गांधी जी की विचारधारा

अब हम गांधी जी की विचारधारा के मुख्य पहलुओं पर विचार करेंगे परंतु उन पर व्याख्या करने से पहले यह जानना आवश्यक है कि ऐसे कई प्रभाव थे जिन्होंने गांधी जी की विचारधारा को उभारने और उसे एक निश्चित दिशा देने में योगदान दिया। अपनी आत्मकथा में गांधी जी ने यह स्वीकार किया है कि उनके अभिभावकों के दृष्टिकोण और उनके रहने के स्थान पर मौजूद सामाजिक और धार्मिक वातावरण ने उनको व्यापक रूप से प्रभावित किया था। उनकी प्रारंभिक विचारधारा को “वैष्णव मत” और जैन धर्म की परंपराओं ने विशेष तौर से प्रभावित किया था। गांधी जी “भगवद् गीता” से भी प्रभावित थे। इसके अतिरिक्त ईसा के “पहाड़ पर उपदेश” (Sermon on the Mount), टालल्टाय थोरो और रस्किन के लेखों ने भी उनके चिंतन को प्रभावित किया था। लेकिन इसके साथ-साथ उनकी विचारधारा के विकास और दिशा निर्धारण में सर्वाधिक योगदान, जीवन में उनके अपने व्यक्तिगत अनुभवों का था।

गांधी जी की विचारधारा

सत्याग्रह

गांधी जी की विचारधारा का सबसे मख्य पहल सत्याग्रह का था। जैसा कि पहले ही जिक्र किया जा चुका है कि यह तरीका गांधी जी ने दक्षिण अफ्रीका में विकसित किया था। परंतु 1919 के उपरान्त भारत के स्वाधीनता संग्राम में यह एक महत्वपूर्ण पहलू बना। गांधी जी के अनुसार हिंसा के स्थान पर सत्याग्रह का प्रयोग स्वयं कष्ट सहकर इस प्रकार किया जाना चाहिए था कि शत्र को अपनी बात मनवाने के लिए बदला जा सके। सत्याग्रह के विचार की व्याख्या करते हुए पट्टाभि सीतारमैया ने लिखा है:

“इसमें स्वयं चुना हुआ कष्ट और विरोधियों के लिए अपमान शामिल है। यदि इसका प्रभाव पड़ता है तो इसलिए पड़ता है कि जिन ख्यालों से इसे इस्तेमाल किया जा रहा है उसमें उनकी नैतिकता पर प्रभाव डाला जाता है। जिस कार्य के लिए इसे प्रयोग किया जाता है, उसके औचित्य के प्रति उनके अंदर विश्वास जगाया जाता है। उनकी शक्ति को उन्हें यह दर्शा कर कमजोर किया जाता है कि उनके कार्यों द्वारा जो कष्ट दसरों को हो रहे हैं, इससे उनमें हीनता की भावना उत्पन्न हो।”

गांधी जी ने सत्याग्रह और निष्क्रिय प्रतिरोध के बीच अंतर किया। उन्होंने यह लिखा है कि :

“निष्क्रिय प्रतिरोध एक कमजोर व्यक्ति का वह अस्त्र है जिसमें कि हिंसा और शारीरिक शक्ति का प्रयोग अपने उद्देश्य की पति के हेत किया जाता है; जबकि सत्याग्रह शक्तिशाली व्यक्ति का अस्त्र है और इसमें किसी भी प्रकार की हिंसा का प्रयोग नहीं है।”

वास्तव में गांधी जी के लिए सत्याग्रह मात्र एक राजनीतिक अस्त्र नहीं था वग्न वह जीवन दर्शन और सिद्धांतों के व्यवहार का एक हिस्सा था। गाधी जी का यह विश्वास था कि मानव जीवन का अंतिम उद्देश्य सत्य की खोज है और क्याक काई भी वास्तविक सत्य को नहीं समझ सकता इसलिए उसे दूसरे व्यक्ति  की खोज में बाधा नहीं डालनी चाहिए।

अहिंसा

हिसा सत्याग्रह का आधार था। गांधी जी ने लिखा

“जब कोई व्यक्ति अहिंसात्मक होने का दावा करता है तो उससे यह अपेक्षा की जाती है कि जिसने उसको हानि पहुँचाई है उससे वह गुस्सा भी नहीं होगा। वह उसके बुरे की कामना भी नहीं करेगा; वह उसकी अच्छाई चाहेगा और वह उसको किसी प्रकार का ‘शारीरिक कष्ट भी नहीं देगा। बरा करने वाला चाहे किसी भी प्रकार की हानि उसे पहँचाये वह उसे सह लेगा। अतः अहिंसा से अभिप्राय पूर्ण भोलेपन से, अहिंसा से अभिप्राय किसी के प्रति बरी भावना रखने का पूर्ण अभाव है।”

गांधी जी ने इस बात पर महत्व दिया कि साधारण व्यक्ति को अपने राजनीतिक उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अहिंसात्मक सत्याग्रह का प्रयोग करना चाहिए। परंत कभी-कभी गांधी जी जो निर्णय लेते थे उसमें पर्ण अहिंसा की कमी नजर आती थी। जैसा कि उन्होंने बार-बार यह कहा कि अन्याय के सामने कायर दिखने की अपेक्षा हिसा बेहतर है। यहाँ पर 1918 में गांधी जी द्वारा सेना में भर्ती किये जाने के प्रयास में उनके सहयोग को उदाहरण के तौर पर रखा जा सकता है। युद्ध के लिए भर्ती में सहयोग देना अहिंसा के सिद्धांत के विपरीत था परंतु गांधी जी ने यह सहयोग इस आशा से दिया था कि युद्ध के बाद अंग्रेजी सरकार से भारतीयों को कुछ सुविधाएँ प्राप्त होंगी।

व्यक्तिगत रूप में सत्याग्रह कई प्रकार के रूप ले सकता था जैसे कि उपवास, अहिंसात्मक धरना, विभिन्न प्रकार का असहयोग और सविनय अवज्ञा, यह जानते हए भी कि उसके लिए कानुनी संरक्षण भी मिलेगा। गांधी जी का यह पूर्ण विश्वास था कि सत्याग्रह के यह रूप सच्चे उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अपनाये गये सच्चे तरीके हैं। गांधी जी के आलोचकों ने यह धारणा व्यक्त की है कि सत्याग्रह की तकनीक को इस्तेमाल करके गांधी जी जन आंदोलनों को नियंत्रित करना चाहते थे। उनकी यह धारणा है कि पूँजीपति और जमींदार, गांधी जी के अहिंसात्मक तकनीक से प्रसन्न थे क्योंकि इसके द्वारा हिंसात्मक सामाजिक क्रांति को रोका जा सकता था। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि गांधी और कांग्रेस के द्वारा राष्ट्रीय आंदोलन में सत्याग्रह के अस्त्र के प्रयोग द्वारा समाज के विभिन्न वर्गों को अंग्रेजी शासन के विरुद्ध संघर्ष में एक जट किया गया।

धर्म

गांधी जी की विचारधारा के संदर्भ में चर्चा करते हुए धर्म के प्रति उनके दृष्टिकोण को जानना आवश्यक है। गांधी जी के लिए धर्म किसी एक विशेष धार्मिक समदाय की सैद्धांतिक व्याख्या न होकर, समस्त धर्मों में निहित मलभत सत्य था। गांधी जी ने धर्म की व्याख्या सच्चाई के लिए संघर्ष के रूप में की। वे यह मानते थे कि धर्म को किसी व्यक्ति की निजी राय बताकर पीछे नहीं ढकेला जा सकता क्योंकि धर्म व्यक्तियों की समस्त गतिविधियों को प्रभावित करता है। उनकी यह धारणा थी कि भारत राजनीतिक कार्रवाई के लिए धर्म एक आधार प्रस्तत करता है। यही कारण है कि गांधी जी ने खिलाफत के प्रश्न को सवर्ष का मुद्दा बनाया जिससे कि मसलमानों को अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध आदोलन में लाया जा सके। परन्तु गांधी जी द्वारा “राम राज्य” जैसे धार्मिक विचारों का प्रयोग राष्ट्रीय आंदोलन में साम्प्रदायिकता की समस्या को हल नहीं कर पाया।

हिन्द स्वराज

गांधी दर्शन का एक महत्वपूर्ण पहल हमें उनकी पुस्तक “हिन्द स्वराज’ (1909) में मिलता है। इस पुस्तक में गांधी जी ने इस बात की ओर संकेत किया है कि वास्तविक शत्रु, अंग्रेजों का राजनीतिक प्रभुत्व न होकर आधुनिक पश्चिम सभ्यता है जो कि धीरे-धीरे भारत को जकड़ती जा रही थी। उनकी धारणा थी कि जो भारतीय पाश्चात्य पद्धति से शिक्षित हए हैं, जैसे कि वकील, डाक्टर, अध्यापक और पूँजीपति, वे आधुनिक तौर तरीकों को फैला करके भारत की प्राचीन धरोहर को नष्ट कर रहे थे।

इस पुस्तक में गांधी जी ने रेलगाड़ी की इस बात के लिए आलोचना की कि रेल खाद्य पदार्थों के निर्यात में सहायक है और अकाल फैलाने में सहायता देती है। स्वराज और स्वशासन को उन्होंने जीवन की एक ऐसी स्थिति माना जो कि तभी स्थाई रह सकती थी जबकि भारतीय अपनी परंपरागत सभ्यता का अनुकरण करें। और आधुनिक सभ्यता से भ्रष्ट न हों। गांधी जी ने लिखा था कि भारतीयों की मक्ति इसी में है कि उन्होंने जो कुछ पिछले 50 वर्षों में सीखा है उसे भुला दें। रेलगाड़ियों, तार, अस्पताल वकील, डाक्टर और इसी प्रकार की सत्र आधनिक वस्तओं को भल जाना होगा। और तथाकथित उच्च वर्ग को साधारण किसान जैसा जीवन व्यतीत करना सीखना होगा।”

20वी शताब्दी के परिप्रेक्ष्य में इस प्रकार के विचार स्वप्नदर्शी और प्रगति विरोधी प्रतीत होते हैं। परंत वास्तव में उनके विचार गरीब किसानों और कामगारों पर हो रहे बड़े आधनिकीकरण के इष्प्रभावों की व्याख्या करते थे। आगे चलकर गांधी जी ने अपने सामाजिक और आर्थिक विचारों को एक निश्चित दिशा देने का प्रयास किया और इसके लिए उन्होंने खादी, ग्रामीण पुनगठन और दरिजन कल्याण का कार्यक्रम रखा। इसमें कोई संदेह नहीं कि इस कार्यक्रम से गांव के लोगों की समस्याओं का पूर्णतः हल नहीं हो पाया लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इस कार्यक्रम के द्वारा एक निश्चित सीमा तक गांधी जी उनकी स्थिति को सुधारने में सफल रहे। वास्तव में इस कार्यक्रम के माध्यम से गांधी जी ने देश में सामाजिक और आर्थिक सुधारों के लिए एक महत्वपूर्ण चेतना जागृत की।

स्वदेशी

गांधी जी ने स्वदेशी का प्रचार किया। स्वदेशी से अभिप्राय अपने देश में बनी हुई वस्तुओं के प्रयोग से था। उदाहरण के लिए इंग्लैंड में मशीन से बने कपड़ों के स्थान पर खादी का इस्तेमाल करना। उनकी राय में स्वदेशी के द्वारा किसान अपनी गरीबी को हटा सकते थे क्योंकि वे कताई करके अपनी आय में वद्धि कर सकते थे। विदेशी कपड़े के इस्तेमाल में कमी करके भारत से इंग्लैंड को हो रही धन की निकासी को भी रोका जा सकता था। यहाँ पर ध्यान देने योग्य बात यह है कि यद्यपि गांधी जी पाश्चात्य औद्योगिक सभ्यता के कड़े विरोधी थे तथापि वे भारत में उभर रहे राष्ट्रीय उद्योगों के विरोधी नहीं थे।

जैसा कि पहले ही जिक्र किया जा चुका है. अम्बालाल जैसे उद्योगपति के साथ गांधी जी के घनिष्ठ संबंध थे। 1922 से एक अन्य उद्योगपति जी.डी. बिरला भी गांधी जी के निकट सहयोगी रहे हैं। गांधी जी श्रम और पूँजी की परस्पर निर्भरता में विश्वास रखते थे। उनके अनुसार पूँजीपति को श्रमिकों के न्यासकर्ता (Trustee) के रूप में कार्य करना चाहिए। गांधी जी ने कभी भी वर्ग आधार पर श्रमिकों में राजनीतिक जागृति उत्पन्न करने का प्रयास नहीं किया। वे वर्ग संघर्ष के विरोधी थे। वर्गीय भेदभाव के स्थान पर वे जनता की एकता में विश्वास करते थे।

गांधी जी की विचारधारा की सार्थकता को लेकर विद्वानों में मतभेद रहे हैं परंतु तथ्य यह है कि उनकी विचारधारा ने राष्ट्रीय आंदोलन को व्यापक रूप से प्रभावित किया और उसे एक निश्चित दिशा प्रदान की।

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