छायावाद

आधुनिक हिन्दी काव्यधारा के विकास में छायावाद का महत्वपूर्ण स्थान है। छायावाद ने न केवल अंतर्वस्तु के स्तर पर अपितु काव्य भाषा और संरचना की दृष्टि से भी हिन्दी कविता को समृद्ध किया है। इस इकाई में छायावाद की इन्हीं विशिष्टताओं से आपका परिचय कराया जाएगा। इस इकाई को पढ़ने के बाद आप:

  • स्वच्छन्दतावाद और छायावाद के अंतर्संबंध को जान सकेंगे;
  • छायावाद के अर्थ और स्वरूप से परिचित हो सकेंगे;
  • छायावाद और संस्कृत की काव्यशास्त्रीय परम्परा के संबंध की चर्चा कर सकेंगे; और
  • छायावाद की मूल प्रवृत्तियों की जानकारी दे सकेंगे।

हिंदी की रोमांटिक स्वच्छंदतावादी काव्यधारा की विकसित अवस्था को ‘छायावाद’ नाम से जाना जाता है। उसकी प्रमुख प्रवृत्तियों और हास के कारणों के बारे में अब कोई उल्लेखनीय विवाद नहीं रह गया है। बीसवीं शताब्दी के हिंदी कविता के सबसे समर्थ और महत्वपूर्ण काव्यांदोलन के रूप में छायावाद की स्वीकृति के बारे में व्यापक सहमति है। शताब्दी के आरंभ में जब काव्य-प्रवृत्ति के लक्षण दिखाई पड़े, तब जिस बात ने विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया, वह थी रीतिकालीन काव्य-रूढ़ियों से मुक्ति।

अभिव्यक्ति के माध्यम के रूप में ब्रजभाषा को अपदस्थ करने के लिए आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी पहले ही व्यापक आंदोलन चला चुके थे। आपने इकाई सं-14 द्विवेदी युग’ में पढ़ा कि द्विवेदी जी के प्रयत्नों से, खड़ी बोली काव्य-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित भी हो चुकी थी। पर जैसा आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने कहा है : “उसी समय पिछले संस्कृत-काव्य के संस्कारों के साथ पं. महावीरप्रसाद द्विवेदी हिंदी साहित्य-क्षेत्र में आए – जिससे इतिवृत्तात्मक (मैटर ऑफ़ फैक्ट) पद्यों का खड़ी बोली में ढेर लगने लगा।” यानी काव्य-भाषा तो खड़ी बोली हो गई, पर काव्य-शैली में रीतिकालीन चमत्कारात्मकता, सरसता, विदग्धता आदि का स्थान । इतिवृत्तात्मकता ने ले लिया। आज शुक्ल जी की यह स्थापना निर्विवाद रूप से स्वीकृत है कि रीतिकाल की रूढ़ियों को तोड़कर “स्वच्छंदता का आभास पहले-पहल पं. श्रीधर पाठक ने ही दिया।” और “सब बातों का विचार करने पर पं. श्रीधर पाठक ही सच्चे स्वच्छंदतावाद (रोमैंटिसिज्म) के प्रवर्तक ठहरते हैं।”

किन्तु इस स्वच्छंतावाद के स्वाभाविक विकास की जो रूपरेखा आचार्य शुक्ल ने प्रस्तुत की है, उसके बारे में बाद के विद्वानों में सहमति नहीं हो सकी। शुक्ल जी ने श्रीधर पाठक की कविता में जिसे “सच्ची और स्वाभाविक स्वच्छंदता का मार्ग” कहा उनके अनुसार वह “हमारे काव्य-क्षेत्र के बीच चल न पाया”। जिन “इने-गिने नए कवियों” में आचार्य शुक्ल ने ‘स्वच्छंदता के स्वाभाविक पथ’ का विकास देखा उनमें उन्होंने रामनेरश त्रिपाठी, मुकुटधर पाण्डेय, माखनलाल चतुर्वेदी, सियारामशरण गुप्त, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’, सुभद्राकुमारी चौहान, गुरुभक्त सिंह ‘भक्त’, उदयशंकर भट्ट जैसे कवियों की तो गणना की, पर उनमें जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला’, महादेवी वर्मा आदि को स्थान नहीं दिया।

उनका कहना था कि रवींद्र बाबू की गीतांजलि की धूम उठ जाने के कारण नवीनता प्रदर्शन के इच्छुक नए कवियों में से कुछ लोग तो बंग भाषा की रहस्यात्मक कविताओं की रूपरेखा लाने में लगे, कुछ लोग पाश्चात्य काव्य-पद्धति को विश्व-साहित्य’ का लक्षण समझ उसके अनुकरण में तत्पर हुए।” उनके इस कथन में इशारा उन कवियों की ओर ही है जिन्हें बाद में ‘छायावाद’ के कवियों के रूप में जाना गया। आचार्य शुक्ल ने इन्हें उन कवियों से अलग करके देखा जिन्हें वे ‘स्वच्छंदतावाद’ के भीतर गिनते थे और उनकी कविता में सच्ची नैसर्गिक स्वच्छंदता’ के दर्शन करते थे।

स्वच्छंदतावाद और छायावाद

हिंदी में इस प्रकार रोमैंटिसिज्म’ के लिए स्वच्छंदतावाद’ शब्द आ जाने के बाद छायावादी कविता को आरंभिक स्वच्छंद काव्य-धारा से ही नहीं, बल्कि उसकी परवर्ती परंपरा से भी अलग करके देखने की परिपाटी चल पड़ी। इसी बीच हिंदी की रहस्यात्मक कविताओं की चर्चा के प्रसंग में अंग्रेज़ी के ‘मिस्टिसिज़्म’ शब्द का उल्लेख किया गया जिसका परिणाम यह हुआ कि आरंभ में बहुत दिनों तक छायावादी कविताओं के लिए रहस्यवाद’ शब्द का प्रयोग भी होता रहा। पर वास्तविकता यह है कि शुक्ल जी ने जिन कवियों की कविताओं में ‘सच्चे स्वच्छंदतावाद’ का स्वरूप देखा था, उनके ‘सच्चे स्वच्छंदतावाद’ में भी और बातों के अलावा ‘रहस्यपूर्ण संकेत’ मौजूद है। इसलिए केवल राविन्द्रिक प्रभाव के अनुमान के कारण छायावाद को स्वच्छंदतावादी काव्य-परंपरा से बाहर नहीं किया जा सकता।

छायावाद के आरंभ में होने वाले तात्कालिक विवादों का कोलाहल शांत हो जाने के बाद अब यह बात भली-भाँति स्पष्ट होकर सामने आ चुकी है कि ‘छायावाद’ हिंदी की अपनी रोमैंटिक अथवा स्वच्छंदतावादी काव्यधारा की ही विकसित अवस्था है। इसके पहले चरण के कवि हैं श्रीधर पाठक, रामनरेश त्रिपाठी, मुकुटधर पाण्डेय आदि जिन्हें आ. शुक्ल ‘सच्चे स्वच्छंदतावादी’ कहते थे और दूसरे चरण में इसी काव्य-प्रवृत्ति को प्रौढ़तम उत्कर्ष तक पहुँचाने वाले कवि प्रसाद, पंत, निराला और महादेवी थे जिन्हें ‘छायावाद’ के कवि माना जाने लगा।

प्रवर्तन का प्रश्न

छायावाद का आरंभ किस कवि की किस रचना से माना जाए यह प्रश्न आज भी विवादास्पद है। सुमित्रानंदन पंत ने अपनी पुस्तक ‘छायावाद : पुनर्मूल्यांकन’ में इस प्रश्न पर विस्तार से विचार किया है। उन्होंने प्रसाद को छायावाद का प्रवर्तक मानने के पक्ष में ‘भावना की दृष्टि से आदर’ व्यक्त किया। पर लगे हाथों ‘तथ्य-विश्लेषण की दृष्टि से’ उन्होंने इस मान्यता का विरोध किया। इस बारे में उन्होंने जो तथ्य प्रस्तुत किए हैं उनका सार यही है कि “सन 1919 में प्रकाशित ‘झरना’ के प्रथम संस्करण की 24 कविताओं में कोई ऐसी विशिष्टता नहीं थी जिस पर ध्यान जाता। दरअसल छायावादी प्रवृत्ति से युक्त प्रसाद जी की कविताएँ झरना’ के दूसरे संस्करण में पहली बार सन् 1927 में ही प्रकट हुई। इसके अलावा उनके ‘कानन-कुसुम’, ‘प्रम-पथिक’ आदि काव्य सन् 1923 के बाद ही प्रकाश में आए। इनमें से ‘कानन-कुसुम’ में द्विवेदी-युग के ढंग की ही रचनाएँ थीं। पंत जी का दावा है कि “मेरी प्राय: सभी ‘पल्लव’ में प्रकाशित रचनाएँ दो वर्ष पूर्व से अर्थात् सन् 1923 के मध्य से सरस्वती में प्रकाशित होने लगी थीं।”

इसके अलावा उनके ‘वीणा’ नाम के गीत-संकलन की रचना सन् 1918-19 में और ‘ग्रंथि’ नामक काव्य की रचना सन् 1919 में की जा चुकी थी। उनकी पहली लम्बी रचना ‘स्वप्न’ का प्रकाशन भी सन् 1920 की सरस्वती में हो चुका था। जहाँ तक लिख लिए जाने का प्रश्न है, निराला जी का कहना था कि ‘जूही की कली’ तो उन्होंने सन् 16 में ही लिख डाली थी। यह बात अलग है कि ‘जूही की कली’ का कथ्य रीतिकालीन सा है पर अप्रस्तुत विधान, चित्रमयी भाषा और लाक्षणिक वैचित्र्य एवं छंद-मुक्ति, सभी दृष्टियों से यह कविता हिंदी काव्य में एक स्पष्ट मोड़ की सूचक है। पंत जी ने अपनी मान्यता के समर्थन में ‘झरना’ के बारे में शुक्ल जी का निम्नलिखित कथन उद्धृत किया – “झरना’ के द्वितीय संस्करण में छायावाद कही जाने वाली विशेषताएँ स्फुट रूप में दिखाई पड़ीं। इससे पहले ‘पल्लव’ बड़ी धूमधाम से निकल चुका था, जिसमें रहस्य-भावना तो कहीं-कहीं पर अप्रस्तुत विधान, चित्रमयी भाषा और लाक्षणिक वैचित्र्य आदि विशेषताएँ अत्यंत प्रचुर परिमाण में सर्वत्र दिखाई पड़ी थीं।”

अगर ‘झरना’ के पहले प्रकाशित कविताओं में छायावादी प्रवृत्तियों का प्रश्न उठाया जाए, तो सन् 1922 में प्रकाशित ‘अनामिका’ की उपेक्षा नहीं की जा सकती। और यदि निराला जी के कथन को प्रमाण मान लिया जाए तो ‘वीणा’ और ‘ग्रंथि’ से पहले ‘जही की कली’ की रचना हो चुकी थी। इसके अलावा, एक ओर ‘सरस्वती’ में पंत की फुटकर रचनाएँ प्रकाशित हो रही थीं और दूसरी और ‘मतवाला’ और ‘समन्वय’ आदि पत्रिकाओं में निराला का फुटकर काव्य प्रकाशित हो रहा था। ‘सरस्वती’ में स्थान पा जाने के कारण पंत जी ने उस समय विद्वत समाज का ध्यान सबसे ज्यादा आकर्षित किया, पर इसका परिणाम यह हुआ कि छायावाद की कटु आलोचनाओं का भार भी सबसे ज़्यादा उन्हीं के सुकुमार व्यक्तित्व को झेलना पड़ा। यह बात अलग है कि छायावाद के कवियों में उनका काव्य, आचार्य शक्ल को इसलिए सबसे अधिक रास आया क्योंकि वे अभिव्यंजना के टेढ़े-रास्ते छोड़कर शुद्ध स्वाभाविक मार्ग पर चलने वाली कविता को लोक-जीवन के अधिक निकट मानते थे। अन्य कवियों की रहस्य-भावना में जहाँ उन्हें साम्प्रदायिकता की गंध आने लगती थी वहाँ पंत जी की रहस्य-भावना उन्हें स्वाभाविक प्रतीत होती थी, और इस दृष्टि से वे उन्हें शुद्ध स्वच्छंदतावाद के सबसे अधिक निकट जान पड़ते थे।

उनका मानना था कि पल्लव’ के भीतर ‘उच्छ्वास’, ‘आँसू’, ‘परिवर्तन’ और ‘बादल’ आदि रचनाएँ देखने से पता चलता है कि यदि ‘छायावाद’ के नाम से एक ‘वाद’ न चल गया होता तो पंत जी स्वच्छंदता के शुद्ध स्वाभाविक मार्ग (True romanticism) पर ही चलते। उन्हें प्रकृति की ओर सीधे आकर्षित करने वाला, उसके खुले और चिरंतन रूपों के बीच खुलने वाला हृदय प्राप्त था।”

‘पल्लव’ में जो गिनी चुनी (स्वप्न’ ‘मौन निमंत्रण’ आदि) रहस्यमूलक रचनाएँ संकलित थीं, उनके बारे में आचार्य शुक्ल ने कहा था कि “पंत जी की रहस्य-भावना स्वाभाविक है, साम्प्रदायिक (Dogmatic) नहीं। ऐसी रहस्य-भावना इस रहस्यमय जगत के नाना रूपों को देख प्रत्येक सहृदय व्यक्ति के मन में कभी-कभी उठा करती है। व्यक्त जगत के नाना रूपों और व्यापारों के भीतर किसी अज्ञात चेतन सत्ता का अनुभव-सा करता हुआ कवि इसे केवल अतृप्त जिज्ञासा के रूप में प्रकट करता है।”

यदि प्रकृति की ओर आकर्षित होने वाला, उसके खुले और चिरंतन रूपों के बीच खुलने वाला हृदय छायावादी हो सकता है तो इस काव्य-प्रवृत्ति का श्रेय श्रीधर पाठक को दिया जा सकता है और यदि असाम्प्रदायिक रहस्य-भावना की दृष्टि से देखा जाए तो रवीन्द्रनाथ की ‘गीतांजलि’ की पहली प्रतिध्वनि मुकुटधर पाण्डेय के काव्य में सुनाई पड़ती है। परंतु छायावाद न केवल प्रकृति-प्रेम है और न ही केवल रहस्य-भावना है। वह वस्तुत: एक विशेष सौंदर्य-दृष्टि का उन्मेष है। रहस्योन्मुखता, प्रकृति-प्रेम आदि उसी की अभिव्यक्ति की विविध सरणियाँ हैं। इस समग्र सौंदर्य-दृष्टि का आभास प्रसाद की आरंभिक रचनाओं में ही मिलने लगा था। ‘कामायनी’ उनकी आरंभिक रचना प्रम पथिक’ की ही सहज स्वाभाविक परिणति है।

निष्कर्ष यह है कि छायावाद का प्रवर्तन किस कवि की किस रचना से हुआ इसका एकदम ठीक-ठीक निर्णय करना कठिन है। वस्तुत: सुमित्रानंदन पंत ने छायावाद के आरंभ के विषय में जो कहा उसमें काफी सार है : “मेरे विचार से छायावाद की प्रेरणा छायावाद के प्रमुख कवियों को उस युग की चेतना से स्वतंत्र रूप से मिली है। ऐसा नहीं हुआ कि किसी एक कवि ने पहले उस धारा का प्रवर्तन किया हो और दूसरों ने उसका अनुगमन कर उसके विकास में सहयता दी हो।” यह बात इसलिए और भी सही है कि किन्हीं समानताओं के रहते भी छायावाद के कवियों में विविधता और भिन्नता भी कम नहीं है।

परिभाषा की समस्या

छायावादी काव्य को एक परिभाषा में बाँधना कठिन काम है। छायावाद व्यक्ति-केंद्रित काव्य था और उसमें प्रत्येक कवि के निजी वैशिष्ट्य और विलक्षणता पर विशेष बल दिया गया था। कठिनाई के बावजूद, छायावादी कवियों में प्राप्त सामान्य विशेषताओं को रेखांकित करना आवश्यक है, क्योंकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि बीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक के अंत से हिंदी कविता में महत्वपूर्ण परिवर्तन घटित हुआ। भले ही ‘छायावाद’ शब्द से उस घटना का पूरा-पूरा बोध न होता हो। यह भी हो सकता है कि हम इस शब्द के बिना ही काम चलाना चाहें, किंतु यह शब्द जिस परिवर्तन की ओर संकेत करता है, उसकी परिभाषा करने की जिम्मेदारी से बचना संभव नहीं है।

किसी समय ऐसी ही कठिनाई अंग्रेज़ी की रोमैंटिक काव्यधारा के बारे में सामने आई थी। ‘ऑक्सफोर्ड हिस्ट्री ऑफ इंगलिश लिट्रेचर’ में यह स्पष्ट कहा गया है कि अंग्रेज़ी के रोमांटिक कवियों के बीच सामान्य विशेषताओं का निर्देश करना असंभव है। फिर भी आलोचक इस युग की सामान्य प्रवृत्तियों का निरूपण करने के लिए बराबर प्रयत्नशील रहे हैं। इस प्रसंग में अंग्रेज़ी के रोमांटिक कवि ‘शैली’ का यह कथन ध्यान देने योग्य है –

“किसी विशेष काल-खंड के सभी लेखकों के बीच अनिवार्य रूप से एक समानता होती है जो उनकी अपनी इच्छाशक्ति पर निर्भर नहीं रहती। वे उस सामान्य प्रभाव से बच नहीं सकते जो उनकी सामाजिक परिस्थितियों के असंख्य सम्पुंजनों से उत्पन्न होता है। एक सीमा तक प्रत्येक कवि स्वयं भी उस प्रभाव का विधाता होता है जो उसकी सत्ता में परिव्याप्त रहता है।” कुछ-कुछ ऐसी ही बात हिंदी के छायावादी कवि समित्रानंदन पंत ने भी कही है कि : “चारों दिशाओं से स्वतंत्र रूप से नई काव्य-चेतना की धाराएँ बहकर छायावाद के युगचरितमानस में संचित हुई।”

देखा जाए तो छायावाद की परिभाषाएँ दो दृष्टियों से की गई हैं – व्युत्पत्तिपरक और प्रवृत्तिपरक ।

‘छायावाद’ की व्युत्पत्तिपरक व्याख्या का एक निश्चित इतिहास है। आरंभ में यह नाम ‘छायावाद’ की तथाकथित सीमाओं के वाचक के रूप में, उसकी खिल्ली उड़ाने के लिए दिया गया। बाद में उपहास को चुनौती के रूप में स्वीकार करते हुए, विद्वानों ने इसी शब्द की अत्यंत गंभीर व्युत्पत्तिपरक व्याख्या प्रस्तुत कर इसे छायावादी काव्य-प्रवृत्ति से जोड़ दिया। इस प्रकार आरंभ में जो शब्द उपहास करने के लिए प्रयोग में लाया गया था, वही उस काव्य-प्रवृत्ति के लक्षणों का बोध कराने लगा।

‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित कुछ कार्टूनों और लेखों में ‘छायावाद’ शब्द का प्रयोग इस काव्य की अस्पष्टता, धूमिलता आदि का बोध कराने के लिए किया गया। इसके बाद आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस शब्द का संबंध पुराने ईसाई संतों के छायाभास (Phantasmata) से जोड़कर इसे ऐतिहासिक व्युत्पत्ति का आधार दे दिया। उनका कहना था कि : “पुराने ईसाई संतों के छायाभास (Phantasmata) तथा यूरोपीय काव्य-क्षेत्र में प्रवर्तित आध्यात्मिक प्रतीकवाद (Symbolism) के अनुकरण पर रची जाने के कारण बंगाल में ऐसी कविताएँ ‘छायावाद’ कही जाने लगी थीं।”

शुक्ल जी ने छायावाद के साथ रहस्यवाद का संबंध एक बार जोड़ दिया तो इस पर परवर्ती विद्वानों ने अपना मतभेद व्यक्त किया। आइए, अब हम छायावाद और रहस्यवाद के संबंधों की चर्चा करें।

छायावाद और रहस्यवाद

शुक्ल जी ने एक ओर तो छायावाद को मध्ययुगीन रहस्य-भावना का नया संस्करण कहा : “कबीरदास किस प्रकार हमारे यहाँ ज्ञानवाद और सूफीवाद के भावात्मक रहस्यवाद को लेकर चले यह हम पहले दिखा आए हैं। उसी भावात्मक रहस्य-परंपरा का यह नूतन भाव-भंगी और लाक्षणिकता के साथ आविर्भाव है।” दूसरी ओर उन्होंने छायावाद को वेदांत के प्रतिबिम्बवाद का नया संस्करण माना : “जो ‘छायावाद’ नाम से प्रचलित है वह वेदांत के पुराने प्रतिबिम्बवाद’ का है।” वस्तुत : यह प्रतिबिम्बवाद’ सूफ़ियों के यहाँ से होता हुआ यूरोप में गया जहाँ कुछ दिनों पीछे ‘प्रतीकवाद’ से संश्लिष्ट होकर धीरे-धीरे बंग साहित्य के एक कोने में आ निकला और नवीनता की धारणा उत्पन्न करने के लिए ‘छायावाद’ कहा जाने लगा। इस तरह यह शब्द काव्य में ‘रहस्यवाद’ के लिए गृहीत दार्शनिक सिद्धांत का द्योतक शब्द है।

आचार्य शुक्ल अपने युग के प्रतिनिधि आलोचक थे। उनकी स्थापनाओं की उपेक्षा करना समकालीन कवियों के लिए संभव नहीं था। उनकी आशंसा को कविता के लिए प्रमाण-पत्र समझा जाता था और आलोचना को चुनौती। शुक्ल जी ने ‘छायावाद’ शब्द का संबंध वेदांत के प्रतिबिम्बवाद से जोड़कर उसे दार्शनिकता प्रदान की पर साथ ही रहस्योन्मुखता को इस काव्यधारा की निजी विशेषता न मानकर बाहरी प्रभाव कहा। उन्होंने छायावाद की पहली सुसम्बद्ध व्याख्या करते हुए ‘छायावाद’ शब्द का प्रयोग दो अर्थों में माना। उसका एक अर्थ उन्होंने रहस्यवाद लिया जिसका संबंध “काव्य-वस्तु से होता है अर्थात् जहाँ कवि उस अनंत और अज्ञात प्रियतम को आलम्बन बनाकर अत्यंत चित्रमयी भाषा में प्रेम की अनेक प्रकार से व्यंजना करता है।”

वस्तुत: छायावाद में ‘मिस्टिसिज़्म’ या रहस्यमयता ढूँढ़ने की प्रवृत्ति पहले से ही चली आ रही थी। पं. मुकुटधर पाण्डेय ने सन् 1920 में ‘श्री शारदा’ नामक पत्रिका में छायावाद पर एक लेखमाला प्रकाशित की थी उसमें वे बंगला साहित्य में प्रचलित रहस्यवादी रंग की रचनाओं और हिंदी के छायावादी काव्य के बीच तारतम्य निरूपित कर चुके थे। उन्होंने छायावाद में “धर्म-भावुकता और आध्यात्मिकता” की निद्वंद्व स्थापना आचार्य शुक्ल की अपेक्षा कहीं अधिक आग्रहपूर्वक पहले ही कर दी थी : “यहाँ छायावादिता से आत्मिकता तथा धर्म-भावुकता का मेल होता है। यथार्थ में उसके जीवन के ये दो मुख्य अवलम्ब हैं।

अतएव छायावाद के कवि इन दोनों क्षेत्रों की सीमा से बहुत कम बाहर निकल सके हैं। वे प्राय: ‘अजोनित्य:शाश्वतोऽयं पुराणों’ तथा वृहच्यतछिव्यमचिन्त्यरूपम’ के गूढातिगूढ़ रहस्य में ही मान रहते हैं।” तथा “हिंदी में ‘आध्यात्मिक साहित्य’ का एकदम अभाव न होने पर भी वह कदाचित् पर्याप्त नहीं। छायावाद से उसकी अभिवृद्धि अवश्यम्भावी है।” उनके अनुसार छायावादी कविता “मन-बुद्धि से परे एक अज्ञात प्रदेश में ले जाती है।’ इसके अलावा भी मुकुटधर पाण्डेय ने स्थान-स्थान पर छायावाद की विलक्षण अभिव्यंजना, भाषा के असामान्य प्रयोग, अस्पष्टता आदि गुणों का संकेत दिया है।

छायावाद में रहस्यवादी तत्वों की व्याख्या-पुनर्व्याख्या का यह क्रम जयशंकर प्रसाद के चिंतन में आगे बढ़ा। उन्होंने भी छायावाद की विचार-पद्धति को रहस्यवाद ही माना पर उसकी व्याख्या शक्ति के रहस्यवाद के रूप में कर दी। शुक्ल जी जिसे मध्ययुगीन संतों के साम्प्रदायिक रहस्यवाद का आधुनिक संस्करण मानते थे, प्रसाद ने उसे सौंदर्य लहरी’ में वर्णित शक्ति के रहस्यवाद से जोड़ दिया : “विश्वसंदरी प्रकृति में चेतनता का आरोप संस्कृत वाड्.मय में प्रचुरता से उपलब्ध होता है। यह प्रकृति अथवा शक्ति का रहस्यवाद सौंदर्य-लहरी के ‘शरीरं त्वं शम्भो’ का अनुकरण मात्र है। वर्तमान हिंदी में इस अद्वैत रहस्यवाद की सौंदयर्मयी व्यंजना होने लगी है, वह साहित्य में रहस्यवाद का स्वाभाविक विकास है। इसमें अपरोक्ष अनुभूति, समरसता तथा प्राकृतिक सौंदर्य के द्वारा ‘अहं’ का ‘इदम्’ से समन्वय करने का सुंदर प्रयत्न है।” ध्यान से देखने पर स्पष्ट हो जाएगा कि यह व्याख्या प्रसाद की अपनी रचनाओं के दर्शन की व्याख्या है जिसके प्रति उन्हें आरंभ से ही विशेष मोह था।

छायावाद में आध्यात्मिकता खोजने का यह क्रम एक बार आरंभ हुआ तो कुछ दूर तक चला। आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी छायावाद में रहस्यवाद का प्रयोग व्यापक अर्थ में स्वीकार करते थे। उन्होंने स्पष्ट किया कि अंग्रेज़ी की रोमैंटिक कविता में रहस्यवादी प्रवृत्ति को अत्यंत उदार अर्थ और व्यापक रूप में देखा जाता था। उन कवियों के लिए सत्य और सौंदर्य अभिन्न हो गए थे। इसलिए वहाँ प्रकृति-प्रेम, उसमें आध्यात्मिक सत्ता के भान आदि को रहस्य-वृत्ति के अंतर्गत ही मान लिया गया था। यह रहस्य-वृत्ति साम्प्रदायिक या धार्मिक नहीं थी : “उसकी मुख्य प्रेरणा धार्मिक न होकर मानवीय और सांस्कृतिक है। भारतीय परंपरागत आध्यात्मिक दर्शन की नव प्रतिष्ठा का वर्तमान अनिश्चित परिस्थितियों में यह एक सक्रिय प्रयत्न है। आधुनिक परिवर्तनशील समाज-व्यवस्था और विचार-जगत में छायावाद भारतीय । आध्यात्मिकता की, नवीन परिस्थिति के अनुरूप स्थापना करता है।” वाजपेयी जी का मानना था कि छायावाद “किसी साम्प्रदायिकता या साधना परिपाटी का अनुगमन नहीं करता।” छायावाद की आध्यात्मिकता की विशिष्टता यही है कि वह न किन्हीं सीमा-निर्देशों से बँधती है और न ही भावना के क्षेत्र में किसी प्रकार का प्रतिबंध स्वीकार करती है।

शुक्ल जी ने छायावाद में साम्प्रदायिक रहस्यवाद की बात कहकर बाद के आलोचकों को इस शब्द-मात्र के प्रति इतना आशंकित कर दिया कि वे छायावाद में प्राकृतिक रहस्य-भावना को स्वीकार करके भी रहस्यवाद से उसका भेद निरूपित करते रहे। रहस्यानुभूति आध्यात्मिक होते हुए भी लौकिक हो सकती है। छायावाद रहस्योन्मुख होते हुए भी इसी धरातल की आध्यात्मिक अनुभूति है, यह न कहकर, छायावाद और रहस्यवाद के बीच भेद करके चलने की प्रवृत्ति ही अधिक लोकप्रिय हुई। इस प्रसंग में प्रसाद की आलोचना करते हुए नन्ददुलारे वाजपेयी ने लिखा: “प्रसाद जी ने व्यष्टि सौंदर्य-दृष्टि (छायावाद) और समष्टि सौंदर्य दृष्टि (रहस्यवाद) में कोई स्पष्ट अंतर नहीं किया। किंतु मैं इस अंतर का विशेष रूप से आग्रह करता हूँ क्योंकि इसने दो विशेष पृथक-पृथक काव्यशैलियों की सष्टि की है। व्यष्टि सौंदर्य-बोध एक सार्वजनीन अनुभति है, यह सहज ही हृदयस्पर्शी है, यह सक्रिय और स्वावलम्बिनी काव्य-चेतना की जन्मदात्री है। इसे मैं प्राकृतिक अध्यात्म कह सकता हूँ। समष्टि सौंदर्य-बोध उच्चतर अनुभूति है फिर भी यह प्रत्येक क्षण रूढ़ होने की संभावना रखती है। इसमें इंद्रियानुभूति की सहज प्रगति या विकास के लिए स्थान नहीं है। यह कदम-कदम पर धर्म के कटघरे में बंद होने की अभिरुचि रखती है।”

छायावाद के मर्मी आलोचक शांतिप्रिय द्विवेदी ने भी दोनों में अंतर किया – “छायावाद में यदि एक जीवन के साथ दूसरे जीवन की अभिव्यक्ति है अथवा आत्मा का आत्मा के साथ सन्निवेश है तो रहस्यवाद में आत्मा का परमात्मा के साथ । एक में लौकिक अभिव्यक्ति है, तो दूसरे में अलौकिक ।”

बाद के आलोचकों को रहस्यवाद शब्द के निषेध की आवश्यकता ही इसलिए प्रतीत हुई क्योंकि शुक्ल जी ने उसे धर्म-संवलित मध्ययुगीन अर्थ में प्रयुक्त किया था। शांतिप्रिय द्विवेदी ने ‘रहस्यवाद’ शब्द को संशोधन के साथ स्वीकार किया, “वर्तमान युग में भावना द्वारा जिस रहस्यवाद की सष्टि हो रही है, वह भी एक निगूढ निर्विकार, परम चेतन की ओर लक्ष्य तो रखती है, किंतु वह धर्ममूलक नहीं, कला (सौंदर्य) मूलक है।” कवि को वे इस रहस्यवाद की अनुभूति “भावना के द्वारा” मानते हैं।

महादेवी वर्मा इस रहस्यानुभूति की व्याख्या कवित्वमय शैली में सन् 1936 में पहले ही कर चुकी थीं : “जब प्रकृति की अनेकरूपता में, परिवर्तनशील विभिन्नताओं में कवि ने ऐसे तारतम्य को खोजने का प्रयास किया जिसका एक छोर असीम चेतन और दूसरा उसके असीम हृदय में समाया हुआ था तब प्रकृति का एक अंश एक अलौकिक व्यक्तित्व को लेकर जाग उठा। इसी से इस अनेकरूपता के कारण पर एक मधुरतम व्यक्तित्व का आरोपण कर उसके निकट आत्मनिवेदन कर देना इस काव्य का दूसरा सोपान बना जिसे रहस्यमय रूप के कारण ही रहस्यवाद नाम दिया गया।”

छायावाद की गीत-सष्टि में बसे ‘नए रहस्यवाद’ को महादेवी ने अपने ढंग से समझाया : “उसने परा विद्या से अपार्थिवता ली, वेदांत के अद्वैत की छाया मात्र ग्रहण की, लौकिक प्रेम से तीव्रता उधार ली और इन सबको कबीर के सांकेतिक दाम्पत्य भाव-सूत्र में बाँधकर एक निराले स्नेह संबंध की सृष्टि कर डाली जो मनुष्य के हृदय को आलम्बन दे सका, पार्थिव प्रेम के ऊपर उठा सका तथा मस्तिष्क को हृदयमय और हृदय को मस्तिष्क बना सका।” महादेवी की इस व्याख्या को अधिक से अधिक उनकी कविताओं पर लागू किया जा सकता है। इसके अलावा उनके गीतों की ‘अपार्थिवता’ और ‘अलौकिकता’ भी बराबर प्रश्नों के घेरे में रही है। इसीलिए परवर्ती आलोचकों में इस रहस्यवादिता पर सदा संदेह बना रहा।

अज्ञेय ने छायावाद की इस प्रवृत्ति को “भावों को अध्यात्मिकता के आवरण में व्यक्त करने की प्रेरणा’ कहा और डॉ. नगेन्द्र ने कहा कि “छायावाद की रहस्योक्तियाँ एक प्रकार की जिज्ञासाएँ हैं, जो छायावाद के उत्तरार्ध में आध्यात्मिक दर्शन के द्वारा और भी पुष्ट हो गई हैं। परंतु वे धार्मिक साधना पर आश्रित नहीं हैं। उनका आधार कहीं भावना, कहीं दर्शन-चिंतन और आरंभ में कहीं-कहीं मन की छलना भी है।”

सुमित्रानंदन पंत ने तो रहस्यवाद के प्रश्न मात्र को छायावाद के संदर्भ में अनुचित माना – “मेरे विचार में उस युग की पुष्कल बहुमुखी काव्य-सृष्टि को सामने रखते हुए छायावाद पर रहस्यवादी दृष्टि से विचार करना मात्र अतिरंजना है और युग की मुख्य काव्य-प्रवृत्ति पर एक गलत मानदंड का प्रयोग करना है। मध्ययुगीन संतों की तरह छायावादी कवि आत्म-ब्रह्म और आत्म-परिष्कार की खोज में न जाकर विश्वात्मा तथा विश्व-जीवन की खोज की ओर अग्रसर हुए।”

यह सही है कि छायावाद बहुमुखी काव्य-सृष्टि है और उसका केंद्रीय भाव रहस्यवाद नहीं है। परंतु रहस्योन्मुखी वृत्ति छायावाद की विशेषताओं में से एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता।

जब हम छायावाद की व्युत्पत्तिपरक व्याख्याओं की बात करते हैं तो देखते हैं कि जयशंकर प्रसाद द्वारा की गई व्याख्या सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण है। उन्होंने यह व्याख्या करते हुए विशेष रूप से प्राचीन परंपरा से उसका संबंध जोड़ने का प्रयास किया।

जयशंकर प्रसाद ने यह सिद्ध किया कि ‘छाया’ शब्द का प्रयोग अभिव्यंजना की विशिष्ट भंगिमा और अर्थ-गरिमा के लिए वक्रोक्ति, ध्वनि और सिद्धांतों में पहले भी होता रहा है। समकालीन काव्य के लिए इस शब्द का प्रयोग परंपरा का पुनराविष्कार मात्र है। प्रसाद जी ने व्युत्पत्यर्थ से संगति बैठाकर छायावादी काव्य-प्रवृत्ति के लिए इस शब्द के प्रयोग का औचित्य बताते हुए उसे परंपरा से जोड़कर शास्त्रसम्मत होने का गौरव प्रदान किया। इसके अलावा उन्होंने इस शब्द को काव्यशास्त्रीय अवधारणाओं से जोड़ दिया जो उनकी समझ में अधिक प्रासंगिक था।

प्रसाद जी के अनुसार प्राचीन काव्यशास्त्र में ‘छाया’ शब्द का प्रयोग अनुभूति और अभिव्यक्ति की विशेष गरिमा के लिए किया गया था। कंतक ने उसे ‘वक्रता की उद्भासिनी’ कहा और “ध्वनिकार ने इसका प्रयोग ध्वनि के भीतर सुंदरता से किया।’ यह आंतर अर्थ-वैचित्र्य काव्य में उसी प्रकार वर्तमान रहता है जिस प्रकार मोती के भीतर आब या पानी। प्रसाद जी मोती के बीच इस लावण्य को ‘छाया की जैसी तरलता’ कहते हैं।

हिंदी में जब “बाह्य उपाधि से हटकर अंतर हेतु की ओर कवि-कर्म प्रेरित हुआ” तो उसने अभिव्यंजना की नई भंगिमाओं की अपेक्षा की। इस संबंध में प्रसाद जी का निष्कर्ष है : “छाया भारतीय दृष्टि से अनुभूति और अभिव्यक्ति की भंगिमा पर अधिक निर्भर करती है। ध्वन्यात्मकता, लाक्षणिकता, सौंदर्यमय प्रतीक-विधान तथा उपचार-वक्रता के साथ स्वानुभूति की विवृति छायावाद की विशेषताएँ हैं। अपने भीतर से मोती के पानी की तरह आंतर-स्पर्श करके भव-समर्पण करने वाली अभिव्यक्ति छाया कांतिमयी होती है।” कहने का अर्थ यह है कि वह काव्य जो केवल बाह्य सौंदर्य का वर्णन कर करके एक विशेष भंगिमा और वक्रता से आंतर सौंदर्य का उद्घाटन करे वही आंतरस्पर्शी रम्यच्छाया का अभिव्यंजक काव्य छायावाद

स्थूल के विरुद्ध सूक्ष्म का विद्रोह

छायावाद की विषय-वस्त, विचार-सरणी अथवा अभिव्यंजना शैली की एक या अधिक प्रवत्तियों को लक्ष्य करके जो अन्य परिभाषाएँ प्रस्तावित की गई उनमें एक महत्वपूर्ण और सबसे अधिक प्रचलित परिभाषा में उसे स्थूल के विरुद्ध सूक्ष्म का विद्रोह कहा गया। इस परिभाषा को सूत्रबद्ध कर प्रचलित करने का श्रेय डा. नगेन्द्र को दिया जाता है। ‘सुमित्रानंदन पंत’ शीर्षक से सन् 1939 में लिखी गई अपनी पहली आलोचनात्मक पुस्तक में ही उन्होंने कहा था : “स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह ही छायावाद का आधार है। स्थूल शब्द बड़ा व्यापक है इसकी परिधि में सभी प्रकार के बाह्य रूप-रंग, रूढ़ि आदि सन्निहित हैं और इसके प्रति विद्रोह का अर्थ है उपयोगितावाद के प्रति भावूकता का विद्रोह, नैतिक रूढ़ियों के प्रति मानसिक स्वातंत्र्य का विद्रोह और काव्य में बंधनों के प्रति स्वच्छंद कल्पना का विद्रोह।”

बाद में ‘आधुनिक हिंदी काव्य की प्रवृत्तियाँ’ (1951) में संकलित निबंध ‘छायावाद’ में इस परिभाषा को उन्होंने संशोधित कर दिया : “जिन परिस्थितियों ने हमारे दर्शन और कर्म को अहिंसा की ओर प्रेरित किया उन्हीं ने भाव (सौंदर्य) वृत्ति को छायावाद की ओर। उसके मूल में स्थूल से विमुख होकर सूक्ष्म के प्रति आग्रह था।” इस वक्तव्य में ‘विद्रोह’, ‘आग्रह’ हो गया जिसे गांधीवादी अहिंसा का प्रभाव समझा जा सकता है।

द्विवेदी युग की कविता को स्थूल-रूप का काव्य कहकर, उसके विरुद्ध छायावाद को सूक्ष्म चेतना के काव्य के रूप में प्रस्तावित कर दर्शन की दृष्टि से उसे गांधीवाद से जोड़ने का प्रयत्न शांतिप्रिय द्विवेदी ने भी किया : “छायावाद का अभ्युदय-काल सन् 30 के राष्ट्रीय आंदोलन का समय है। ऐसे समय नवीन हिंदी-कविता (छायावाद) में राष्ट्रीय भावों के बजाय अदृश्य सूक्ष्म भावनाओं का दर्शन मिलना विरोधाभास-सा लगता है। किंतु छायावाद में जो एक पुरातन दार्शनिकता है वह सन् 20 के राष्ट्रीय आंदोलन के पार्थिव प्रयत्नों में भी एक भक्तिकालीन दार्शनिक चेतना थी – गांधीवाद के रूप में। ऐसे समय में जबकि गांधीवाद की भाँति छायावाद भी एक सूक्ष्म चेतना लेकर चला था, द्विवेदी-युग का साहित्य । वस्तुजगत को लेकर ही प्रकट हुआ था, फलत: राष्ट्रीय आंदोलन के स्थूल रूप का रेखांकन उसके लिए स्वाभाविक था।”

स्थूल की प्रतिक्रिया की बात छायावाद के आलोचक ही नहीं कवि भी कर चुके थे। महादेवी वर्मा अपने छायावाद-संबंधी लेख में विस्तार से अपना मत प्रस्तुत कर चुकी थीं : “स्थूल सौंदर्य की निर्जीव आवृत्तियों से थके हुए और कविता की परंपरागत नियम-शृंखलाओं से ऊबे हुए व्यक्तियों को फिर उन्हीं रेखाओं में बंधे स्थूल का न तो यथार्थ चित्रण रुचिकर हुआ और न उसका रूढ़िगत आदर्श भाया। उन्हें नवीन-नवीन रेखाओं में सूक्ष्म सौंदर्यानुभूति की आवश्यकता थी, जो छायावाद में पूर्ण हुई।” महादेवी इस संबंध में सावधान रहीं कि सूक्ष्म का अर्थ यथार्थ-विरोधी या अवास्तविक न लगा लिया जाए। अत: जब “सूक्ष्म के संबंध का कोलाहल सूक्ष्म से भी परिमाण में अधिक हो गया” तो उन्हें स्थूल के विषय में अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट करने की आवश्यकता प्रतीत हुई – “छायावाद की सौंदर्य सृष्टि स्थूल के आधार पर नहीं है, यह कहना स्थूल की परिभाषा को संकीर्ण कर देना है।

उसने जीवन के इतिवृत्तात्मक यथार्थ चित्र नहीं दिए, क्योंकि वह स्थूल से उत्पन्न सूक्ष्म सौंदर्य-सत्ता की प्रतिक्रिया थी। अप्रत्यक्ष सूक्ष्म के प्रति उपेक्षित यथार्थ की नहीं, जो आज की वस्तु है।” महादेवी को इस स्पष्टीकरण की आवश्यकता इसलिए महसूस हुई क्योंकि उनकी परिभाषा में प्रयुक्त स्थूल’ और ‘सूक्ष्म’ शब्द न केवल व्याख्या-सापेक्ष हैं और इनकी एक से अधिक व्याख्याएँ संभव हैं बल्कि ये प्राय: परस्पर-विरोधी रूप में ग्रहण किए जाते हैं जबकि महादेवी के अनुसार स्थूल और सूक्ष्म परस्पर पूरक हैं, इसलिए “जीवन की समष्टि में सूक्ष्म से इतना भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वह तो स्थूल से बाहर कहीं अस्तित्व ही नहीं रखता।

अपने व्यक्त सत्य के साथ मनुष्य जो है और अपने अव्यक्त सत्य के साथ वह जो कुछ होने की भावना कर सकता है, वही उसका स्थूल और सूक्ष्म है और यदि इनका ठीक संतुलन हो सके तो हमें एक परिपूर्ण मानव ही मिलेगा। उनके अनुसार स्थूल यथार्थ है और सूक्ष्म आदर्श । महादेवी ने स्थूल की तुलना में सूक्ष्म के आग्रह से बात आरंभ की और अंतत: दोनों के बीच विवेकसम्मत संतुलन पर खत्म की।

छायावाद की इस परिभाषा को भी निर्विवाद स्वीकृति नहीं मिली। दरअसल जब छायावाद को स्थूल के प्रति विद्रोह कहा गया तो स्वभावत: स्थूल शब्द से प्राय: वास्तविकता, यथार्थ या मांसलता का अर्थ ग्रहण किया। गया। इसीलिए प्रगतिवाद के मूर्धन्य आलोचक डा. रामविलास शर्मा ने एक ओर निराला की प्रसिद्ध कविता ‘नयनों के डोरे लाल गुलाल भरे खेली होली’ की मांसलता को सूक्ष्मता के विरुद्ध प्रस्तुत किया और दूसरी ओर कहा कि : “छायावाद स्थूल के प्रति सक्ष्म का विद्रोह नहीं रहा वरन थोथी नैतिकता, रूढ़िवाद और सामंती साम्राज्यवादी बंधनों के प्रति विद्रोह रहा है।” अर्थात् वे छायावाद को अमांसल, अतींद्रिय, अवास्तविक और यथार्थ-विरोधी काव्य न मानकर सामंती मूल्यों के विरुद्ध विद्रोह का, स्वातंत्र्य का काव्य मानते थे।

सुमित्रानंदन पंत ने इस परिभाषा में तथ्य के एक अंश को निहित स्वीकार करके भी छायावाद को अधिक से अधिक स्थूल का सूक्ष्म में रूपांतर माना – “पर इससे भी छायावाद के अर्थ का पूर्णत: समाधान नहीं होता । वास्तव में छायावाद स्थूल के प्रति विद्रोह न कर न उसका संस्कार या रूपांतर ही कर नए मूल्य की प्रतिष्ठा करने का प्रयत्न करता है।” पंत जी के अनुसार छायावाद की मूल दृष्टि विद्रोही न होकर स्थापनधर्मी थी और इस प्रकार उसमें केवल निषेध न होकर विधान भी था। वह कोरी प्रतिक्रिया नहीं, स्वत:स्फूर्त क्रिया थी : “इस प्रकार स्थूल के प्रति सूक्ष्म के विद्रोह से अधिक आग्रह छायावाद में नवीन जीवन-सौंदर्य के मूल्य तथा भाव-सम्पद की स्थापना के ही प्रति रहा है, वैसे भी पिछली और नई वास्तविकता के लिए स्थूल और सूक्ष्म का उपयोग अर्थ-व्यंजकता की दृष्टि से संगत नहीं प्रतीत होता।”

इन परिभाषाओं एवं व्याख्याओं के अतिरिक्त छायावाद को शैली की एक पद्धति के रूप में परिभाषित करने का प्रयास भी लगभग छायावाद के आरंभ के साथ ही किया जाने लगा था। इसका पहला आभास सुकवि किंकर महावीरप्रसाद द्विवेदी के ‘आजकल के हिंदी कवि और कविता’ शीर्षक निबंध में मिलता है (‘सरस्वती’ मई, 1927)। छायावाद की कविताओं में उन्हें मिस्टिसिज्म अर्थात् “आध्यात्मिक रहस्य नहीं दिखाई पड़ा।” उन्होंने छायावाद के बारे में कहा : “छायावाद से लोगों का क्या मतलब है कुछ समझ में नहीं आता। शायद उनका मतलब है कि किसी कविता के भावों की छाया यदि कहीं अन्यत्र जाकर पड़े तो उसे छायावादी कहना चाहिए।’ इस प्रकार उन्होंने ‘अन्योक्ति पद्धति’ को ही छायावाद स्वीकार किया।

शुक्ल जी भी उनकी इस मान्यता से अप्रभावित न रह सके। छायावाद को उन्होंने भी एक विशेष काव्य-शैली मानते हुए एक तरफ़ तो “प्रतीक पद्धति या चित्रभाषा शैली” स्वीकार किया, दूसरी ओर आचार्य महावीरप्रसाद के स्वर में स्वर मिलाकर कहा – अत: अन्योक्ति-पद्धति का आलम्बन भी छायावाद का एक विशेष लक्षण सिद्ध हुआ।” शुक्ल जी के विचार में इस काव्य का “प्रधान लक्ष्य काव्य-शैली की ओर था, वस्तुविधान की ओर नहीं।” वस्तुत: विषयवस्तु के धरातल पर ‘रहस्यवाद’ से संबंध न रखने वाली कविताएँ भी छायावाद ही कही जाने लगी थीं। क्योंकि “छायावाद शब्द का प्रयोग रहस्यवाद तक ही न रहकर काव्य-शैली के संबंध में भी प्रतीकवाद (Symbolism) के अर्थ में होने लगा।” अर्थात् छायावाद का अनिवार्य लक्षण रहस्यवाद न रहकर प्रतीकवाद ही हुआ : “छायावाद का सामान्य अर्थ हुआ प्रस्तुत के स्थान पर उसकी व्यंजना करने वाली छाया के रूप में अप्रस्तुत का कथन ।’

सुमित्रानंदन पंत ने छायावाद की अन्य प्रचलित परिभाषाओं पर जहाँ विस्तार से विचार किया, वहाँ इस परिभाषा को सिर्फ इतना कहकर चलता कर दिया कि “छायावादी को लाक्षणिक प्रयोगों अमूर्त उपमानों या अप्रस्तुत विधानों की मात्र चित्र-भाषामयी शैली मानना भी केवल उसके बाह्य कलेवर पर दृष्टिपात करना अथवा उसकी कलाबोध की प्रक्रिया के बारे में निर्णय देकर ही संतोष कर लेना है।”

वस्तुत: छायावाद की ये प्रचलित परिभाषाएँ यथासंभव एक-न-एक पक्ष पर बल देते हुए भी समग्र छायावादी काव्य को घेरने में असमर्थ हैं। इससे प्रमाणित होता है कि छायावाद प्रस्तुत परिभाषाओं से कहीं अधिक व्यापक काव्य-प्रवृत्ति है। ऐसी स्थिति में आवश्यकता इन परिभाषाओं में एक परिभाषा और जोड़ने की नहीं, बल्कि छायावादी काव्य की विशेषताओं एव प्रवृत्तियों को पहचानने की है। यह केवल संयोग नहीं है कि छायावाद की उपलब्ध परिभाषाओं का विश्लेषण और आलोचना करने के बावजूद स्वयं सुमित्रानंदन पंत ने उसकी कोई सूत्रबद्ध परिभाषा प्रस्तावित नहीं की।

इस इकाई में अब तक हमने छायावाद के इतिहास, प्रवर्तन और परिभाषा के संबंध में जो जानकारी आपको दी, आइए संक्षेप में उसकी चर्चा करें।

  1. बीसवीं शताब्दी के आरंभ में हिंदी में जिस नवीन काव्य-प्रवृत्ति का उदय हुआ, उसे स्वच्छंद काव्यधारा कहा गया। इस प्रवृत्ति का पहला आभास श्रीधर पाठक की कविता में दिखाई पड़ा।
  2. छायावाद इसी स्वच्छंदतावादी (रोमैंटिक) काव्यधारा का उत्तर-विकास है। आचार्य शुक्ल ने यद्यपि अनेक तर्कों के आधार पर स्वच्छंदतावाद से उसे अलग माना और छायावाद के प्रमुख कवियों की गणना स्वच्छंदतावादियों में नहीं की, पर क्रमश: छायावाद को हिंदी की अपनी रोमैंटिक काव्यधारा, स्वच्छंदतावाद का ही विकास माना जाने लगा।
  3. छायावाद के आरंभ की ही तरह प्रवर्तन के विषय में भी विद्वानों में विवाद रहा। छायावाद का आरंभ किसी विशेष कवि की विशेष रचना से हुआ, यह तय करना कठिन है। इस कठिनाई का अनुभव करते हुए अंतत : यह स्वीकार किया गया कि छायावाद की प्रेरणा प्रमुख छायावादी कवियों को उस युग की चेतना से स्वतंत्र रूप में मिली। ऐसा नहीं हआ कि किसी एक कवि ने पहल की और बाकी ने उसका अनुसरण । यही छायावाद के कवियों की कविता में वैविध्य का कारण है।
  4. समय-समय पर छायावाद को परिभाषित करने का प्रयत्न छायावाद के कवियों और आलोचकों ने किया। ये परिभाषाएँ दो दृष्टियों से की गई : व्युत्पत्तिपरक और प्रवृत्तिपरक । इन परिभाषाओं और व्याख्याओं में सबसे अधिक विवाद छायावाद में रहस्यवाद की स्थिति और स्वरूप को लेकर हुआ। स्वयं छायावाद के कवि पंत ने इस विवाद का लगभग निर्णायक अंत करते हुए कहा कि रहस्योन्मुखता छायावाद की महत्वपूर्ण विशेषता है पर उसका केंद्रीय भाव रहस्यवाद नहीं है।
  5. छायवाद की दूसरी सबसे अधिक प्रचलित परिभाषा में उसे स्थूल के विरुद्ध सूक्ष्म का विद्रोह कहा गया। इस परिभाषा को सूत्रबद्ध डा.नगेन्द्र ने किया किंतु इसका संकेत महादेवी वर्मा पहले कर चुकी थीं।
  6. छायावाद को शैली की एक पद्धति मात्र मानने का पहला प्रस्ताव महावीरप्रसाद द्विवेदी ने किया बाद में आचार्य शुक्ल ने भी परिभाषा का विस्तार किया। उन्होंने ‘प्रतीक पद्धति या चित्रभाषा शैली’ को ही छायावाद की विशेषता स्वीकार करते हुए अंतत: प्रतीकवाद को उसका अनिवार्य लक्षण मान लिया।
  7. इन सभी परिभाषाओं में छायावाद की किसी विशेषता को आधार बनाकर उसे परिभाषा के रूप में सूत्रबद्ध करने का प्रयास किया गया पर इनमें कोई परिभाषा सर्वांग निरूपण करने में सफल नहीं हो सकी।

छायावाद की मूल प्रवृत्तियाँ

लम्बे विचार-विमर्श के बाद आपको यह स्पष्ट हो गया होगा किं छायावाद न रहस्यवाद है, न केवल शैली और न ही केवल स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह या आग्रह । इन सब परिभाषाओं में उसकी एक प्रमुख विशेषता की ओर संकेत तो मिलता है पर उसकी समग्रता परिभाषित नहीं होती। छायावाद इनमें संकेतित हर विशेषता से कुछ अधिक है। एक अरसे से शुक्लोत्तर आलोचक इस ‘कुछ’ को पारिभाषित करने का प्रयास करते आ रहे हैं। हिंदी साहित्य : बीसवीं शताब्दी’ में पं. नंददुलारे वाजपेयी ने कहा – “इस छायावाद को हम पंडित रामचंद्र शुक्ल के कथनानुसार केवल अभिव्यक्ति की एक लाक्षणिक प्रणाली-विशेष नहीं मान सकेंगे। इसमें एक नूतने सांस्कृतिक भावना का उद्गम है और एक स्वतंत्र दर्शन की नियोजना है।”

वाजपेयी जी के इस कथन से छायावाद को “अभिव्यक्ति की एक लाक्षणिक प्रणाली” मात्र नहीं माना जा सकता यह तो स्पष्ट होता है, किंतु यह स्पष्ट नहीं होता कि ‘नूतन सांस्कृतिक भावना’ और ‘स्वतंत्र दर्शन की नियोजना’ से उनका क्या अभिप्राय है। ये शब्द भी छायावाद की केंद्रीय चेतना को स्पष्ट करने में असमर्थ है। डॉ.देवराज ने भी शुक्ल जी की आलोचना करते हुए यह तो कहा कि वे यह नहीं देख सके कि छायावाद “आधुनिक मनोवृत्ति का प्रतीक है।” पर ‘आधुनिक मनोवृत्ति’ की स्पष्ट व्याख्या उन्होंने भी नहीं की।

इस विचार-क्रम को आगे बढ़ाने का दायित्व सुमित्रानंदन पंत ने ही उठाया। ‘छायावाद : पुनर्मूल्याकंन’ में उन्होंने बार-बार इस बात पर बल दिया कि छायावाद मूल्य केंद्रिक’ काव्य है : “छायावाद केवल अभिव्यंजनात्मक ही नहीं नवीन मूल्यपरक काव्य है।” उन्होंने यथाशक्ति अपने ढंग से उन मूल्यों का निर्देश भी किया, किंतु छायावाद के केंद्रीय मूल्य का निर्धारण वहाँ भी न हो सका। दरअसल मूल्य-केंद्रिकता छायावाद की अनेक विशेषताओं में से एक है और उसकी स्थिति केंद्रीय है। आइए अब हम छायावाद की मूल प्रवृत्तियों की चर्चा करते हैं।

मूल्यकेंद्रिकता

इस विषय पर सबसे पहले छायावाद के प्रथम आलोचक और स्वंय स्वच्छंदतावादी कवि मुकुटधर पाण्डेय के ‘कवि-स्वातंत्र्य’ शीर्षक निबंध में विचार किया गया। इस निबंध के शीर्षक से संकेत ग्रहण करके कहा जा सकता है कि छायावाद का केंद्रीय मूल्य स्वातंत्र्य’ ही है। इसी से छायावादी काव्य के जीवन और कविता संबंधी सभी मूल्य निस्सृत होते हैं। इस विषय की पुष्टि तत्कालीन राष्ट्रीय संदर्भ से भी होती है। कवि सुमित्रानंद पंत ने भी ‘छायावाद : पुनर्मूल्यांकन’ में मध्ययुगीन धार्मिक मुक्ति-साधना से आधुनिक मुक्ति-भावना को अलगाते हुए लिखा – “छायावादी कवियों के सामने आत्ममुक्ति की धारणा तुच्छ होकर, भाव-मुक्ति तथा लोक-मुक्ति की संभावना अनेक मूल्यों, विचारों तथा भावनाओं में रूप धर कर, उनकी वाणी द्वारा स्वप्न-मूर्त होने का प्रयत्न कर रही थी।” इस प्रकार छायावादी काव्य अपने ऐतिहासिक संदर्भ और राष्ट्रीय परिवेश के अनुरूप बहुमुखी स्वातंत्र्य अथवा मुक्ति की आकांक्षा की अभिव्यक्ति था।

निराला का प्रसिद्ध गीत ‘वीणावादिनी वर दे’ का प्रिय स्वतंत्र रव’ और ‘बादल राग’ शीर्षक कविता-शंखला में विप्लवी निबंध बादल’ का प्रतीक इसी मुक्ति-कामना के उदाहरण हैं। पंत की कविताओं में भी यह । मुक्ति-कामना अनेक रूपों में अभिव्यक्त हुई है। उनकी प्रसिद्ध कविता : “खुल गए छंद के बंध प्रास के रजत पाश” छंद-शास्त्र से मुक्ति का घोषणा है और “झरें जाति-कुल वर्ण-पर्ण धन। अंध नीड़ से रूढ़-रति छन” – सामाजिक रूढ़ियों से ।

पंत के ‘पल्लव’ की भूमिका में इसी मुक्ति-चेतना या स्वातंत्र्य की मूल्य के रूप में प्रतिष्ठा की गई है। उन्होंने काव्य-रचना की रूढ़िगत परिपाटियों का बहिष्कार कर कवि के द्वारा अभिव्यक्ति की युक्तियों के स्वतंत्र चयन के अधिकार की वकालत की है। ‘पल्लव’ की इस भूमिका को स्वच्छंदतावादी काव्य-दृष्टि के प्रथम घोषणा-पत्र का दर्जा दिया गया है।

वैयक्तिकता

छायावाद को उसके आलोचकों ने व्यक्तिवाद की कविता भी कहा है किंतु इन कवियों का व्यक्तिवाद, व्यक्तिकेंद्रित नहीं है, अपितु वह व्यक्ति की मानसिक और सामाजिक स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति है। पंत जी के शब्दों में – “छायावादी काव्य व्यक्तिनिष्ठ न होकर मूल्यनिष्ठ रहा है, उसमें व्यक्ति, मूल्य का प्रतिनिधि रहा है।” क्योंकि “बोध की दृष्टि से छायावादी कवि का व्यक्ति नए मूल्य का प्रतीक, नए मूल्य का अंश । था। छायावादी कवि की वैयक्तिकता की सही समझ इस नए मूल्य-बोध के संदर्भ में ही संभव है। इस कवि का व्यक्ति जिस नए मूल्य का प्रतीक था उसमें मध्ययुगीन सामंती रूढ़ियों से मुक्त होकर स्वतंत्र-चेता व्यक्तित्व के विकास का प्रयास निहित था। संयुक्त परिवार, जाति और धर्म की नींव पर मध्ययुगीन समाज की जो व्यवस्था इस व्यक्ति ने विरासत में पाई थी, वह उसके संवेदनशील मन को अवरोधक प्रतीत हो रही थी। ऐसे वातावरण में अपनी वैयक्तिकता की माँग स्वतंत्रता का ही एक रूप माना जाएगा।

छायावाद इसी अर्थ में विद्रोह का काव्य है कि उसमें एक नई वैयक्तिक चेतना का उदय दिखाई पड़ता है जो अपने रूढिबद्ध समाज से मुक्ति की कामना करती है। छायावादी प्रगीतों में व्यापक स्तर पर प्रयुक्त होने वाली ‘मैं’ शैली केवल शैली नहीं, वरन् व्यक्तित्व के आग्रह का प्रतिफलन है। ‘आत्मकथा’ इसी प्रवृत्ति का दूसरा आयाम है। यह आकस्मिक नहीं है कि छायावादी कवियों में से अधिकांश ने किसी-न-किसी रूप में आत्मकथात्मक कविताएँ लिखी हैं। आत्मसंयम के आदर्श कवि प्रसाद की ‘आत्मकथा’ शीर्षक कविता तो विख्यात है ही, निराला ने भी ‘सरोज-स्मृति’ तथा ‘वन-वेला’ में अपने जीवन के मार्मिक प्रसंगों का चित्रण करके उसी वैयक्तिकता का आग्रह व्यक्त किया है। महादेवी की समची गीत-सष्टि जैसे “मैं नीर भरी द:ख की बदली” का व्याख्यान है। जीवन की वास्तविक घटनाओं को उन्होंने रेखाचित्रों के माध्यम से अभिव्यक्ति दी है।

वैयक्तिकता का यह आग्रह छायावादी शिल्प पर भी अनेक रूपों में अपनी छाप छोड़ता है। इन कवियों का अतिप्रिय प्रतीक ‘निर्झर’ व्यक्ति की उद्दाम मुक्ति-कामना की ओर संकेत करता है तो पथिक’ का प्रतीक घर छोड़कर बन-बन भटकने वाले व्यक्ति की व्याकुल-बेचैन मन:स्थिति की सूचना देता है। वैयक्तिक्ता का आग्रह छायावाद के कवि में आत्म-संकोच और आत्म-केंद्रीकरण की प्रवृत्ति पैदा नहीं करता बल्कि आत्म-प्रसार की प्रेरणा देता है। प्रसाद के प्रम पथिक’ के पथिक का लक्ष्य तो अपरिमित है ही।

“इस पथ का उद्देश्य नहीं है श्रान्त भवन में टिक रहना। किंतु पहुँचना उसके आगे जिसके आगे राह नहीं।’ ‘कामायनी’ के मनु का यह कथन : “वन गुहा – कुंज, मरु अंचल में हूँ खोज रहा अपना विकास” आत्मप्रसार की कामना की ही अभिव्यक्ति है। “अबाध-गति मरुत सदृश” संचरण करने वाले मनु छायावाद के गत्वर व्यक्तित्व वाले आधुनिक व्यक्ति-मन का ही एक प्रतिरूप है। छायावादी काव्य-सृष्टि व्यक्ति-स्वातंत्र्य के मूल्य पर केंद्रित एक नई वैयक्तिकता के उदय की सूचना देती है।

विषयिनिष्ठता

वैयक्तिकता के कारण छायावादी काव्य में विषय के स्थान पर विषयी की प्रधानता हुई। छायावाद को जब द्विवेदीयुगीन कविता की इतिवृत्तात्मकता की प्रतिक्रिया कहा गया तो उसका यही अर्थ था कि उसमें वस्तुनिष्ठता के स्थान पर व्यक्तिनिष्ठता और विषयनिष्ठता की जगह विषयिनिष्ठता का आग्रह था। छायावाद को स्थूल के विरुद्ध सूक्ष्म का विद्रोह कहने का भी एक अभिप्राय यही है। इसी विषयिनिष्ठता के कारण छायावाद की ‘छाया’ के विरोध में प्रकाशवाद’ के नाम से एक विनोदपूर्ण वाद भी प्रस्तुत किया गया। छायावाद की विषयिनिष्ठता को लक्ष्य करके ‘पुष्करिणी’ की भूमिका में सच्चिदानंद वात्स्यायन ने लिखा था- “विषयीप्रधान दृष्टि ही छायावादी काव्य की प्राणशक्ति है”। अपने इस कथन की व्याख्या करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया – “छायावादी कवि की व्याकुलता नाना रूपों में प्रकट हुई । किंतु उनमें सामान्य बात यह थी कि विषयी की प्रधानता थी, सभी रूपों की मूल प्रेरणा वैयक्तिकता की अभिव्यक्ति थी।

वह वैयक्तिकता चाहे कल्पना की हो, चाहे चिंतना की, चाहे अनुभूति की और चाहे स्वयं आध्यात्मिक व्याकुलता की हो।’ इस विषयिनिष्ठता का प्रतिफलन स्पष्ट रूप से छायावाद के प्रकृति-चित्रण में देखा जा सकता है, जिसमें जड़ प्रकृति पर चेतना के आरोप की ही नहीं, बल्कि मानवीकरण की व्यापक प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है। छायावादी काव्य में प्रकृति का ही नहीं, प्रत्येक वस्तु का चित्रण गहरे भाव संवलित रूप में हुआ है। यहाँ तक कि मनु, श्रद्धा, इड़ा जैसे पौराणिक व्यक्ति-चरित्र भी मनोविकारों के रूप में चित्रित किए गए हैं।

अनुभूति की प्रतिष्ठा

विषयी की प्रधानता के कारण स्वभावत: छायावाद में अनुभूति के महत्व की प्रतिष्ठा हुई। प्रसाद जी ने तो कविता की परिभाषा ही ‘आत्मा की संकल्पनात्मक अनुभूति’ के रूप में की और छायावाद की अन्य विशेषताओं के बीच ‘स्वानुभूति की विकृति’ पर विशेष बल दिया। काव्य-सृजन के विषय में पंत की कविता-“वियोगी होगा पहला कवि, आह से उपजा होगा गान” तो प्रसिद्ध है ही, महादेवी भी जब गीत को, “व्यक्तिगत सीमा में तीव्र सुख-दुखात्मक अनुभूति के शब्द-रूप” कहकर परिभाषित करती हैं तो एक तरह से कविता में अनुभूति के महत्व को ही रेखांकित करती हैं। पंत ने ‘छाया’ की अनेक उपमाओं में से एक उपमा भावुकता भी दी है।

हिंदी कविता को छायावाद की वह महत्त्वपूर्ण देन है कि उसने कविता में कोरे वस्तु वर्णन के स्थान पर अनुभूति का महत्व प्रतिष्ठित किया। यह बात अलग है कि इस प्रयास में छायावाद कभी-कभी भावोच्छ्वास और कोरी भावुकता की रसवर्जिनी सीमा तक चला गया। बाद में छायावाद के पतन के अनेक कारणों में भावों की यह अधिव्यक्ति भी एक कारण बनी।

कल्पनाशीलता

वैयक्तिकता का एक पहलू अनुभूतिप्रवणता है तो दूसरा कल्पनाशीलता, और यह निर्विवाद है कि छायावाद में कल्पना की उड़ान अभूतपूर्व थी। निराला ने कविता को “कल्पना के कानन की रानी’ कहा और प्रसाद ने कल्पना’ की प्रशंसा में एक पूरी कविता की रचना कर डाली जिसमें कल्पना को ‘मनुज-जीवन-प्रान’ कहा गया है। पंत जी ने ‘पल्लव’ की कविताओं को कल्पना के ये पल्लव बाल’ कहा और काव्य में कल्पना को इस हद तक महत्त्व दिया कि उनका कहना था “कोई भी गंभीर व्यापक तथा महत्वपूर्ण अनुभूति काल्पनिक होती है।” (छायावाद : पुनर्मूल्यांकन)।

छायावाद के आलोचकों ने प्राय: इस बात को परिलक्षित किया है कि छायावाद में कल्पना की अंतर्दृष्टिदायिनी और सृष्टि-विधायिनी दोनों शक्तियों का भरपूर उपयोग हुआ है। छायावादी कवि के लिए कल्पना उसकी मानसिक स्वतंत्रता का प्रतीक थी। कल्पना के पंखों के सहारे ही वह अपने चारों ओर के संकीर्ण वातावरण से निकलकर मुक्त आकाश में विचरण करने की क्षमता प्राप्त करता था और उसी के सहारे मनोवांछित स्वप्नलोक का निर्माण भी कर लेता था। कल्पना के अतिरेक के कारण ही कुछ आलोचकों ने छायावाद को ‘वायवी’ कहा और कुछ ने ‘वास्तविकता’ पर ‘बलात्कार’। दरअसल छायावादी कवियों की कल्पनाशीलता का गहरा संबंध स्वतंत्रता की उस चेतना से है जिसे वे मूल्य के रूप में स्वीकार करते थे। इतना निश्चित है कि इन कवियों की कल्पना-शक्ति ने छायावाद के स्वच्छंदतावाद नाम को सार्थक किया।

वेदना की विवृति

छायावाद की कविताओं में ‘उच्छ्वास’ और ‘आँसू’ की अधिकता आश्चर्यजनक नहीं है क्योंकि वैयक्तिकता की परिणति वेदना में होती है। ‘आँस’ प्रसाद के काव्य का शीर्षक ही नहीं है, पंत ने भी इस शीर्षक की कविता लिखी है और महादेवी का तो सारा काव्य ही जैसे आँसुओं से गीला है। पंत की दृष्टि में यदि “उमड़कर आँखों से चुपचाप, बही होगी कविता अनजान” तो प्रसाद में भी घनीभूत पीड़ा “दुर्दिन में आँसू बनकर चुपचाप बरसने आई’ और महादेवी ने तो स्पष्ट स्वीकार किया ही है : “वदना में जन्म करुणा में मिला आवास।” और तो और, विद्रोही निराला भी वेदना से अछूते नहीं हैं। “दु:ख ही जीवन की कथा रही” यह आत्मस्वीकृति निराला की ही है। ऐसी स्थिति में छायावादी कवियों पर यदि वेदनावादी या वेदनाविलासी होने का आरोप लगाया गया तो कुछ अनुचित नहीं है।

पंत ने ‘छायावाद : पुनर्मूल्यांकन’ में इस प्रवृत्ति की अत्यंत तर्कसम्मत व्याख्या की – “बहुत सारी वेदना की अनुभूति उस युग के भाव-प्रवण मन में इसलिए भी थी कि वह उन शृंखला की कड़ियों के प्रति जाग्रत था जो समस्त देश तथा समाज की चेतना को अपने दुर्निवार, निर्मम, नृशंस लौह-बंधनों में जकड़े हुए थीं जिन्हें तोड़ने के लिए प्रबुद्ध सामूहिक कर्म तथा संयुक्त सामाजिक संघर्ष करना आवश्यक तथा अनिवार्य था। नए युग के भावमुक्तिकामी, मन की। उड़ान भरने वाले, पिंजरबद्ध, व्यक्ति के असमर्थ-पंख उन जीवन-शून्य ठंडे सींकचों के सम्पर्क के कठोर आघात से लहूलुहान होकर कराहती हुई वेदना की स्वरों में गा उठे थे।” वेदना को छायावादी कवियों ने पीड़ा के अतिरिक्त अनुभूति, सम्वेदना तथा बोध के अर्थ में भी प्रयुक्त किया है, जैसे “वेदना के ही सुरीले हाथ से बना यह विश्व” इत्यादि । किंतु छायावादी काव्यधारा के उत्तरोत्तर विकास को देखते हुए कहा जा सकता है कि वेदना की जो प्रधानता आरंभिक अवस्था में थी वह उत्तरकाल में क्रमश: कम होती गई।

प्रसाद ने यदि दु:खवाद का सर्वथा निषेध करके अंतत: आनंदवाद की प्रतिष्ठा की तो पंत ‘गुंजन’ में सुख-दुख के बीच संतुलन खोजते हुए पाए गए : “दुख-सुख के मधुर मिलन से, यह जीवन हो परिपूरन ।”। ‘यामा के अंतिम याम तक पहुँचते-पहुँचते महादेवी की ‘नीरजा’ के आँसू सूख चले और निराला की ‘राम की शक्ति पूजा’ का अंत “होगी जय होगी जय हे पुरुषोत्तम नवीन” में व्यक्त आत्मविश्वास से हुआ। वेदना के आवेग और कराहटों से आरंभ करके इस कविता की परिणति सुख-दुख के सामरस्य या कम से कम संतुलन में हुई।

प्रेमानुभूति

छायावाद को आधुनिक काल की सबसे सशक्त प्रेम-कविता कहा जाता है। आचार्य शुक्ल ने आरंभ में ही इस प्रवृत्ति को लक्ष्य करते हुए छायावादी कविता को ‘अधिकतर प्रेम गीतात्मक’ कहा था। यह सही है कि छायावाद में जीवन के अन्य क्रियाव्यापारों एवं समस्याओं का समावेश करते हुए भी प्रेम को सर्वोपरि स्थान दिया गया है। द्विवेदीयुग के नैतिक शुद्धतावादी काव्य की तुलना में इस प्रेमाधिक्य ने निस्संदेह शुरू में विशेष रूप से ध्यान आकृष्ट किया, किंतु संपूर्ण काव्य-परंपरा के क्रम में छायावाद की यह प्रवृत्ति अतिरंजित नहीं कही जा सकती, क्योंकि यदि कविता के इतिहास पर नज़र डाली जाए तो इसमें संदेह नहीं रहेगा कि प्रेम की प्राय: सर्वत्र और सदैव प्रधानता रही है। शास्त्र में भी श्रृंगार के रस-राजत्व को व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ है।

किंतु छायावाद में प्रेमानुभूति की अधिकता से कहीं अधिक ध्यान आकर्षित करने वाली विशेषता प्रेम के प्रति इन कवियों का दृष्टिकोण है। छायावाद के आलोचकों में इस बारे में व्यापक सहमति है कि छायावाद का प्रेम प्राय: अशरीरी है और उसमें रीतिकालीन भोगवादी दृष्टि के स्थान पर मानसिक रागात्मकता की प्रतिष्ठा की गई है। रीतिकालीन शृंगारिकता के विरुद्ध प्रतिक्रिया तो द्विवेदीयगीन काव्य में भी दिखाई पड़ी थी, परंतु अपने नैतिक-शुद्धतावादी आग्रहों के कारण जहाँ द्विवेदी युग का काव्य श्रृंगार के लगभग बहिष्कार की सीमा का स्पर्श करने लगा था, वहाँ छायावाद ने वैसा निषेधपरक कट्टर दृष्टिकोण नहीं अपनाया। शुद्धतावाद के स्थान पर छायावाद ने आदर्शवाद का रास्ता अपनाया और प्रेम का उन्नयन करने का प्रयास किया।

मध्ययुगीन विलास-चेष्टाओं का स्थान छायावादी कविता में रागात्मकता और… पावनता ने ले लिया। प्रेम का यह स्वरूप हिंदी कविता में अब तक अपरिचित और आधुनिक था। प्रेम को उसके मध्ययुगीन स्वरूपों और अनुषंगों से मुक्त करना छायावाद की स्वातंत्र्य भावना का ही प्रतिफलन है। छायावादी कवियों ने वैयक्तिक प्रेम की अनेक मनोदशाओं के सूक्ष्म चित्रण तो किए ही, इसके अलावा प्रेम नामक भाव को उदात्त रूप देकर उसे स्वतंत्र रूप से काव्य का विषय बना दिया। छायावाद की कविता प्रेम की अनुभूति को नए रूप-रंगों में प्रस्तुत करने के कारण तो ध्यान आकर्षित करती ही है. इससे अधिक इस बात के कारण महत्वपूर्ण है कि उसमें प्रेम एक गंभीर जीवन-दर्शन के रूप में प्रकट हुआ ।

सौंदर्यबोध

सौंदर्य की अभिव्यक्ति कविता की सामान्य विशेषता मानी जाती है पर छायावादी कविता का सौंदर्यबोध अपनी सामान्यता में नहीं, विशिष्टता में ध्यान आकर्षित करता है। पंत जी के अनुसार-“छायावाद में नए मूल्य ने सबसे अधिक सशक्त अभिव्यक्ति सौंदर्य-बोध में पाई, इसलिए सौंदर्यबोध उस युग के काव्य की सबसे मौलिक तथा प्रमुख देन रही।” छायावादी कवियों की दृष्टि निश्चित रूप से सौंदर्यवादी थी, इसमें संदेह नहीं। इतना ही नहीं कि छायावादी कवियों की दृष्टि अखिल विश्व से सौंदर्य-चयन की ओर थी. बल्कि वे जीवन को भी सुंदर बनाने के अभिलाषी थे। छायावाद के प्रसंग में, कलावाद के जिस प्रभाव की चर्चा प्राय: की गई है, वह और किसी रूप में हो न हो, सौंदर्यवाद के रूप में अवश्य प्रतिफलित हुआ है। ‘सत्यं, शिवं, सुंदरं’ में से छायावाद की दृष्टि ‘सुंदरम्’ पर ही विशेष जमी, यहाँ तक कि वहाँ ‘सत्यं’ और ‘शिवं’ भी ‘सुंदरं’ के रूप में ही गृहीत हुए। इस पथ पर चलते हुए छायावादी कवि क्रमश: प्रकृति-सौंदर्य से चलकर मानव-सौंदर्य तक पहुंचे। पंत के शब्दों में “सुंदर हैं विहग सुमन सुंदर, मानव तुम सबसे . सुररतम।”

किंतु छायावाद की सौंदर्य-दृष्टि भी विशिष्ट थी। यहाँ एक ओर सौंदर्य “कनक किरण के अंतराल में लुक-छिपकर चलता” दिखाई पड़ता है तो दूसरी ओर वह चेतना का उज्ज्वल वरदान’ प्रतीत होता है। इस प्रकार छायावाद की सौंदर्य दृष्टि में जहाँ एक ओर स्वप्न-लोक का कुहासा है वहाँ दूसरी ओर चेतना की उज्ज्वलता। सौंदर्य उनके यहाँ एक प्रकार के रहस्य से मंडित है। इन कवियों ने सौंदर्य को उदात्तता, भव्यता, दिव्यता आदि गुणों से विभूषित करके उसे काव्य में एक नए मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित किया। यह बात अलग है कि बाद में इस सौंदर्य-दृष्टि पर एकांगिता का आरोप लगाते हुए प्राय: इसकी आलोचना की गई।

प्रकृति की ओर वापसी

हिंदी काव्य-परंपरा में प्रकृति की भूमिका आरंभ से ही विविध रूपों में रही है, किंतु उसे जो स्थान छायावाद में मिला, वह अभूतपूर्व है। भक्त कवियों की कविता में, प्रकृति, प्राय: उनके भगवान की लीला-भूमि से अधिक महत्व नहीं पा सकी, और रीतिकाल के कवि उसका उपयोग सहेट-स्थल से आगे जाकर नहीं कर सके। भारतेंदु और उनके मंडल के कवियों के बारे में आचार्य शुक्ल का कहना था कि उनका मन प्रकृति की अपेक्षा “दस तरह के लोगों में उठने-बैठने में अधिक रमता था” स्वच्छंदतावादी कवि आरंभ में निस्संदेह प्रकृति की ओर आकृष्ट हुए किंतु अनुभूति की यथेचित गहराई और कल्पना की अपेक्षित क्षमता के अभाव में वहाँ भी प्रकृति के चित्र साधारण स्तर से ऊँचे नहीं उठ सके। इनसे भिन्न छायावादी कवियों ने उषा, संध्या, रात्रि और चाँदनी जैसे चिर-परिचित प्रकृति-रूपों को भी नई अंतर्दृष्टि से देखा। इसीलिए पंत की ‘प्रथम रश्मि’ और ‘चाँदनी’, निराला की ‘संध्या संदरी’ प्रसाद की ‘मंदिर माधवी यामिनी’ जैसी बहुत सी कविताएँ हिंदी कविता में छायावाद से पहले दुर्लभ हैं। प्रकृति के पूर्व परिचित दृश्यों में नवीन सौंदर्य का उद्घाटन तो छायावादी कवियों ने किया ही, इसके अलावा उन्होंने वन्य प्रकृति के सुदूर दृश्यों की ओर भी दृष्टि डाली। पंत के पार्वतीय सौंदर्य के चित्र और प्रसाद की ‘कामायनी’ में चित्रित प्रलयकालीन समुद्र के विराट दृश्यचित्र हिंदी काव्य की अमूल्य निधि हैं। प्रकृति के खंड-चित्रों के अलावा छायावादी कवियों ने शायद पहली बार एक विराट सत्ता के रूप में प्रकृति की अवधारणा की और प्राकृतिक वस्तुओं के स्थान पर समग्र प्रकृति को काव्य का विषय बनाया।

उन्होंने प्रकृति को जैसे एक व्यक्तित्व प्रदान किया। इसके साथ ही प्राचीन सांस्कृतिक अनुषंगों से युक्त तामरस, शेफाली, शिरीष, यूथिका जैसे फूलों के भावचित्रों के द्वारा इन्होंने प्रकृति-चित्रण को सांस्कृतिक आयाम देने का प्रयास किया। छायावादी कवियों के इस प्रकृति-प्रेम के कारण कभी-कभी उन पर पलायन का आरोप भी लगाया गया, किंतु उनके प्रकृति-प्रेम के मूल में सामाजिक रूढ़ियों से मुक्ति और नैसर्गिक जीवन की आकांक्षा अधिक थी, पलायन नहीं। प्राकृतिक रूपों और व्यापारों में उन्हें अपने लिए ‘मौन निमंत्रण’ और कोलाहल की अवनि से मुक्ति का मार्ग दिखाई पड़ता था।

प्रकृति उनके लिए या तो प्रेरणा का स्रोत थी या विश्रामस्थली, पलायन भूमि नहीं। प्रसाद की प्रसिद्ध कविता ले चल मुझे भुलावा देकर मेरे नाविक धीरे-धीरे’ इन कवियों पर पलायन के आक्षेप को पुष्ट करने के लिए अक्सर उद्धृत की जाती है। इस कविता का ध्यान से विश्लेषण करने पर, यह स्पष्ट होते देर नहीं लगती कि इसमें जीवन के परस्पर विरोधी व्यापारों के बीच समरस भूमि को पाने की आकांक्षा और बेचैनी है, जीवन से पलायन नहीं। कुल मिलाकर हिंदी का छायावाद अन्य रोमांटिक आंदोलनों की तरह प्रकृति की आदिम गोद में लौटने की ओर उन्मुख नहीं है, बल्कि उसमें मानव-जीवन को प्रकृति के सौंदर्य से मंडित करने की मानवीय आकांक्षा है।

राष्ट्रीय चेतना, लोकमंगल और मानव करुणा

छायावादी कवियों पर बहुत दिनों तक यह आरोप लगाया जाता रहा कि जिस समय देश. औपनिवेशिक शक्तियों के विरुद्ध अपनी स्वाधीनता के संग्राम में संलग्न था, ये कवि राष्ट्रीय प्रश्नों से उदासीन और विरत होकर क्षितिज के पार ताक-झाँक करते रहे। यह वस्तुत: छायावादी काव्य को एकांगी दृष्टि से देखने का परिणाम है, वरना इन कवियों ने ओजस्वी स्वर में जागरण-गीत भी कम नहीं लिखे। प्रसाद जी की हिमालय के आंगन में उसे, प्रथम किरणों का दे उपहार’ और ‘हिमाद्रि तुंग श्रृंग से प्रबुद्ध शुद्ध भारती’ जैसे गीत, निराला की ‘भारति जय विजय करे’, और ‘महाराजा शिवाजी के नाम पत्र’ जैसी रचनाएँ इसका प्रमाण हैं।

हम पहले स्पष्ट कर चुके हैं कि स्वातंत्र्य’ छायावादी कविता का केंद्रीय मूल्य था। उसकी अभिव्यक्ति व्यक्ति स्वातंत्र्य से आगे बढ़कर राष्ट्रीय स्वतंत्रता की आकांक्षा के रूप में होती, यह स्वाभाविक था। किंतु छायावाद की राष्ट्रीय चेतना केवल राष्ट्रगीतों तक ही सीमित नहीं रही बल्कि अपनी सूक्ष्म और सांकेतिक प्रकृति के अनुरूप अन्य कविताओं में भी अंतर्धारा के रूप में व्याप्त रहकर व्यक्त होती रही। उदाहरण के लिए निराला के ‘तुलसीदास’ में देश को पराधीनता से मुक्त कराने का संकल्प है और ‘राम की शक्ति पूजा’ के पौराणिक प्रतीक भी देश के उद्धार के लिए नैतिक शक्ति की साधना का संदेश देते हैं।

छायावाद के कवियों की स्वातंत्र्य-भावना समाज में व्याप्त विषमताओं के विरुद्ध लोक-मंगल और मानव-करुणा के रूप में भी व्यक्त हुई है। यह भावना सामान्यत: सभी छायावादी कवियों में न्यूनाधिक रूप में मिलती है किंतु इसकी सबसे अधिक मुखर अभिव्यक्ति निराला के काव्य में हुई है। निराला की करुणामय दृष्टि ‘भिक्षुक’ और ‘विधवा’ पर ही नहीं पड़ती, बल्कि ‘बादल राग’ में उन्होंने ‘जीर्ण बाहु शीर्ण शरीर अधीर कृषक में कृषक के क्षुब्ध तोष’ को भी वाणी दी और शेष-श्वास, मुक-भाष प्रहार पाते मानव समुदाय’ के अधिकारों की भी चिंता की। इस प्रकार छायावादी काव्य में, मानव-करुणा और लोक-मंगल से प्रेरित सामाजिक-चेतना भी परिलक्षित होती है। यह कविता जीवन-विमुख नहीं जीवनोन्मुखी कविता है।

विश्वमानवतावाद

छायावाद की कविता में राष्ट्रीय-चेतना तो है, अंध राष्ट्रवाद नहीं। राष्ट्र के स्वाधीनता-संग्राम से संबद्ध होते हुए भी ये कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर के विश्वमानवतावाद से प्रेरणा प्राप्त कर अपने काव्य में विश्व-दृष्टि की ही अभिव्यक्ति करते रहे। पंत जी ने ‘छायावाद : पुनर्मूल्यांकन’ में बार-बार इस बात पर बल दिया कि छायावाद विश्व-दृष्टि से अनुप्राणित था और यही उसकी आधुनिकता थी। प्रसाद की ‘कामायनी’ में अखिल मानव-भावों के सत्य को विश्व के हृदय पटल पर अंकित करने की कामना व्यक्त हुई और निराला ने सम्राट अष्टम एडवर्ड’ के प्रति कविता लिखकर यह प्रमाणित कर दिया कि छायावाद के कवि की दृष्टि देश, वर्ण, धर्म आदि की सभी दीवारों को तोड़कर मानवीय संबंधों और संवेदना के नाते किसी भी व्यक्ति के प्रति सहानुभूति रखने को प्रस्तुत है। निराला के लिए तो :

मानव मानव से नहीं भिन्न

निश्चय, हो श्वेत, कृष्ण अथवा

वह नहीं क्लिन्न,

भेद कर पंक

निकलता कमल जो मानव का वह निष्कलंक।

मध्ययुगीन काव्य से छायावाद की मनोभूमि, इसी विश्व-दृष्टि के कारण भिन्न ही नहीं व्यापक और विराट भी है। यही उसे आधुनिक भी बनाती है।

सांस्कृतिक गरिमा

प्राचीन रूढ़ियों के विरुद्ध विद्रोह छायावाद की कविता का प्रमुख सरोकार था। लेकिन इसके बावजूद समकालीन नवजागरण की चेतना के अनुरूप अपनी सांस्कृतिक परंपरा के पुनरुत्थान की ओर भी उन्होंने ध्यान दिया। अपनी विरासत से ग्रहण और त्याग के विषय में इन कवियों का अपना विवेक कारगर हुआ। छायावाद की सांस्कृतिक चेतना, द्विवेदी युग से अधिक परिमार्जित और सूक्ष्म थी। निराला की ‘यमुना के प्रति’, ‘तुलसीदास’, ‘राम की शक्तिपूजा’ तथा प्रसाद की ‘कामायनी’ से स्पष्ट है कि ऐतिहासिक एवं पौराणिक कथानकों को ग्रहण करते हुए भी छायावादी कवियों ने उनका उपयोग केवल अतीत की पुनरावृत्ति और स्मरण करने के लिए नहीं किया अपितु उन्हें समकालीन आशयों और अर्थ व्यंजनाओं से संपृक्त कर उनका पुनराविष्कार भी किया।

यह पुराख्यानों के भावमूलक ग्रहण और संप्रेषण की दृष्टि थी। कालिदास का ‘मेघदूत’ द्विवेदी युग के कवियों ने केवल पढ़ा किन्तु छायावादी कवियों के लिए सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ने लिखा है – “छायावादी कवि ने कहानी मानों पढ़ी ही नहीं, कालिदास नामक ऐंद्रजालिक द्वारा सशरीर आँखों के सामने ला खड़ी की गई प्रकृति की अनिर्वचनीय मूर्ति को वह अपलक देखता रह गया। यहाँ भी नए परिचय का प्रश्न नहीं था, नई दृष्टि का ही प्रश्न था। इसीलिए कालिदास के ‘पुनराविष्कार’ की बात की गई।’ इस प्रकार स्वातंत्र्य भावना से प्रेरित होकर छायावाद ने परंपरा की रूढ़ियों से अपने आपको मुक्त कर नए सिरे से परंपरा का पुनराविष्कार किया और फिर आधुनिक संदर्भ में उसका पुन: सृजन किया और उसे नई अर्थच्छायाओं से संवलित कर प्रस्तुत किया। परिणामत: छायावाद के आधुनिक-बोध को एक नया सांस्कृतिक आयाम मिल गया।

भाव व्यंजना

छायावाद के विशिष्ट अभिव्यंजना-कौशल को उसकी सबसे बड़ी देन या उपलब्धि समझा जाता है। यह कौशल वस्तुत: छायावाद के केंद्रीय मूल्य-स्वातंत्र्य का प्रथम साधन है। स.ही.वात्स्यायन के अनुसार : “छायावाद के सम्मुख पहला प्रश्न अपने काव्य के अनुकूल भाषा का – नई संवेदना के नए मुहावरे का था। इस समस्या का उसने धैर्य और साहस के साथ सामना किया।” द्विवेदी युग में खड़ी बोली काव्य-भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हो चुकी थी। उसके परिमार्जन और परिष्कार का कार्य भी सम्पन्न हो चुका था किंतु उसमें निहित काव्यात्मक संभावनाओं को पहचानकर इसका उपयोग करने का कार्य शेष था। यह कार्य छायावादी कवियों के हाथों ही सम्पन्न हुआ, साथ ही काव्य-भाषा में व्यंजकता की वृद्धि हुई। मुकुटधर पांडेय ने छायावाद की विशेषताओं का बयान करते हुए लिखा था – “उसका एक मोटा लक्ष्य यह है कि उसमें शब्द और अर्थ का सामंजस्य बहुत कम रहता है। कहीं-कहीं तो इन दोनों का परस्पर कुछ भी . संबंध नहीं रहता। लिखा कुछ और ही गया है, पर मतलब कुछ और ही निकलता है। इसमें ऐसा कुछ जादू भरा है – अतएव यदि यह कहा जाए कि ऐसी रचनाओं में शब्द अपने स्वाभाविक मूल्य को खोकर सांकेतिक चिह्न मात्र हुआ करते हैं तो कोई अत्युक्ति न होगी। तात्पर्य यह है कि छायावाद के शब्द प्रतीक होते हैं और ये जादू का-सा असर पैदा करते हैं। इसके लिए कवि शब्द को उसके प्रचलित अर्थ से अलग करके नए अर्थ से युक्त करता है।”

यह तथ्य है कि जो शब्द काव्य में पहले कभी साथ-साथ नहीं देखे गए थे वे छायावाद में पहली बार नियोजित हुए – और इस प्रकार नियोजित हुए कि उनसे एक नया अर्थ ध्वनित होने लगा। इसी को दूसरे शब्दों में, शब्द और अर्थ का नए संबंधों में आबद्ध होना कहते हैं। . उदाहरण के लिए तुतला उपक्रम’, ‘तुमुल तम’, ‘नील झंकार’, ‘मूर्च्छित आतप’ । शास्त्रीय भाषा में जिसे विशेषण-विपर्यय अलंकार के रूप में अति सरलीकृत ढंग से समझाया जाता है वह रचना-प्रक्रिया की दृष्टि से वस्तुत: भाषागत सृजनात्मक स्वतंत्रता का सूचक है, और छायावादी कवियों ने इस दिशा में अभूतपूर्व साहस का परिचय दिया। इस दृष्टि से पंत जी का यह कथन सर्वथा संगत है कि “शब्दों में नए अर्थ, अर्थों से नई चेतना, चेतना से नया कलाबोध और कलाबोध से नई सौंदर्य-भंगिमा हृदय को स्पर्श कर नए रस का संचार करने लगी।”

छायावाद ने भाषा की अभिव्यंजना-क्षमता बढ़ाने के लिए बिम्ब-विधान का भी आश्रय लिया जिसे शुक्ल जी ने ‘लाक्षणिक मूर्तिमत्ता’ तथा पंत जी ने ‘चित्रभाषा’ कहा है। बिम्ब रचना में छायावादी कवियों का सबसे बड़ा साधन सृष्टि विधायनी कल्पना थी। इसीलिए उनके बिम्बों में मौलिकता और ताज़गी है।

छंद प्रयोग की दृष्टि से भी छायावादी कवियों का योगदान विशेष महत्वपूर्ण है। इन कवियों ने द्विवेदी-युगीन अनेक विकल्पों के बीच से खड़ी बोली हिंदी की प्रकृति के अनुरूप कुछ छंदों का चुनाव कर प्रगीत-रचना के लिए उन्हें परिनिष्ठित रूप दिया, साथ ही कविता में संगीतात्मकता की वृद्धि की। इसके अलावा छायावाद को हिंदी में मुक्त छंद के प्रवर्तन का श्रेय भी दिया जाता है जिसके पुरस्कर्ता मुख्य रूप से निराला हैं।

छायावाद की प्रेरक परिस्थितियाँ, उसकी मूल दृष्टि, संवेदना और शिल्प की विशेषताओं को सुमित्रानंदन पंत के शब्दों में इस प्रकार समझा जा सकता है : “उस युग का नवीन काव्य-संचरण जो कि एक नए जीवन-मूल्य की खोज में था, वह अपने प्रथम उत्थान में अपनी आदर्शोन्मुखी अभिव्यंजना-शैली के अंतर्गत उदात्त कल्पना-वैभव, मौलिक सौंदर्य-बोध, अंतर्मुखी प्रतीक बिम्ब-विधान, वस्तुजगत का भावोन्मुखी सूक्ष्मीकरण तथा भाव-संवेदनों का वस्तून्मुखी स्थूलीकरण, प्रकृति-चित्रण तथा लाक्षणिक प्रयोगों द्वारा शब्द-शक्ति की सम्प्रेषणीयता संबंधी समृद्धि तथा नवीन छंदों की उन्मुक्त स्वर-लय-झंकृति आदि अनेक रमणीय रसात्मक-तत्वों को लेकर अभूतपूर्व काव्य-ऐश्वर्य के साथ अवतरित हुआ।”

सारांश

इस इकाई को पढ़ने के बाद अपने जाना कि छायावाद की प्रेरणा उस युग के कवियों को उस युग की चेतना से स्वतंत्र रूप से प्राप्त हुई है। साथ ही छायावाद की उपलब्ध परिभाषाओं पर विचार करने पर यह स्पष्ट हो गया कि, ऐसी कोई एक परिभाषा नहीं है जो उसकी विशेषताओं पर उनकी समग्रता में प्रकाश डालती हो। वे सभी एकांगी है।

छायावाद मूलत: मूल्य केंद्रित काव्य माना जाता है और इसका केंद्रीय मूल्य स्वातंत्र्य है। मुक्ति की कामना इस युग के कवियों में व्यापक स्तर पर अनेक रूपों में व्यक्त हुई है। इन कवियों ने वस्तु वर्णन के स्थान पर अनुभूति को महत्त्व दिया। वस्तु वर्णन के स्थान पर अनुभूति को महत्त्व देना हिंदी कविता को छायावाद की महत्त्वपूर्ण देन है। छायावादी काव्य में प्रेम को उसके मध्ययुगीन अनुषंगों से मुक्त कर उसे रागात्मक और अशरीरी पावनता से युक्त करने का प्रयास किया गया। छायावादी कवियों ने प्रकृति को भी एक नई अंतर्दृष्टि से देखा। उन्होंने प्रकृति की अवधारणा एक विराट सत्ता के रूप में की।

छंदों के प्रयोग में भी इन कवियों का महत्वपूर्ण योगदान है। द्विवेदी युगीन अनेक विकल्पों के बीच से अपनी प्रगीत-रचना के अनुरूप छंदों का चयन करके और मुक्त छंद का प्रवर्तन और विकास करके इन्होंने अपना विशिष्ट स्थान बनाया।

अभ्यास/प्रश्न

  1. छायावाद के प्रवर्तन पर एक टिप्पणी लिखिए।
  2. छायावाद की परिभाषा देते हुए छायावाद और रहस्यवाद के संबंध की चर्चा कीजिए।
  3. ‘छायावाद स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह है’ कथन की समीक्षा कीजिए।
  4. छायावादी काव्य में प्रकृति’ की भूमिका पर प्रकाश डालिए।
  5. छायावाद की प्रमुख प्रवृत्तियों की सोदाहरण चर्चा कीजिए।

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