जयशंकर प्रसाद की नाट्य दृष्टि और ‘स्कंदगुप्त’

छायावाद के प्रमुख स्तंभ और प्रख्यात कथाकार जयशंकर प्रसाद की रचनात्मक प्रतिभा बहुमुखी थी। उन्होंने कविताओं और कहानियों के अलावा नाटक और उपन्यास भी लिखे। प्रसाद के नाटक संख्या में ज्यादा नहीं है, लेकिन हिंदी में नाट्य साहित्य को समृद्ध करने में उनका योगदान अप्रतिम है। इस पाठ्यक्रम में आप प्रसाद के प्रसिद्ध नाटक स्कंदगुप्त का अध्ययन करेंगे। स्कंदगुप्त पर कुल तीन इकाइयाँ शामिल की गई हैं। यह उस पर लिखी गई पहली इकाई है और उसमें आप प्रसाद की नाट्य दृष्टि का परिचय प्राप्त करेंगे।

जयशंकर प्रसाद के नाटकों की साहित्यिक उत्कृष्टता पर कोई विवाद नहीं है, लेकिन नाट्य कला और रंगमंचीय प्रस्तुति की दृष्टि से विद्वानों में मतभेद है। इस पक्ष पर सभी दृष्टियों से विचार विमर्श के लिए जरूरी है कि हम यह समझने का प्रयास करें कि जयशंकर प्रसाद का नाट्य संबंधी सोच क्या था। प्रसाद ने नाटकों के बारे में बहुत नहीं लिखा है, लेकिन जो कुछ भी लिखा है, उसके अध्ययन द्वारा हम उनकी दृष्टि को पहचान सकते हैं।

स्कंदगुप्त लिखने से पहले प्रसाद कई अन्य नाटक लिख चुके थे। उनके सभी नाटक ऐतिहासिक घटनाओं और चरित्रों पर आधारित हैं। चाहे स्कंदगुप्त हो, या अजातशत्रु और चन्द्रगुप्त। ध्रुवस्वामिनी हो या राज्यश्री। ये सभी पात्र ऐतिहासिक हैं और उनके माध्यम से उन्होंने नाट्य रचना द्वारा इतिहास को पुनःसृजित करने का सफल प्रयत्न किया है। वे कारण कौन से थे, जिन्होंने प्रसाद को ऐतिहासिक कथानकों को चुनने के लिए प्रेरित किया, इसे समझने के लिए जरूरी है कि हम प्रसाद के नाटकों से परिचित हों। इस इकाई में आप उनके नाटकों के मौलिक स्वरूप की पहचान करने का प्रयास करेंगे।

प्रसाद के नाटकों में स्कंदगुप्त का महत्वपूर्ण स्थान है। स्कंदगुप्त भी एक ऐतिहासिक नाटक है। इसकी कथावस्तु गुप्त वंश के प्रसिद्ध सम्राट स्कंदगुप्त के जीवन पर आधारित है। स्कंदगुप्त का समय 5वीं सदी ई0 माना जाता है। यह वह समय है जब देश शकों और हूणों के हमलों से आक्रांत था। स्कंदगुप्त ने हूणों के हमलों से अपने राज्य की रक्षा की और आक्रमणकारियों का जबर्दस्त प्रतिरोध किया। जब प्रसाद ने स्कंदगुप्त की रचना की, तब देश पर अंग्रेजों का शासन था और आजादी की लड़ाई जारी थी। जाहिर है, देशभक्ति की भावना के प्रसार द्वारा लोगों को ज्यादा से ज्यादा इस संघर्ष में शामिल किया जा सकता था। यह तभी संभव था जब लोग, धर्म, जाति, भाषा और क्षेत्र के मतभेदों से ऊपर उठकर और एकजुट होकर अंग्रेजी शासन के विरूद्ध संघर्ष करते। इसी पृष्ठभूमि के परिप्रेक्ष्य में हमने इस नाटक की रचनाशीलता पर विचार किया है।

उपर्युक्त पहलुओं का अध्ययन करने से आपको स्कंदगुप्त नाटक को समझने में मदद मिलेगी, ऐसी आशा है।

इस खंड की पहली तीन इकाइयों में आपने भारतेंदु हरिश्चंद्र के प्रहसन अंधेर नगरी का अध्ययन किया था। हिंदी में नाटकों की शुरुआत का श्रेय भारतेंदु हरिश्चंद्र को है, जिन्होंने न सिर्फ कई नाटक लिखे बल्कि नाटक नामक पुस्तिका द्वारा उन्होंने अपनी नाटक संबंधी अवधारणा को भी प्रस्तुत किया था। नाटक संबंधी भारतेंदु की सोच का विवेचन करते हुए हमने पाया था कि वे आधुनिक हिदीं नाटक के लिए न तो पूरी तरह से संस्कृत नाट्य परंपरा और न ही पाश्चात्य नाट्य परंपरा के अनुकरण को सही मानते हैं। उनके अनुसार नाटक और रंगमंच में समयानुसार फेरबदल होना चाहिए। अंधेर नगरी जिसे उन्होंने प्रहसन कहा है, प्रहसन की संस्कृत नाट्यशास्त्र की परिभाषा के अनुरूप नहीं लिखा गया। उसकी संरचना पर पाश्चात्य नाट्य परंपरा का प्रभाव है, लेकिन उसकी कथा और प्रस्तुति पर भारत की लोक नाट्य परंपरा का भी प्रभाव साफ तौर पर देखा जा सकता है।

भारतेंदु युग के बाद हिंदी में नाटकों के लेखन की परंपरा चल निकली। स्वयं भारतेंदु के समय में कई और लेखकों ने नाटकों का लेखन किया। लेकिन भारतेंदु युग के बाद हिंदी नाटक के क्षेत्र में एक नये परिवर्तन का संकेत हमें छायावाद के दौर में मिला। जयशंकर प्रसाद जितने महत्वपूर्ण कवि थे, उससे कम महत्वपूर्ण नाटककार नहीं थे। ‘स्कंदगुप्त’ के अलावा उन्होंने चंद्रगुप्त, अजातशत्रु, ध्रुवस्वामिनी, विश्वास, कामना, जनमेजय का नागयज्ञ, राज्यश्री और एकचूंट नाटकों की रचना की। प्रसाद के । नाटक न सिर्फ भारतेंदु युग के नाटक से भिन्न थे, बल्कि स्वयं उनके समकालीन नाटककारों से भी अलग थे।

जयशंकर प्रसाद मूलतः कवि थे। हालांकि वे प्रेमचंद के समकालीन थे, लेकिन उनकी रचनात्मक प्रतिभा प्रेमचंद से काफी भिन्न तरह की थी। यद्यपि दोनों लेखक स्वतंत्रता संघर्ष से गहरे रूप में प्रभावित थे, लेकिन स्वतंत्रता संघर्ष का प्रभाव दोनों पर भिन्न-भिन्न तरह का था। प्रसाद पर राष्ट्रीय चेतना का प्रभाव भाववादी और सांस्कृतिक था जबकि प्रेमचंद पर यथार्थवादी औरर सामाजिक। इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रसाद पर तत्कालीन सामाजिक यथार्थ का असर नहीं था। और न ही प्रेमचंद सांस्कृतिक और भावात्मक पक्षों की उपेक्षा करते थे। लेकिन दोनों की राष्ट्रीय चेतना की केंद्रीय विशेषता अलगअलग थी और यही वजह है कि प्रेमचंद ने अपनी अधिकांश रचनाओं में समकालीन यथार्थ को ही अंतर्वस्तु का आधार बनाया है जबकि प्रसाद के नाटक और कहानियाँ अधिकांशतः ऐतिहासिक अंतर्वस्तु पर आधारित है। इतिहास के प्रति प्रसाद का दृष्टिकोण क्या था, इसपर विचार हम आगे करेंगे।

प्रसाद के नाटकों पर विचार करते हुए उनके कवि होने को ध्यान में रखना जरूरी है। प्रसाद के नाटकों में गीतों का बहुलता से प्रयोग ही इस बात का साक्षी नहीं है बल्कि नाटक में कथा का विकास, पात्रों के अंतर्द्वद्व का चित्रण और संवादों की भाषा में भी हम उनके कवि हृदय का प्रमाण पा सकते हैं। ‘स्कंदगुप्त’ के संदर्भ में हम इस पक्ष की चर्चा इस इकाई में रचनाशीलता पर विचार करते हुए करेंगे।

प्रसाद का नाट्य संबंधी सोच

जयशंकर प्रसाद ने नाटकों की रचना के साथ-साथ नाटक विधा के बारे में समय-समय पर अपने विचार प्रस्तुत किए हैं। उन्होंने इस विषय पर बहुत अधिक नहीं लिखा है, लेकिन जो भी लिखा है, उससे नाटक संबंधी उनके विचारों को समझने में पर्याप्त मदद मिलती है। प्रसाद ने ‘हिंदी में नाटक का स्थान नाटकों में रस का प्रयोग, नाटकों का आरंभ और रंगमंच नामक अपने लेखों में नाटक और रंगमंच पर विचार किया है। नाटक संबंधी उनके विचारों का विवेचन इन निबंधों के आधार पर ही किया गया है।

नाटक संबंधी चिंतन का आधार

जयशंकर प्रसाद ने जब नाटक लिखना आरंभ किया था, तब हिंदी में नाटकों की समृद्ध परंपरा नहीं थी। भारतेंदु युग के लेखकों द्वारा लिखे नाटक ही उनके सामने मौजूद थे। लेकिन उनके समक्ष संस्कृत और पश्चिमी नाटकों की समृद्ध परंपरा मौजूद थी। उनके लेखन से यह जाहिर होता है कि उन्होंने संस्कृत के नाटकों का ही नहीं वरन् संस्कृत में नाट्य संबंधी अवधारणाओं का भी गहरा अध्ययन-मनन किया था। इसके साथ ही वे पश्चिम के नाट्य चिंतन और नाटकों की परंपरा से भी भलीभाँति परिचित थे। भारत में उस समय जो रंगमंच उपलब्ध था, उस पर पश्चिम के नाटकों और रंगमंच का गहरा असर था। लेकिन यह असर दो रूपों में दिखाई देता है। पहला, शिक्षित समाज के लिए खेला जाने वाला आभिजात्य नाटक और दूसरा, जनसाधारण के लिए खेला जाने वाला पारसी रंगमंच। प्रसाद हिंदी पर इस पारसी रंगमंच के प्रभाव को अच्छा नहीं समझते थे और वे पाश्चात्य प्रभाव के इन दोनों रूपों से भिन्न भारत की अपनी नाट्य परंपरा के अनुरूप हिंदी नाटक और रंगमंच के विकास के समर्थक थे। भारतेंदु हरिश्चंद्र से भिन्न प्रसाद ने प्रायः अपने नाटकों की रचना में लोकनाट्य परंपरा के प्रभाव को स्वीकार नहीं किया। यह उल्लेखनीय भी है कि प्रसाद ने नाटकों के बारे में अपने लेखन में संस्कृत नाट्य परंपरा का ही हवाला दिया है। पारसी रंगमंच की उनकी कटु आलोचना, जिसका उल्लेख हम आगे विस्तार से करेंगे, को भी सही परिप्रेक्ष्य में समझने की जरूरत है।

जयशंकर प्रसाद नाटक को ‘कला का विकसित रूप मानते हैं। उनके विचार में, नाटक में ‘सब ललित सुकुमार कलाओं का समन्वय है।’ यह कला का विकिसत रूप इसलिए भी है क्योंकि नाटक में दृश्य और श्रव्य दोनों कलाओं की अनुभूति होती है। प्रसाद नाटक का उद्देश्य यह नहीं मानते कि ‘जहाँ मनुष्य अपने को भूल जाए और तल्लीन हो जाए।’ वे प्रश्न करते हैं कि ‘क्या यह हृदय-वृत्ति को (Sentiment) उत्तेजित करके मोह लेना मात्र न होगा? क्या विवेक शुद्ध बुद्ध-सत्य (Reason) से उसका कुछ भी संबंध होगा? उनके अनुसार, ‘जो नाटक मनोभाव का विश्लेषण करके चमत्कार के बल से मोहता हुआ, अंतःकरण में आदर्श सत्य को स्वयंमेव विकसित कर देता है, उसे … सभी सभ्य । जातियों के साहित्य में सम्मान मिला है।’ नाटक की यह परिभाषा कई अर्थों में महत्वपूर्ण है। प्रसाद इसमें मनुष्य के मनोभावों की प्रस्तुति के माध्यम से चमत्कार उत्पन्न करने और उसके द्वारा दर्शक के हृदय में सहज रूप से आदर्श को विकसित करने पर जोर देते हैं। सरल शब्दों में कहें तो प्रसाद नाटकीयता और सोद्देश्यता दोनों को नाटक के लिए जरूरी मानते हैं।

प्रसाद ने नाटकों में रस के प्रयोग के संदर्भ में नाटक की भारतीय और पाश्चात्य धारणाओं की तुलनात्मक विवेचना की है। प्रसाद के अनुसार पश्चिम में कला को अनुकरण माना जाता है जबकि यहाँ कला में दार्शनिक सत्य की प्रतिष्ठा की जाती है। भरत के हवाले से वे कहते हैं कि आत्मा का अभिनय भाव है। भाव ही आत्म-चैतन्य में विश्रान्ति पा जाने पर रस होते हैं। जैसे विश्व के भीतर से विश्वात्मा की अभिव्यक्ति होती है, उसी तरह नाटकों से रस की।’ इस कथन का तात्पर्य स्पष्ट है। यहाँ यह दोहराने की जरूरत नहीं है कि रस सिद्धांत का विकास नाटक के संदर्भ में ही हुआ था। भरत का रसनिष्पति संबंधी प्रसिद्ध सूत्र’तत्र विभावानुभावव्यभिचारी संयोगाद् रस निष्पत्ति’ में तत्र का तात्पर्य रंगमंच ही है जहाँ नाटक का अभिनय प्रस्तुत किया जाता है। भरत के अनुसार नाटक देखते हुए जो हृदय स्थित भाव है, वही परिपक्व होकर रस रूप में परिणत होते हैं। जब अभिनेता अपने आत्म चैतन्य में तल्लीन हो जाता है तो उसका भाव रस रूप में परिणत हो जाता है। इस प्रकार पश्चिम मे नाटक के केंद्र में अनुकरण होता है जबकि भारत में रस।

प्रायः यह बात कही जाती है कि भारतीय नाटकों का अंत हमेशा सुख या आनंद में होता है जबकि पश्चिम में बल दुखांत पर रहता है। प्रसाद विचार है कि पश्चिम के लोगों को आर्यों के विपरीत उपनिवेशों की खोज में दुर्गम भूभागों में भटकना पड़ा और विपरीत परिस्थितियों से निरंतर संघर्ष करते हए उन्हें जीवन जीना पड़ा। जीवन की इस कठिनाई पर अधिक ध्यान देने के कारण पश्चिम ने इस जीवन को ही दुःखमय (ट्रेजेडी) समझ लिया। प्रसाद का यह भी मानना था कि ‘ग्रीस और रोमन लोगों को बुद्धिवाद – भाग्य से, और उसके द्वारा उत्पन्न दुःखपूर्णता से संघर्ष करने के लिए अधिक अग्रसर करता रहा। उन्हें सहायता के लिए संघबद्ध होने पर भी, व्यक्तित्व के, पुरूषार्थ के विकास के लिए। मुक्त अवसर देता रहा, इसलिए उनका बुद्धिवाद, उनकी दुःख भावना के द्वारा अनुप्राणित रहा। इसी को साहित्य में उन लोगों ने प्रधानता दी।’ प्रसाद के इस कथन से स्पष्ट है कि पश्चिम के नाटकों में त्रासदी का जोर रहा तो इसीलिए कि उनकी परिस्थितियों ने उन्हें लगातार दुख और संघर्ष की ओर अग्रसर किया और चूंकि उन्होंने भावना की बजाए बुद्धि पर अधिक भरोसा किया इसलिए उन्होंने इस दुख को ही जीवन का सत्य समझ लिया। खास बात यह भी है कि प्रसाद इसको सिर्फ नाटकों का ही गुण नहीं मानते वरन् संपूर्ण पश्चिमी साहित्य की विशेषता मानते हैं।

बुद्धिवाद और दुख को प्रधानता देने के कारण ही प्रसाद के अनुसार पश्चिमी सिद्धांत मनुष्य के ‘चरित्रनिर्माण का पक्षपाती है। नाटक देखकर या कविता पढ़कर यदि मनुष्य अपने को बुराई की तरफ जाने से रोकता है और अपने चरित्र में संशोधन करता है तो साहित्य का लक्ष्य पूरा हो जाता है। मौजूदा साहित्य की दो प्रमुख विशेषताओं व्यक्ति-वैचित्र्य और यथार्थवाद को वे इसी दृष्टि से देखते हैं। स्वयं उनके शब्दों में, कहीं व्यक्ति से सहानुभूति उत्पन्न करके समाज का संशोधन है, और कहीं समाज की दृष्टि से व्यक्ति का! किंतु दया और सहानुभूति उत्पन्न करके भी वह दुःख को अधिक प्रतिष्ठित करता है, निराशा को अधिक आश्रय देता है।’

पश्चिम के विपरीत भारतीय परंपरा रस पर आधारित है। इसको प्रधानता देने का मुख्य कारण प्रसाद जी के अनुसार यह था कि आर्यों को पश्चिमवासियों की तरह घरबार छोड़कर इधर-उधर भटकना न पड़ा था। भारतीय आर्य निराशावादी नहीं थे। उनके शब्दों में, ‘करूण रस था, उसमें दया, सहानुभूति की कल्पना से अधिक थी रसानुभूति। उन्होंने प्रत्येक भावना में अभेद निर्विकार, आनंद लेने में अधिक सुख माना।’ प्रसाद जी का मानना है कि रस में लोकमंगल की भावना प्रच्छन्न रूप में विद्यमान रहती है। भारतीय परंपरा में लोकमंगल स्थूल सामाजिक रूप में नहीं बल्कि दार्शनिक सूक्ष्मता के आधार पर मौजूद रहता है। इसके विपरीत पश्चिम में वासना का आधार रहता है और ‘वासना से ही क्रिया संपन्न होती है और क्रिया के संकलन से व्यक्ति का चरित्र बनता है। चरित्र में महत्ता का आरोप हो जाने पर व्यक्तिवाद का वैचित्र्य उस महत्ती लीलाओं से विद्रोह करता है।’ इस प्रकार प्रसाद के अनुसार पश्चिम का साहित्य व्यक्ति और समाज की वासनात्मक क्रियाओं से ही संचालित और प्रेरित होता है, और यही कारण है कि उसमें किसी दार्शनिक श्रेष्ठता के दर्शन नहीं होते।

प्रसाद जी के अनुसार रसवाद को अपनाने के कारण मनुष्य की वासनात्मक मनोवृत्तियाँ साधारणीकरण के द्वारा आनंदमय बना दी जाती है। इससे मनुष्य की वासना का संशोधन हो जाता है। इससे मनुष्य की विशिष्टता और विभिन्नता समाप्त हो जाती है और उसकी भावनाओं को मानवीय आधार मिल जाता है। इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन से साफ है कि जयशंकर प्रसाद नाट्य रचना के लिए पश्चिम के अनुकरण सिद्धांत, बुद्धिवाद और दुख व निराशा को स्वीकार नहीं करते। वे नाटक में लोकमंगल को स्वीकार करते हुए भी रस को ही उसका लक्ष्य मानते हैं।

नाटक और रंगमंच

आमतौर पर यह मान्यता रही है कि नाटकों की रचना रंगमंच को ध्यान में रखकर की जानी चाहिए। लेकिन प्रसाद जी इससे सहमत नहीं हैं। उनका स्पष्ट मत है कि नाटकों की सुविधा जुटाना रंगमंच का काम है। वे इस बात को स्वीकार नहीं करते कि रंगमंच की नाटक में कंद्रीय स्थिति होती है। भारतीय रंगमंच के विकास पर विस्तार से विचार करते हुए उन्होंने इस बात पर बल दिया है। यहाँ यह ध्यान दिलाना आवश्यक है कि प्रसाद के नाटकों की रंगमंचीयता को लेकर हमेशा विवाद रहा है। संभवतः प्रसाद जी भी इस बात के प्रति सजग थे। यही कारण है कि उन्होंने नाटकों पर रंगमंच के दबाव को मानने से इनकार कर दिया। भारतीय रंगमंच की विकास परंपरा पर विचार करते हुए उन्होंने यह साबित करने का प्रयास किया है कि रंगमंच का निर्धारण नाटक से होता है, न कि रंगमंच नाटक को निर्धारित करता है। उन्हीं के शब्दों में, रंगमंच की बाध्य-बाधकता का जब हम विचार करते हैं, तो उसके इतिहास से यह प्रकट होता है कि काव्यों के अनुसार प्राचीन रंगमंच विकसित हए और रंगमंचों की नियमानुकूलता मानने के लिए काव्य बाधित नहीं हुए। अर्थात् रंगमंचों को ही काव्य के अनसार अपना विस्तार करना पड़ा और यह प्रत्येक काल में माना जाएगा कि काव्यों के अथवा नाटकों के लिए ही रंगमंच होते हैं।’ इसका कारण प्रसाद के अनुसार यह है कि रसानुभूति के अनंत प्रकार नियमबद्ध उपायों से नहीं प्रदर्शित किए जा सकते।’

रंगमंच के बारे में प्रसाद की यह धारणा इसलिए बनी क्योंकि प्रसाद के समय में जो रंगमंच उपलब्ध था, उससे वे संतुष्ट नहीं थे। उनका विचार था कि संस्कृत की जो सबल रंगमंचीय परंपरा थी, उसे मध्य युग में खत्म कर दिया गया। प्रसाद के अनुसार, ‘मध्यकालीन भारत में जिस आतंक और अस्थिरता का साम्राज्य था, उसने यहाँ की सर्व साधारण प्राचीन रंगशालाओं को तोड़-फोड़ दिया। धर्मान्ध । आक्रमणों ने जब भारतीय रंगमंच के शिल्प का विनाश कर दिया तो देवालयों से संलग्न मण्डपों में छोटे-छोटे अभिनय सर्व-साधारण के लिए सुलभ रह गए, प्रसाद का संकेत लोकनाट्य रूपों की तरफ है जो संस्कृत नाट्य परंपरा के विलुप्त होने के बावजूद लगातार खेले जाते रहे। भारत में लोक नाटकों की परंपरा अति प्राचीन है। अगर हम संस्कृत नाटकों की समृद्ध परंपरा पर विचार करें तो इस बात को आसानी से समझ सकते हैं कि संस्कृत नाटकों में जो प्रौढ़ता और शास्त्रीयता नज़र आती है, वह तब तक संभव नहीं हो सकती, जब तक कि उसके पीछे लोक नाटकों की परंपरा मौजूद न रही हो।

लेकिन जहाँ तक मध्ययुग में नाटकों की परंपरा के खत्म होने का सवाल है, तो उसका कारण ‘धर्मान्ध आक्रमण’ शायद नहीं है। यह एक मिथ्या धारण है कि मुसलमानों के आगमन के कारण नाटकों का लेखन और मंचन बंद हो गया जबकि सचचाई यह है, कि आठवीं सदी के बाद से ही नाटकों का मंचन काफी कम हो गया था जबकि परंपरागत लोक नाट्य रूपों की प्रस्तुति हमेशा अबाध रूप में जारी रही। नाटकों के लेखन और प्रदर्शन में लगातार कमी आने का कारण शायद यह था कि ब्राह्मण, बौद्ध और जैन धर्म का आभिजात और पंडित वर्ग नाट्य कला को हीन दृष्टि से देखता था। दूसरे इस पूरे दौर में राजनीतिक अस्थिरता और सामंतवर्ग की सांस्कृतिक पतनशीलता के चलते भी अभिजात्य रंगमंच आधारित नाटकों को राजाश्रय मिलना बंद हो गया। मुगलों के दौर में जब भक्ति आंदोलन ने एक व्यापक सांस्कृतिक जागरण की स्थिति पैदा की, तब आभिजात्य रंगमंच की वैसी आवश्यकता महसूस नहीं की गई क्योंकि भक्ति आंदोलन जनता के जिस हिस्से के बीच सक्रिय था, उसमें पहले से ही । लोक नाट्य की समृद्ध परंपरा मौजूद थी और भक्ति आंदोलन के दौर में इन नाट्य शैलियों का न केवल उपयोग किया गया बल्कि कई नई नाट्य शैलियाँ विकसित भी हुई। उसी मध्य युग में साहित्य, संगीत, चित्र, स्थापत्य आदि प्रायः सभी ललित कलाओं का अभूतपूर्व विकास हुआ था। अगर मध्यकालीन विदेशी आक्रमणकारी इसका कारण होते, तो इसका असर लोक नाट्य रूपों पर भी पड़ता। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसलिए प्रसादजी का यह विचार तथ्यपरक नहीं जान पड़ता कि नाटकों की परंपरा का लोप विदेशी आक्रमणकारियों की वजह से हुआ।

प्रसाद ने इसी क्रम में लिखा है कि ‘उत्तरीय भारत में तो औरंगजेब के समय में ही साधारण संगीत का भी जनाजा निकाला जा चुका था, किंतु रंगमंच से विहीन कुछ अभिनय बच गये, जिन्हें हम पारसी स्टेजों के आने के पहले भी देखते रहे हैं। यहां प्रसाद जी का संकेत कतिपय लोक नाट्य रूपों की ओर है। प्रसादजी ने इस बात पर विचार नहीं किया है कि पारसी थियेटर के नाटकों का संबंध क्या इन लोक नाट्य रूपों से भी रहा है या वे सिर्फ पश्चिम के अंधनुकरण से ही विकसित हुए हैं। इस मुद्दे पर विचार करने के लिए पारसी नाटक और रंगमंच की पृष्ठभूमि को जानना जरूरी है।

रंगमंचीय नाटकों को लिखने और खेले जाने की दुबारा शुरुआत अंग्रेजों के शासनकाल में हुई जब कलकत्ता और दूसरे माहनगरों में विदेशी, विशेषकर अंग्रेजी नाटक खेले जाने लगे। उन्हीं के अनुकरण में बाद में भारतीय भाषाओं में भी नाटक लिखे और खेले जाने लगे। रंगमंच आधारित इन नाटकों की दो परंपराओं का विकास हुआ। एक तरह के नाटक वे थे जिनका उद्देश्य नाट्य विधा का कलात्मक विकास करना था और जो नाटकों की रचना और मंचन को सामाजिक सोद्देश्यता से जोड़ते थे जबकि दूसरी तरह के नाटक वे थे जिनका उद्देश्य शुद्ध मनोरंजन था और इस मनोरंजन द्वारा वे थियेटर को व्यावसायिक रूप देना चाहते थे। इस दूसरे प्रकार के रंगमंच को लोकप्रिय बनाने में पारसी रंगमंच का बहुत बड़ा हाथ है, जिसका उल्लेख प्रसादजी ने किया है।

पारसी रंगमंच के बारे में कोई भी राय बनाने से पहले यह जान लेना बहुत जरूरी है कि इसकी शुरूआत किस तरह हुई। 1846 ई० में बंबई के मशहूर व्यापारी जगन्नाथ शंकर सेठ ने बंबई के ग्रांट रोड पर ग्रांट रोड थियेटर के नाम से नए थियेटर की शुरूआत की। शुरू में यहाँ अंग्रेजी मे नाटक खेले गए, परंतु जल्दी ही वहाँ गुजराती, मराठी और हिंदी-उर्दू में नाटक खेले जाने लगे। इस थियेटर को न तो सरकारी संरक्षण मिला था और न ही इसे अभिजात वर्ग के दर्शक देखने आते थे। आमतौर पर वहाँ नाविक, सिपाही और छोटे-मोटे व्यापारी, दुकानदार ही आते थे। 1853 तक इस थियेटर में अंग्रेजी में नाटक खेले जाते थे लेकिन जब हिंदुस्तानी दर्शकों की संख्या बढ़ने लगी तो नाटक भी हिंदुस्तानी भाषाओं में खेले जाने लगे। इसी दौरान बंबई में ‘पारसी ड्रामेटिक कोर’ का जन्म हुआ जिसने ग्रांट रोड थियेटर में ‘रूस्तम जबोली और सोहराब’ नाम से गुजराती नाटक प्रस्तुत किया।

इसकी कथा फिरदौसी के ‘शाहनामा’ से ली गई थी। इसके बाद तो पारसी थियेटर के नाम से हिंदुस्तानी भाषाओं में नाटकों का सिलसिला चल निकला। यहाँ यह कहना जरूरी है कि शुरू में पारसी थियेटर में फारस (ईरान) की कथाओं को नाटकों का विषय बनाया गया था लेकिन जब हिंदू-मुसलमान दर्शकों की संख्या बढ़ने लगी तो हिंदू-मुस्लिम इतिहास और परंपरा से भी कथानक लिए जाने लगे। पारसी थियेटर के नाटकों में ऐतिहासिक, पौराणिक विषयों का बोलबाला था और उन्हें प्रायः रूमानी और मेलोड्रामाई रूप में प्रस्तुत किया जाता था। हालांकि थोड़ा बहुत प्रभाव ऐलिजाबेथीय थियेटर का भी व्यक्त होता था। पारसी थियेटर के नाटकों का संगीत आमतौर पर शास्त्रीय संगीत था, विशेष रूप से ठुमरी, दादरा, झिंझोटी आदि का प्रयोग होता था। लेकिन कहीं-कहीं पश्चिमी संगीत का प्रभाव भी झलकता था। पारसी थियेटर में काव्य का स्तर आमतौर पर हल्का और बाजारू किस्म का होता था। शुरू में पारसी नाटकों में सगीत नहीं होता था। संवाद गद्य में होते थे, लेकिन बाद में संगीत और गीत तथ पद्यबद्ध संवाद पारसी रंगमंच की खास पहचान बन गए। पारसी रंगमंच के संदर्भ में इंदर सभा का उल्लेख करना जरूरी है। इंदर सभा के लेखक सैयद आगा हसन थे जो अमानत उपनाम से लिखते थे। इसकी रचना उन्होंने 1853 में की थी और पारसी थियेटर के नाटकों पर इसका जबर्दस्त प्रभाव पड़ा था। इंदर सभा में वे सब विशेषताएँ थीं जिन्हें पारसी थियेटर के लोकप्रिय नाटकों में अपनाया गया। चमत्कारपूर्ण कथा, संगीत, गीत, नृत्य और चुटीले पद्यबद्ध संवाद इंदर सभा की विशेषता थे। ‘इंदरसभा’ और उससे प्रभावित नाटकों की विशेषता यह थी कि वे सभी कविताबद्ध नाटक हैं जिनमें विभिन्न छंदों और रागरागिनियों का समावेश किया गया था।

जब प्रसाद ने नाटक लिखना आरंभ किया था, तब पारसी थियेटर अपनी लोकप्रियता के शिखर पर था। हिंदी जन समुदाय के बीच, विशेषकर शहरी लोगों के बीच यह रंगमंच अत्यंत लोकप्रिय था और नौटंकी जैसे कुछ लोकनाट्य रूपों पर भी इसका प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता था। इसलिए यह स्वाभाविक था कि प्रसादजी पारसी रंगमंच के प्रभाव से चिंतित होते। प्रसादजी को पारसी थियेटर देखने का अवसर मिला था और वे उसकी विशेषताओं से भलीभाँति परिचित थे। उन्होंने रंगमंच नामक निबंध में विस्तार से इस संबंध में अपने विचार रखे हैं।

प्रसादजी का मानना था कि पारसी रंगमंच ने शेक्सपीरियन स्टेज का अनुकरण किया था। उनका यह कथन कुछ सीमा तक सत्य है, लेकिन पूरी तरह सही नहीं। यह सत्य है कि पारसी रंगमंच की शुरूआत शेक्सपीरियन स्टेज के अनुकरण से हुई थी, लेकिन जब इसके दर्शक अंग्रेज़ी अभिजात वर्ग की बजाए साधारण लोग हो गए तो, इस मंच पर खेल जाने वाले नाटकों और उसकी प्रस्तुति में भी फेरबदल हो गया। इस परिवर्तन ने थियेटर का बाह्य रूप तो कमोबेश वही रखा, लेकिन आंतरिक संरचना में बदलाव ला दिया। नाटकों की प्रस्तुति में ऐलिजाबेथीयन अभिजात का दबाव काफी कम हो गया। प्रसाद का यह कहना भी कुछ हद तक सही है कि पारसी रंगमंच पर भारतीय रंगमंच का प्रभाव नहीं था। लेकिन ऐसा नहीं है कि उसका भारतीय रंगमंच से कोई संबंध नहीं था। वस्तुतः प्रसादजी जिसे भारतीय रंगमंच कह रहे हैं, वह भारतीय रंगमंच की अभिजात परंपरा है, जिसका प्रभाव कुछ कथानकों को छोड़कर पारसी रंगमंच पर नज़र नहीं आता। लेकिन इंदर सभा, चित्रा-बकावली, चद्रावली, हरिश्चंद्र आदि जिन नाटकों की उन्होंने चर्चा की है, उनका संबंध भारत की उस नाट्य परंपरा से है, जिसका मूल लोक नाटकों में है। नौटंकी, भाण, आदि नाट्य रूपों को फारसी प्रेम कथाओं और अंग्रेजी रंगमंच से मिलाकर पारसी रंगमंच ने अपना मार्ग बनाया था।

पारसी रंगमंच पर विचार करते हुए प्रसादजी ने लिखा है कि ‘दृश्यांतर और चित्रपटों की अधिकता के साथ ही पारसी स्टेज ने पश्चिमी ट्युनों का भी मिश्रण भारतीय संगीत में किया। उनका कहना था कि यह काम बंगाल ने भी किया लेकिन बंगाल ने इतने भद्दे ढंग से नहीं किया था, जितने भद्दे ढंग से पारसी थियेटर ने किया था। प्रसादजी लिखते हैं, ‘पारसी स्टेज में दृश्यों और परिस्थितियों के संकलन की प्रधानता है। वस्तु-विन्यास चाहे कितना ही शिथिल हो, किंतु अमुक परदे के पीछे वह दूसरा प्रभावोत्पादक परदा आना ही चाहिए, कुछ नहीं तो एक असंबद्ध फूहड़ भडैती से ही काम चल जाएगा।’ प्रसादजी की उक्त आलोचना से साफ है कि एक तो वे इस बात के विरूद्ध थे कि नाटकों में दृश्यों और दृश्यांतरों की प्रधानता हो। बास्बार दृश्यों के बदलने और दृश्यों की संख्या ज्यादा होने को वे उचित नहीं मानते। इस प्रवृत्ति को वे पारसी रंगमंच से जोड़ते हैं। वे इस प्रवृत्ति की भी आलोचना करते ‘ हैं कि रंगमंच पर भड़कीले परदे लगाए जाएं। लेकिन ये तो बाहरी ढांचा है, किसी नाटक की रचनात्मक प्रस्तुति में कई आंतरिक तत्व होते हैं, उन्हें भी मद्देनज़र रखने की जरूरत है। प्रसादजी दृश्यों की संख्या जयादा होने की आलोचना करते हैं, लेकिन स्वयं उनके नाटकों में दृश्यों की बहुलता है। उदाहरण के लिए, स्कंदगुप्त के पाँच अंकों में कुल 33 दृश्य हैं यानी प्रत्येक अंक में 6 या 7 दृश्य। इसी तरह चंद्रगुप्त के अंकों में तो दृश्यों की संख्या 10 से 14 तक हैं। प्रसाद ने अपने नाटकों में जैसे क्रिया व्यापार शामिल किए हैं, उन्हें मंच पर प्रस्तत करना नामुमकिन-सा है। उनका प्रभाव उत्पन्न करने के लिए प्रसाद के नाटको में भी भड़कीले पर्दो की जरूरत होती है। कहने का तात्पर्य यही है कि प्रसादजी पारसी रंगमंच की आलोचना करते हुए भी उसकी कई विशेषताओं को अपने में समाहित किए हुए है। इस मसले पर हम विस्तार से आगे विचार करेंगे।

प्रसादजी का मुख्य मुद्दा यह है कि रंगमंच को नाटक की जरूरतों के अनुसार निर्मित किया जाना चाहिए। इस बारे में प्रसादजी का अपना मत स्पष्ट है लेकिन हमें यह देखना होगा कि क्या उनका यह दृष्टिकोण सही है? नाटककार जब यह तय करता है कि वह एक नाटक लिखेगा, तो क्या उसका यह निर्णय ही उसे इस बात से बाँध नहीं देता कि वह रंगमंच पर खेले जा सकने वाले नाटक की रचना करे? अगर नाटक को खेला जाना है, तो उसे रंगमंच की जरूरतों के अनुरूप होना होगा। लेकिन रंगमंच कभी एक-सा नहीं रहा। वह लगातार बदलता रहा है। अगर कोई चीज़ स्थिर है तो यही कि नाटक की प्रस्तुति अभिनय के द्वारा होती है। यह भी आवश्यक नहीं है कि नाटक रंगमंच पर या प्रेक्षागृह में प्रस्तुत हो। लेकिन अभिनय विहीन नाटक नहीं हो सकता। स्पष्ट है कि नाटक को खेला जाएगा। इसलिए जब कोई रचनाकार नाटक लिखने को तत्पर होता है तो उसके मन में नाटक की मंचीय प्रस्तुति की कोई संकल्पना अवश्य रहती है। उसी संकल्पना के अनुरूप नाटक की रचना आकार ग्रहण करती है। यह संकल्पना उस रंगमंच का अनुकरण करे जो नाटक की रचना के दौर में मौजूद थी यह आवश्यक नहीं है । लेखक एक नयी तरह की संकल्पना के अनुसार भी नाटक की रचना कर । सकता है। ऐसी स्थिति में मंचन के लिए नाटक में अंतर्निहित उस संकल्पना को समझते हुए निर्देशक रंगमंच को नया रूप प्रदान करता है, ताकि नाटक को सफलता के साथ खेला जा सके। इसलिए जब प्रसाद यह कहते हैं कि काव्यों (नाटकों) की सुविधा जुटाना रंगमंच का काम है और रंगमंच को नाटक के अनुसार अपना स्वरूप धारणा करना चाहिए तो उसका तात्पर्य इतना ही हो सकता है।

अब प्रश्न यह उपस्थित होता है कि क्या प्रसाद के नाटक रंगमंच पर प्रस्तुत करने के योग्य नहीं है? इस प्रश्न का उत्तर दो ढंग से दिया जा सकता है। एक तो यह कि स्कंदगुप्त सहित प्रसाद के लगभग सभी प्रमुख नाटक आरंभ से ही मंच पर खेले गये हैं। यही नहीं उनके नाटकों की विविध प्रस्तुतियाँ यह भी बताती हैं कि उनके नाटकों में नवीन प्रयोगों की पर्याप्त संभावना निहित है। दूसरा, यह कि इन प्रस्तुतियों के बावजूद मोहन राकेश के नाटक या हिंदीतर भाषाओं के लोकप्रिय नाटकों की प्रस्तुति की तुलना में प्रसाद के नाटकों को खेलना कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण रहा है। पात्रों की अधिकता, ऐसी घटनाओं का चित्रण जिन्हें यथार्थवादी रंगमंच पर प्रस्तुत करना असंभव सा है, उनका बाहुल्य लंबे और क्लिष्ट संवाद, दृश्यों की बहुलता आदि ऐसे कई पक्ष हैं, जिनके कारण नाटकों को खेलना आसान नहीं होता। उदाहरण क लिए ‘स्कंदगुप्त’ के अंक एक के दृश्य सात का निम्नलिखित रंग संकेत देखें :

भीमवर्मा का प्रस्थान। द्वार का टूटना। विजयी शत्रु-सेनापति का प्रवेश। पुनः भीमवर्मा का आकर रोकना। गिरते-गिरते भीमवर्मा का जयमाला और देवसेना की सहायता से युद्ध । सहसा स्कंदगुप्त का सैनिकों के साथ प्रवेश। युवराज स्कंदगुप्त की जय का घोष। शक और हूण स्तंभित होते हैं।

इस रंग संकेत में युद्ध का यह विवरण चाहे कितना भी विशाल रंगमंच क्यों न हो, एक ऐसे युद्ध का यथार्थ अभिनय प्रस्तुत नहीं कर सकता, जिसे देखकर पाठक कह सकें कि हां यह वह युद्ध है जिसने पूरे राष्ट्र को हिला दिया था और जिसका प्रभाव देश के भविष्य पर भी पड़ा था। ‘स्कंदगुप्त’ में ऐसे कई प्रसंग हैं। मसलन, अंक तीन का पाँचवा दृश्य का यह रंग संकेत देखें :

नेपथ्य में रणवाद्य। शत्रु सेना आती है। हूणों की सेना से विकट युद्ध । हूणों का मरना, घायल होकर भागना। बंधुवर्मा की अंतिम अवस्था। गरूड,ध्वज टेककर उसे चूमना।

यहां भी एक बहुत बड़े युद्ध को दो-चार सैनिकों को मंच पर दिखाने से क्या वह प्रभाव उत्पन्न किया जा सकता है, जो वास्तव में होना चाहिए। लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण पक्ष है, जिस पर विचार करने की आवश्यकता है। प्रसाद के नाटकों में इस तरह दृश्य की उपर्युक्त आलोचना उस यथार्थवादी रंग दृष्टि से उत्पन्न हुई है जिसके अनुसार रंगमंच पर वे ही घटनाक्रम प्रस्तुत किये जाने चाहिए जो यथार्थ और विश्वसनीय लगे। यह रंग दृष्टि हमेशा विवाद का विषय रही है। यहाँ इस बात पर विस्तार से चर्चा करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन कोई भी कल्पनाशील निर्देशक ऐसे दृश्यों को जिन्हें यथार्थपूर्ण ढंग से प्रस्तुत नहीं किया जा सकता, उसे वह ऐसे सांकेतिक रूप में जरूर प्रस्तुत कर सकता है कि उसका प्रभाव प्रेक्षकों के लिए लगभग वैसा ही हो, जैसा किसी बहुत बड़े युद्ध का होता है। मसलन, रामलीला में सैंकड़ों सालों से राम और रावण युद्ध का अभिनय किया जाता रहा है, और दर्शकों के सामने यह समस्या कभी नहीं आई कि युद्ध का वह दृश्य यथार्थपरक है या नहीं। कहने का तात्पर्य यही है कि नाटककार रंगमंच के उस रूप को भले ही स्वीकार न करे, जो उसके दौर में मौजूद है, लेकिन रंगमंच (या कहना चाहिए नाट्य प्रस्तुति) की कोई संकल्पना उसके मानस में अवश्य विद्यमान रहती है, प्रसाद के संदर्भ में यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि पारसी थियेटर को अस्वीकार करते हुए भी उनकी नाट्य संकल्पना काफी हद तक उससे प्रेरित और प्रभावित है।

प्रसाद की नाट्यकला का मौलिक स्वरूप

जयशंकर प्रसाद की नाट्यकला के संबंध में उपर्युक्त बातचीत के आधार पर हम कुछ निष्कर्ष निकाल सकते हैं। पहली बात तो यह कि प्रसाद के लिए नाटक एक साहित्य विधा है और इसी साहित्यिक रचनाशीलता कि रक्षा करना इसकी पहली शर्त मानते हैं। इसी से प्रेरित होकर वे इस बात को बल के साथ कहते हैं क नाटक की रचना रगमंच को ध्यान में रखकर नहीं की जानी चाहिए। बल्कि नाटक के अनुसार रंगमंच को रूपांतरित किया जाना चाहिए। प्रसाद के नाट्य सबंधी इसी परिप्रेक्ष्य ने उन्हें यह स्वतंत्रता दी है कि वे नाटकों को मंचित करने के लिए जो आधारभूत अपरिहार्यताएं मानी जाती रही हैं, उनसे वे नाटक लिखते हुए बंधे न रहें। इससे उनके नाटकों का वैशिष्ट्य तो निर्मित हुआ है, लेकिन इसी विशिष्टता के कारण उनके नाटकों को मंचित करना एक चुनौती बना हुआ है। इसका तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि प्रसाद के नाटकों को खेला नहीं जा सकता। इसके विपरीत उनके कई नाटक लिखे जाने के बाद से बार-बार भिन्न-भिन्न रंगकर्मियो द्वारा खेले जाते रहे हैं और इनमें से कई प्रस्तुतियां सफल भी रही हैं।

जयशंकर प्रसाद की नाट्य कला के मौलिक स्वरूप को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। प्रसाद के नाटकों को इस दृष्टि से देखा जाना चाहिए कि उनकी रचना साहित्यिक कृति के रूप में करने में वे किस हद तक कामयाब रहे हैं। प्रसाद के नाटकों का सही मूल्यांकन इस बात से नहीं होगा कि उनका मंचन कितनी सफलता के साथ किया जा सकता है बल्कि एक रचनात्मक कृति के तौर पर वह कितना प्रभावशाली है। यह प्रसाद के नाटकों की शक्ति भी है और सीमा भी। इस दृष्टि से अगर हम स्कंदगुप्त पर विचार करें तो हम पाते हैं कि भले ही उसका मंचन करन में कठिनाइयां उत्पन्न हो, लेकिन साहित्यिक रचना के रूप में उनका अध्ययन अत्यंत प्रभावशाली है। लोकप्रिय नाटकों की व्यावसायिक परंपरा से नाटकों को मुक्त करने के लिए यह ज़रूरी था। मनोरंजन और व्यावसायिकता से भिन्न सोद्देश्यता और रचनात्मकता से अनुप्रेरित होकर उन्होंने नाटकों की रचना की। उनके सभी नाटक राष्ट्रीय मुक्ति और नवजागरण की भावना से प्रेरित होकर लिखे गए हैं। राष्ट्रीय मुक्ति के विराट संघर्ष के सामने जो चुनौतियां मौजूद थीं, उन्हीं से उन्होंने नाटकों की कथावस्तु का ताना-बाना बुना है। इसके लिए उन्होंने इतिहास के ऐसे खंडों का इस्तेमाल किया है, जहां इसी तरह के विराट संघर्ष हुए होंगे।

स्कंदगुप्त की कथावस्तु का निर्माण भारतीय इतिहास के ऐसे कालखंड के आधार पर ही किया गया है जब देश एक ओर विदेशी आक्रांताओं (हूणों) से पददलित हो रहा था, तो दूसरी ओर देश के अंदर ब्राह्मण धर्म और बौद्ध धर्म के बीच तलवारें खिंची हुई थीं अगर हम स्कंदगुप्त को एक रूपक कथा समझें तो हम आसानी से जान सकते हैं कि जो स्कंदगुप्त के समय में हूण हैं, वही स्वयं प्रसाद के समय में अंग्रेज हैं। जो स्कंदगुप्त के समय में ब्राह्मण और बौद्ध हैं, वही प्रसाद के समय में हिंदू और मुसलमान हैं। इस प्रकार प्रसाद इतिहास को इस तरह रचते हैं कि वह समकालीन दौर का ही प्रातिनिधिक रूप बन जाता है।

प्रसाद ऐतिहासिक कथानक उठाते हैं, लेकिन उसका फलक अति विराट होता है। प्रायः उनकी रचनाओं में संपूर्ण राष्ट्र की समस्याएं अभिव्यक्त होती है। वे उन्हें सरल रूप में नहीं वरन जटिल रूप में रखते हैं। उनके सम्मुख राष्ट्रीय और सांस्कृतिक जीवन के विविध रूप उपस्थित रहते हैं। इसी राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में हमें उनके नाटकों को देखना होगा। हिंदी में नाटकों को इतने विराट परिप्रेक्ष्य में रचने का ऐसा उपक्रम बहुत कम हुआ है। इस दृष्टि से प्रसाद के नाटक अन्यतम कहे जा सकते हैं।

प्रसाद के नाटकों में संवादों की भाषा की भी काफी आलोचना की जाती रही है। संस्कृतनिष्ठ, तत्सम शब्दावली और काव्यात्मक विशेषताओं से युक्त भाषा को नाटकों के लिए बहुत उपयुक्त नहीं माना जाता। प्रसाद की भाषा को मोहन राकेश के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाले नाटकों से तुलना करने पर प्रसाद के नाटकों की भाषा की सीमा और अधिक उजागर होती है। लेकिन प्रसाद के नाटकों की भाषिक विशेषता के मूल्यांकन का यह उपयुक्त तरीका नहीं है। उनकी नाट्य भाषा को उनके पूर्व के नाटकों की भाषा, तत्कालीन लोकप्रिय नाटकों की भाषा और स्वयं प्रसाद की भाषा के परिप्रेक्ष्य में ही देखना होगा। प्रसाद पारसी नाटकों की उर्दू-मिश्रित हिंदी से नाटकों की भाषा को छुटकारा दिलाना चाहते थे। वह नाटकों की भाषा को साहित्यिक, परिनिष्ठत और रचनात्मक भी बनाना चाहते थे। इन दोनों तरह के प्रयत्नों को वे अपनी भाषा-प्रकृति के साथ ही पूरा कर सकते थे। वे छायावाद के प्रमुख स्तंभ थे, इसलिए छायावाद की काव्य भाषा का असर उन पर जबर्दस्त था, जिसको हम उनके नाटकों की भाषा में भी देख सकते हैं।

लेकिन प्रसाद के नाटकों में कथावस्तु की प्रस्तुति कहानी और उपन्यास की तरह नहीं की गई है। स्कंदगुप्त की कथावस्तु में हमें पर्याप्त नाटकीय तत्व मिलते हैं। पहले अंक के पहले दृश्य में ही पाठक को आभास हो जाता है कि कथावस्तु के केंद्र में कौन-सी समस्या है। पहले अंक के पहले दृश्य से अंतिम अक के अंतिम दृश्य तक हमें इस समस्या के विभिन्न पहलू, समस्या के समाधान में आने वाली कठिनाइयां, संघर्ष की विभिन्न स्थितियां और अंत में समस्या का समाधान तक की यात्रा नज़र आती है। स्कंदगुप्त नाटक में कथा का पूरा विकास ही नाटक के रूप में हुआ है। नाटक में संघर्ष की प्रधानता रहती है वह संघर्ष बाहरी हो या आंतरिक। इस दृष्टि से विचार करने पर भी हम यही पाते हैं कि प्रत्येक अंक और प्रत्येक दृश्य में संघर्ष की प्रधानता है। बाहरी आक्रमण से देश की रक्षा का प्रश्न हो, चाहे ब्राह्मणों और बौद्धों का संघर्ष हो या देवसेना, विजया और स्कंदगुप्त का आंतरिक द्वंद्व हो। इस इकाई का उद्देश्य ‘स्कंदगुप्त’ की कथावस्तु का विवेचन करना नहीं है। लेकिन उपर्युक्त बात से यही कहना चाहते हैं कि प्रसाद ने नाटकों की रचना नाटकों की मूल विशेषताओं को ध्यान में रखकर ही की है।

प्रसाद के नाटकों का एक दोष यह माना जाता है कि उनमें पात्रों की बहुलता होती है। ‘स्कंदगुप्त’ में ही पच्चीस से अधिक पात्र हैं। नाटक में ज्यादा पात्र होने पर उनके निजत्व को चित्रित करना नाटककार के लिए मुश्किल हो जाता है। इस दृष्टि से विचार करने पर हम पाते हैं कि यद्यपि प्रसाद के नाटकों में पात्रों की संख्या ज्यादा अवश्य है, लेकिन कथा के केंद्र में एक-दो पात्र ही होते हैं। जैसे ‘स्कंदगुप्त’ में स्वयं स्कंदगुप्त और देवसेना। लेकिन प्रसाद की सफलता इस बात में है कि चरित्र छोटा हो या बड़ा उसकी विशिष्टता और महत्व को पूरी तरह से चित्रित करने में वे सफल होते हैं।

‘स्कंदगुप्त’ की रचनाशीलता

‘स्कंदगुप्त’ जयशंकर प्रसाद की एक प्रौढ़ रचना है। ऐतिहासिक कथावस्तु पर आधारित इस नाटक के द्वारा प्रसाद ने अपने दौर के राष्ट्रीय स्वाधीनता संघर्ष के सम्मुख उपस्थित विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक समस्याओं को स्कंदगुप्त के समय के संदर्भ में रखकर नाटक रूप में प्रस्तुत किया है। स्कंदगुप्त का समय ईसवीं की पांचवी शताब्दी जाना जाता है। उस समय भारत में सामंती राज्य व्यवस्था थी। भारत जिसे हम आज एक राष्ट्र राज्य के रूप में जानते हैं, स्कंदगुप्त के समय वह राष्ट्र राज्य के रूप में नहीं था। लेकिन आज जिसे हम भारत कहते हैं, उसके भौगोलिक क्षेत्र के बाहर से लगातार लोगों का आवागमन होता रहा है। आर्यों से लेकर अंग्रेज़ों तक। लेकिन इन आगमनों को भारत नामक राष्ट्र-राज्य के ऊपर बाहरी आक्रमण के रूप. में देखा जाना चाहिए या नहीं, यह एक अलग प्रश्न है।

जयशंकर प्रसाद ने स्कंदगुप्त के दौर की दो विशेषताओं को वर्तमान से जोड़ा है। स्कंदगुप्त के समय हूणों के शासन वाले भारत के उत्तरी इलाकों पर हमला करके स्कंदगुप्त ने उन्हें मुक्त कराया था। उस समय भारत अंदरुनी रूप में एक सशक्त राज्य नहीं था। वह छोटे-छोटे राज्यों में बिखरा हुआ था। हूणों के समय देश में दो प्रमुख धर्म थे ब्राह्मण धर्म और बौद्ध धर्म । हूण भी बौद्ध धर्मावलंबी थे। स्वयं प्रसाद के समय भी भारत हिंदू और इस्लाम दो धर्मों में बंटा हुआ था। अंग्रेजों को भारत से भगाने के लिए यह जरूरी था कि लोगों में सामंजस्य और एकता स्थापित हो। प्रसाद के साहित्य की मूल चिंता राष्ट्रीय मुक्ति और राष्ट्रीय जागरण था। उसी से प्रेरित होकर उन्होंने अपने अधिकांश नाटकों की रचना की। स्कंदगुप्त में भी हम यही चिंता देखते हैं।

प्रसाद की भारतीय इतिहास में गहरी रुचि थी और उसका गहन अध्ययन भी उन्होंने किया था। जैसा कि हम पहले लिख चुके हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप पर । लगातार बाहरी प्रदेशों से लोगों का आना-जाना लगा रहा। उनमें से कई जातियों ने भारत के विभिन्न प्रदेशों पर शासन भी किया था। प्रसाद इन बाहरी लोगों को हमलावरों के रूप में चिन्हित करते हैं और उनके विरुद्ध संघर्ष को वर्तमान शासकों के विरुद्ध संघर्ष से जोड़ते हैं। ‘स्कंदगुप्त’ की रचना के पीछे भी यही उद्देश्य था। पांचवी सदी में भारत के उत्तरी और पश्चिम प्रांतों पर हूणों और शंकों का शासन था और मालव (उज्जैन) के शासक स्कंदगुप्त ने उनको पराजित किया था। ‘स्कंदगुप्त’ के इस पराक्रम को वे राष्ट्रीय गौरव के रूप में देखते हैं और मानते हैं कि स्कंदगुप्त के पराक्रम की ज़रूरत आज भी है। ऐसा नायक जो राष्ट्र को बाहरी हमलावरों से मुक्त कराने के अभियान का नेतृत्व कर सके। चंद्रगुप्त, चाणक्य, स्कंदगुप्त आदि ऐसे ही नायक हैं।

प्रसाद के समय राष्ट्रीय आंदोलन का नेतृत्व कांग्रेस के हाथ में था। कांग्रेस ने भारत जैसे विविध राष्ट्रीयताओं वाले देश को एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास किया था। इसके बावजूद धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा आदि की समस्याएं बार-बार उभर आती थीं। राष्ट्रीय मुक्ति का संघर्ष तब तक सफल नहीं हो सकता था जब तक कि विभिन्न धर्मों, विभिन्न जातियों और विभिन्न भाषा-भाषियों के लोगों में एकता स्थापित न हो और वे भारत को अपना वतन मानकर उसके लिए दूसरे हमवतनों के साथ मिलकर संघर्ष के लिए तैयार न हो। राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम की इस केंद्रीय चिंता को प्रसाद ने स्कंदगुप्त में भी कथावस्तु का अंग बनाया है। ब्राह्मण धर्म और बौद्ध धर्म में टकराव, विभिन्न प्रांतों में परस्पर द्वेष और संघर्ष, सत्ता हथियाने के लिए विदेशी हमलावरों से साठगांठ आदि कहीं-न-कहीं प्रसादकालीन राष्ट्रीय संघर्ष की भी समस्याएं थीं और अपने नाटकों के द्वारा वे इनके प्रति लोगों को जागरूक बनाने और एक्यबद्ध करने का प्रयास कर रहे थे।

लेकिन प्रसाद की चिंता सिर्फ राष्ट्र की चिंता ही नहीं थी। वे राष्ट्रीय और सामाजिक समस्याओं से जूझते स्त्री-पुरुषों की निजी समस्याओं को भी उतना ही महत्व देते थे। प्रसाद की यह विशेषता रही है कि वे अपने नायकों को अपने लक्ष्य की पूर्ति करने वाला मानव नहीं बनाते थे। वे उन्हें ऐसा मनुष्य बनाते थे, जिसमें भी मनुष्योचित कमजोरियां होती हैं और जिसका हृदय भी टूटता है, जो निराश भी होता है और जिसे कभी-कभी सब कुछ व्यर्थ और सारहीन लगता है। व्यक्ति अपनी भावनाओं और लक्ष्यों के बीच अंतर्द्वद्व से गुजरकर ही अपनी गतिविधियों को दिशा देता है। उन्हीं गतिविधियों से उसके नायकत्व या खलनायकत्व का निर्धारण होता है। प्रसाद की रचनाशीलता की यह प्रमुख विशेषता है जो उन्हें अपने समाकलीनों से भिन्न और विशिष्ट बनाती है।

प्रसाद की रचनाशीलता की एक अन्य विशेषता यह भी है कि स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिलता को भी अपनी रचनाओं का विषय बनाते हैं। यह विशेषता उनके काव्य, नाटक, कहानी और उपन्यास लेखन में देख सकते हैं। स्कंदगुप्त में स्कंदगुप्त, देवसेना और विजया के बीच संबंधों की जटिलता और उनके अंतर्द्वद्व के चित्रण के लिए वे अपने नाटक में पर्याप्त अवकाश निकाल लेते हैं और वह कथा के मूल ढाँचे के साथ अत्यंत स्वाभाविक भी लगता है।

सारांश

जयशंकर प्रसाद के नाटक स्कंदगुप्त से संबंधित इस पहली इकाई में प्रसाद की नाट्य दृष्टि और स्कंदगुप्त की रचनाशीलता पर विचार किया गया है। प्रसाद ने नाटकों के बारे में बहुत अधिक नहीं लिखा है, लेकिन जितना लिखा है, उससे उनके नाट्य संबंधी सोच को अच्छी तरह समझा जा सकता है।

जयशंकर प्रसाद से पूर्व हिंदी में नाटकों की परंपरा बहुत लंबी नहीं थी। पहली बार नाट्य लेखन की शुरुआत भारतेंदु युग में हुई। हम इस खंड की पहली तीन इकाइयों में भारतेंदु के प्रसिद्ध नाटक अंधेर नगरी के बारे में अध्ययन कर चुके हैं। हम यह भी पढ़ चुके हैं कि भारतेंदु ने नाटक संबंधी सोच की भी शुरुआत कर दी थी। प्रसाद की नाट्य दृष्टि भारतेंदु से भिन्न है। प्रसाद के नाट्य संबंधी सोच पर संस्कृत नाट्य-दृष्टि का काफी प्रभाव है। वे नाटक की रचना को रस से जोड़ते हैं और यह भी मानते हैं कि नाटक की रचना मंच के अनुसार नहीं बल्कि मंच को नाटक के अनुसार होना चाहिए। प्रसाद नाटक को कला का विकसित रूप मानते हैं, वे उसे मनोरंजन का माध्यम नहीं मानते। उसका संबंध बुद्धि से नहीं हृदय से जोड़ते हैं। त्रासदी पर अधिक बल दिये जाने का यही कारण मानते हैं।

प्रसाद की नाट्य दृष्टि के निर्माण में तत्कालीन नाट्य परंपरा भी थी। उन्नीसवीं सदी के उत्तर्राद्ध से पारसी थियेटर के नाम से जो पापुलर थियेटर शुरू हुआ, वह प्रसाद के समय भी मौजूद था। प्रसाद उसकी स्वस्थ लक्षण नहीं मानते थे और हिंदी नाटकों को वे इस बाजारू और सस्ते नाटकों से मुक्त करवाना चाहते थे। प्रसाद की नाट्य दृष्टि को इस परिप्रेक्ष्य में भी समझना चाहिए।

प्रसाद के नाटकों को आमतौर पर रंगमंच के अनुरूप नहीं माना जाता। प्रसाद के नाटकों को मंच पर खेलना आसान नहीं होता। प्रसाद के नाटकों में अंक और दृश्यों की संख्या ज्यादा होती है। पात्र भी ज्यादा होते हैं और वे एक ही नाटक में दस-पंद्रह गीत डाल देते हैं। कथा में इतनी तेजी से परिवर्तन होता है कि उसको अत्यंत कुशल निर्देशक ही संभाल पाता है। नाटकों में संवाद की भाषा को भी मंचन और अभिनय के अनुकूल नहीं माना जाता। इसके बावजूद यह भी सत्य है कि प्रसाद के नाटक बराबर खेले जाते रहे हैं और ऐसे प्रयास प्रख्यात निर्देशकों द्वारा किए गए हैं।

जयशंकर प्रसाद के नाटकों की कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जिनसे उनके नाटकों का मौलिक स्वरूप निर्मित होता है। प्रसाद के नाटकों को सिर्फ रंगमंच पर खेले जाने वाले नाटक की पटकथा के रूप में देखना सही नहीं होगा। वे स्वतंत्र रूप से रचनात्मक कृतियां भी हैं। इस दृष्टि से देखने पर प्रसाद के नाटक का महत्व ज्यादा उचित रूप में उजागर होता है। प्रसाद ने नाटक मनोरंजन और व्यावसायिकता से भिन्न राष्ट्रीय मुक्ति और जागरण तथा रचनात्मक सौंदर्यबोध से अनुप्रेरित होकर लिखे थे। उनके नाटक ऐतिहासिक कथावस्तु पर आधारित होकर भी प्रसाद के अपने समकालीन दौर के प्रतिनिधिक बन सामने आते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रसाद के नाटक नाटक नहीं हैं। उनकी कथा संरचना, चरित्र चित्रण, भाषा, संवाद और अभिनेयता पर विचार करने पर हमें यह स्पष्ट प्रतीत हो जाता है कि उनके नाटक नाटक ही हैं।

प्रसाद के नाटक स्कंदगुप्त की रचनाशीता को इसी परिप्रेक्ष्य में समझा जा सकता है। पांचवी सदी के भारत की राजनीतिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों पर आधरित उनका यह नाटक प्रसाद के अपने समय की चिंताओं को केंद्र में रखकर लिखा गया है। राष्ट्रीय मुक्ति और राष्ट्रीय सांस्कतिक जागरण को ध्यान में रखते हुए उन्होंने इस नाटक की रचना की है। सांस्कृतिक विविधताओं वाले इस देश के नागरिकों को विदेशी दासता से मुक्त कराने के संघर्ष में एकताबद्ध करने और उनमें गौरव की भावना उत्पन्न करना इस नाटक की केंद्रीय विशेषता है। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने स्त्री-पुरुष संबंधों और व्यक्ति के अंतर्संघर्ष को भी अपनी रचनाशीलता में प्रमुख स्थान दिया है। स्कंदगुप्त नाटक पर हम आगे की इकाइयों में जो विचार करेंगे उसके लिए इस पृष्ठभूमि को समझना बहुत ज़रूरी है।

अभ्यास

  1. प्रसाद के नाट्य संबंधी विचारों का उल्लेख करते हुए भारतेंदु के विचारों से उसकी भिन्नता बताइए।
  2. प्रसाद के नटक की मौलिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।
  3. स्कंदगुप्त की रचनाशीलता का आधार क्या है और इसने नाटक को किस तरह प्रभावित किया है, स्पष्ट कीजिए।

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