मृदा की गुणवत्ता में क्षेत्रीय भिन्नताओं पर चर्चा : मृदा स्वास्थ्य के ह्रास की रोकथाम खाद्य सुरक्षा की प्राप्ति के लिए अत्यावश्यक

प्रश्न: मृदा स्वास्थ्य के ह्रास की रोकथाम खाद्य सुरक्षा की प्राप्ति के लिए अत्यावश्यक है। मृदा की गुणवत्ता में क्षेत्रीय भिन्नताओं पर चर्चा करते हुए, सरकार द्वारा इसके सुधार के लिए उठाए गए कुछ कदमों का उल्लेख कीजिए।

दृष्टिकोण

  • प्रदत्त कथन के संदर्भ को स्पष्ट कीजिए।
  • मृदा की गुणवत्ता में क्षेत्रीय भिन्नताओं पर चर्चा कीजिए।
  • उपर्युक्त समस्याओं के समाधान हेतु सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर

मृदा स्वास्थ्य संधारणीय वैश्विक खाद्य सुरक्षा की प्राप्ति, जलवायु परिवर्तन का सामना करने तथा जैव-विविधता संरक्षण हेतु महत्वपूर्ण है। बढ़ती जनसंख्या, कृषि भूमि की सीमित उपलब्धता, कृषि जोत का छोटा आकार, औद्योगीकरण, नगरीकरण एवं मृदा की उर्वरता में गिरावट के कारण निकट भविष्य में भारत अपनी खाद्य अधिशेष की प्रस्थिति को खो सकता है। भारत में मृदा अपरदन, भूमि क्षरण का सर्वाधिक प्रचलित रूप है। इसके अतिरिक्त लवणता, जल भराव और झूम कृषि के कारण मृदा क्षरण अन्य कारक है।

मृदा की गुणवत्ता में निम्नलिखित क्षेत्रीय भिन्नताएं व्याप्त हैं:

  • मध्य भारत जल-प्रेरित मृदा अपरदन से मुख्य रूप से प्रभावित है।उत्तर-पूर्वी एवं दक्षिणी क्षेत्र भी इससे प्रभावित होते हैं।
  • पश्चिमी भारत विशेष रूप से राजस्थान और पंजाब, हरियाणा, गुजरात और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के आसपास के क्षेत्र वायु अपरदन से प्रभावित हैं।
  • सिन्धु-गंगा का मैदान, हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र और कर्नाटक के नहर-सिंचित क्षेत्र लवणीकरण और/या क्षारीयकरण से प्रभावित हैं, जिसका मुख्य कारण अपर्याप्त जल निकासी, अप्रभावी जल प्रबंधन और सब्सिडी आधारित विद्युत् मूल्य निर्धारण है। 1970 के दशक में हरित क्रांति प्रारम्भ हुई, जिसमें मुख्य रूप से गेहूं और चावल के लिए गहन कृषि पद्धतियों का प्रयोग किया गया। इसने भी मृदा को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है। MON तटीय क्षेत्र, तटीय अपरदन से ग्रसित हैं। निकोबार द्वीप समूह में मृदा अपरदन से प्रभावित तटरेखा का प्रतिशत सर्वाधिक है।
  • तटीय भूमि का लवणीकरण और लवणीय जल का प्रवेश भी भारतीय तट के समक्ष प्रमुख खतरे हैं।
  • भारतीय मृदा में फॉस्फोरस की कम मात्रा होने के कारण उर्वरक पर अत्यधिक निर्भरता वाले क्षेत्रों में मृदा का क्षरण होता है।
  • झूम कृषि की पद्धतियों के साथ अत्यधिक वनोन्मूलन के कारण पूर्वोत्तर क्षेत्र में अत्यधिक मृदा क्षरण हुआ है।

मृदा स्वास्थ्य में सुधार के लिए सरकार द्वारा उठाए गए कदम:

  • यूनाइटेड नेशन कन्वेंशन टू कॉम्बैट डेजर्टिफिकेशन का हस्ताक्षरकर्ता होने के साथ ही भारत ने एकीकृत जलसंभर प्रबंधन कार्यक्रम (IWMP), मनरेगा और स्वच्छ भारत मिशन जैसे कार्यक्रमों को लागू करके मृदा क्षरण से निपटने के लिए समग्र दृष्टिकोण अपनाया है।
  • मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के तहत, मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किए जा रहे हैं। ये किसानों को आगतों के विवेकसम्मत उपयोग के माध्यम से मृदा की उत्पादकता में सुधार करने में सहायता करने के लिए प्रत्येक खेत के लिए आवश्यक पोषक तत्वों और उर्वरकों की फसल-वार अनुशंसाएं प्रदान करते हैं।
  • परम्परागत कृषि विकास योजना, राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन आदि पहलों के माध्यम से सामाजिक वानिकी और जैविक कृषि को बढ़ावा देना।
  • कृषि विज्ञान केंद्र तथा सूचनाएं, ज्ञान और परामर्श प्राप्त करने हेतु कृषि वैज्ञानिकों के साथ किसानों को जोड़ने के लिए मेरा गांव मेरा गौरव जैसी योजनाएं।
  • जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (NAPCC) ने मृदा स्वास्थ्य में सुधार के लिए स्वच्छ और बेहतर कृषि प्रणालियों की विचारधारा को विकसित करना प्रारंभ कर दिया है।

उपर्युक्त पहले रियो+20 का लैंड डीग्रेडेशन-न्यूट्रल-वर्ल्ड आउटकम डॉक्यूमेंट, 2030 तक सम्पूर्ण विश्व में लैंड डीग्रेडेशन न्यूट्रैलिटी (LDN) प्राप्त करने के लिए SDGs के लक्ष्य 15.3 की प्राप्ति और ग्लोबल सॉइल फोरम (GSF) का गठन जैसे अंतर्राष्ट्रीय कदमों के अनुरूप हैं। यह फोरम एक ऐसे विश्व की कल्पना करता है, जिसमें मृदा का संधारणीय प्रबंधन और उत्तरदायित्वपूर्ण प्रशासन किया जाता है।

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