भारत में उच्च एवं तकनीकी शिक्षा (Higher and Technical Education in India)

भारत की उच्च शिक्षा प्रणाली (छात्रों के संदर्भ में) चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के पश्चात विश्व की तीसरी सबसे बड़ी शिक्षा प्रणाली है। भविष्य में भारत विश्व में सबसे बड़े शिक्षा केंद्रों में से एक के रूप में उभर सकता है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात से ही भारत के उच्च शिक्षा क्षेत्र में विश्वविद्यालयों/विश्वविद्यालय स्तर के संस्थानों तथा कॉलेजों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि हुई है।

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भारत में उच्च शिक्षा से संबंधित चुनौतियाँ

नामांकन

उच्च शिक्षा में भारत का सकल नामांकन अनुपात (GER) केवल 25.2% है। यह विकसित और अन्य विकासशील देशों की
तुलना में अत्यधिक कम है।

समता

  •  समाज के विभिन्न समुदायों के मध्य GER में कोई समता नहीं है। GER पुरुषों के लिए (26.3%), महिलाओं के लिए (25.4%), अनुसूचित जातियों के लिए (21.8%) तथा अनुसूचित जनजातियों के लिए(15.9%) है।
  • कुछ क्षेत्रीय भिन्नताएं भी विद्यमान हैं,कुछ राज्यों में GER उच्च है जबकि अन्य राज्य राष्ट्रीय GER से काफी नीचे हैं। यह असमानता उच्च शिक्षा प्रणाली में व्याप्त उल्लेखनीय असंतुलन को प्रदर्शित करती है। देश में कॉलेज घनत्व (प्रति लाख योग्य जनसंख्या पर कॉलेजों की संख्या) में भी भिन्नता दिखाई देती है जो बिहार में 7 तथा तेलंगाना में 59 है, जबकि अखिल भारतीय औसत 28 है।
  • इसके अतिरिक्त अधिकांश प्रमुख विश्वविद्यालय तथा कॉलेज महानगरों एवं शहरों में केंद्रित हैं, जिससे उच्च शिक्षा तक पहुंच संबंधी क्षेत्रीय असमानता में वृद्धि होती है। हालांकि, इस अंतराल को भरने के लिए सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों हेतु तकनीकी शिक्षा गुणवत्ता सुधार कार्यक्रम (TEQIP) का शुभारंभ किया है।
  • उच्च शिक्षा में भी समाज के शोषित वर्गों तथा महिलाओं के प्रति सामाजिक संरचना सम्बन्धी भेदभाव एवं पूर्वाग्रह अभी तक व्याप्त हैं।

गुणवत्ता

शिक्षा प्रणाली में रटने की प्रवृत्ति अत्यधिक प्रचलित है जबकि इसमें रोजगार एवं कौशल विकास का अभाव है। 2016 में 150,000 इंजीनियरिंग स्नातकों के मूल्यांकन से ज्ञात हुआ कि केवल 18% इंजीनियर ही सॉफ्टवेयर सेवा क्षेत्र में कार्यात्मक
भूमिका में नियोजनीय थे।

अवसंरचना

  • निम्नस्तरीय अवसंरचना उच्च शिक्षा प्रणाली के समक्ष विद्यमान एक अन्य चुनौती है। विशेषतः सार्वजनिक क्षेत्र द्वारा संचालित संस्थान निम्नस्तरीय भौतिक सुविधाओं एवं अवसंरचना की समस्या से ग्रसित हैं।
  • ऐसे अनेक कॉलेज हैं जो इमारत की दूसरी या तीसरी मंजिल पर कार्यरत हैं जबकि भूतल अथवा पहली मंजिल पर रेडीमेड होजरी या फोटोकॉपी की दुकानें अवस्थित हैं।
  • हाल ही में, सरकार ने अवसंरचना संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए उच्च शिक्षा वित्त पोषण एजेंसी (HEFA) की स्थापना
    तथा रीवाइटेलाइजिंग इन्फास्ट्रचर एंड सिस्टम्स इन एजुकेशन (RISE) योजना प्रारंभ की है

राजनीतिक हस्तक्षेप

अधिकांश शैक्षिक संस्थानों का स्वामित्व राजनीतिक नेताओं के पास है जो विश्वविद्यालयों के शासी निकाय में महत्वपूर्ण
भूमिका निभाते हैं।

शिक्षक

  • शिक्षकों की कमी एवं राज्य शैक्षणिक संस्थानों की सुयोग्य शिक्षकों को आकर्षित करने एवं बनाए रखने की अक्षमता कई वर्षों तक गुणवत्तायुक्त शिक्षा के समक्ष मुख्य चुनौती रही है। शिक्षकों की कमी के कारण प्रमुख संस्थानों को भी तदर्थ शिक्षकों की  नियुक्ति प्रक्रिया का विस्तार करना पड़ता है।
  • उच्च शिक्षा में अनेक रिक्तियों के बावजूद बड़ी संख्या में नेट/पीएचडी उम्मीदवार बेरोजगार हैं।
  • हालांकि देश में छात्र-शिक्षक अनुपात (30:1) स्थिर रहा है, परंतु संयुक्त राज्य अमेरिका (12.5:1), चीन (19.5:1) और
    ब्राजील (19:1) की तुलना में इसमें पर्याप्त सुधार करने की आवश्यकता है।

प्रमाणन

जून 2010 तक राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (National Assessment and Accreditation Council:NAAC) के आंकड़ों के अनुसार देश के कुल उच्च शिक्षा संस्थानों में से 25% भी मान्यता प्राप्त नहीं हैं और कुल मान्यता प्राप्त में से केवल 30% विश्वविद्यालयों तथा 45% कॉलेजों को ही ‘ए’ स्तरीय रैंक प्रदान करने योग्य पाया गया है।

अनुसंधान एवं नवाचार

शिक्षण एवं शोध उपक्रमों में भी सम्बद्धता का अभाव है। शोध को केवल विभिन्न सरकारी विभागों के अंतर्गत विशिष्ट
अनुसंधान संस्थानों तक ही संकेंद्रित करते हुए विश्वविद्यालयों की भूमिका को केवल शिक्षण तक ही सीमित कर दिया गया है।

इससे ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हुई है कि विश्वविद्यालयों में छात्र तो मौजूद हैं किन्तु उन्हें अतिरिक्त शिक्षकों (फैकल्टी) की आवश्यकता है। दूसरी ओर शोध संस्थानों के पास योग्य फैकल्टी तो है परंतु इनके पास युवा छात्रों का अभाव है।

उच्च शिक्षा व्यवस्था की संरचना

  • भारतीय शिक्षा के प्रबंधन को अतिकेन्द्रीकरण, नौकरशाही संरचनाओं तथा उत्तरदायित्व, पारदर्शिता और पेशेवर अभिवृत्ति के अभाव संबंधी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
  • मान्यता प्राप्त कॉलेजों एवं छात्रों की संख्या में वृद्धि के परिणामस्वरूप विश्वविद्यालयों के प्रशासनिक कार्यों के भार में भी । अत्यधिक वृद्धि हुई है तथा शैक्षिक एवं शोध कार्यों पर से इनका ध्यान हट रहा है।

उच्च शिक्षा प्रणाली में अनुसंधान एवं विकास

हाल ही में, सरकार ने उच्च शिक्षा प्रणाली में अनुसंधान एवं विकास (R&D) को बढ़ावा देने हेतु निम्नलिखित योजनाओं को प्रारंभ किया है:

  • टीचर एसोसिएटशिप फॉर रिसर्च एक्सीलेंस(TARE) स्कीम,
  • ओवरसीज विज़िटिंग डॉक्टोरल फैलोशिप (OVDF),
  • विशिष्ट अन्वेषक पुरस्कार (DIA), और
  • ऑग्मेंटिंग राइटिंग स्किल्स फॉर आर्टिकुलेटिंग रिसर्च (AWSAR) स्कीम।

नीति आयोग: उच्च शिक्षा संबंधी एक कार्य एजेंडा

विश्व की सफल उच्च शिक्षा प्रणालियों पर विचार करने पर ज्ञात होता है कि स्वायत्त शासन, पारदर्शिता और परिणामों का कम विनियमन किया जाना और इन पर अधिक ध्यान दिया जाना, गुणवत्ता युक्त तथा सफल उच्च शिक्षा क्षेत्रक के महत्वपूर्ण घटक हैं। इस संदर्भ में नीति आयोग ने उच्च शिक्षा संबंधी एक कार्य एजेंडा प्रस्तुत किया है जिसके अंतर्गत निम्नलिखित महत्वपूर्ण क्षेत्र सम्मिलित हैं:

 विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों का दर्जा

  •  20 विश्वविद्यालयों (10 निजी तथा 10 सार्वजनिक) की पहचान कर उन्हें विनियामक व्यवस्था से मुक्त करना।
  • विश्व रैंकिंग जैसे स्वतंत्र परिणामों पर आधारित स्वायत्त अभिशासन, लक्षित वित्त पोषण और निरीक्षण के माध्यम से
    विश्व स्तरीय विश्वविद्यालयों की स्थापना करना।
  • 10 निजी विश्वविद्यालयों में से केवल 2 के लिए टियर आधारित फंडिंग मॉडल को अपनाना।
  • सर्वोत्तम प्रदर्शन करने वाले विश्वविद्यालयों को सर्वाधिक फण्ड प्रदान करना तथा उन्हें परिणामों के लिए उत्तरदायी  बनाना। साथ ही विश्व के किसी भी अन्य विश्वविद्यालय की भांति उन्हें अभिशासन में लचीलापन प्रदान किया चाहिए।
  • चयनित निजी विश्वविद्यालयों को भी स्वायत्तता का समान स्तर प्रदान किया जाना चाहिए, हालांकि उनके समक्ष
    सार्वजनिक संसाधनों की पेशकश नहीं की जानी चाहिए।

शीर्ष कॉलेजों हेतु स्वायत्तता

  • तुलनात्मक रूप से अधिक प्रतिष्ठित कॉलेजों को स्वायत्त कॉलेज योजना के अंतर्गत लाया जाना चाहिए ताकि उन्हें
    विश्वविद्यालय के केंद्रीकृत नियंत्रण से बाहर निकालकर अकादमिक मामलों में अधिक स्वायत्तता प्रदान की जा सके।
  • उत्कृष्ट ट्रैक रिकॉर्ड, शिक्षण कार्यों में उत्कृष्टता और शिक्षण एवं शोध के क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन हेतु प्रतिबद्ध चुनिन्दा कॉलेजों को स्नातकोत्तर शिक्षण की अनुमति प्रदान करने के साथ ही एकीकृत विश्वविद्यालयों में परिवर्तित होने का विकल्प प्रदान किया जाना चाहिए।
  • इससे कॉलेजों को अपना ब्रांड नेम विकसित करने और उत्कृष्ट छात्रों एवं शिक्षकों के लिए अधिक प्रभावी ढंग से
    प्रतिस्पर्धा करने में सहायता प्राप्त होगी।

विनियमन व्यवस्था में सुधारः विश्वविद्यालयों की टियर आधारित व्यवस्था

  •  विनियमन की एक ऐसी प्रणाली प्रस्तुत की जानी चाहिए जो विश्वविद्यालयों के सूक्ष्म प्रबंधन के बजाय सूचना
    प्रकटीकरण तथा अभिशासन पर केंद्रित हो। इसके लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) को नियामक प्रणाली के रूप में स्थापित करना और पेशेवर परिषदों की भूमिका को तर्कसंगत रूप देना आवश्यक है। हाल ही में, मानव संसाधन विकास मंत्रालय (MHRD) ने भारतीय उच्च शिक्षा आयोग (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम निरसन) विधेयक, 2018 तैयार किया है तथा लोगों से इस पर उनकी टिप्पणियों एवं सुझावों की मांग की है (इसकी चर्चा नीचे की गई है)।

मौजूदा कानूनी ढांचे के अंतर्गत, एक स्तरीकृत (टियर आधारित) व्यवस्था को प्रारंभ किया जा सकता है जिसमें निम्नलिखित स्तर सम्मिलित होने चाहिए :

 प्रथम स्तर (First Tier): विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा हेतु प्रतिबद्ध शीर्ष शोध-केंद्रित विश्वविद्यालय को पूर्ण स्वायत्तता प्रदान की जाएगी और समय के साथ बेहतर प्रदर्शन के आधार पर अतिरिक्त संसाधन प्रदान किये जाएँगे।

  • इन विश्वविद्यालयों के लिए पाठ्यक्रम, पाठ्यचर्चा, अध्यापन के घंटे और शिक्षण-विज्ञान जैसे परिचालन संबंधी
    मामलों में पूर्ण स्वतंत्रता के साथ पारदर्शिता के उच्च मानकों के अनुपालन को अनिवार्य बनाया जा सकता है।
  • तृतीय पक्ष द्वारा आवधिक आकलन के माध्यम से गुणवत्ता सुनिश्चित की जानी चाहिए।

विश्वविद्यालयों का द्वितीय स्तर: रोजगार-केंद्रित शिक्षा वाले विश्वविद्यालयों पर कुछ विनियम आरोपित किए जा सकते

  • इन विश्वविद्यालयों से रोजगार बाजार की परिवर्तित संरचना के अनुरूप प्रवेश नीतियों, पाठ्यचर्चा और पाठ्यक्रमों
    को समायोजित करने के लिए इन्हें प्रदत्त स्वायत्ता का उपयोग करने की अपेक्षा की जाएगी।
  • उनकी सफलता का मूल्यांकन उनके छात्रों के नियोजन (जॉब प्लेसमेंट) के आधार पर भी किया जाएगा।

विश्वविद्यालयों का अंतिम स्तर: ऐसे विश्वविद्यालयों को जिनका प्राथमिक उद्देश्य सभी के लिए उच्च शिक्षा सुनिश्चित
करना हो, सर्वाधिक विनियमों के दायरे में आना चाहिए।

  • इस स्तर के अंतर्गत ऐसे विश्वविद्यालय शामिल होंगे जिनका वर्तमान प्रदर्शन स्तरीय नहीं है और जिनके अनुसंधान
    या रोजगार पहलू पर अच्छा प्रदर्शन करने की संभावना भी नहीं है।
  • जहाँ इस स्तर की UGC द्वारा अधिक निगरानी की जा सकती है, वहीं पारदर्शिता को प्राथमिकता दिए जाने के
    साथ-साथ नियंत्रण को कम करने की भी आवश्यकता है।

इन कार्यों के अतिरिक्त राज्य के स्तर पर भी सुधार आवश्यक हैं और इन सुधारों को राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान | (RUSA) के माध्यम से प्रोत्साहन प्रदान किया जाना चाहिए। इन सुधारों के माध्यम से उच्च शिक्षा के राज्य स्तर के विनियमन के अंतर्गत भी विश्वविद्यालयों में स्वायत्तता और सुशासन प्रथाओं को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

प्रोजेक्ट एवं शोधार्थी विशिष्ट शोध अनुदान प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए।

  • अन्य देशों में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में अधिकांश नवाचार को लोक महत्व के विशिष्ट क्षेत्रों में शोध के लिए सार्वजनिक वित्त पोषण की प्रणाली द्वारा प्रेरित किया जाता है। विशिष्ट विद्वानों को वित्त पोषण प्रदान करके भारत में भी समान प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए, जिससे परिणामों के लिए अधिकतम लचीलापन और उत्तरदायित्व दोनों सुनिश्चित किया जा सके।
  • ‘पुरस्कार’ प्रणाली संबंधी मॉडल को भी अपनाया जाना चाहिए। इसके अंतर्गत स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट समस्याओं के
    समाधान प्रदान करने वाले अनुसंधान/नवाचार समूहों को वित्त पोषित किया जाना चाहिए। यह प्रणाली भविष्य में नवाचार और अनुसंधान को संचालित करने, विभिन्न समस्याओं को हल करने और प्रतिस्पर्धा एवं गुणवत्ता आश्वासन (quality assurance) के लिए एक तंत्र प्रदान करने के लिए उपयोग की जा सकती है।

व्यावसायिक और पेशा आधारित शिक्षा पर बल

  • रोज़गार से निकटता से सम्बद्ध कौशलों और व्यापार पर केंद्रित संस्थानों के लिए मानदंडों/मानकों और/या परिणाम
    आधारित प्रमाणीकरण की स्थापना और उसका प्रसार करना।
  • व्यावसायिक शिक्षा को अधिक स्वीकृति और उपयोगिता प्रदान करने हेतु मुख्यधारा के विश्वविद्यालयों में व्यावसायिक
    विषयों को शामिल करना।
  • विशेषतः उन कौशलों पर अधिक बल दिया जाना चाहिए  जिनमें आने वाले वर्षों में सार्वजनिक क्षेत्र में उच्च मांग के सृजन की सम्भावना हो। उदाहरणस्वरूप, सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता, आधारभूत कौशल शिक्षण, नर्सिग, पैरामेडिक्स आदि।

भारतीय प्रबंधन संस्थान अधिनियम, 2017 

  • यह भारतीय प्रबंधन संस्थानों (IIMs) को अधिक स्वायत्तता प्रदान करता है तथा उन्हें डिप्लोमा के बजाय डिग्री प्रदान करने का अधिकार देता है।
  • प्रत्येक निदेशक की नियुक्ति बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स (न कि केंद्र सरकार) द्वारा की जाएगी।
  • इसके अतिरिक्त प्रत्येक भारतीय प्रबंधन संस्थान की अकादमिक परिषद निम्नलिखित को निर्धारित करेगी: 

(i) अकादमिक सामग्री; (ii) पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए विभिन्न मानदंड एवं प्रक्रिया; और (iii) परीक्षाओं के संचालन हेतु दिशानिर्देश।

राष्ट्रीय उच्चतर शिक्षा अभियान (RUSA)

  • यह 2013 में प्रारंभ एक अत्यंत व्यापक केन्द्र प्रायोजित योजना है। इसे पात्र राज्यों की उच्चतर शैक्षिक संस्थाओं को
    वित्तपोषित करने के उद्देश्य से मिशन मोड में संचालित किया जा रहा है।
  • इस योजना के कार्यान्वयन से पूर्व, राज्य उच्च शिक्षा संस्थानों में कुछ परिवर्तनकारी सुधार जैसे अभिशासन, अकादमिक सम्बद्धता और मान्यता प्रदान करने संबंधी सुधार आदि किये जाने की आवश्यकता है।

RUSA 2.0 के अंतर्गत निम्नलिखित पहलें की जाएंगी –

  • राज्यों को वाइअविलटी गैप फंडिंग के आधार पर सार्वजनिक-निजी साझेदारी मोड के अंतर्गत परियोजना प्रारंभ
    करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
  • 2020 तक सकल नामांकन अनुपात में 30 प्रतिशत की वृद्धि, 70 नए मॉडल डिग्री कॉलेजों और 8 नए पेशेवर कॉलेजों की स्थापना।
  • अनुसंधान, नीति समर्थन, क्षमता निर्माण और सुस्पष्ट नीति और तथ्य-आधारित शोध इनपुट प्रदान करने हेतु एक
    संसाधन केंद्र के रूप में राष्ट्रीय उच्च शिक्षा संसाधन केंद्र (NHERC) की स्थापना।

भारतीय उच्चतर शिक्षा आयोग (HECI) विधेयक, 2018

(Draft Higher Education Commission of India (HECI) Bill, 2018)

 विधेयक के पक्ष में तर्क

  • UGC और तकनीकी शिक्षा नियामक ‘अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE)’ की कोष अनुदान प्रक्रिया
    भ्रष्टाचार और अक्षमता के आरोपों के कारण पहले से कमज़ोर हुई है।
  • अनुदान कार्यों का पृथक्करण HECI को केवल अकादमिक प्रकरणों पर ध्यान केंद्रित करने में सहायता करेगा।
  • पूर्व में UGC की प्रतिबंधात्मक व्यवस्था के कारण इसकी आलोचना की गई है। प्रोफेसर यशपाल समिति और हरि गौतम समिति ने लालफीताशाही से उच्च शिक्षा क्षेत्र को छुटकारा दिलाने के लिए एक शिक्षा नियामक की अनुशंसा की थी।
  • HECI के फलस्वरूप “इंस्पेक्शन राज” का अंत हो सकता है। HECL ऑनलाइन ई-शासन मॉड्यूल का उपयोग करके उच्चतर शिक्षा संस्थानों (HEls) को स्थापित करने, उनका अकादमिक परिचालन आरंभ करने या उन्हें बंद करने के मानदंडों और मानकों को निर्दिष्ट करेगा। उच्च शिक्षा के मानकों और गुणवत्ता से संबंधित विषयों पर पारदर्शी सार्वजनिक प्रकटीकरण तथा योग्यता आधारित निर्णयन के माध्यम से इस निकाय की प्रभावशीलता में वृद्धि होगी।
  • अनुपालन सुनिश्चित करने की शक्ति HEls के मानकों/गुणवत्ता में सुधार लाने में सहायता करेगी।
  • सभी राज्य उच्चतर शिक्षा परिषदों के प्रमुखों की सदस्यता वाली सलाहकार परिषद राज्यों को अपेक्षाकृत वृहद् अवसर प्रदान करेगी। यह तथ्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अभी तक उच्च शिक्षा की नीति के निर्माण में राज्यों की भूमिका नगण्य थी।
  • HEls को शोध, शिक्षण और अधिगम का संवर्द्धन सम्मिलित करने वाले उत्कृष्ट तौर-तरीकों की आचार संहिता स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित करना एक दूरदर्शी कदम है।

विधेयक की आलोचना

  • चूंकि UGC की स्थापना संसद के अधिनियम के माध्यम से की गई थी, अत: इसके प्रतिस्थापन पर निर्णय लेने से पहले इसमें सुधार लाने के तरीकों पर संसद के भीतर और शिक्षाविदों के साथ विस्तृत चर्चा की जानी चाहिए थी
  • वित्तीय शक्तियां UGC से लेकर MHRD को देने से उच्च शिक्षा संस्थानों पर प्रत्यक्ष राज्य नियंत्रण आरोपित होगा। वित्तीय नियंत्रण में इस परिवर्तन का उपयोग ज्ञान को एक सीमा में बाँधने के लिए किया जा सकता है।
  • विधेयक स्वायत्तता को बढ़ावा देने की बात करता है। कई संस्थानों ने स्वायत्तता का विरोध किया है क्योंकि यह व्यावसायीकरण को बढ़ावा देगा जिसके फलस्वरूप सामाजिक रूप से उत्पीड़ित एवं आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के छात्र हाशिये पर चले जाएंगे और अंततः उच्च शिक्षा के क्षेत्र से उनका पूर्ण अपवर्जन हो जाएगा।
  • इसमें अधिकृत करने, निगरानी करने, बंद करने, वर्गीकृत स्वायत्तता के लिए मानदंड या प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहन के लिए मानक निर्धारित करने और यहां तक कि उच्चतर शिक्षा संस्थानों के विनिवेश की अनुशंसा करने की शक्तियों को एकपक्षीय और निरंकुश बनाया गया है।
  • संभव है कि अधिगम परिणामों, संस्थानों द्वारा अकादमिक प्रदर्शन के मूल्यांकन और शिक्षकों के प्रशिक्षण पर विशिष्ट ध्यान देने के साथ अकादमिक मानकों में सुधार लाने के अपने अधिदेश से युक्त HECI, विश्वविद्यालयों का अतिविनियमन और विश्विद्यालय के स्तर पर प्रबंधन या उनका सूक्ष्म प्रबंधन करने लगे।
  • प्रस्तावित प्रारूप ने इस निकाय में शिक्षकों की उपस्थिति काफी कम कर दी है। UGC में कुल 10 सदस्यों में से 4 शिक्षक सदस्य हैं, जबकि HECI में कुल 12 सदस्यों में से केवल 2 शिक्षक सदस्य हैं।

उत्कृष्टता के संस्थान(IOE) (Institute of Eminence-IOE)

  • बजट 2016 में वित्त मंत्री ने घोषणा की थी कि “उच्च शिक्षा संस्थानों को सशक्त बनाना हमारी प्रतिबद्धता है ताकि वे विश्व स्तरीय शिक्षण और अनुसंधान संस्थान बन सकें। विश्व स्तरीय शिक्षण और अनुसंधान संस्थानों के रूप में उभरने के लिए दस सार्वजनिक और दस निजी संस्थानों को एक सक्षम विनियामक संरचना प्रदान की जाएगी जो सामान्य भारतीयों के लिए उच्च गुणवत्ता की शिक्षा के लिए वहनीय पहुंच को बढ़ाएगा। इस सन्दर्भ में एक विस्तृत योजना तैयार की जाएगी।”
  • इसके संदर्भ में एन गोपालस्वामी की अध्यक्षता वाली एक एम्पॉवर्ड एक्सपर्ट कमेटी (EEC) ने उत्कृष्ट संस्थानों के रूप में 6 संस्थानों (3 सार्वजनिक क्षेत्र से और 3 निजी क्षेत्र से) के चयन की अनुशंसा की। सार्वजनिक क्षेत्र: भारतीय विज्ञान संस्थान, बंगलुरु, कर्नाटक; भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, बॉम्बे, महाराष्ट्र; और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, दिल्ली। निजी क्षेत्र: जियो इंस्टीट्यूट (रिलायंस फाउंडेशन), पुणे ग्रीन फील्ड श्रेणी के तहत; बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड साइंसेज, पिलानी, राजस्थान; और मणिपाल एकेडमी ऑफ हायर एजुकेशन, मणिपाल, कर्नाटक।

ऐसे संस्थानों की विशेषताएं –

  • UGC (इंस्टीटूशन्स ऑफ़ एमिनेंस डीम्ड टू बी यूनिवर्सिटीज) रेगुलेशन 2017, उन सभी संस्थानों को विनियमित करेगा,  जिन्हें प्रतिष्ठित संस्थान के रूप में मान्यता प्रदान की गई है। इससे उनकी पूर्ण शैक्षणिक, प्रशासनिक और वित्तीय स्वायत्तता
    सुनिश्चित की जा सकेगी।
  • ये विनियम UGC के अन्य सभी विनियमों का अधिरोहण (override) करेंगे और UGC की प्रतिबंधात्मक निरीक्षण व्यवस्था और शुल्क एवं पाठ्यक्रम पर नियामकीय नियन्त्रण से संस्थानों को मुक्त रखेंगे।
  • इन संस्थानों को मुख्यतः बहु-विषयक होना चाहिए और असाधारण उच्च गुणवत्ता वाले शिक्षण एवं शोध, दोनों पर ही केन्द्रित होना चाहिए।
  • इन संस्थानों द्वारा नियमित पाठ्यक्रमों के अतिरिक्त, विभिन्न अंतर्विषयक पाठ्यक्रम भी उपलब्ध करवाए जाने चाहिए। इन अंतर्विषयक पाठ्यक्रम में उभरती हुई प्रौद्योगिकियों एवं सरोकारों वाले पाठ्यक्रमों के साथ-साथ भारत जैसे देशों की विकास संबंधी चिन्ताओं के लिए प्रासंगिक पाठ्यक्रम भी सम्मिलित होने चाहिए।
  • घरेलू और विदेशी छात्रों का उचित सम्मिश्रण होना चाहिए।
  • प्रवेश के लिए एक योग्यता आधारित पारदर्शी चयन प्रक्रिया होनी चाहिए, ताकि मेधावी छात्रों के प्रवेश पर फोकस बना रहे।
  • विश्व स्तरीय संस्थान के रूप में घोषित किये जाने के तीन वर्षों के पश्चात शिक्षक-छात्र अनुपात 1:10 से कम नहीं होना  चाहिए।
  • संस्थान के पाठ्यक्रमों से संबंधित प्रतिष्ठित पत्रिकाओं की सदस्यता सहित संस्थान में एक विश्व स्तरीय पुस्तकालय होना चाहिए।
  • यहाँ विश्व स्तर के प्रतिष्ठित संस्थानों के समान ही छात्र सुविधाएँ उपलब्ध होनी चाहिए।
  • संस्थान के पास उपयुक्त रूप से बड़ा परिसर होना चाहिए और भविष्य में स्वयं के विस्तार के लिए पर्याप्त स्थान भी उपलब्ध होना चाहिए।

loE के रूप में घोषणा के लाभ

  • इस योजना के तहत ‘उत्कृष्ट संस्थान’ के रूप में चयनित प्रत्येक सार्वजनिक संस्थान को पांच वर्ष की अवधि में 1000 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्राप्त होगी।
  • इन संस्थानों को दाखिल छात्रों के 30% तक विदेशी छात्रों को प्रवेश देने; कुल संकाय की संख्या के 25% तक विदेशी संकाय (फैकल्टी) की भर्ती करने; अपने पाठ्यक्रमों का 20% तक ऑनलाइन उपलब्ध कराने; UGC की अनुमति के बिना विश्व रैंकिंग संस्थानों में शीर्ष 500 के साथ अकादमिक सहयोग में प्रवेश करने; किसी भी प्रतिबंध के बिना विदेशी छात्रों का शुल्क निर्धारित करने और वसूलने; डिग्री लेने के लिए वर्षों और क्रेडिट घंटों के संदर्भ में पाठ्यक्रम संरचना का लचीलापन तथा दूसरों के मध्य पाठ्यचर्या एवं पाठ्यक्रम के निर्धारण में पूर्ण लचीलेपन के लिए अधिक स्वायत्ता प्रदान की जाएगी।
  • उन्हें अधिक कौशल और गुणवत्ता में सुधार के साथ अपने संचालन के विस्तार का अधिक अवसर मिलेगा ताकि वे शिक्षा के क्षेत्र में विश्वस्तरीय संस्थान बन सकें।
  • यह अपेक्षा की गयी है कि ये चयनित संस्थान अगले 10 वर्षों में विश्व के शीर्ष 500 संस्थानों में तथा आगे चलकर विश्व के शीर्ष 100 संस्थानों में शामिल होंगे।

सम्मिलित मुद्दे

संस्थानों के स्तर पर

  • आरक्षण व्यवस्था के लागू न होने के कारण इन संस्थानों को समाज के एक विशेष वर्ग के असंतोष का सामना करना पड़  सकता है।
  • UGC की पर्यवेक्षी सहायता की अनुपस्थिति के कारण, दीर्घकाल में ये संस्थान राजनीतिक प्रभाव में आ सकते हैं और इनके अनुसन्धान की गुणवत्ता में कमी आ सकती है।
  • प्रतिभा पलायन से बचने के लिए शोधकर्ताओं को सामाजिक-आर्थिक प्रोत्साहन दिए जाने चाहिए।

रैंकिंग पद्धति के स्तर पर

  • स्वतंत्र रूप से आयोजित किए गए सर्वेक्षणों का उपयोग कर अनुमानित किए गए सब्जेक्टिव परसेप्शन-बेस्ड मैट्रिक्स पर अत्यधिक बल दिया गया है।
  • अंतर्राष्ट्रीय रैंकिंग सर्वेक्षणों में भारत ने सामान्य रूप से और शिक्षाविदों/शोधकर्ताओं के स्तर पर ऐतिहासिक रूप से बहुत
    कम भागीदारी की है, जिससे भारत का औसत प्रदर्शन कम ही बना रहा है।
  • राष्ट्रीय महत्त्व, केंद्र, राज्य, राज्य के निजी, एवं डीम्ड विश्वविद्यालय के रूप में संस्थानों के जटिल वर्गीकरण तथा UGC,
    AICTE, NBA, NAAC जैसे विभिन्न निकायों द्वारा अति विनियमन ने भारतीय विश्वविद्यालयों की रैंकिंग को हानि
    पहुँचाया है।

अन्य मत

  • उच्च प्रतिस्पर्धाः वैश्विक शिक्षा स्पर्धा में प्रवेश अब अत्यंत चिंता का विषय बन सकता है। संस्थानों को परिणामों की
    प्रासंगिकता के संबंध के विचार किए बिना केवल उनकी संभावित रैंकिंग के द्वारा मापना न्यूनकारी होगा।
  • पारदर्शिता: चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी है ,क्योंकि रिलायंस फाउंडेशन के ग्रीनफील्ड जियो इंस्टीट्यूट का चयन किया गया है परंतु महत्वपूर्ण व्यापार एवं अकादमिक प्रतिष्ठा वाले आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के नेतृत्व वाले KREA विश्वविद्यालय को छोड़ दिया गया है। बेंचमार्क और दिशा-निर्देशों का सार्वजनिक साझाकरण भविष्य में ऐसे विवादों को रोक सकता है।
  • फ्रेमवर्क: ज्ञान अर्थव्यवस्था में केवल बहु-अनुशासनात्मक विश्वविद्यालय शामिल नहीं हैं, परंतु वर्तमान परिदृश्य में एकमात्र विश्वविद्यालय ही loE टैग के योग्य प्रतीत होते हैं। समता के हित में और अवसर खोने के भय से भारतीय प्रबंधन संस्थान जैसे क्षेत्रीय संस्थानों को समायोजित करने हेतु एक पृथक श्रेणी का निर्माण किया जा सकता है।

 राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी की स्थापना (Creation of National Testing Agency)

  • 2017-18 के बजट भाषण में वित्त मंत्री ने राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की स्थापना की घोषणा की थी। अब मंत्रिमंडल से इस प्रस्ताव को अनुमोदन मिल गया है।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 में NTA की अनुशंसा की गई थी।

राष्ट्रीय ज्ञान आयोग ने भी ‘राष्ट्र के नाम प्रतिवेदन’ (2006-2009) में राष्ट्रीय परीक्षा सेवा की स्थापना का उल्लेख किया था।

  •  इसका गठन उच्च शिक्षा संस्थानों की प्रवेश परीक्षा का संचालन करने के लिए भारतीय सोसाइटी पंजीकरण अधिनियम,
    1860 के अंतर्गत एक उच्च दर्जे के स्वायत्त और आत्मनिर्भर संस्थान के रूप में किया गया है।
  • यह संयुक्त राज्य अमेरिका में शैक्षिक परीक्षण सेवा (ETS) की तर्ज पर समर्पित एक स्वतंत्र निकाय होगा।
  • उन प्रवेश परीक्षाओं का आयोजन करेगा जिनके आयोजन की ज़िम्मेदारी इसे किसी भी विभाग या मंत्रालय द्वारा दी गयी

NTA की संरचना

  • मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा नियुक्त एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद् द्वारा इसकी अध्यक्षता की जाएगी।
  • इसका मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) ही इसका महानिदेशक होगा जिसकी नियुक्ति सरकार द्वारा की जाएगी।
  • इसका एक बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स (Board of Governors) होगा जिसमें उपयोगकर्ता संस्थानों के सदस्य सम्मिलित होंगे।
  • महानिदेशक की सहायता के लिए 9 विशिष्ट निकाय (9 verticals) होंगे जिनकी अध्यक्षता शिक्षाविदों/ विशेषज्ञों द्वारा
    की जाएगी।

विशेषताएं

  • आरंभ में यह उन प्रवेश परीक्षाओं का आयोजन करेगा जिन्हें वर्तमान में CBSE द्वारा आयोजित किया जा रहा है। NTA के
    पूर्णरूपेण तैयार हो जाने के बाद यह क्रमशः अन्य परीक्षाओं का भी आयोजन करने लगेगा।
  • प्रवेश परीक्षाएं ऑनलाइन पद्धति से वर्ष में कम से कम दो बार आयोजित की जाएंगी, जिससे अभ्यर्थियों को अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के लिए पर्याप्त अवसर मिलेगा।
  • ग्रामीण छात्रों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए, यह उप-जिला/ जिला स्तर पर अपने केंद्र स्थापित करेगा और जहां
    तक संभव हो छात्रों को प्रायोगिक प्रशिक्षण प्रदान करेगा।
  • पहले वर्ष में अपना परिचालन आरंभ करने हेतु सरकार द्वारा इसे 25 करोड़ रुपये का एकमुश्त अनुदान दिया जाएगा। उसके
    पश्चात, यह वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर हो जाएगा।

NTA की आवश्यकता

  • निवेश का उच्च स्तर- आधुनिक जाँच परीक्षा में IT एवं भौतिक अवसंरचना में पर्याप्त निवेश की आवश्यकता होती है तथा
    विश्वविद्यालय या महाविद्यालय इस मामले में आत्मनिर्भर नहीं हैं।
  • प्रक्रिया का सरलीकरण- देश में परीक्षाओं के भिन्न-भिन्न मानकों के कारण छात्रों पर समय एवं धन (परीक्षा शुल्क) का बोझ
    पड़ता है और प्रत्येक परीक्षा के लिए समय-निर्धारित करने और तैयारी में होने वाला तनाव काफी अधिक रहता है।
  • आकस्मिकता के लिए आवश्यक अंतराल उपलब्ध कराएगा – चूंकि माध्यमिक स्कूल की बोर्ड परीक्षाएं एक ही बार आयोजित होती हैं, अत: छात्र को अपना अंक सुधारने का अवसर नहीं मिल पाता। ऐसे में प्रदर्शन को प्रभावित करने में सक्षम किसी भी आकस्मिक या अप्रत्याशित परिस्थिति के समायोजन हेतु कोई अवसर उपलब्ध नहीं रहता।
  • साझी परिसंपत्ति- एक समर्पित एजेंसी के गठन से कॉमन पूल परिसंपत्ति के रूप में मूल्यांकन सेवाएं प्रदान की जा सकती हैं जिसका प्रयोग अन्य निकाय भी कर सकते हैं।
  • अन्य लाभ- आशा है कि NTA के गठन से CBSE, AICTE और अन्य एजेंसियां प्रवेश परीक्षाओं के आयोजन के अपने उत्तरदायित्व से मुक्त हो जाएंगी और यह छात्रों की अभिवृत्ति, बुद्धिमत्ता और समस्या का समाधान करने की क्षमताओं के मूल्यांकन में उच्च विश्वसनीयता व कठिनाई का एक मानक स्तर लेकर आएगा।

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