IBSA और BRICS : भारत के लिए प्रासंगिकता

प्रश्न: IBSA और BRICS दोनों भारत के बहुपक्षीय संरेखण (मल्टी एलाइन्मेट) की तलाश के उदाहरण है, हालाँकि उनके अभिविन्यास में मौलिक अंतर है। भारत के लिए इन समूहों की प्रासंगिकता के संदर्भ में चर्चा कीजिए।

दृष्टिकोण

  • बहु-संरेखण (मल्टी एलाइन्मेट) के लिए भारत की तलाश के महत्व का संक्षिप्त उल्लेख करते हुए शुरुआत कीजिए।
  • IBSA, इसकी संरचना, अभिविन्यास/उद्देश्यों और भारत के लिए इसकी प्रासंगिकता पर चर्चा कीजिए।
  • BRICS, इसकी संरचना, अभिविन्यास/उद्देश्यों और भारत के लिए इसकी प्रासंगिकता पर चर्चा कीजिए।
  • इसकी चर्चा करते हुए निष्कर्ष दीजिए की ये दोनों किस प्रकार भिन्न है और भारत द्वारा स्वयं को इनके मध्य किस प्रकार स्थापित करना चाहिए।

उत्तर

बहु-संरेखण एक वैचारिक या हित समूह में शामिल होने के जोखिम के बिना कई मोर्चों पर अनेक भागीदारों की एक साथ संलग्नता को बढ़ावा देता है। इस संदर्भ में, IBSA और BRICS दोनों महत्वपूर्ण किन्तु भिन्न उद्देश्यों को पूरा करते हैं।

IBSA एक वार्ता मंच है, जिसे 2003 में गठित किया गया थाजिसमें भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका शामिल हैं। ये सभी अपने संबंधित क्षेत्रों में प्रमुख लोकतंत्र देश हैं। यह पारस्परिक लाभ के लिए, दक्षिण-दक्षिण सहयोग को प्रोत्साहित करने और विकासशील विश्व के क्षेत्रीय नेतृत्वकर्ताओं के मध्य संबंधों को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से कार्य करता है। यह भारत के लिए प्रासंगिक है क्योंकि IBSA के सहयोग एजेंडे में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • असमानता, शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल जैसी घरेलू चुनौतियों का समाधान।
  • UNSC संशोधन, जलवायु परिवर्तन, व्यापार, परमाणु नीति और सैन्य हस्तक्षेप जैसे अंतर्राष्ट्रीय हितों पर चर्चा।
  • प्रौद्योगिकियों, सूचना और कौशल का त्रिपक्षीय विनिमय।

BRICS पांच प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं अर्थात् ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका का एक समूह है, यह राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संलग्नता की दिशा में कार्यरत है। यह IBSA की तुलना में व्यापक अंतर्राष्ट्रीय और भूसामरिक संदर्भ में कार्य करता है, भूसामरिक मुद्दों पर चर्चा के साथ-साथ सामाजिक-आर्थिक विकास संबंधी प्रश्नों और संयुक्त राष्ट्र, G-20 जैसे मंचों पर विकासशील विश्व की चिंताओं को उजागर करने हेतु कार्य करता है। भारत के लिए इसकी प्रासंगिकता का आंकलन निम्नलिखित बिंदुओं से लगाया जा सकता है:

  • BRICS ने वैश्विक संरचनाओं (जैसे IMF) में सुधार हेतु कार्य आरंभ किया है।
  • यह वैश्विक मुद्दों पर राजनीतिक प्रभाव और विकासशील देशों की आवाज उठाने में सहायता करता है।
  • BRICS द्वारा NDB (न्यू डेवलपमेंट बैंक) और आकस्मिक रिजर्व व्यवस्था (Contingent Reserve Arrangement: CRA) की शुरुआत की गयी है जो विश्व बैंक और IMF के पूरक के रूप में कार्य करेंगे।

हालांकि IBSA के सभी सदस्य BRICS के भी सदस्य हैं, फिर भी निम्नलिखित भिन्नताओं के कारण दोनों निकाय विभिन्न संदर्भो में प्रासंगिक हैं:

  • IBSA के सभी सदस्य देशों में बहु-दलीय लोकतांत्रिक व्यवस्था है, जबकि BRICS में शामिल रूस और चीन में ऐसी व्यवस्था नहीं हैं।
  • IBSA के सदस्यों देशों के प्रत्यक्ष प्रतिस्पर्धात्मक हित नहीं हैं और इसलिए ये साझा राजनीतिक योजनाओं का निर्माण कर सकते हैं।
  • UNSC संबंधी सुधार हेतु BRICS की तुलना में IBSA अधिक चिंतित हैं, क्योंकि BRICS के सदस्यों में दो UNSC के स्थायी सदस्य शामिल हैं।
  • BRICS इसके नियमित शिखर सम्मेलनों, NDB और प्रस्तावित BRICS रेटिंग एजेंसी के कारण बेहतर रूप से संस्थागत हैं।
  • IBSA के प्रमुख उद्देश्य कृषि, संस्कृति, सामाजिक विकास के क्षेत्र में सहयोग करना हैं, जो इसके सदस्य देशों के लिए प्रमुख चिंता का विषय हैं। जबकि, BRICS अपने सदस्य देशों के मैक्रो-इकोनॉमिक और रणनीतिक हितों पर केंद्रित है।

IBSA और BRICS के मध्य समन्वय का लाभ उठाने हेतु भारत को IBSA के अन्य सदस्यों सहित इस संगठन के लोकतांत्रिक मूल्यों का लाभ उठाना चाहिए और तदनुसार BRICS की चर्चाओं की कार्यप्रणाली का मार्गदर्शन करना चाहिए और तत्पश्चात वैश्विक एजेंडा का निर्धारक बनना चाहिए 

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