निर्धारण करने के बाद कवि का वाचक “मैं’ इस यथार्थ जगत को एक ममतामय, अत्यंत आकर्षक रूप में देखता है :

“मुझको तो समूचा दृश्य धरती की सतह से उठ

अनावृत अंतरिक्षाकाश-स्थित दीखता ।

व उस आकाश में से बरसते मुझ पर

सुंगधित रंग-निर्झर और

छाती भीग जाती है, व आंखों में

उसी की रंग-लौ चमकती सी।”

इसे मुक्तिबोध ने “अपने ही जीवन के मूल स्रोतों का अमृत-पान” और “युग की विवेक-चेतना बनने का मौन प्रयास” कहा है। अपनी संपूर्ण अच्छाइयों और बुराइयों के साथ पृथ्वी का यह दृश्य स्वर्गीय आभा से जगमगाता हुआ दिखायी देता है।

यहाँ पहुँच कर फैंटेसी का दूसरा दौर समाप्त हो जाता है। आगे वह एक नये स्वप्न के रूप में उपस्थित होती है :

“रमणीयतम जो स्वप्न देखा था

वही

हाँ, वही

बिल्कुल सामने प्रत्यक्ष है।

यह “प्रतेजस आनना कोई अन्य नहीं, वरन् काव्य-नायक “मैं’ की अपनी “श्यामल अंचला” छाया ही है, जो अंतर्बाह्य और देश-देशांतर का परिभ्रमण करने के बाद “लावण्य से युक्त तेजस्विनी प्रतिभा” के रूप में उपस्थित हुई है। अपनी “द्वंद्व चेतस् वेदना” का अनुभव-निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए वह काव्यनायक “मैं’ को चुनौती देती है :

“मुझसे भागते क्यों हो,

तुम्हारी स्वप्न वीथी कर सकेगी क्या?

बिना संसार के सर्जन असंभव है,

समन्वय झूठ है,

सब सूर्य फूटेंगे

व उनके केंद्र टूटेंगे

उड़ेंगे खंड

बिखरेंगे गहन ब्रह्मांड में सर्वत्र

उनके नाश में तुम योग दो”

(मुक्तिबोध की रचना-प्रक्रिया के विश्लेषण के क्रम में इस अंश की व्याख्या हो चुकी है – उसे देख लें) निर्माण से पूर्व ध्वंस के सौंदर्य से अभिभूत कवि का वाचक “मैं” “प्रतेजस आनना” से पूर्ण साक्षात्कार के लिए अंतर्गमन करता है। उसके रूप-स्वरूप का पूरा जायज़ा लेने के बाद एक नये बोध के साथ जब वह बाहर आता है तो :

 “कि इतने में 

अचानक कान में फिर से 

नमोमय भूमिमय लहरा रहा सा

गंधमय संगीत

मानो गा रहा कोई पुरुष

आकाश के नीचे

खुले बेछोर क्षिप्रा (नदी विशेष) कूल पर उन्मुक्त।”

यहाँ “बेछोर क्षिप्रा-कूल’ मूर्त जगत में प्रवेश का सूचक है, अंतर्विरोध-ग्रस्त समाज में आगमन का संकेतक है – जहाँ पहुँच कर “सुगंधित संगीत” के वातावरण में काव्य-नायक “मैं’ को एक नये सत्य का ज्ञान होता है:

“लेकिन विरोधात्मक चेतना मेरी

उसी क्षण सुन रही है

श्याम संध्या-काल मंदिर आरती आलाप बेला में

भयानक श्वान दल का ऊर्ध्व क्रन्दन

वह उदासी की ऊंचाई पर चढ़ा लहरा रहा रोना

सुन रहा हूँ आज दोनों को

कि है आश्चर्य!!”

वस्तु जगत में, समाज में एक तरफ मंदिर में संध्याकालीन आरती और दूसरी तरफ कुत्तों का ऊपर मुँह उठाए हुए रोना – शुभ और अशुभ के ये दोनों दृश्य एक साथ प्रस्तुत कर कवि ने समाज के वैमनस्यपूर्ण अन्तर्विरोध का, उसके मूल-द्वंद्व का संकेत किया है। समाज का यह अन्तर्विरोध काव्यवाचक ‘मैं” के लिए चिर-प्रतीक्षित सौंदर्य के रूप में, निर्माण से पूर्व संहार के सौंदर्य के रूप में उपलब्ध हुआ है। इस संबंध में उसकी प्रतिक्रिया इस प्रकार व्यक्त हुई है :

“यह भी खूब जिस सौंदर्य को मैं खोजता फिरता रहा दिन-रात वह काला लबादा ओढ़ पीछे पड़ गया था रात-दिन मेरे। कि उद्घाटित हुआ वह आज कि अब सब प्रश्न जीवन के मुझे लगते कि मानो रक्त-तारा चमचमाता हो कि मंगल-लोक हमको बुलाता हो ‘साहसिक यात्रा-पथों पर और मेरा हृदय दृढ़ होकर धड़कता है”

वस्तुत: समाज के मूलभूत अंतर्विरोध की सही जानकारी ही विषमताग्रस्त समाज की बेहतरी का समुचित मार्ग प्रस्तुत करती है। यहाँ “रक्त-तारा” का चमचमाना युगान्तरकारी क्रांति की अनिवार्यता का प्रतीक है तो “मंगल-लोक” का आह्वान एक नयी और कल्याणकारी समाज-व्यवस्था को प्रतीकित करता है। लेकिन क्रांति कोई यंत्रवत स्वचालित प्रक्रिया नहीं है। उसके लिए परिपक्व भौतिक स्थितियों का होना भी आवश्यक है। जन चेतना का अंग बन जाने के बाद क्रांतिकारी विचारधारा के बिना क्रांति के दिशाहीन ही नहीं, विनाशकारी होने की संभावना भी बढ़ जाती है। लेकिन यहाँ वैचारिक उपकरण के रूप में “सत्-चित-वेदना का द्वंद्व चेतस् फूल” और मंगल-व्यवस्था के रूप में “मंगल-लोक” से जुड़कर क्रांति निर्माण के लिए संहार का अत्यंत मानवीय रूप धारण कर लेती है। क्रंतिकारी परिस्थितियों में बौद्धिक समुदाय की भी एक भूमिका होती है। उसके सैद्धांतिक और व्यावहारिक पक्ष को दृढ़ करते हुए वह क्रांतिकारी शक्तियों का सही निर्देश कर सकता है। प्रकारान्तर से कवि कलाकार की गणना भी बुद्धिजीवी समुदाय में ही होती है। एक बुद्धिजीवी के रूप में, उसकी भूमिका को कविता के अंत में काव्य-वाचक मैं के माध्यम से मुक्तिबोध ने इस प्रकार कलात्मक अभिव्यक्ति प्रदान की है :

“कि मैं तो एक आयुध/मात्र साधन/प्रेम का वाहन/

तुम्हारे द्वार पर आया हुआ मैं अस्त्र-सज्जित स्थ/मेरे

चक्र दोनों अग्रगति के लिए व्याकुल हैं/व मेरी प्राण

त्रासदी तुम्हारी प्रतीक्षा में है/यहाँ बैठो, विराजो,/

आत्मा के मृदुल आसन पर/हृदय के, बुद्धि के ये अश्व

तुमको ले उड़ेंगे और/शैल-शिखरों की चढ़ानों पर

बसी ठण्डी हवाओं में/उसके पार/गरु गंभीर मेघों

की चमकी लहर-पीठों पर/व उसके भी परे, आगे

व ऊँचे,/स्वर्ण-उल्का क्षेत्रों में स्थ तुम्हें ले जाएगा!!/

नक्षत्र-तारक-ज्योति-लोकों में घुमा ले आएगा

सर्वत्र। रथ के यंत्र सब मजबूत हैं!/उन प्रश्न

लोकों में यहाँ की बोलियाँ/तुम को

बुलाती हैं। कि उनको ध्यान से सुन लो।”

यहाँ यह ध्यान में रखने की बात है कि रूप (फार्म या शिल्प) जिसके माध्यम से कलां वास्तविकता को रूपायित करती है, वह सामाजिक चेतना की अभिव्यक्ति की दूसरी प्रतिविधियों या दूसरे अनुशासनों (दर्शन, राजनीति, धर्म, संस्कृति, विधि-विधान) और कला के मध्य किसी दृढ़ विभाजन-रेखा का औचित्य सिद्ध नहीं करता। यदि हम काव्य-कला के वस्तु-तत्व (कांटेट) और उसके आग्रह-अनुरोधों की सर्वथा उपेक्षा करके केवल ‘फार्म” (शिल्प) की दृष्टि से कला का विश्लेषण करेंगे तो एक ज्ञान-विधा के रूप में उसकी शक्ति और उसके वैशिष्ट्य को समझने में निश्चित रूप से असमर्थ होंगे। आप देखेंगे कि छायावादी और नयी कविता के बहुत से कलावादी समीक्षक फार्म या शिल्प के विश्लेषण में रूपकों, प्रतीकों, बिंबों की बारीकियों को दिखाने में ही अधिकांशत: उलझकर रह गए हैं। ऐसी स्थिति में नये समीक्षकों को बनावट और बुनावट (स्ट्रक्चर और टेक्सचर) के मध्य का तनाव तो दिखाई देता है, लेकिन कथ्य और शिल्प के मध्य का तनाव न दिखाई देने के कारण रचना में व्यक्त कथ्य पूरी तरह उपेक्षित रह जाता है।

इसलिए प्रस्तुत कवितांश में आए हुए आयुध (अस्त्र-शस्त्र), अस्त्र-सज्जित रथ, प्राण-आसंदी (बैठने का स्थान), आत्मा का मृदुल आसन, हृदय और बुद्धि के अश्व, शैल-शिखरों की यात्रा, मेघों की चमकती लहस्पीठ, स्वर्ण-उल्का-क्षेत्र, नक्षत्र-तारक-ज्योति-लोक, रथ के यंत्र आदि की लाक्षणिकता, रूपकीय प्रतीकात्मकता या प्रतीकात्मक बिंबात्मकता के निरपेक्ष विश्लेषण द्वारा मुक्तिबोध को आध्यात्मवादी-रहस्यवादी घोषित कर देने का खतरा उत्पन्न हो सकता है। वस्तुत: यहाँ मुक्तिबोध ने एक चिंतक कलाकार के रूप में क्रांतिकारी शक्तियों के प्रति पूर्ण आत्म-समपर्ण का भाव व्यक्त किया है। क्रांति के एक आयुध या शस्त्र के रूप में, एक साधक के रूप में वे अपने को क्रांतिकारी शक्तियों के हवाले कर देते हैं। यहाँ आयुध या शस्त्र अपने लक्षाणिक अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।

(इस अस्त्र-सज्जित रथ को यदि “राम-चरितमानस’ में चित्रित राम के धर्म-स्थ, दोहा सं0 79 की चौपाइयों के साथ मिलाकर देख लें तो आपके लिए इसकी विशेषताओं को समझना आसान हो जाएगा) वस्तुत: “युग की विवेक चेतना बनने के इस मौन प्रयास” का परीक्षण करने के लिए गृहीत वस्तु-तत्व या कथ्य को पूर्ण रूप से ध्यान में रख कर यदि एक अत्यन्त व्यापक फैंटेसी के अधीन उपर्युक्त कल्पना-चित्रों, बिंबोंप्रतीकों की रूपकीय योजना पर विचार करें तो सभी नयी समाज-व्यवस्था के उच्चादर्श/समन्वित मनोराज्योन्मुखता (यूटोपिया) की एक कलात्मक अभिव्यक्ति के रूप में दिखाई देंगे।

यथार्थ के पुनरुत्पादन से हटकर यथार्थ जीवन की पुनर्रचना की इस प्रकृति का उद्घाटन करते हुए ए.एस.वास्केत्स ने लिखा है, “द आर्टिस्ट सीज बिफोर हिम द इमीडिएट, गिवेन, कांक्रीट रिएलिटी, बट ही कैन नाट रिमेन आन दैट लेवेल, लिमिटिंग हिम सेल्फ टु रिप्रोड्यूसिंग इट। ह्यूमन रिएलटी रिवील्स इट्स सीक्रेट टु द आर्टिस्ट ओनली टु द एक्सटेंट दैट, स्टार्टिंग फ्राम द इमीटिएट ऐंड इंडिविडुवल, ही राइजेज टु ए यूनिवर्सल लेवेल, टु रिटर्न अगेन टु द कांक्रीट। बट दिस इंडिविडुवल ऑर अर्टिस्टिक कांक्रीटनेस इज प्रेसाइजली द फ्रट ऑव ए प्रासेस ऑफ क्रिएशन, नाट ऑव इमीटेशन।” 

उपर्युक्त पंक्तियों में कला की रचना-प्रक्रिया के महत्व को रेखांकित करते हुए लेखक ने मानव. यथार्थ की, ठोस यथार्थ की कलात्मक अभिव्यक्ति की स्थिति को अत्यंत कुशलता से उद्घाटित किया है। मुक्तिबोध द्वारा प्रतिपादित कला के तीन क्षणों को ध्यान में रखते हुए यदि हम इस कविता के प्रारंभिक बंद (स्टेंजा) :

‘अंत:करण का आयतन संक्षिप्त हैं

आत्मीयता के योग्य

मैं बिलकुल नहीं’

पर विचार करें तो स्पष्ट प्रतीत होगा कि यह अंत:करण का आयतन उनके अपने अंत:करण का, उनके अपने संचित अनुभवों का दायरा है। जब ये अनुभव अपने दुखते-कसकते मूलों (स्रोतों) से अलग होकर निर्वैयक्तिकता की स्थिति में पहुँचते हैं तो एक फैंटेसी का रूप ग्रहण करते हैं। अनुभव की व्यक्तिगत पीड़ा से उत्पन्न होने के कारण फैंटेसी में एक संवेदनात्मक उद्देश्य समाया रहता है। अन्यत्र फैंटेसी की स्थिति को मुक्तिबोध ने निर्वैयक्तिकता की स्थिति के रूप में सौंदर्यानुभूति का वास्तविक क्षण माना है। इस क्षण में जहाँ आत्म-पक्ष से तटस्थता होती है, वहीं परपक्ष के साथ गहन तन्मयता भी आ जाती है। इसी को ए.एस.वास्केत्स ने व्यक्तिगत स्तर से कलाकार के सार्वभौम स्तर तक उठने की संज्ञा दी है। इस स्तर तक पहुँचकर ही कलाकार यथार्थ जीवन की पुनर्रचना कर पाता है। फैंटेसी के शिल्प के माध्यम से मुक्तिबोध भी यही कार्य करते हैं।

भाववादी शिल्प का यथार्थवादी दृष्टि से उपयोग .

भाववादी शिल्प के कारण मुक्तिबोध के मूल्यांकन के संबंध में एक दूसरा विवाद उनकी मनोराज्योन्मुखता (युटोपिया) को लेकर है। यह “युटोपिया” जिस प्रकार “कामायनी’ में प्रसाद ने प्रस्तुत किया है, ठीक उसी प्रकार अपनी अधिकांश कविताओं में मुक्तिबोध ने भी। दोनों ने इसकी सिद्धि फैंटेसी के शिल्प के माध्यम से की है। लेकिन जहाँ प्रसाद का “यूटोपिया” उनके अद्वैतवादी दर्शन और उनकी भाववादी आध्यात्मवादी जीवन-दृष्टि पर आधारित है, वहाँ मुक्तिबोध के “यूटोपिया” का आधार द्वंद्वात्मक भौतिकवादी दर्शन और उनकी यथार्थवादी दृष्टि है। अत: केवल भाववादी शिल्प के आधार पर मुक्तिबोध को आध्यात्मवादी, रहस्यवादी, मनेविश्लेषणवादी, यहाँ तक कि अस्तित्ववादी घोषित कर देना अनुचित ही नहीं अनर्गल भी है। “अंत:करण का आयतन’ कविता में मुक्तिबोध ने यथार्थपरक जीवन तथ्यों का जो अमूर्तीकरण किया है, वह यथार्थ को और अधिक मानवीय और ठोस बनाने के लिए ही. किया है। अत: भाववादी शिल्प को ग्रहण करते हुए भी मुक्तिबोध एक यथार्थवादीसमाजवादी कलाकार के ही रूप में हमारे सामने आते हैं।

यथार्थवादी कला के लिए भाववादी शिल्प वर्जित नहीं है। दुनिया के बड़े-से-बड़े समाजवादी-यथार्थवादी कलाकारों ने भाववादी शिल्प का सार्थक उपयोग करके अपने कद को ऊंचा किया है। इस स्थिति को स्पष्ट करते हुए ए.एस.वास्केत्स ने लिखा है, “इट इज नेस्सेसरी टु डिस्कवर न्यू मेथडस, एण्ड आई बिलीव दैट दिस इज नथिंग बट ए नेचुरल प्रॉसेस। विदाउट दिस फ्रूटफुल एसिमिलेशन ऑव न्यू मेथड्स आव एक्सप्रेशन, द आर्टिस्टिक पर्सनेलटीज ऑव सोशलिस्ट आर्ट वुड हैव बीन स्टैण्टेड इन देअर डेवलेपमेंट| मायकोवस्की वुड नाट हैव एग्जिस्टेड विदाउट फ्यूचरिज्म नॉर सिकारो (siqueiros) विदाउट मार्डन पेंटिंग, ब्रेख्त विदाउट एक्सप्रेशनिज्म, नरुदा, अरागाँ ऑर एलुआर्ड विदाउट सुर्रियलिज्म, ई.टी.सी.” – (आर्ट एडं सोसायटी, पृ0 37)। वस्तुत: साहित्यान्दोलन के रूप में (फ्यूचरिज्म), अभिव्यंजनावाद (एक्सप्रेशनिज्म), आधुनिक चित्रकला का प्रभाववाद (इम्प्रेसनिज्म), अति यथार्थवाद (सुर्रियलिज्म) आदि शिल्प संबधी साहित्यान्दोलन एक भाववादी बुर्जुआ मनोवृत्ति से प्रेरित होकर अस्तित्व में आए थे।

लेकिन बदलती हुई परिस्थितियों में मानवी यथार्थ की जटिलता की अभिव्यक्ति के लिए समाजवादी विचारधारा के कलाकारों ने भी इन शिल्प-विधियों को मौलिक ढंग से स्वीकार कर अपने अपेक्षित लक्ष्यों की अभिव्यक्ति के लिए इनका सार्थक उपयोग किया है। अपने फैंटेसी के शिल्प में मुक्तिबोध ने एक “यूटोपिया’ प्रस्तुत करने के लिए भविष्यवाद, अपने अंतर्लोक का विश्लेषण करने के लिए अतियथार्थवाद यहाँ तक कि अभिव्यजंनावाद, प्रभाववाद आदि के शिल्प का भी यत्र-तत्र सहारा लिया है। लेकिन इस प्रक्रिया में उनकी जीवन-दृष्टि जनोन्मुखी और यथार्थवादी ही रही है। “अंत:करण का आयतन” कविता के आरंभ से अंत तक आत्मचेतस् से विश्वचेतस् बनते हुए कलाकार की विकासप्रक्रिया का एक यथार्थ चित्र प्रस्तुत हुआ है, जो उन्हें यथार्थवादी-समाजवादी कलाकार सिद्ध करता है।

वस्तुत: एक विशेष प्रकार के शिल्प का चयन करने के पीछे मुक्तिबोध के सम्मुख एक गंभीर चुनौती रही है। जिस प्रकार अकलात्मकता के गलत आक्षेप द्वारा प्रगतिशील काव्य धारा को नयी कविता के मंच से साहित्य-क्षेत्र से निष्काषित करने का प्रयास किया गया, उसे लेकर वे काफी चिंतित थे। मुक्तिबोध ने कई स्थानों पर इस तथ्य की घोषणा की है कि “कलात्मकता केवल नयी कविता की बपौती नहीं है। उसे हम प्रगतिशील कवि भी साध सकते हैं। इस भावना से प्रेरित होकर उन्होंने नयीकविता की शिल्पगत उपलब्धियों को स्वीकार किया तथा उसे भाववादी बुर्जुआ शिल्प मानते हुए भी, उसका अपनी प्रगतिशील जनवादी चेतना की अभिव्यक्ति के लिए अत्यंत सार्थक ढंग से उपयोग किया है। इस प्रक्रिया में उन्होंने नयी कविता के समूचे तंत्र को, एक विशेष भावधारा की अभिव्यक्ति के अभेद्य दुर्ग को भीतर से तोड़ा है — उसकी प्रतीक योजना, मिथक रचना, उपमा और रूपक-व्यवस्था, बिंब-विधान द्वारा निर्मित उसके दृढ़ प्राचीर को तोड़ते हुए, जनवादी चेतना के लिए उसका द्वार खोल दिया है। पाठ्यक्रम में निर्धारित नयी कविता के प्रतिनिधि कवि अज्ञेय द्वारा प्रयुक्त शिल्पगत उपकरणों को मुक्तिबोध द्वारा प्रयुक्त उपकरणों – मिथकों, प्रतीकों, रूपकों, बिंबों आदि से मिलाकर देखें तो यह बात स्पष्ट हो जाएगी। (आगे इस दृष्टि से मुक्तिबोध और अज्ञेय की यथास्थान संक्षिप्त तुलना भी की जाएगी।

मुक्तिबोध द्वारा प्रयुक्त उपमा, रूपक, प्रतीक, मिथ और बिंब

फैंटेसी के शिल्प का विश्लेषण करते हुए आपके सामने मुक्तिबोध के रूपक, उपमान-व्यवस्था, प्रतीकों, बिंबों आदि के महत्व को भी रेखांकित करने का प्रयास किया जा चुका है। लेकिन अभिव्यक्ति के उपर्युक्त उपकरणों पर अलग से संक्षेप में विचार कर लेना भी आपके लिए उपयोगी हो सकता है। यहाँ इस तथ्य को ध्यान में रखना आवश्यक है कि मुक्तिबोध की उपमाएँ, रूपक, प्रतीक, बिंब आदि भी अभिप्रेरित-अनुभूति हैं अथवा संवेदनात्मक उद्देश्य से प्रेरित हैं। इस इकाई के आरंभ में “चकमक की चिनगारियाँ” शीर्षक कविता के पहले बंद को उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर दो उपमाओं की विस्तृत व्याख्या करते हुए इस तथ्य को रेखांकित किया गया था कि उनसे प्रस्तुत या कथ्य का बिंबग्रहण ही नहीं होता, वरन् वे दोनों विश्वव्यापी सत्य को उद्घाटित करने वाले वस्तु तत्व या कथ्य भी बन जाते हैं। (उस व्याख्या को पुन: देख लें) इस संदर्भ में मुक्तिबोध की कविताओं से कुछ उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं, जिनसे अभिव्यक्ति के इन उपकरणों के प्रयोग के संबंध में उनकी निजी-दृष्टि का भी पता लग जाएगा।

“एक अन्तर्कथा’ शीर्षक कविता में अत्यंत विह्वलता के क्षण में उन्होंने लिखा है : 

“उपमाएँ उद्घाटित वक्षा मृदु स्नेह मुखी

एक-टक देखतीं मुझको

प्रियतर मुसकाती

मूल्यांकन करते एक-दूसरे का

हम एक दूसरे को सँवारते जाते हैं।

वे जगत-समीक्षा करते से

मेरे प्रतीक-रूपक सपने फैलाते हैं

आगामी के

दरवाजे दुनिया के सारे खुल जाते हैं

मैं अपनों से घिर उठता हूँ।

मैं विचरण करता सा हूँ एक फैंटेसी में

यह निश्चित है कि फैंटेसी कल वास्तव होगी।”

(इस उद्धरण पर हम पहले भी विचार कर चुके हैं, लेकिन यहाँ एक दूसरे संदर्भ में इस पर विचार करना आवश्यक है)

 “मुझे कदम-कदम पर’ शीर्षक कविता में मुक्तिबोध जीवनानुभव के मध्य कहानी, उपन्यास, कविता के विषय को प्राप्त करते हुए यात्रा से जब वापस घर आते हैं तो :

“घबराए प्रतीक और मुसकाते रूप-चित्र(बिंब)

लेकर मैं घर पर जब लौटता

 उपमाएं, द्वार पर आते ही कहती हैं कि

सौ बरस और तुम्हें

जीना ही चाहिए।”

“एक स्वप्न-कथा’ शीर्षक कविता के अंतर्गत अत्यधिक व्याकुलता के क्षण में मुक्तिबोध ने अपने बिंबों की प्रकृति के विषय में लिखा है :

“इसी लिए, मेरी ये कविताएँ

भयानक हिडिम्बा हैं,

वास्तव की विस्फारित प्रतिमाएँ

विकृताकृति बिंबा हैं।’

 “चकमक की चिनगारियाँ’ शीर्षक कविता में मुक्तिबोध ने जीवन के यथार्थ को प्रतीकों और बिंबों के माध्यम से प्रस्तुत करने का प्रयास इस प्रकार किया है :

“प्रतीकों और बिंबों के

असंवृत रूप में भी रह

हमारी जिंदगी है यह

जहाँ पर धूल के भूरे गरम फैलाव पर पसरी लहरती चादरें

वे थाह सपनों की।

जहाँ पर पत्थरों के सिर

गरीबी के उपेक्षित श्याम चेहरों की दिलाते याद।

टूटी गाड़ियों के सांवले चक्के

दिखें तो मूर्त होते आज के धक्के

भयानक बदनसीबी के।

जहाँ सूखे बबूलों की कंटीली पांत

भरती है हृदय में धुन्ध-डूबा दुख,

भूखे बालकों के श्याम चेहरों साथ

मैं भी घूमता हूँ शुष्क,

आती याद मेरे देश भारत की।”

पहले उदाहरण में उपमाओं के साथ कवि का अत्यंत आत्मीय संबंध प्रकट हुआ है। उपमाओं को संवारने की प्रक्रिया में कवि का स्वयं संस्कार होता है। प्रतीक और रूपक जगत-समीक्षा करते हुए भविष्य के लिए स्वप्नों का विस्तार करते हुए समूची दुनिया के दरवाज़े खोल देते हैं अर्थात् दुनिया की सच्चाइयों से अवगत कराते हैं। इस प्रकार कवि उपमाओं, प्रतीकों, रूपकों के माध्यम से विश्व के साथ आत्मीयता का अनुभव करता है। फलस्वरूप फैंटेसी में विचरण करता हुआ भी वह वास्तविक जगत से साक्षात्कार करता है।

दूसरे उदाहरण में भी “घबराए प्रतीक”, “मुसकाते रूप-चित्र (बिंब) और प्रतीक्षारत उपमाओं को जिजीविषा अर्थात् सौ वर्ष तक जीने की इच्छा उत्पन्न करने वाली बताकर कवि ने उनके साथ अपने आत्मीय संबंध को संकेतित किया है।

तीसरे उदाहरण में मुक्तिबोध ने अपनी कविताओं को जीवन्त-यथार्थ से पूर्ण हिडिम्बा (एक विकट आकृति वाली देवी-भीम की पत्नी) की तरह भयानक और विकृत आकृति वाले बिंबों से युक्त बताया है। लेकिन मुक्तिबोध के बिंब-विधान की विशेषताओं को देखते हुए इसे एक मात्र सत्य नहीं माना जा सकता। उन्होंने कोमल और रागात्मक मानवीय भावों की अभिव्यक्ति के लिए अत्यन्त रमणीय बिंबों का पर्याप्त सहारा लिया है।

चौथे उदाहरण में मुक्तिबोध ने प्रतीकों और बिंबों को खुले क्षेत्र में जिंदगी के दर्द को अत्यंत कुशलता से अभिव्यक्त किया है। यहाँ कवि ने यथार्थ जगत के अन्यान्य तत्वों और दृश्यों को प्रतीकात्मकबिंबात्मक रूप देकर वर्तमान जीवन की अपूर्ण आशा-आकांशा, उपेक्षा, गरीबी, दुख, बदनसीबी, भूख आदि का मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया है।

उपर्युक्त सभी उदाहरणों में यह स्पष्ट रूप से दिखायी देता है कि अभिव्यक्ति के सभी उपकरण मुक्तिबोध के निजी और सामाजिक जीवन से गहरा रिश्ता रखते हैं और कभी-कभी वे जीवन तथ्यों से अभिन्नता भी स्थापित कर लेते हैं। लेकिन अधिकांशत: वे जीवनानुभूति को सजाते, संवारते और निखारते हुए स्वयं जीवनानुभूति के माध्यम से निखरते और संवरते भी हैं। इस प्रकार मुक्तिबोध ने वस्तु (कथ्य) और रूप (शिल्प) के मध्य एक द्वंद्वात्मक संबंध को स्वीकार किया है। इस दृष्टि से यदि आप अज्ञेय के शिल्प-विधान पर विचार करें तो स्पष्ट रूप से देखेंगे कि उनके यहाँ शिल्प प्राथमिक है, अर्थ या वस्तु-तत्व उसके बाद की अवस्था है। सर्थ को गौण रखकर शब्द को ही कविता का मूल तत्व मान लेना वस्तुत: अपने भाव जगत के संकोच को शब्दाडम्बर के माध्यम से छिपाने की एक चाल है। इस संबंध में उनका स्पष्ट कथन है कि “काव्य सबसे पहले शब्द है। सारे कवि धर्म इसी परिभाषा से निसृत होते हैं। ध्वनि, लय, छंद आदि के सभी प्रश्न इसी से निकलते हैं और इसी में विलय हो जाते हैं। इतना ही नहीं, सारे सामाजिक संदर्भ भी यहीं से निकलते हैं। इसी में युग सम्पृक्ति का और कृतिकार के सामाजिक उत्तरदायित्व का हल मिल सकता है।”अज्ञेय की इस मान्यता को आप उनके काव्य में भी फलीभूत होते हुए देखेंगे। वैसे अज्ञेय नयी कविता के प्रतिनिधि चिंतक-कवि हैं। इन्होंने शिल्प के क्षेत्र में अपनी मौलिकता का परिचय दिया है। “कलगी बाजरे की” शीर्षक कविता इस दृष्टि से उल्लेखनीय है, जिसमें पुराने उपमानों की अपर्याप्तता को घोषित करते हुए उन्होंने लिखा है:

“ये उपमान मैले हो गए हैं

देवता इन प्रतीकों के कर गए हैं कूच

कभी बासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है।’

इस प्रक्रिया में वे प्रिया के लिए “ललाती सांझ के नभ की अकेली तारिका” या चांदनी में नहाई हुई प्रात: कालीन कुमुदनी अथवा “चम्पे की ताज़ा कली’ के स्थान पर “लहलहाती हवा में कलगी छरहरी बाजरे की” अथवा “बिछलती घास” जैसे उपमानों का औचित्य सिद्ध करते हैं। लाक्षणिक प्रयोगों, ऐन्द्रिक (इंद्रियों से संबंधित-दृश्य, स्पृश्य, गंध, श्रव्य आदि) बिंबों और प्रतीकों के नये और सधे हुए प्रयोग की दृष्टि से अज्ञेय एक महत्वपूर्ण कवि के रूप में सामने आते हैं। लेकिन “कलगी बाजरे की”, “नदी के द्वीप”, “बावरा अहेरी”, “यह दीप अकेला”, “सोन मछली”, “मैंने देखा एक बूंद’ ही नहीं, वरन “असाध्य वीणा” जैसी लंबी कविता में प्रयुक्त उपमानों, प्रतीकों, रूपकों और बिंबों में वह संश्लिष्टता या जीवन का व्यापक स्पर्श नहीं मिलेगा जो मुक्तिबोध के यहाँ दिखायी देता है। “मैंने देखा एक बूंद’ या “सोन मछली” जैसी कविताओं के बिंब या उनकी प्रतीकात्मकता नवीन होने के कारण पाठक को विहृल तो कर देती है, लेकिन उसे कोई दिशा नहीं देती। उदाहरण के लिए यहाँ संध्या का एक बिंब विचारणीय है :

“पति सेवा-रत साँझ

उझकता देख पराया चाँद।

ललाकर ओट हो गयी।”

यह संध्या के स्वरूप और उसकी प्रकृति का अत्यंत नया और व्यंजक चित्रांकन है लेकिन यहाँ बिंब की चकाचौंध में खोकर हम रह जाते हैं। लगभग यही स्थिति अज्ञेय के प्रतीकों की भी है, “सोन मछली और “मैंने देखा एक बूंद’ में आप इसे आसानी से देख सकते हैं। लेकिन मुक्तिबोध के प्रतीक, रूपक, बिंब ही नहीं, उनकी उपमाएँ भी पाठक को एक व्यापक जीवन-संदर्भ से जोड़ती हैं, उनके प्रतीकरूपक जगत-समीक्षा करते हुए भविष्य के लिए एक नया स्वप्न देते हैं। (आप अज्ञेय और मुक्तिबोध के रूपकों, प्रतीकों और बिंबों के तुलनात्मक स्वरूप पर विचार अवश्य कर लें क्योंकि इस तरह के प्रश्न परीक्षा में पूछे जा सकते हैं।)

प्रतीकों, रूपकों, बिंबों और समूची उपमान-व्यवस्था की अपनी निजी विशिष्टता के साथ मुक्तिबोध मिथकों के प्रयोग में हिंदी काव्य-जगत में अद्धितीय हैं। वैसे तो मुक्तिबोध ने प्रतीकों-रूपकों के चयन के लिए वर्तमान जीवन तथ्यों पर ही अधिक निर्भर किया है, लेकिन वर्तमान जीवन की त्रासदी और उससे मुक्ति की समस्या के समाधान के लिए उनकी दृष्टि पौराणिक प्रतीकों की ओर भी गई है। इसके लिए कवि ने अन्यान्य पौराणिक प्रतीकों के साथ ही महाभारत पर सर्वाधिक निर्भर किया है। इस क्रम में उसने वैदिक ऋषि शुन:शेष, अजीगर्त, दधीचि, राम, रावण, हनुमान के साथ ही महाभारत के कौरवपांडव संघर्ष और उसके विभिन्न पात्रों द्रोण, कर्ण, भीष्म, अर्जुन, कृष्ण आदि को अत्यन्त सार्थक मिथक का रूप दिया है। पौराणिक कृष्ण-कथा, कंस और उसके कारावासी वसुदेव-देवकी, कृष्ण-जन्म आदि मिथकीय पुरुषों और घटनाओं के माध्यम से आज की गंभीर समस्याओं का चित्रण करते हुए मुक्तिबोध ने एक तर्क-संगत समाधानं भी प्रस्तुत किया है। जब कि अज्ञेय केवल आस्वाद तक ही सीमित रह गए हैं।

देवकी से कृष्ण-जन्म की पौराणिक मान्यता का आधार ग्रहण कर कोयलों की खदान में कार्यरत महिला के पीड़ादायक प्रसव का उल्लेख करते हुए मुक्तिबोध ने लिखा है :

“अभागिन किसी आत्मा ने

देवकी ने

अंधियारी-अत्याचारी जाने किस प्रहर-रात

जन्म दिया कृष्ण को अपार संताप में”

इस प्रसंग को “डूबता चाद कब डूबेगा’ शीर्षक कविता में मुक्तिबोध ने इस प्रकार प्रस्तुत किया है :

“जाने कितने कारावासी वसदेवः ।

स्वयं अपने कर में, शिशु आत्मज ले

बरसाती रातों में निकले 

विक्षुब्ध पूर में यमुना के

अतिदूर, अरे उस नन्द-ग्राम की ओर

जाने किसके डर से वे स्थान्तरित कर रहे

जीवन के आत्मज सत्यों को

किस महाकंस से भय खाकर।”

यहाँ कृष्ण-जन्म का मिथ आज के महत्वपूर्ण क्रांतिकारी विचारों के जन्म से जुड़कर आधुनिक बोध को स्पष्ट करता है। “महाभारत’ की वास्तविकता को “इस नगरी’ शीर्षक कविता में मुक्तिबोध ने इस प्रकार किया है :

“इस नगरी में कौरव के घर

वीर द्रोण की थकन भरी है भूरी-भूरी

पीली है सूरत अनचाहों की सेवा में

कुन्ती पुत्र कर्ण, कर्प – (कृपाचार्य) सात्यिक की ग्रीवा में

कुत्ते की गर्दन का पट्टा

दुखते हिय से भीष्माचार्यों की मजबूरी

कौरव के घर।”

(भूरी-भूरी खाक…, पृ0 167)

यह महाभारत की कथा की पुनर्व्याख्या (री इंटर प्रेटेशन) है, जिसमें द्रोणाचार्य जैसे महारथी की विवशता, पांडव-माता कुंती-पुत्र कर्ण, कृपाचार्य, सात्यिक जैसे योद्धाओं का सत्ताधारी पक्ष की चाकरी, (इनके गलों में पालतू कुत्तों का पट्टा दिखाकर कवि ने इनके आन्तरिक चरित्र का अत्यंत मार्मिक उद्घाटन किया है) और भीष्म पितामह की मजबूरी का चित्रण है। लेकिन मुक्तिबोध ने इस मिथक के माध्यम से आज के सत्ताधारी शोषक-शासक वर्ग की चाकरी में कार्यरत तथाकथित महानों की ओर भी संकेत किया है। इस संबंध में मुक्तिबोध ने “नये साहित्य का सौंदर्य शास्त्र’ पुस्तक में लिखा है कि आज के युग में भी एक नया महाभारत छिड़ा हुआ है। इसमें भीष्म पितामह और गुरु द्रोण जैसे तमाम सारे प्रचण्ड व्यक्ति दिखावे के लिए तो पांडवों की पीठ थपथपाते हैं, लेकिन आज के युद्ध में सत्ताधारी पक्ष की ओर से लड़ रहे हैं। कष्टग्रस्त श्रेणी से उभरने वाली प्रतिभाओं को आज ऐसे लोगों से सबसे बड़ा खतरा है। इस बात को स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा है, “गुरु द्रोण के प्रांगण में आधुनिक कौरव और पांडव -दोनों तालीम पा रहे हैं। …अभी भी बहुत से महापुरुष कौरव की चाकरी करते हुए, पांडवों से प्रेम करते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। किंतु द्रोण, भीष्म, कर्ण जैसे प्रचंड व्यक्तियों की ऐतिहासिक पराजय जैसे महाभारत काल में हुई थी, वैसी आज भी होने वाली है।” 

उपर्युक्त विवेचन-विश्लेषण से यह स्पष्ट है कि मुक्तिबोध द्वारा प्रयुक्त प्रतीक, रूपक, उपमा, बिंब, मिथक आदि स्वतंत्र सत्ता रखते हुए अभिव्यक्ति के वाहक मात्र न होकर सामाजिक अनुभवों की जड़ों से जुड़े हुए हैं। फलस्वरूप अज्ञेय की भांति अनुभव-क्षण की आवेशात्मक अभिव्यक्ति तक सीमित न रहकर अनुभव को ज्ञानात्मक संवेदन और संवेदनात्मक ज्ञान तक पहुँचाते हुए उसे (अनुभवों को) बोध का रूप भी प्रदान करते हैं : 

“ने जगत-समीक्षा करते से

मेरे प्रतीक-रूपक सपने फैलाते हैं।

आगामी के”

इन काव्य पंक्तियों के माध्यम से मुक्तिबोध ने उपर्युक्त तथ्य को रेखांकित किया है। फैंटेसी के शिल्प के प्रेरक “संवेदनात्मक उद्देश्य’ भी कल्पना, भावना और बुद्धि के सहारे यही कार्य करते हैं। सब मिला कर अद्भुत अभिव्यक्ति कौशल का सहारा लेते हुए भी मुक्तिबोध ने सामान्यत: शिल्प के संबंध में कोई विशेष आग्रह न प्रस्तुत कर उसकी सहजता और वस्तु-तत्व (काण्टेण्ट) की अनुकूलता को रेखांकित करते हुए लिखा है :

“जमाने ने नगर के कंधे पर हाथ रख

कह दिया साफ-साफ

पैरों के नखों से या डंडे की नोक से

धरती की धूल में भी रेखाएँ खींच कर

तसवीरें बनती हैं

बशर्ते कि जिंदगी के चित्र सी

बनाने का चाव हो

श्रद्धा हो, भाव हो।’

-(चाँद का मुँह टेढ़ा है)

काव्य-भाषा, शब्दावली और विराम-चिह्न

काव्य-भाषा के संबंध में मुक्तिबोध का कोई रूढ़ आग्रह नहीं रहा है। यद्यपि उन्होंने रचना-प्रक्रिया में शब्द-साधना को एक अत्यन्त कठिन साधना के रूप में विस्तार से विश्लेषित किया है। वैसे उनकी नवीन चेतना कभी संस्कृत-निष्ठ तत्सम सामासिक पदावली की अलंकृत गलियों से गुज़रती है, तो कभी अरबी-फारसी-उर्दू के नाजुक हाथों को थाम कर चलती है, कभी बोल-चाल के सहज प्रवाह में प्रवाहित होती है, तो कभी अंग्रेज़ी, हिंदी, संस्कृत के मिश्रित रूप का कुशलता पूर्वक सहारा लेती है। अंत: उनकी भाषा में एकरूपता न होकर अवसरानुसार तथा भावानुकूल अनेक रूप मिलते हैं। इसके लिए कुछ उदाहरण देखे जा सकते हैं : 

“फाड़ श्याम मृत्तिका वरण, उठे सकोण

प्रस्तरी अंग यत्र-तत्र सर्वत्र।’

या

“भू-लोक-विपथ-विज्ञान-गणित-शास्त्री

तम छायाओं द्वारा. प्रकाश-पथ के ज्ञाता,

आज की श्याम भूताकृतियों के द्वारा ही

कल की प्रकाश-छवियों के.ओ दर्शन-कर्ता” (ओ काव्यात्मन् फणिधर)।

“भूल (आलमगीर)

मेरी आपकी कमजोरियों के स्याह

लोहे का जिरह बख्तर पहन, खूखार

हाँ, खूखार आलीजाह’ – (भूल गलती)

सुबह से शाम तक…

काम की तलाश में इस गुजरे हुए दिन की

निरर्थकता की आग में

जलता धुआता हुआ

जिन्दगी की दुनिया को कोसता

मैं रास्ते पर चलता हूँ’ – (मुझे याद आते हैं)

स्क्रीनिंग करो मिस्टर गुप्ता ।

क्रास एक्जामिन हिम थारोली” (अंधेरे में)।

शब्द-चयन और शब्दावली और प्रयोग की दृष्टि से भी मुक्तिबोध अपने युग के एक विशिष्ट कवि के रूप में हमारे सामने आते हैं। शब्द-शोधन और नये शब्दों के अनुसंधान को ही वास्तविक कवि कर्म मानने वाले अज्ञेय की शब्दावली से मुक्तिबोध की शब्दावली को मिलाकर आप आसानी से देख सकते हैं कि इस क्षेत्र में भी मुक्तिबोध की प्रयोग धर्मिता अज्ञेय से कितनी आगे है। लाक्षणिक विशेषणों से युक्त और विलक्षण शब्दों का प्रयोग मुक्तिबोध की अनुभूति की जटिलता की अभिव्यक्ति के लिए अनिवार्य साधन के रूप में आया है। कोमल अहं-अस्मि-वेदना, क्रांति सा क्रुद्ध लाल सुर्ख, मित्रस्मिता, वनवासी समीर, शिलीभूत गतियों का हिम,अंगारी झीलें, गतिशील असंगतियाँ, भूले-भटके शब्द, खेतिहर के नवाक्षर विभ्राट-व्यवस्था, आत्मज अनुभव-शिशु, अन्वय-व्यतिरेक-प्रभा-उपपत्ति सहित, भूलों के ग्राफ,गलतियों के नक्शे, अपाहिज पूर्णताएँ, अपवाद के नियम, अऋतन भाव-चित्र जैसे शब्दों के साथ ही । एलक्ट्रान-प्रोटोन, यूरेनियम, मैगनीज, फास्फेट, रेडियम, फास्फोरस, नाइट्रोजन, स्टीम-रोलर, पिस्टन आदि जैसी वैज्ञानिक शब्दावली उनकी प्रखर चेतना की अभिव्यक्ति करती हैं। ये शब्दावली उनके व्यापक रचना संसार का भी स्पष्ट संकेत करती है।

मुक्तिबोध ने अपनी काव्य-भाषा में विराम चिह्नों की भूमिका को भी रेखांकित किया है। कोष्टक, डैश, . वाक्यारंभ और अंत में तीन बिंदुओं – (डाट्स) का प्रयोग, कामा, कोलन, सेमीकोलन, रिक्त पंक्तियों के रूप में एक पूरी पंक्ति के स्थान पर बिंदुओं (….) का प्रयोग, प्रश्न वाचक चिह्न, संबोधन कारक चिह्नों के रूप में! या!! या फिर!!! चिह्नों, इकहरे या दुहरे इनवर्टिड कामाज़ (” -‘) का प्रयोग आदि मुक्तिबोध के काव्य-शिल्प को एक नयी और सार्थक भंगिमा प्रदान करते हैं।

अन्य अनेक विशेषताओं के साथ ही नाटकीयता भी मुक्तिबोध के काव्य की एक प्रमुख विशेषता है। इसे “चाँद का मुँह टेढ़ा है’ संग्रह की पहली कविता “भूल गलती” से लेकर अंतिम कविता ‘अंधेरे में” तक हम आसानी से देख सकते हैं। स्थान-स्थान पर आने वाले संवाद, प्रश्न-उत्तर-प्रतिउत्तर, पट परिवर्तन, पटाक्षेप, दृश्य-परिवर्तन, छाया-ध्वनि-प्रकाश आदि की कुशल योजना मुक्तिबोध की शिल्पगत विशिष्ट उपलब्धि है। अपने इस नाटकीय शिल्प के लिए मुक्तिबोध ने कुछ विशिष्ट शब्दों का सहारा भी लिया है। जैसे -अचानक, अकस्मात, यकायक, एकाएक, अनायास, अरे, ओ, अरे। अरे।।, कौन, क्यों, कैसे, हाय-हाय आदि-आदि शब्द नाटकीय कौशल में पर्याप्त सहायक हुए हैं।

काव्य-भाषा, शब्दावली और विराम चिह्नों के साथ मुक्तिबोध के नाटकीय कौशल को समझने के लिए पाठ्यक्रम में निर्धारित कविताओं – विशेष रूप से “चकमक की चिनगारियाँ”, “ओ काव्यात्मन फणिधर’ और “अंधेरे में’ शीर्षक कविताओं पर एक सरसरी निगाह अवश्य डाल लें।.

कुछ कविताओं के शीर्षकों का आशय-अभिप्राय

मुक्तिबोध के काव्य-शिल्प का विस्तृत विश्लेषण करने के बावजूद यह ज़रूरी लगता है कि आपके सामने मुक्तिबोध की कुछ कविताओं के शीर्षकों के आशय-अभिप्राय को स्पष्ट किया जाए। इससे आपके सम्मुख यह तथ्य अधिक स्पष्टता से आ सकेगा कि किसी कविता विशेष में मुक्तिबोध को कहना क्या है और कहने का वे क्या तरीका अपनाते हैं। इससे उनकी रूपक-प्रतीक-योजना के साथ ही फैंटेसी का शिल्प स्वरूप भी स्पष्ट हो सकेगा।

“चकमक की चिनगारियाँ’ और ‘अंत:करण का आयतन’ शीर्षक कविता पर इस दृष्टि से हमने व्यापक चर्चा कर ली है। “अंधेरे में’ शीर्षक कविता पर अगली इकाई के अंतर्गत विस्तार से विचार किया जाएगा। यहाँ हम केवल तीन कविताओं के शीर्षकों को विचार-विमर्श के लिए ले रहे हैं – 

  • “डूबता चाँद कब डूबेगा, 
  • “चम्बल की घाटी में” और
  • “ओ काव्यात्मन् फणिधर”।

“डूबता चाँद कब डूबेगा’ – इस शीर्षक का प्रतीकार्थ है, ह्रास की ओर उन्मुख पूंजीवादी समाज व्यवस्था का अंत कब होगा। इस प्रतीकार्थ को समझे बिना फैंटेसी के शिल्प में प्रस्तुत की गई इस कविता के प्रतीकों-रूपकों के आशय को समझने में कठिनाई हो सकती है। प्रस्तुत कविता का आरंभ समाज के दिल दहलाने वाले, भयंकर और वीभत्स चित्रांकन से होता है। द्वेष, ईर्ष्या, कुत्सा . (पाप) आदि के विषाक्त वातावरण के कारण उत्पन्न स्थिति का भयप्रद चित्र अंकित करते हुए कवि ने लिखा हैं :

“अंधियारे बिल से झांक रहे

सर्यों की आंखें तेज हुई

अब अहंकार उद्विग्न हुआ,

मानव के सब कपड़े उतार

वह रीछ एक दम नग्न हुआ।”

यथार्थ जीवन-स्थितियों का अमूर्तन करते हुए फैंटेसी के शिल्प के सहारे अनेक कल्पना-चित्रों द्वारा असह्य पीड़ादायक स्थिति से छुटकारा पाने के लिए नये अनुभव-शिशु के रूप में क्रांतिकारी विचारधारा के जन्म का संकेत भी कवि ने अत्यंत भावात्मक-कलात्मक ढंग से किया है। इस समाज के संचालक पूंजीवादी कंस के कारागार में जन्में वसुदेव पुत्र कृष्ण के रूप में अवतरित यह क्रांतिकारी विचारधारा ही अमानवीय शोषण से मुक्ति दिला सकती है – इस मान्यता के साथ कविता समाप्त होती है। यह संपूर्ण कार्य कवि ने पूँजीवाद, पूँजीपति, सर्वहारा की क्रांति आदि का स्पष्ट उल्लेख किए बिना ही सम्पन्न किया है। कथन की यह पद्धति ही फैंटेसी के शिल्प की विशेषता है, जिसमें रूपकों, प्रतीकों और उपमानों की महत्वपूर्ण भूमिका भी यहाँ रेखांकित हुई है।

“चम्बल की घाटी में” – इस कविता में मुक्तिबोध का मूल कथ्य है कि समाज के ऐतिहासिक विकास की निरंतर प्रवाहित धारा आज पूँजीवाद के साम्राज्यवादी-इजारेदारी के इस दौर में पूरी तरह अवरुद्ध हो गई है, जिसे पुन: प्रवाहित करने के लिए क्रांतिकारी शक्तियों के साथ ही बुद्धिवादी मध्यवर्ग को अपनी सही भूमिका का निर्वाह करना चाहिए। चम्बल (एक नदी) का प्रतीकात्मक उपयोग करते हुए कवि ने कविता के दूसरे खंड के मध्य में लिखा है :

– “अब तक अथाह जो भरी पूरी नदी थी,

वही आज

अपनी ही घाटी में डूब मरी

चम्बल के (यहाँ आ) पैर उखड़ गए

तुमने बहुत देर की

पानी की खोहें और थाहें सब सूख गयीं

तलवे सब फट गए

दरारों में प्यास भर गयी है”

वस्तुत: चम्बल यहाँ समाजेतिहास की उस विकास-धारा का प्रतीक है, जिसने निरंतर प्रवहमान रहते हुए पूँजीवादी विकास के साम्राज्यवादी मोड़ पर अपनी ही घाटी में दम तोड़ दिया है। पूँजीवादी व्यवस्था के प्रच्छन्न नायक को यहाँ मुक्तिबोध ने जादूदाँ और यातुधान (राक्षस) कहा है। चम्बल की हत्या के षडयंत्र का सूत्रधार वही है। ऐसी स्थिति में भी कवि का पूरा विश्वास है कि वह राक्षस चाहे कितना भी बलवान क्यों न हो, इस घाटी में रहने वाले सभी लोगों की हत्या संभव नहीं है : .

“असंभव, इस पूरे क्षेत्र में सब लोग मारे जाएँ, मर जाएँ, असंभव,

भले ही उजाड़ और

चाहे जितनी जन-हीन ।

लगे यह पूरी भूमि

कुशल और चाहे जितना बलवान

वह यातुधान हो,

लोग अभी जिन्दा हैं, जिन्दा।।

यहीं कहीं, वे भी।’

इसके बाद एक मध्यवर्गीय व्यक्ति के रूप में अपने और अपने जैसे दूसरों को चेतावनी देते हुए कवि ने … लिखा है :

“जिसके होने में गहन अंशदान

स्वयं तुम्हारा,

इसी लिए जब तक उसकी (शोषण पाप के परम्परा-क्रम की) स्थिति है ।

मुक्ति न तुमको।

याद रखो, कभी अकेले में मुक्ति नहीं मिलती

इस प्रकार कवि ने अंत में व्यक्तिबद्धता के दायरे को तोड़ कर मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों को जन साधारण के साथ एकमेक होने का आग्रह अनुरोध व्यक्त किया है। लेकिन यह कार्य एक अत्यंत उलझे हुए, फिर भी अत्यन्त कलात्मक माध्यम से सम्पन्न हुआ है।

“ओ काव्यात्मन फणिधर” – प्रस्तुत कविता का शीर्षक उपर्युक्त दोनों कविताओं के शीर्षक की प्रकृति से भिन्न है। यहाँ कवि ने अपनी कविताओं को फणिधर नाग के रूप में संबोधित किया है। इस कविता का मूल कथ्य भी वही है, जो उपर्युक्त दोनों कविताओं का है। लेकिन यहाँ अपने  अनुभव-शिशु को अर्थात् प्रकाशमान रत्नों को सहेज कर एकत्र करने का अनुरोध प्रस्तुत किया गया है। क्योंकि “यह काल तुम्हारा नहीं’। उन्हें प्रकट करने का समय अभी आया नहीं है। फिर भी तुम घर-आँगन, पुर-नगर के कचरों के ढेरों में छिपाए गए “मन के, जन के, जो मूल सत्य हैं, . इस जग के परिवर्तन के” उन रत्नों को एकत्र करो, जो असुविधाजनक समझ कर छिपा दिए गए हैं। यहाँ कवि ने अनुभव-विस्तार की प्रक्रिया को आत्म-संघर्ष और आत्म साक्षात्कार के माध्यम से सम्पन्न करने के महत्व को रेखांकित किया है” आधुनिक सभ्यता के वीभत्स और भयावह परिवेश से अपने काव्यात्मन फणिधर को अंधकूप के सूखे तल में, कूड़े-कचरों के ढेर के नीचे छिपे रो रहे: नवजात शिशु को श्रम-गरिमा का दूध पीने के लिए समुचित स्थान पर ले जाने का कवि ने आग्रह भी किया है।

वस्तुत: नवजात शिशु यहाँ क्रांतिकारी विचारधारा है, जो वर्तमान सभ्यता के जंगल में “हाँ में हाँ, नहीं-नहीं में भर/ अपने को जग में खपा देने’ वाली प्रवृत्ति के कारण अन्तरात्मा के अंधकूप में डाल दी गई है। यह विचारधारा ही नवजात शिशु के रूप में पुष्ट होकर वर्तमान शोषण मूलक व्यावसायिक सभ्यता के संचालक प्रच्छन्न रहने वाले “ब्रह्मदेव’ के काले कारनामों का परदाफाश करेगा :

“पर शोक मत करो नागात्मन..

 आ गए तुम्हारी अनुपस्थिति में लोग

प्रतीक्षा जिनकी थी

अब उन रत्नों का अर्थ दीप्त होगा,

उनका प्रभाव घर-घर में पहुँचेगा फिर से

उनके प्रकाश में दीख सकेगा भीषण मुख..

 जग देख चुकेगा पूरा ही।

उस ब्रह्मदेव का दर्शन सभी कर सकेंगे

जिसकी छत्रच्छाया में रह

अधिकाधिक दीप्तिमान होते

धन के श्री-मुख,

पर, निर्धन एक-एक सीढ़ी नीचे गिरते जाते

उस ब्रह्मदेव का विवेक-दर्शन

होगा उद्घाटित पूरा।”

यहाँ पहुँच कर “नागात्मन् फणिधर’ की फैंटेसी अपने आवरण के बाहर आती है और अपनी जीवनयात्रा के सामाजिक निष्कर्ष को प्रस्तुत करती है। मुक्तिबोध की इस प्रवृत्ति को हम “एक अंतर्कथा”, “चाँद का मुँह टेढ़ा है”, “इस चौड़े ऊंचे टीले पर’, “एक स्वप्न कथा” आदि अधिकांश कविताओं में स्पष्टता के साथ देख सकते हैं।

सारांश

प्रस्तुत इकाई में मुक्तिबोध के काव्य-शिल्प पर विचार करते हए सर्वप्रथम हमने कथ्य और शिल्प की एकरूपता के साथ ही उनके द्वंद्वात्मक संबंधों को समझने का प्रयास किया है। “चकमक की चिनगारियाँ” कविता के एक उदाहरण द्वारा हमने स्पष्ट रूप से देखा है कि अभिव्यक्ति के उपकरण किस प्रकार कथ्य का अभिन्न अंग बनते हुए उसे और अधिक सम्पन्न करते हैं। इसके बाद फैंटेसी के शिल्प की सामान्य विशेषताओं को स्पष्ट करते हुए मुक्तिबोध द्वारा फैंटेसी के मौलिक प्रयोग पर भी विचार किया गया है। इसके लिए “अन्त:करण का आयतन” कविता को आधार बनाते हुए फैंटेसी के शिल्प में गुथे हुए प्रतीकों, रूपकों, बिंबों के सार्थक उपयोग और उनकी मूल प्रकृति को भी रेखांकित किया गया है। प्रतीक, रूपक, मिथक और समूची उपमान-व्यवस्था ही वह उपकरण है, जो एक ओर फैटेसी के मूल ढांचे को कायम रखती है और दूसरी ओर वर्तमान जीवन-तथ्यों के रंग भी भरती है। मुक्तिबोध के काव्य-शिल्प की विशेषताओं के स्पष्टीकरण के क्रम में फैंटेसी से अलग उनके रूपकों, प्रतीकों, उपमाओं, बिंबों, मिथकों आदि पर भी हमने विचार कर लिया है। इसके लिए नयी कविता के प्रतिनिधि कचि अज्ञेय की शिल्प संबधी विशेषताओं की मुक्तिबोध के शिल्प से तुलना भी संक्षेप में की गई है। इस तुलना में समाजनिष्ठ मुक्तिबोध और व्यक्तिनिष्ठ अज्ञेय के मूलभूत अंतर को भी रेखांकित करने का प्रयास किया गया है।

इकाई के अंत में मुक्तिबोध की काव्य-भाषा, शब्दावली, विराम-चिह्नों के प्रयोग के साथ ही उनके नाटकीय कौशल पर भी प्रकाश डाला गया है। ये सभी उनके काव्य-शिल्प को निजी विशेषता से मंडित करते हैं। इस तथ्य को और अधिक स्पष्ट करने के लिए अंत में “डूबता चाँद कब डूबेगा”, “चम्बल की घाटी में” तथा “ओ काव्यात्मन फणिधर’ जैसे शीर्षकों की प्रतीकात्मकता को इस दृष्टि से स्पष्ट किया गया है कि आप यह समझ सकें कि मुक्तिबोध मूल कथ्य को किस पद्धति से प्रस्तुत करते हैं। इससे भी उनकी शिल्पगत विशेषताओं, विशेष रूप से फैंटेसी की शिल्प की विशेषताओं को समझने में पर्याप्त सहायता मिल सकती है।

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