विदेश नीति -1947-1964

इसे पढ़ने के बाद आप –

  • भारतीय विदेश नीति के आधारभूत सिद्धांतों को जान सकेंगे,
  • भारतीय विदेश नीति के प्रमुख मुद्दों को पहचान सकेंगे,
  • पाकिस्तान और चीन के साथ भारत के संबंध का विश्लेषण कर सकेंगे,
  • अफ्रीका और एशिया के देशों के साथ भारत के संबंधों की व्याख्या कर सकेंगे, और
  • बड़ी शक्तियों और अन्य प्रमुख शक्तियों के प्रति भारतीय दृष्टिकोण को समझ सकेंगे।

इस इकाई में 1947 से लेकर 1964 तक की भारतीय विदेश नीति की चर्चा की गई है। चर्चा की शुरूआत भारतीय विदेश नीति के आधारभूत सिद्धांतों से की गयी है और 1947 के बाद की भारतीय विदेश नीति पर प्रकाश डाला गया है। इस इकाई में गुट-निरपेक्ष आंदोलन और भारत द्वारा निरस्त्रीकरण के जरिए, शान्ति कायम करने के प्रयासों की भी चर्चा की गयी है। इन मुद्दों के अतिरिक्त भारत-पाक और भारत-चीन संबंधों पर भी प्रकाश डाला गया है। साथ-ही-साथ विश्व के अन्य देशों के साथ भारत के संबंधों पर टिप्पणी की गयी है।

भारतीय विदेश नीति के सिद्धांत

भारतीय विदेश नीति के आधारभूत सिद्धांतों की व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है :

  • भारत कभी भी द्विपक्षीय या बहपक्षीय सैन्य संधि के पक्ष में नहीं रहा है। विश्व की समस्याओं को सुलझाने में सैन्य शक्ति की भूमिका का भारत ने हमेशा विरोध किया है। शीत युद्ध शुरू होने के बाद अमरीका और सोवियत संघ में अस्त्र बढ़ाने की होड़ लग गयी। नये-नये आण्विक अस्त्र तैयार हए और नयी-नयी सैन्य संधियाँ कायम की गयीं। भारत का विचार था कि ऐसा करने से देशों के बीच तनाव बढ़ेगा और इसकी परिणति सशस्त्र संघर्ष में होगी। अतः भारत ने शांति कायम करने की दृष्टि से अपने को हर तरह के गुटों से अलग रखा। )
  • भारतीय विदेश नीति अपने आप में स्वतंत्र है. भारत दो बडी शक्तियों में स किसी के गुट में शामिल नहीं है। पर ऐसा मानना सही नहीं कि भारत की विदेश नीति “तटस्थ’ है। वस्तुतः अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों पर भारत कभी “तटस्थ’ नहीं रहा बल्कि इसके गुण और दोष के आधार पर विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय मंचों से अपनी सम्मति स्पष्ट रूप से जाहिर करता रहा है। भारत की इस नीति से कुछ बड़ी शक्तियां खुश नहीं थीं लेकिन तीसरे विश्व के कई देशों ने भारत की इस नीति की प्रशंसा की।
  • भारत ने सभी देशों से मित्रता बनाये रखने की कोशिश की। खास बात यह है कि भारत ने अमरीकी गुट (पूँजीवादी व्यवस्था) और सोवियत गुट (साम्यवादी व्यवस्था) के देशों से बिना किसी भेदभाव के मित्रता की। भारत ने कभी भी एक देश को दूसरे देश से लड़ाने की नीति पर अमल नहीं किया। भारत में सरकार का ढाँचा लोकतांत्रिक है। लेकिन विदेश नीति के मामले में भारत न पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों से अधिक जुड़ा और न ही साम्यवादी देशों से इस कारण दूर हुआ।
  • भारत बहुत दिनों तक ब्रिटेन का उपनिवेश रहा, अतः इसने स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही उपनिवेशवाद विरोधी नीति का अनुगमन किया। विश्व के मानचित्र पर भारत के एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में उभरने के साथ ही एशिया-अफ्रीका-लातिनी अमरीका के देशों में उपनिवेशों के स्वतंत्र होने का सिलसिला शुरू हुआ। भारत की आजादी के बाद श्रीलंका, बर्मा और इंडोनेशिया आज़ाद हुए। इसके बाद भारत ने विभिन्न अन्तर्राष्ट्रीय मंचों से उपनिवेशवाद के खिलाफ़ बोलकर अफ्रीकी देशों की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • भारत ने अपनी विदेश नीति के तहत नस्लवाद विरोधी नारा बुलंद किया। जैसा कि पहले बताया जा चुका है गांधी जी ने 19वीं शताब्दी के आरंभ में दक्षिण अफ्रीका में नस्लवाद के खिलाफ संघर्ष किया था। लेकिन मानव सभ्यता के लिए यह शर्मनाक बात है कि नस्लवाद अपने कर रूप में आज भी दक्षिण अफ्रीका में मौजद है। यह नस्लवाद विश्व मत और सभ्यता के सभी सिद्धांतों को नकारता हआ आज भी वर्तमान है। भारत ने सबसे पहले 1946 में संयुक्त राष्ट्र संघ में यह मुद्दा उठाया था। उसके बाद आज तक भारत विश्वव्यापी नस्लवाद विरोधी आंदोलन में सक्रिय हिस्सा ले रहा है।
  • भारत इस विचार का समर्थक रहा है कि अस्त्रों की होड़ और सैन्य संधियों को रोके बिना विश्व-शांति कायम करना असंभव है। भारत निरस्त्रीकरण को विश्वशांति की कुंजी मानता है। इसके अतिरिक्त निरस्त्रीकरण से अस्त्रों पर खर्च की जाने वाली विशाल राशि की बचत होगी और इस राशि का उपयोग गरीब देशों के विकास के लिए किया जा सकता है।

भारतीय विदेश नीति का विकास

स्वतंत्रता के आरंभिक वर्षों में कुछ लोग भारतीय विदेश नीति को “तटस्थ’ मानते थे। क्योंकि भारत दोनों गुटों (पश्चिमी गुट और सोवियत गुट) से अलग था, लेकिन तटस्थता एक वैधिक अवधारणा है और इस दृष्टि से भारत कभी भी “तटस्थ” नहीं रहा। वस्तुतः इसने सभी महत्वपूर्ण अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों पर उनकी गुणवत्ता के आधार पर अपनी राय (सम्मति) प्रकट की है। अतः भारत की विदेश नीति को स्वतंत्र विदेश नीति कहना चाहिए न कि तटस्थ। 1955 की बाइंग कांफ्रेंस के बाद “गुट निरपेक्ष” शब्द सामने आया और गट-निरपेक्ष देशों की पहली कान्फ्रेंस 1961 में बेलग्रेड में हुई। पहली बार जब भारतीय विदेश नीति के सिद्धांत सामने आये, उस समय विश्व दो गुटों में बंटा हुआ था। संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ इन दो गटों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे और इनके बीच विश्व पर प्रभाव जमाने के लिए प्रतिस्पर्धा चल रही थी। पचास और साठ के दशकों में भारत ने कई अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी अलग राय व्यक्त की। बहुत बार यह राय बड़ी शक्तियों को पसन्द नहीं आई।

जैसे-जैसे समय बीतता गया भारतीय विदेश नीति की प्रशंसा की जाने लगी। दो बड़ी शक्तियों के बीच तनाव में कमी आने पर भारतीय विदेश नीति का महत्व और भी बढ़ गया। दोनों देशों के बीच आण्विक और परम्परागत अस्त्रों की होड़ ने विश्व में एक नयी स्थिति उत्पन्न कर दी। शक्ति संतुलन में निम्नलिखित कारणों से आधारभूत परिवर्तन आया :

  • चीन-सोवियत संघ टकराव
  • वियतनाम में अमरीकी हस्तक्षेप,
  • फ्रांस का स्वतंत्र आण्विक क्षमता हासिल करने का निर्णय,
  • चीन द्वारा आण्विक हथियारों का निर्माण।

इस प्रकार शक्ति संतुलन द्विध्रुवीय से बदल कर विश्व के बहुत से देशों में बंटकर बहुधुवीय हो गया। कुछ समय बाद भारत ने भी अपनी सैन्य शक्ति बढ़ा ली जिसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता था। परिस्थितियों के बदलने के साथ भारतीय विदेश नीति में भी परिवर्तन आया पर इसने अपने आधारभूत सिद्धांतों को नहीं छोड़ा। भारतीय विदेश नीति बहुत कुछ इन बातों पर निर्भर थी :

  • उत्तरी और पश्चिमी सीमाओं पर सरक्षा की मांग,
  • हिन्द महासागर क्षेत्र में होने वाले परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियाँ,
  • विदेश से अनुदान और सहायता प्राप्त करने की ज़रूरत, और
  • दूसरे देशों के साथ व्यापार का विकास।

गुट-निरपेक्ष आन्दोलन

गुट-निरपेक्ष आन्दोलन भारत के प्रयासों का परिणाम था। इस आन्दोलन ने अन्तर्राष्ट्रीय मसलों पर बड़ी शक्तियों की “गुट राजनीति” को चुनौती दी। इसके अतिरिक्त इससे उन देशों के बीच मैत्री संबंध स्थापित हुए, जो उपनिवेशवादी प्रभुत्व से स्वतंत्र होना चाहते थे। इस आन्दोलन का दूसरा लक्ष्य विश्व-शान्ति के लिए प्रयास करना था। 1961 की बैलग्रेड कांफ्रेंस में गुट-निरपेक्ष आंदोलन का स्वरूप स्पष्ट रूप से सामने आया।

गुट-निरपेक्ष आन्दोलन के पांच पथ-प्रदर्शक नेता थे :

  • यूगोस्लाविया के राष्ट्रपति टीटो
  • मिश्र के राष्ट्रपति नासिर
  • घाना के राष्ट्रपति नकरूमाह (Nkrumah)
  • इन्डोनेशिया के राष्ट्रपति सुकानों
  • भारत के प्रधानमंत्री नेहरू ।

पहली गुट-निरपेक्ष कांफ्रेंस की प्रारंभिक समिति ने गुट-निरपेक्ष देशों के लिए निम्नलिखित मानक सूत्रबद्ध किए :

  • इन देशों को सहअस्तित्व और गुट निरपेक्षता के आधार पर स्वतंत्र नीति अपनानी चाहिए या इस नीति के पक्ष में रहना चाहिए।
  • इन्हें हमेशा राष्ट्रीय स्वतंत्रता का समर्थन करना चाहिए।
  • इन्हें बहुपक्षीय सैन्य संधियों में हिस्सा नहीं लेना चाहिए और बड़ी शक्तियों के आपसी टकराव के साथ नहीं जुड़ना चाहिए।
  • अगर इन्होंने दूसरे देश की सेना को अपने यहाँ अड्डा बनाने की छूट दी है तो यह रियायत बड़ी शक्तियों के संघर्ष के संदर्भ में नहीं दी जानी चाहिए।
    अगर ये किसी द्विपक्षीय या क्षेत्रीय रक्षा समझौता के सदस्य हैं तो यह समझौता बड़ी शक्तियों की राजनीति के संदर्भ में नहीं होना चाहिए।

साधारणतः गुट-निरपेक्ष कांफ्रेंस हर तीसरे साल होती है। इसकी दूसरी बैठक 1964 में काहिरा में हुई।

निरस्त्रीकरण

अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत ने हमेशा निरस्त्रीकरण के लिए काम किया। संयुक्त राष्ट्र के घोषणा पत्र की तैयारी की प्रक्रिया में भारत गहरे रूप से जुड़ा हुआ था। अन्तर्राष्ट्रीय निरस्त्रीकरण के लक्ष्य को हासिल करने के लिए घोषणा पत्र के अनुच्छेद ग्यारह में यह कहा गया कि आम सभा अन्तर्राष्ट्रीय शांति और सरक्षा कायम करने के लिए सहयोग के सिद्धांत को मद्देनज़र रख सकती है। इसके अन्तर्गत निरस्त्रीकरण और शस्त्रीकरण को नियंत्रित । करने से संबंधित बातें भी शामिल की जा सकती हैं और सदस्यों या सुरक्षा परिषद या दोनों से ही ऐसे सिद्धांतों की सिफारिश कर सकता है।

भारत ने 1947 में गठित परमाणु ऊर्जा आयोग का समर्थन किया और 1962 में अठारह राष्ट्रों की निरस्त्रीकरण कान्फ्रेंस आयोजित की। संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ सम्पूर्ण या आंशिक निरस्त्रीकरण की प्रक्रिया पर असहमत थे इसलिए यह मुद्दा सुलझ नहीं सका है। भारत आण्विक जमाव का कट्टर आलोचक रहा है और इसके संयुक्त राष्ट्र तथा अन्य विश्व मंचों से इसके ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद की।

पाकिस्तान

पाकिस्तान भारत का प्रमुख विरोधी रहा है। पाकिस्तान और भारत के बीच अनबन का कारण पाकिस्तान और भारत के विभाजन के तरीके में निहित है। 1947 के विभाजन से दोनों देशों के सामने कछ नयी समस्यायें खड़ी हो गयीं। दोनों देश अस्त्रों की होड़ में लग गये, जिसका परिणाम हुआ भारत-पाक युद्ध। इसके कारण दोनों देशों के विकास में बाधा पड़ी, क्योंकि अधिकांश पंजी युद्ध में खर्च हो गयी। आरंभ से ही पाकिस्तान सभी क्षेत्रों में भारत की बराबरी करने की कोशिश कर रहा था। उसकी दूसरी समस्या अपनी अलग पहचान बनाने की भी थी। विभाजन बनावटी और अप्राकृतिक था, 1947 तक यह हिस्सा (जो बाद में पाकिस्तान बना) भूगोल, इतिहास, परम्परा और संस्कृति की दृष्टि से भारत का एक अंग था। इसलिए पाकिस्तान के लिए यह ज़रूरी हो गया कि वह अपनी स्वतंत्र पहचान स्थापित करे।

इसलिए सभी अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान ने भारत से होड़ शुरू कर दी और प्रमखता प्राप्त करने के लिए सभी प्रकार के हथकंडों का उपयोग करने लगा। उदाहरण के लिए, पाकिस्तान ने पश्चिमी एशिया के मस्लिम राज्यों से धार्मिक संबंध स्थापित करने शुरू किये। लेकिन इसके बावजुद पश्चिमी एशियाई देशों के साथ भारत के संबंध बहुत सौहार्दपूर्ण रहे।

पाकिस्तान की प्रतिरक्षा की दृष्टि में भारत का आकार, जनसंख्या, संसाधन और कार्यक्षमाताएं गंभीर चनौती बने हए थे। इसका परिणाम यह हआ कि पाकिस्तान अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने में विशेष रूप से संलग्न रहा। इस उद्देश्य से उसने विश्व के अनेक देशों से सैनिक सहायता मांगी। पाकिस्तान पश्चिमी गुट में शामिल हो गया और इस तरह वह भी शीत युद्ध का भागीदार बन गया। भारत ने भी प्रतिरक्षा के लिए अपनी सैन्य शक्ति को मज़बत बनाया। हालांकि भारत ने हमेशा एक साथ बैठकर विभिन्न मुद्दों को सुलझाने की नीति की वकालत की।

कश्मीर

कश्मीर, भारत और पाकिस्तान के बीच एक अहम् समस्या बना रहा। भारत ने 26 अक्तूबर, 1947 को कश्मीर को अपना हिस्सा बना लिया, लेकिन पाकिस्तान इसे मानने के लिए तैयार नहीं था और उसने जनजातीय कबीलों की आड़ में छुपकर आक्रमण किया। भारत ने पाकिस्तानी आक्रमणकारियों को कश्मीर से खदेड़ दिया। इसमें शेख अब्दल्लाह के नेतृत्व में जन-समुदाय ने महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। दुर्भाग्य की बात यह है कि भारत ने इस काम को पूरा किये बगैर संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में शिकायत दायर कर दी। यह मामला जनवरी, 1948 में दायर किया गया, फलतः 1 जनवरी, 1949 को युद्ध-विराम की घोषणा की गई।

1947 में भारत ने अन्तर्राष्ट्रीय निरीक्षण के अन्तर्गत कश्मीर में जनमत संग्रह कराने का प्रस्ताव रखा लेकिन 1955 में कुछ बदली हई परिस्थितियों के कारण, इसे वापस ले लिया गया। हालांकि कश्मीर के मसले पर संयुक्त राष्ट्र और अन्य अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर कूटनीतिक लड़ाई चलती रही, पर युद्ध की नौबत 1964 तक नहीं आई। लेकिन कश्मीर की समस्या का कोई समाधान नहीं निकला और दोनों देशों के संबंधों पर इसका प्रतिकूल असर पड़ा। वस्तुतः अब दोनों देश अपनी सीमा की रक्षा करने में तत्पर हो गये और इनमें से कोई भी बलपूर्वक इसे बदलने की इच्छा ज़ाहिर नहीं कर रहा था।

सिन्धु नदी जल विवाद

विभाजन ने अनेक समस्याएं उत्पन्न की जिनमें एक है सिन्धु नदी जल का बटवारा। दोनों देश सिन्धु और उसकी सहायक नदियों के जल का ज़्यादा से ज़्यादा उपयोग करना चाहते थे। भारत और पाकिस्तान खाद्यान में आत्मनिर्भर होना चाहते थे, अतः वे सिंधु के जल का अधिक से अधिक उपयोग करना चाहते थे। विभाजन के बाद सिन्धु नदी से सिंचित होने वाले 280 लाख एकड़ क्षेत्र में से 50 लाख एकड़ भूमि भारत के पास रह गयी। अधिकांश पश्चिमी नदियाँ समुद्र में मिल जाती थीं। जबकि पाकिस्तानी नहरें पूर्वी नदियों पर आश्रित थीं। इन नदियों का पानी पूर्वी पंजाब से होकर पाकिस्तान में जाता था।

भारत का कृषि विकास भी रावी, व्यास और सतलज जैसी पूर्वी नदियों के जल पर आश्रित था। पाकिस्तान की नहरों का वह भाग, जो नदी से जुड़ा था, भारतीय भूभाग में पड़ता था। तनाव का कारण यही था। पाकिस्तान में बाढ़ आने या अकाल पड़ने पर पाकिस्तानी शासक भारत को दोषी ठहराते थे। उन्होंने पानी की समस्या के लिए भारत को दोषी ठहराया और न्यायसंगत बटवारे की मांग की। दूसरी ओर भारत इस समस्या को सलझाने के लिए तत्पर था। विश्व बैंक की देख-रेख में 17 अप्रैल, 1959 को वाशिंगटन में नहर के जल के बटवारे से संबंधित अंतरिम समझौता हुआ। इसके बाद दोनों देशों के बीच व्यापक समझौतों का एक सिलसिला चला। 19 सितम्बर, 1969 को कराची में नहर जल संधि पर हस्ताक्षर किए गये।

पाकिस्तान को सैन्य सहायता

पाकिस्तान ने संयुक्त राज्य अमरीका के साथ परस्पर प्रतिरक्षा सहयोग समझौता किया और सितम्बर, 1954 में वह दक्षिण पूर्व एशिया संधि संगठन (South-East Asia Treaty Organisation SEATO) का सदस्य बन गया। 1955 में पाकिस्तान केन्द्रीय संधि संगठन (बगदाद समझौता) का सदस्य बन गया। 1959 में पाकिस्तान ने संयुक्त राज्य अमरीका के साथ सहयोग का द्विपक्षीय समझौता किया जिससे अमरीका ने पाकिस्तान को बड़े पैमाने पर आर्थिक और सैनिक सहायता देना शुरू किया। इसके कारण पाकिस्तान की सैनिक शक्ति बढ़ गयी। इससे भारत को अपनी सुरक्षा का खतरा पैदा हो गया। इसके बावजूद भारत ने किसी प्रमुख शक्ति के साथ गठबंधन नहीं किया।

चीन

स्वतंत्रता के बाद भारत ने सबसे पहले चीन से राजनयिक (Diplomatic) संबंध स्थापित किये। उस समय चीन में च्यांग काई शेक की राष्ट्रीय सरकार का शासन था। 1949 में साम्यवादियों ने राष्ट्रीय सरकार को उखाड़ फेंका और माओत्सेतुंग के नेतृत्व में नयी सरकार का गठन हुआ। भारत ने 30 दिसम्बर, 1949 को इस सरकार को मान्यता दे दी। इसके बाद भारत ने लगातार यह कोशिश की कि चीनी जनतांत्रिक गणराज्य संयुक्त राष्ट्र संघ में शामिल कर लिया जाए। आज़ादी के बाद से ही भारत ने चीन के साथ मित्रता का संबंध रखा लेकिन इसका परिणाम बहुत ही निराशाजनक रहा। भारत-चीन संबंध के तनाव को समझने के क्रम में तिब्बत की गतिविधियों, सीमा विवादों और 1962 के चीनी आक्रमण से संबंधित विभिन्न पहलुओं को जानना आवश्यक है।

तिब्बत विवाद

1950 में चीन की जन मुक्ति सेना (Chinese People’s Liberation Army) तिब्बत में प्रवेश कर गयी और इसे अपने अधीन कर लिया। भारत को इससे गहरा धक्का लगा। तिब्बत क्षेत्र में 2,000 मील की सीमा परम्परागत रूप से भारत के अधीन थी। भारत को यह अधिकार अंग्रेज़ शासन से प्राप्त हुआ था। इसके बावजूद भारत ने चीन से लड़ाई नहीं की और मित्रता का संबंध बनाये रखा। 1954 में भारत ने चीन से समझौता करके तिब्बत पर चीन के अधिकार को मान लिया। इस संधि में पाँच सिद्धान्त शामिल थे। अतः इसे पंचशील भी कहा जाता है। ये भारत और चीन के संबंधों के निर्देशक सिद्धान्त बने। ये पांच सिद्धान्त थे :

  • एक-दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता का सम्मान,
  • एक-दूसरे पर आक्रमण नहीं करना,
  • एक-दूसरे के मामले में हस्तक्षेप नहीं करना, 
  • समानता और आपसी हित, और
  • शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व।

1954 की संधि के तहत भारत ने चीन को नयी दिल्ली, कलकत्ता और कलिंगपोंग में अपने वाणिज्यिक एजेंसियों की स्थापना की छूट दी। इसके जवाब में चीन ने भारत को तिब्बत में व्यापार केन्द्र स्थापित करने की इजाज़त दी।

1959 में तिब्बत में एक जन-विद्रोह हुआ जिसे चीन ने शीघ्रता से दबा दिया। इसके परिणामस्वरूप भारत में गहरा रोष प्रकट किया गया। जब दलाई लामा तिब्बत से भागकर भारत आये तब उन्हें राजनीतिक शरण दी गई। चीन को यह बात ज़रा भी पसन्द नहीं आई। 1959 में चीन ने लौंगणू पर कब्जा कर लिया और लद्दाख में भारतीय क्षेत्र का 12,000 वर्ग मील यू क्षेत्र हथिया लिया। इसके बाद दोनों देशों के बीच सीमा समस्या पर विरोध पत्र, स्मरण पत्र, ज्ञापन पत्र भेजे गये। इनमें दोनों देशों द्वारा अपने-अपने दावों की बात की गई।

भारत-चीन सीमा पर तनाव

तिब्बत में होने वाली गतिविधियों से प्रेरित होकर चीन ने भारतीय सीमा का उल्लंघन करना शुरू कर दिया। चीन ने भारतीय भूक्षेत्र के बड़े भाग पर अपना दावा किया जिसे भारत ने दृढ़तापूर्वक अस्वीकार कर दिया। अप्रैल, 1960 में चीन के प्रधानमंत्री चाउ एन-लाई सीमा विवाद को सुलझाने के लिए नयी दिल्ली आये, लेकिन समस्या का कोई समाधान सामने नहीं आया। दोनों देशों के अधिकारियों ने एक-दूसरे के देश का दौरा किया। लेकिन कोई समझौता नहीं हो सका और सीमा पर छिटपुट आक्रमण होते रहे। भारतीय सीमा का उल्लंघन करके चीनी लगातार भारत पर दबाव डालते रहे।

1962 का चीनी आक्रमण

अक्तूबर, 1962 में चीन ने उत्तरी पूर्वी सीमान्त एजेंन्सी (NEFA नेफा, आधुनिक अरुणाचल प्रदेश) और लद्दाख पर आक्रमण कर दिया। इस प्रकार चीन और भारत के बीच युद्ध शुरू हो गया जिसमें भारत की हार हुई। नवम्बर, 1962 में चीन ने वापस लौटने की एकतरफा घोषणा कर दी। युद्ध के दौरान पश्चिमी शक्तियों ने भारत को सैनिक सहायता दी। सोवियत संघ ने भी भारत का समर्थन किया। लेकिन चीन ने लद्दाख के बड़े भाग पर अपना अधिकार जमाये रखा। इससे चीन के अधिकार क्षेत्र में सिन कियांग और दक्षिणी चीन को जोड़ने वाला सामरिक महत्व का क्षेत्र कब्जे में आ गया।

इस धक्के के बाद भारतीय विदेश नीति की सार्थकता पर प्रश्नचिन्ह लगाया जाने लगा। भारत ने ऐसा राजनयिक (Diplomatic) रास्ता खोजने की कोशिश की जिसमें चीन पर यह दवाब डाला जा सके कि वह भारत का हिस्सा लौटा दे। पर उसे सफलता नहीं मिली। 1962 में कोलम्बो में भारत-चीन विवाद के शांतिपूर्ण समझौते के लिए अफ्रीका और एशिया के देशों की एक बैठक हुई। इसमें इन्डोनेशिया, कम्बोदिया, बर्मा, संयुक्त अरब गणराज्य, घाना और श्रीलंका शामिल हुए। पर चीन के नकारात्मक रवैये के कारण कोई समाधान नहीं निकल सका। इस प्रकार सीमा विवाद को लेकर भारत और चीन के संबंध तनावपूर्ण बने रहे।

1962 के बाद चीन ने दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशियाई क्षेत्र में अपनी स्थिति मज़बूत करनी शुरू कर दी। जहां भी संभव हुआ उसने भारतीय प्रभाव को रोकने की कोशिश की और पाकिस्तान तथा बर्मा के साथ गहरे संबंध स्थापित किये। दूसरी ओर, इन परिस्थितियों के दबाव में आकर भारत अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए मजबूर हुआ।

दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया

भारत ने दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों से संबंध विकसित करने पर विशेष बल दिया और इस क्षेत्र के शांति और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। दो बड़ी शक्तियों के बीच चल रहे शीत युद्ध से भारत उस क्षेत्र में शांति दूत की भूमिका नहीं निभा सका। लेकिन भारत ने इन सभी देशों के साथ मित्रता का संबंध और सहयोग बनाये रखा। जेनेवा कांफ्रेंस में भारत को उस क्षेत्र का शांतिदूत बनाया गया और वह अन्तर्राष्ट्रीय नियंत्रण आयोग का अध्यक्ष बना। हमने यहां भारत और दक्षिण तथा दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के आपसी संबंधों की आपको जानकारी दी है।

नेपाल : नेपाल हिमालय के दक्षिणी ढलान और भारत की उत्तरी सीमा के बीच बसा हुआ है। अतः भारतीय सुरक्षा की दृष्टि से नेपाल का सामरिक महत्व है। भारत इस तथ्य को समझ रहा था, अतः जलाई, 1950 में उसने नेपाल के साथ एक संधि की। भारत ने नेपाल की संप्रभुता, क्षेत्रीय अंखडता और स्वतंत्रता को मान्यता दी। यह समझौता हआ कि किसी भी प्रकार के मन-मुटाव, किसी समस्या पर हुई गलतफहमी से दोनों देश एक-दूसरे को अवगत करायेंगे।

भूटान : भूटान हिमालय से घिरा और चीन की सीमा से लगा हुआ एक देश है। भूटान सामरिक रूप से भारत से जुड़ा हुआ है। अगस्त, 1949 में दोनों देशों ने चिरस्थायी शांति और मित्रता के लिए एक संधि की। भारत ने यह वादा किया कि वह भूटान के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा। दूसरी तरफ भूटान विदेशी संबंधों के लिए भारत के परामर्श पर चलने के लिए तैयार हो गया।

श्रीलंका : श्रीलंका हिन्द महासागर में स्थित है और भारत का पड़ोसी देश है। श्रीलंका में होने वाली किसी भी गतिविधि का भारत की सुरक्षा और शांति पर प्रभाव पड़ता है। श्रीलंका में मुख्य रूप से सिंहली और तमिल रहते हैं। इन दोनों समुदायों में लगातार संघर्ष और झगड़े होते रहते हैं। 1958 और उसके बाद के सिंहली-तमिल दंगे काफी गंभीर प्रकृति के थे। इन अवसरों पर भारतीयों ने संसद में और संसद के बाहर तमिलों के पक्ष में सहानुभूति व्यक्त की। हालांकि श्रीलंका की सरकार को यह बात अच्छी नहीं लगी। भारत श्रीलंका के जातीय झगड़ों को उनका आन्तरिक मामला मानता है। भारत का श्रीलंका से मित्रता का संबंध है और दोनों के बीच आर्थिक और व्यापारिक संबंध भी कायम है। श्रीलंका गुट-निरपेक्ष आन्दोलन का समर्थक है। यह किसी सैन्य सहबंध का सदस्य नहीं है।

बर्मा : यू-नू के नेतृत्व में बर्मा के संबंध भारत से काफ़ी अच्छे रहे। दोनों देशों ने अफ्रीकी-एशियाई भाईचारे की चेतना जगाने का काफी प्रयास किया। लेकिन यू-न को हटाए जाने के बाद वहां तानाशाही कायम हो गयी। और 1962 के बाद बर्मा की विदेश नीति अपने आप में सिमट कर रह गयी। हालांकि, भारत ने बर्मा से एक पड़ोसी के नाते  सौहार्द और मित्रता का संबंध बनाये रखा।

थाईलैंड : थाईलैंड, जो अतीत में कभी भी उपनिवेश नहीं रहा था, सितम्बर, 1954 में दक्षिण-पूर्व एशियाई संधि संगठन (सीटो) का सदस्य बना। द.प.ए.सं. (सीटो) का मख्यालय बैंकॉक में स्थापित हुआ। शीत युद्ध में सोवियत गुट के खिलाफ थाईलैंड ने अमरीकी गुट का समर्थन किया। इसके बावजूद कुछ सांस्कृतिक साम्य और सामान्य आर्थिक हितों को मद्देनज़र रखते हुए भारत ने थाइलैंड से मित्रता का संबंध बनाए रखा। आर्थिक संबंध सुधारने के लिए दोनों देशों के बीच आपसी समझौते होते रहे।

कम्बोदिया : प्रिंस नरोदम सिंहानुक की अध्यक्षता में कम्बोदिया का संबंध भारत से मित्रतापूर्ण रहा। इन दोनों देशों ने मिलकर शीत-युद्ध का हिस्सा बनने से अपने को बचाया। अन्तर्राष्ट्रीय नियंत्रण आयोग का अध्यक्ष होने के नाते भारत ने संतोषजनक ढंग से इस देश की भारत और चीन के साथ लगी सीमाओं का निर्धारण किया। 1955 के बांडुंग कान्फ्रेंस में कम्बोदिया और भारत ने सक्रिय हिस्सा लिया। नेहरू और सिंहानुक एक दूसरे के प्रशंसक थे और इससे दोनों देशों के सौहार्दपूर्ण संबंधों में वृद्धि हुई।

लाओस : लाओस के साथ भी भारत का गहरा संबंध था। भारत ने लाओस की तटस्थता की नीति का समर्थन किया। लाओस ने गुट निरपेक्ष नीति का अनुकरण किया और दोनों देशों के विचार अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर एक समान रहे।

वियतनाम (उत्तर और दक्षिण): भारत, वियतमिन्ह की समाप्ति, इसके दो भागों में बंटने तथा इन दोनों वियतनामों के आपसी संघर्ष से काफी चिन्तित था। भारत का संबंध एक परामर्शदाता के स्तर पर वियतनाम लोकतांत्रिक गणराज्य और वियतनाम गणराज्य दोनों से था। भारत उस क्षेत्र के विकास और शांति के लिए काम करना चाहता था। लेकिन दक्षिण वितयनाम में जहां न्गो-दिन्ह-दियेम का शासन था, वह भारत को सहयोग नहीं दे रहा था। यह शासन अमरीका के प्रभाव में था। भारत ने क्रमशः 1957-58 में दिल्ली आने पर न्गो-दिन्ह-दियेम और हो-यी-मिन्ह का भरपूर स्वागत किया। भारत दोनों वियतनामों की एकता पर असम्बद्ध रहना चाहता था। हो-यी-मिन्ह और हिन्द-चीन में उसके स्वतंत्रता संग्राम को भारतीय जनता का पूर्ण समर्थन प्राप्त था।

फिलिपिन्स : दक्षिण पूर्व एशियाई संधि संगठन (सीटो) के सदस्य के रूप में फिलिपिन्स पश्चिमी गुट का मित्र था। इस देश के साथ भारत के राजनयिक संबंध थे और भारत ने इसके साथ आर्थिक संबंध स्थापित करने की कोशिश की लेकिन भारत अपने इस उद्देश्य में सफल नहीं हआ। भारत यह चाहता था कि अफ्रीका और एशिया के देश पश्चिमी गट के साथ सैन्य संधि न करें। लेकिन फिलिपिन्स ने न केवल सैन्य संधि की, बल्कि अमरीका को क्लार्क वायुसेना अड्डा और सुबिक सेना अड्डा भी प्रदान किया।

मलेशिया : मलेशिया में मलय, चीन और भारतीय समुदाय के लोग रहते हैं और वहां लोकतांत्रिक सरकार है। इसने अफ्रीकी एशियाई बंधुत्व को मजबूत करने की दिशा में भारत का समर्थन किया। यह भी दक्षिण ओर दक्षिण पूर्व एशिया के प्रति चीनी जनवादी गणराज्य के रवैये से आशंकित था। मलेशिया ने अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत का समर्थन किया। भारत के साथ इसके गहरे आर्थिक संबंध रहे। मलेशिया ने भारतीय संयुक्त उद्योगों का स्वागत किया। नेहरू और टुंक अब्दुल रहमान दोनों की शिक्षा ब्रिटेन में हुई थी और अधिकांश अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दों पर दोनों का दृष्टिकोण समान था। इस तरह भारत और मलेशिया का संबंध आपसी विश्वास और सहयोग पर आधारित था। भारत ने इन्डोनेशिया की“मलेशिया को ध्वस्त करने की योजना” का विरोध किया और मलेशिया के राष्ट्र निर्माण को अपना समर्थन दिया।

इन्डोनेशिया : दक्षिण पूर्व एशियाई क्षेत्र में इंडोनेशिया सबसे बड़ा देश है। इंडोनेशिया स्वतंत्रता आंदोलन के नेता सुकार्नो नेहरू के दोस्त थे। मार्च, 1951 में चिरस्थायी शांति और अपरिवर्तनीय मित्रता को बढ़ाने के लिए भारत और इंडोनेशिया ने मैत्री की संधि की। आरम्भ में इंडोनेशिया ने अफ्रीकी एशियाई एकता को दृढ़ करने के प्रयास का समर्थन किया। उसने उपनिवेशवाद को समाप्त करने में भी भारत का साथ दिया। इसने 1955 में बांडुंग में अफ्रीकी एशियाई कांफ्रेंस के नेतृत्व में पुरानी स्थापित शक्तियों के खिलाफ नई उदित शक्तियों के संघर्ष की अवधारणा सामने रखी।

इसने उपनिवेशवाद, नव उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद के खिलाफ जिहाद छेड़ दिया। अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में भारत ने इन उग्र विचारों का समर्थन नहीं किया। भारत ने नई उदित शक्तियों का सदस्य बनने से इंकार कर दिया। इससे भारत इंडोनेशिया संबंधों पर असर पड़ा। जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया तब इंडोनेशिया चुप रहा और भारत के साथ सहानुभूति भी ज़ाहिर नहीं की। यहां तक कि सकानों ने पश्चिमी गट के विरोध में जकार्ता-पिन्डी-पेकिंग-प्योंग-याँग के निर्माण का समर्थन किया। सितम्बर, 1964 में अयूब-सुकानों ने कश्मीर के मामले पर पाकिस्तान का समर्थन किया और अगले वर्ष इंडोनेशिया ने नई उदित शक्तियों से अनरोध किया कि पाकिस्तान-भारत के युद्ध में पाकिस्तान की सहायता करें। इसके बावजूद भारत और इंडोनेशिया के बीच राजनयिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध कायम रहे। भारत ने कभी भी इंडोनेशिया का विरोध नहीं किया।

पश्चिमी एशिया

भारत, मिश्र, ईरान, सऊदी अरब, ईराक, जोर्डन, तुर्की, सुडान, यमन, कुवैत आदि पश्चिमी एशिया के देशों के साथ मित्रता का संबंध स्थापित करने के लिए लगातार कोशिश करता रहा है। पश्चिमी एशिया के देशों में विश्व तेल का 60% भंडार है। यह क्षेत्र दो सामरिक महत्व के समुद्री मार्गों को जोड़ता है। काला सागर और भू-मध्य सागर यहीं आकर मिलते हैं और लाल सागर स्वेज़ नहर के ज़रिए भू-मध्य सागर से जुड़ता है।  भारत ने इस क्षेत्र में फैले मनमुटाव को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

  • फिलिस्तीन समस्या : अरब-इज़राइल मनमुटाव या स्वेज़ संकट, किसी भी मामले को गौर से देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि भारत ने हमेशा अरब देशों का समर्थन किया ताकि उस देश में शांति और विकास हो सके। फिलिस्तीन समस्या और पश्चिमी एशिया के अनेक झगड़ों का मामला संयक्त राष्ट्र संघ में दर्ज हआ, लेकिन फिलिस्तीन का मसला सबसे ज़्यादा उलझा हआ था। संयक्त राष्ट्र के सामने फिलिस्तीन का मसला सबसे पहले अप्रैल, 1947 में ग्रेट ब्रिटेन द्वारा रखा गया था। इसने आम सभा में फिलिस्तीन के भविष्यगत ढांचे पर विचार करने की मांग की। ब्रिटेन के अनुरोध पर आम सभा ने फिलिस्तीन पर विचार करने के लिए विशेष समिति नियक्त की। अगस्त, 1947 में इस समिति ने अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की जिसमें यह प्रस्तावित किया गया कि फिलिस्तीन को अरब राज्य, यहूदी राज्य और अंतर्राष्ट्रीय निरीक्षण में विशेष क्षेत्र में विभक्त कर दिया जाय। जेरूसेलम को विशेष क्षेत्र में शामिल होना था। समिति के प्रस्ताव को आम सभा में दो तिहाई मतों से स्वीकार कर लिया गया। आम सभा ने फिलिस्तीन से संबंधित अनुमोदन को कारगर करने के लिए एक आयोग गठित किया। अंतर्राष्ट्रीय क्षितिज पर इज़राइल उभरता हुआ राज्य था जिसे पश्चिमी शक्तियों का सहयोग प्राप्त था। लेकिन अरब देश इसके अस्तित्व को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे। इसके बाद फिलिस्तीनियों द्वारा स्वदेश की मांग को जनसमर्थन प्राप्त हआ और यह समस्या उलझती ही चली गई। प्रत्येक चरण में भारत ने संयुक्त राष्ट्र के बाहर और भीतर फिलिस्तीनियों का पक्ष लिया।
  • स्वेज़ संकट : स्वेज़ संकट एक ऐसा मसला बना जिसके कारण विश्व की शांति को खतरा उत्पन्न हो गया। जुलाई, 1956 में मिश्र के राष्ट्रपति ने स्वेज़ नहर के राष्ट्रीयकरण की घोषणा की और मिश्र में स्वेज़ नहर कम्पनी के कोष को जब्त कर लिया। ग्रेट ब्रिटेन और फ्रांस ने इस राष्ट्रीयकरण पर नाराज़गी व्यक्त की। उनके विचार में मिश्र की सरकार की यह कार्रवाई 1968 की कौन्सटैनटिनोपोल की संधि के अनुकूल नहीं थी जिसमें स्वेज़ नहर को अंतर्राष्ट्रीय चार्टर के अधीन रखा गया था। ब्रिटेन और फ्रांस तथा मिश्र की सरकार ने एक-दूसरे के खिलाफ आरोप लगाया और अपने-अपने दावे की घोषणा की। भारत और संयक्त राज्य अमरीका ने झगड़े को मिटाने के लिए अपने प्रस्ताव सामने रखे, पर मिश्र ने उसे मंजूर नहीं किया। भारत ने यह सझाव दिया कि स्वेज नहर को मिश्र के अभिन्न अंग के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए। इसने संयुक्त राष्ट्र संघ की सुरक्षा परिषद में इस सवाल पर मिश्र का समर्थन किया।

अक्तूबर, 1956 में इज़राइल, फ्रांस और ब्रिटेन ने स्वेज़ नहर क्षेत्र के मिश्री ठिकानों पर हमला बोल दिया। भारत और अफ्रीकी एशियाई गुट ने मिश्र के प्रति अपनी सहानुभूति व्यक्त की और तत्काल यद्ध रोकने की मांग की। अन्ततः नवम्बर में यद्ध विराम की घोषणा हुई। और इस प्रकार संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपनी आपात सेना भेजने की योजना बनायी ताकि झगड़े के निपटारे का निरीक्षण कर सके। मिश्र ने संयक्त राष्ट्र संघ की सेना को रखना मंजूर कर लिया और एक बार फिर कॉन्सटैन्टिनोपोल की संधि की शर्तों को मानने के लिए तैयार हो गया। इस स्वेज़ संकट को सुलझाने में भारत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

बड़ी शक्तियाँ और अन्य प्रमुख शक्तियाँ

आज़ाद होने के बाद से ही भारत बड़ी शक्तियों और विश्व की अन्य प्रमुख शक्तियों के साथ अपने संबंध में संतुलन बनाए रखने की कोशिश करता आया है। इस भाग में हम इन संबंधों की चर्चा करेंगे।

संयुक्त राज्य अमरीका

हालांकि भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष को अमरीका के तत्कालीन राष्ट्रपति रूजवेल्ट ने अपना समर्थन दिया था, पर चीन में साम्यवाद के उदय के पहले अमरीका ने इस क्षेत्र में कोई विशेष रुचि नहीं दिखाई। भारत की आज़ादी के आरम्भिक वर्षों में अमरीका ने कश्मीर के मसले पर सुरक्षा परिषद् में पाकिस्तान का समर्थन किया। अमरीका चाहता था कि भारत उसके द्वारा संरक्षित सैन्य संधि में शामिल हो जाय। भारत और अमरीका के दृष्टिकोण का मतभेद गहरा होता चला गया। इसके बाद भारत ने किसी भी प्रकार के उपनिवेशवाद का विरोध किया जबकि अमरीका ने उपनिवेशवाद का विरोध अपनी नीति के लाभ के अनुरूप किया।

अमरीका ने उस उपनिवेशवाद का विरोध नहीं किया जहां साम्यवादी शक्तियां इसके ख़िलाफ़ लड़ रही थीं। इस मामले में उसने उपनिवेशवादी शक्तियों का समर्थन किया। भारत ने चीनी जनवादी गणराज्य को मंजूरी दी। उसने लगातार यह कोशिश की कि चीन को संयुक्त राष्ट्र संघ में शामिल कर लिया जाय। इन सब बातों से अमरीका और भारत के संबंध मित्रतापूर्ण नहीं रह सके। इन मतभेदों के बावजूद आर्थिक और तकनीकी क्षेत्रों में भारत को अमरीका से सहायता मिलती रही। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान अमरीका ने भारत को सैनिक सहायता प्रदान करने का प्रस्ताव रखा। इस काल के दौरान आइज़ेनहॉवर (अमरीका के भूतपूर्व राष्ट्रपति) और केनेडी (अमरीकी राष्ट्रपति) ने भारत की यात्रा की। इन सहयोगों के बावजूद भारत ने अमरीका की “नियंत्रण नीति” को स्वीकार नहीं किया गुटनिरपेक्ष बना रहा।

सोवियत संघ

सोवियत संघ ने भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष का समर्थन किया था। 1947 के बाद अन्तर्राष्ट्रीय क्षितिज पर भारत और सोवियत संघ एक दूसरे के करीब आते गये। सोवियत नेता भारत से निम्नलिखित कारणों से प्रभावित हुए :

  • भारत ने चीनी जनवादी गणराज्य को मंज़री दी।
  • संयुक्त राष्ट्र संघ में इसने उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष का समर्थन किया।
  • कोरिया में युद्ध विराम का प्रयत्न और चीन को आक्रमणकारी मानने से इंकार किया।
  • इसने सोवियत गणराज्य के खिलाफ़ गुट में शामिल होने से इंकार कर दिया।

कश्मीर के मसले पर सोवियत संघ ने भारत का समर्थन किया। 1955 में सोवियत नेता बुल्गानिन और खुश्चेव भारत आये और दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते हुए। बाद में गोआ के मसले पर सोवियत संघ ने भारत का समर्थन किया। स्वेज़ संकट के दौरान . भारत और सोवियत संघ ने समान रूप से आक्रमण का विरोध किया था। तृतीय पंचवर्षीय योजना में सोवियत संघ ने भारत को 5000 लाख डॉलर दिये। इसने भारत को तेल भी दिया, जबकि पश्चिमी कम्पनियों ने भारत को तेल देने से इंकार कर दिया था।

जब 1962 में चीन ने भारत पर आक्रमण किया तब सो यत संघ ने न केवल अपनी सहानुभूति व्यक्त की बल्कि मिग लड़ाकू जहाज़ बनाने में सहयोग प्रदान किया। सोवियत नेताओं ने भारत की गुटनिरेपक्षता और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की नीति का समर्थन किया।

ब्रिटेन

हालांकि भारत ब्रिटेन के नेतृत्व वाले राष्ट्रमंडल का सदस्य था पर यह ब्रिटेन की गतिविधियों के प्रति सतर्क था। ब्रिटेन के रवैये ने भारत को और भी सतर्क कर दिया। इसने कश्मीर के मसले पर पाकिस्तान का समर्थन किया और दोनों देश दक्षिण पूर्व एशिया संधि संगठन (सीटो) के सदस्य की हैसियत से मित्र भी बन गये। स्वाभाविक रूप से भारत इन गतिविधियों से नाराज़ हुआ। भारत ने ब्रिटेन की पश्चिम एशियाई नीति का भी विरोध किया। भारत ने स्वेज नहर पर कब्जा करने के लिए आक्रमण करने और मिश्र की आज़ादी को खतरा पहुंचाने की ब्रिटेन की कार्रवाई की निन्दा की।

इस प्रकार, भारत ने सोवियत संघ के साथ मिलकर आंग्ल-फ्रांसीसी आक्रमण का विरोध किया। इससे ब्रिटेन नाराज़ हुआ, पर . अन्ततः पश्चिम एशिया में उसे अपनी कार्रवाई बन्द करनी पड़ी और संकट के राजनीतिक हल के लिए राज़ी होना पड़ा। हालांकि ब्रिटेन और भारत के बीच बहुत से मामलों में विरोध था, पर कई अवसरों पर ब्रिटेन ने भारत के प्रति सहानुभूति व्यक्त की। 1962 में जब चीन ने भारत पर आक्रमण किया था, तब सहानुभूति का पहला संदेश ब्रिटेन ने भेजा था और भारत का समर्थन किया था।

फ्रांस

फ्रांस के साथ भी भारत ने मैत्री संबंध बनाने की कोशिश की। अफ्रीकी एशियाई देशों से सम्बद्ध मसलों पर विचार करते समय फ्रांस ने भारतीय दृष्टिकोण को महत्व दिया। भारत के हिन्द-चीन राज्यों से उपनिवेशवाद समाप्त करने के प्रयास ने फ्रांस को काफी प्रभावित किया। वियतनाम, लाओस, और कम्बोदिया के सत्ता के हस्तांतरण में भारतीय सुझावों को वरीयता दी गई। पर स्वेज़ संकट में भारत द्वारा आक्रमण का विरोध किए जाने पर फ्रांस नाराज़ हआ। बाद में फ्रांस ने भारत फ्रांसीसी संबंध को सुधारने की कोशिश की। चीनी आक्रमण के समय भारत के प्रति फ्रांस का रवैया सहानुभूतिपूर्ण था। वह भारत को सामरिक महत्व के अस्त्र देने के लिए भी राज़ी हो गया।

जापान

जहां तक जापान का संबंध है, भारत ने द्वितीय विश्वयुद्ध में जापान की भूमिका पर मित्र शक्तियों के विचार को स्वीकार नहीं किया। भारत ने जापान से द्वितीय विश्वयुद्ध का । हर्जाना मांगने से इंकार कर दिया। जून 1952 में भारत और जापान के बीच शांति संधि पर हस्ताक्षर हुए, जिसके बाद दोनों देशों के बीच आर्थिक और वाणिज्यिक संबंध स्थापित हए। निम्नलिखित गतिविधियों से भारत और जापान संबंध और भी दृढ़ हुए :

  • नागरिक उड्डयन समझौता (नवम्बर, 1955)
  • सांस्कृतिक समझौता (फ़रवरी, 1956)
  • प्रथम येन ऋण समझौता (फ़रवरी, 1958)
  • भारत-जापान व्यापार समझौता (फ़रवरी, 1958)

लघु उद्योग में भारत और जापान के एक साथ काम करने और इसमें जापान के सहयोग से दोनों देशों के आपसी संबंध मज़बत हए। अन्य तकनीकी क्षेत्रों में भी जापान ने भारत को सहयोग दिया।

आस्ट्रेलिया

भारत, आस्ट्रेलिया के साथ भी निकटता स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील रहा है। आस्ट्रेलिया प्रशांत और हिन्द महासागर से लगा हुआ है अतः दक्षिण-पूर्व एशिया और इस उप-महाद्वीप के लिए इस देश का सामरिक महत्व है। आस्ट्रेलिया चीन के खिलाफ तटस्थीकारक की भूमिका अदा कर सकता है और इस क्षेत्र के देशों के प्रतिरक्षा संबंधी हितों का ख्याल रख सकता है।

भारत और आस्ट्रेलिया राष्ट्रमंडल के सदस्य हैं। जब आस्ट्रेलिया दक्षिण-पूर्व एशियाई संधि संगठन (सीटो) में शामिल हुआ और दक्षिण तथा दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के साथ उसने संबंध स्थापित किये तो भारत ने इसके प्रति अपना कोई उत्साह नहीं दिखाया। भारत आस्ट्रेलिया के साथ गहरा आर्थिक और सांस्कृतिक संबंध स्थापित करना चाहता था और आस्ट्रेलिया ने भी भारत की इस इच्छा का सम्मान किया। आस्ट्रेलिया ने कभी भी पाकिस्तान का पक्ष नहीं लिया और भारत के हितों के खिलाफ़ कभी भी चीन के साथ दोस्ती नहीं की।

अफ्रीकी देश

भारत ने अफ्रीकी देशों में चल रहे स्वतंत्रता आंदोलनों को अपना समर्थन दिया। इसने एशिया में उपनिवेशवाद के खिलाफ़ चल रहे संघर्ष को अफ्रीका के साथ जोड़ने की कोशिश की और उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ विश्व मत बनाने में सक्रिय भूमिका निभाई। 1949 के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ में अफ्रीकी-एशियाई गुट का उदय, अफ्रीका और एशिया के लोगों की सामान्य इच्छा का प्रतिफलन था। बाद में जब भारत, मिश्र और अन्य देशों ने मिलकर गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की शुरूआत की तो कई अफ्रीकी देशों ने इसका सदस्य बनकर अफ्रीकी-एशियाई बंधुत्व को मज़बूत किया। भारत ने अपनी आज़ादी के पहले ही दक्षिण अफ्रीका की नस्लवादी नीति का विरोध किया था। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इसने दक्षिण अफ्रीका की नस्लवादी भेदभाव और रंगभेद की नीति का विरोध सभी अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर किया। भारत ने दक्षिण अफ्रीका से अपने सभी व्यापारिक संबंध तोड़ दिये।

जांबिया, तनज़ानिया, कीनिया और सूडान भारत के अच्छे दोस्त रहे हैं। बाद में अल्जीरिया, लीबिया, मोरक्को, टुनीसिया आदि देशों के साथ भी दोस्ती और सहयोग के संबंध स्थापित हए। भारत ने इन देशों को कपड़ा, जूट, चाय, तम्बाक, मसाला, चीनी और हल्के इंजीनियरिंग के सामान निर्यात किये और कच्चा सूत, तांबा, फास्फेट आदि खनिज पदार्थ आयात किये। कई अफ्रीकी देशों के साथ भारत के संबंध सौहार्दपूर्ण हैं।

सारांश

संक्षेप में हमने 1947 से 1964 के दौरान भारतीय विदेश नीति के सभी पक्षों पर दृष्टिपात कर लिया है। विभिन्न देशों के साथ भारत के आपसी संबंधों का चर्चा इस इकाई में की गई। इस अवधि के दौरान भारत दक्षिण प्रशांत सागर और लातिनी अमरीकी देशों के साथ अपने संबंध दृढ़ नहीं कर सका था। अतः इस इकाई में उन पर प्रकाश नहीं डाला गया है। 1947 और 1964 की भारतीय विदेश नीति का एक ही उद्देश्य था-अपने को एक स्वतंत्र देश के रूप में प्रतिष्ठित करना और अपने राष्ट्रीय हितों का विकास करना।

लेकिन भारत ने कई अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर विकासशील और अविकसित देशों के हितों की प्राथमिकता पर भी जोर दिया। इसने पश्चिमी या साम्यवादी देशों के साथ सैन्य संधि करने से इंकार किया और गुटनिरपेक्ष आन्दोलन को आगे बढ़ाया। इसने शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और विकास की नीति अपनाई, अंतर्राष्ट्रीय राजनीति को भारत का यह महत्वपूर्ण योगदान है। हालांकि 1962 के चीनी आक्रमण के कारण भारत को एक गहरा धक्का लगा फिर भी 1947-64 का काल भारतीय विदेश नीति का आधार बना।

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