मुद्रास्फीति : मौद्रिक और राजकोषीय उपाय

प्रश्न: मुद्रास्फीति की परिघटना से निपटने हेतु उठाए जा सकने वाले मौद्रिक और राजकोषीय उपायों पर प्रकाश डालिए। साथ ही, उनकी सीमाओं का भी वर्णन कीजिए।

दृष्टिकोण:

  • मुद्रास्फीति को परिभाषित कीजिए।
  • मुद्रास्फीति को पृथक रूप से नियंत्रित करने के लिए अपनाए गए मौद्रिक और राजकोषीय उपायों की चर्चा कीजिए।
  • भारत में मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण की क्रिया-विधि का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।

उत्तरः

मुद्रास्फीति वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों में सामान्य वृद्धि को दर्शाती है। इसके कारण मुद्रा की एक समान इकाई पहले की तुलना में कम वस्तुओं और सेवाओं को खरीदने में सक्षम होती है, जिससे अर्थव्यवस्था में मुद्रा की क्रय शक्ति कम हो जाती है। यद्यपि मुद्रास्फीति के मध्यम स्तर का अर्थव्यवस्था पर सामान्यतः सकारात्मक प्रभाव होता है, तथापि उच्च मुद्रास्फीति दरें उपभोक्ताओं और अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी प्रभाव उत्पन्न करने वाली सिद्ध हो सकती हैं।

मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के उपाय 

मौद्रिक उपाय: केंद्रीय बैंक द्वारा अपनाए गए इन उपायों का उद्देश्य मुद्रा की आपूर्ति को कम करना होता है, जिससे समग्र मांग में कमी तथा परिणामस्वरूप मूल्यों में गिरावट होगी। मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने हेतु निम्नलिखित उपाय अपनाए जाते हैं:

  • रेपो दर: यह वह दर है जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक अन्य बैंकों को अल्प अवधियों के लिए ऋण प्रदान करता है। रेपो दर में वृद्धि नकदी और धन के प्रवाह को कम कर देती है।
  • बैंक दर: बैंक दर में वृद्धि के परिणामस्वरूप बैंकों और ऋण लेने वालों के लिए उधार प्राप्त करने की लागत बढ़ जाती है। इससे वाणिज्यिक बैंकों से ऋण प्राप्ति में कमी होती है।
  • आरक्षित कोष विषयक अनिवार्यताएं: नकद आरक्षित अनुपात/सांविधिक तरलता अनुपात के अंतर्गत वर्द्धित आरक्षित कोष विषयक अनिवार्यताओं से वाणिज्यिक बैंक की ऋण प्रदान करने की क्षमता कम हो जाती है। इससे जनता की ओर धन का प्रवाह कम हो जाता है।
  • खुले बाजार की संक्रियाएँ: इनमें दीर्घकालिक स्थायी तरलता वृद्धि करने और उसका अवशोषण करने हेतु सरकारी प्रतिभूतियों की एकमुश्त खरीद और बिक्री, दोनों सम्मिलित होती हैं।

राजकोषीय उपाय: व्यय को कम करने और आपूर्ति प्रेरित मुद्रास्फीति का प्रबंधन करने के लिए सरकार द्वारा अपनाए गए राजकोषीय उपायों में सम्मिलित हैं

  • व्यय में कमी: सरकार मुद्रास्फीति के नियंत्रित होने तक गैर-विकासकात्मक गतिविधियों पर अनावश्यक व्यय को कम कर सकती है, सार्वजनिक ऋण की चुकौती को स्थगित कर सकती है, आदि।
  • करों में वृद्धि: इससे अल्प प्रयोज्य आय के कारण व्यक्तिगत उपभोग व्यय में कटौती होती है। साथ ही इससे अर्थव्यवस्था में समग्र मांग को कम करने में भी सहायता प्राप्त होती है।
  • अधिशेष बजट: अधिशेष बजट का अर्थ यह होता है कि सरकार द्वारा व्ययों के माध्यम से धन की आपूर्ति की अपेक्षा करों के माध्यम से जनता के पास उपलब्ध अधिशेष तरलता में कमी अधिक की गई है। इसके परिणामस्वरूप मांग कम हो जाती है।
  • संरक्षणवादी उपाय: सरकार घरेलू खपत को सहायता प्रदान करने के लिए दाल, तेल आदि आवश्यक वस्तुओं के निर्यात पर प्रतिबंध अधिरोपित करके तथा शुल्कों को कम करके आयातों को प्रोत्साहित करने जैसे कुछ संरक्षणवादी उपाय अपना सकती है।

मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने में उपर्युक्त उपायों की सीमाएं:

  • प्रभाव उत्पन्न करने में लगने वाली दीर्घ अवधि: उच्च ब्याज दरों द्वारा मांग में कमी करने का प्रभाव उत्पन्न करने में 18 माह तक की अवधि लग सकती है। इस प्रकार, इसे भविष्य की मुद्रास्फीति प्रवृत्तियों के सटीक पूर्वानुमान की आवश्यकता होगी।
  • उपभोक्ता व्यय को कई कारक प्रभावित करते हैं: व्यवहार में, उच्च ब्याज दरें उपभोक्ता व्यय को सभी परिस्थितियों में कम नहीं कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, यदि उपभोक्ता का विश्वास अधिक दृढ़ है और घरेलू कीमतों में बढ़ोतरी हो रही है, तो बढ़ी हुई ब्याज दरें भी उपभोक्ता व्यय को कम करने के लिए अपर्याप्त सिद्ध हो सकती हैं।
  • राजनीतिक प्रभाव: राजकोषीय नीति सदैव आर्थिक विचारों पर आधारित नहीं होती है। उदाहरण के लिए, करों में वृद्धि से समग्र मांग को कम करने में अधिक सहायता प्राप्त हो सकती है, परन्तु वास्तव में सत्तासीन सरकार द्वारा इस प्रकार का निर्णय लेना प्राय: कठिन होता है।
  • वृद्धि दर के साथ समन्वयन: यद्यपि उपर्युक्त दोनों उपायों से समग्र मांग को कम करने में सहायता प्राप्त हो सकती है, परन्तु मांग में कमी निवेश और आर्थिक विकास की दर में कमी के रूप में भी प्रतिबिंबित होगी।

इस प्रकार, समग्र व्यय को प्रभावित करने के लिए मौद्रिक और राजकोषीय उपायों का उचित समेकन प्राप्त करना अत्यंत कठिन है। इन दो विधियों के अतिरिक्त, अन्य प्रत्यक्ष विधियों जैसे मांगों की पूर्ति हेतु उत्पादन में वृद्धि, पारिश्रमिक नीति को युक्तिसंगत बनाना, प्रत्यक्ष मूल्य नियंत्रण आदि का उपयोग भी किया जा सकता है।

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