निबंध: क्या विश्व वैश्वीकरण की विपरीत धारा का साक्षी बन रहा है? (Essay: Is the world witnessing the opposite of globalization? )

वैश्वीकरण क्या है? (What is Globalization?)

विगत दो दशकों में एक वैश्विक अर्थव्यवस्था का उदय हुआ है जो हजारों मील की दूरी तक विस्तृत होने के बावजूद निर्बाध रूप से परस्पर संबद्ध है। इसने राष्ट्रीय अवरोधों को समाप्त कर दिया है तथा इसका लक्ष्य एक सीमारहित विश्व के आदर्श स्वरूप को प्राप्त करना है। व्यापार पर अत्यधिक सरकारी नियंत्रण की अनुपस्थिति ने कंपनियों को कम लागत के विकल्पों की निरंतर खोज करने तथा इस प्रक्रिया में विश्व को और अधिक बेहतर बनाने की अनुमति प्रदान की है। विश्व भर में साझा आर्थिक, वाणिज्यिक तथा राजनीतिक हितों ने राष्ट्र राज्यों को और अधिक एकीकृत किया है।

इसके साथ ही वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं का विकास हुआ है। इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में विभिन्न कारकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है जैसे – उभरते बाजारों में सुधार, वैश्विक व्यापार समझौते, नए व्यापारिक मॉडल जिन्होंने एकीकृत कंपनियों को विभाजित किया है, निम्न परिवहन लागत इत्यादि।

वैश्वीकरण का प्रथम चरण मुख्य रूप से औपनिवेशिक साम्राज्यों द्वारा संचालित था जिन्होंने विदेशों में उपलब्ध सस्ते संसाधनों को प्राप्त कर उनका घरेलू स्तर पर मूल्य वर्धन किया और लाभ प्राप्त किया। जब ये आपूर्ति श्रृंखलाएं विफल हुईं तो इसके कारण यूरोप में दीर्घकालीन औद्योगिक क्षमता होने के बाद भी वस्तुओं की कमी हो गई। इसने एक अस्थिरकारी असंतुलन को जन्म दिया जो कालांतर में दो विश्वयुद्धों का कारण बना।

वैश्वीकरण के प्रति भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रतिक्रिया

(Indian Economy’s Responses)

यद्यपि यह समझा जाता है कि सीमा-पार व्यापार और निवेश में वृद्धि ने सभी देशों को लाभांवित किया है, लेकिन कुछ राष्ट्रों ने अन्य राष्ट्रों की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया है। यह वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में भारत और चीन जैसे देशों की बढ़ती हिस्सेदारी के रूप में प्रतिबिंबित होता है। वैश्वीकरण के कारण, भारत की वैश्विक GDP में हिस्सेदारी वर्ष 1990 के 3.6% से बढ़कर वर्ष 2016 में अनुमानित 7.3% तक हुई है।

वैश्विक स्तर पर वैश्वीकरण का प्रभाव

(Impact of Globalization Around The World)

आधुनिक विचार प्रक्रिया में वैश्वीकरण एक प्रभावी तत्व के रूप में उभरा है। इसने आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक सहित मानव जीवन के सभी पहलुओं को प्रभावित किया है।

आर्थिक पहलू (Economic Aspects)

  •  वर्तमान में उभरते हुए बाजारों की वैश्विक अर्थव्यवस्था में हिस्सेदारी वर्ष 1990 की तुलना अधिक
    हो गई है। इन बाजारों की वैश्विक अर्थव्यवस्था में समग्र हिस्सेदारी 1990 के 36% से बढ़कर वर्तमान में 58% हो गई है।
  • हालांकि वैश्विक GDP में कुछ देशों की हिस्सेदारी में गिरावट आयी है। G-7 समूह (कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, यूनाइटेड किंगडम तथा संयुक्त राज्य अमेरिका) की प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं की वैश्विक GDP में हिस्सेदारी वर्ष 1990 के लगभग 50% से घटकर वर्ष 2016 में 30.9% हो गई है। इसी अवधि में यूरोपीय संघ (28 सदस्य देश) की हिस्सेदारी 27.6% से घटकर 16.8% रह गई है।
  • हालांकि, प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं की घटती हिस्सेदारी को सभी उभरते बाजारों के लाभों के रूप में प्रत्यक्षत: परिवर्तित नहीं किया जा सका है। ‘उभरते एवं विकासशील एशिया’ (जिसमें चीन एवं भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ तथा दक्षिण-पूर्वी एशियाई टाइगर अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं) की हिस्सेदारी 12.5% से बढ़कर 31.8% हो गई है।

 

  •  वहीं 1990 से 2016 के मध्य वैश्विक GDP में उप-सहारा अफ्रीका की हिस्सेदारी में बहुत कम वृद्धि (2.8% से बढ़कर 3%) देखी गई थी। इसी प्रकार ‘मध्य-पूर्व, उत्तरी अफ्रीका, अफगानिस्तान तथा पाकिस्तान’ जैसे देशों की हिस्सेदारी में भी कम वृद्धि देखी गई थी। लैटिन अमेरिका तथा कैरेबियन क्षेत्र की हिस्सेदारी 10% से घटकर 7.9% रह गई।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका सहित विकसित विश्व के विभिन्न भागों में संरक्षणवाद की भांग में वृद्धि हो रही है जो विश्व व्यापार और संवृद्धि के समक्ष संकट उत्पन्न कर सकती है।
  • यदि सांख्यिकीय परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो वैश्वीकरण ने सभी भागीदारों को लाभ पहुंचाया है। वैश्विक स्तर पर समग्र रूप में निर्धनता के निरपेक्ष स्तर में गिरावट हुई है। वैश्वीकरण से कुछ लोगों को लाभ प्राप्त हुआ है तो कुछ को हानि उठानी पड़ी है। कुछ लोग अत्यधिक समृद्ध बन गए हैं। शीर्ष 1% समृद्ध व्यक्तियों द्वारा अपने देश की आर्थिक सम्पदा के एक बड़े भाग का संचय कर लिया गया है तथा वे करों के भुगतान से भी बचते हैं। जबकि मध्य स्तर पर आय स्थिर हो गई है तथा युवाओं में बेरोजगारी की दर में वृद्धि हो रही है।
  • वे विदेशों के घरेलू रोजगार को भी क्षति पहुंचाते हैं। इसके अतिरिक्त, अधिकारों हेतु जनवादी आंदोलनों द्वारा भी आतंक और हिंसा के विरुद्ध सख्त कार्यवाही की मांग की जा रही है। इस प्रकार असमानता तथा असुरक्षा ने जनवादी और सत्तावादी सरकारों के लिए अनुकूल परिस्थितियों का निर्माण किया है।

सामाजिक-सांस्कृतिक पहलू (Socio-cultural Aspects)

  • वैश्वीकरण के न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव भी होते हैं। वैश्विक स्तर पर एकल परिवारों का उदय हुआ है तथा इसके साथ ही विशेष रूप से शिक्षा, स्वास्थ्य तथा पोषण से संबंधित लैंगिक समानता की प्रवृत्ति देखी जा रही है।
  • इसके साथ ही, वैश्वीकरण ने इंटरनेट पर सूचना के प्रसार के माध्यम से शिक्षा तक पहुंच को सक्षम बनाया है जिससे लोगों के मध्य कौशल विकास और जागरूकता में वृद्धि हुई है।\
  • इसके अतिरिक्त, सेवा क्षेत्रक में वृद्धि के कारण वैश्वीकरण ने नगरीकरण की गति को और अधिक तीव्र किया है तथा नगर केन्द्रित रोजगारों के सृजन के कारण ग्रामीण क्षेत्रों से नगरीय प्रवास में वृद्धि हुई है। उदाहरणार्थ एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2050 तक भारत की 50% से अधिक जनसंख्या शहरों में निवास करेगी।
  • वैश्वीकरण ने एक देश के स्थानीय खान-पान, वेशभूषा तथा निष्पादन कला परम्पराओं को भी प्रभावित किया है। उदाहरण के लिए पिज़्ज़ा, बर्गर, चाइनीज़ तथा अन्य पश्चिमी खाद्य पदार्थ वैश्विक स्तर पर लोकप्रिय हो गए हैं। होली, दीपावली तथा क्रिसमस जैसे त्यौहार संपूर्ण विश्व में मनाए जाते हैं। इसी प्रकार योग और भारतीय हस्तशिल्प वैश्विक लोकप्रियता प्राप्त कर रहे हैं।
  • भारतीय शास्त्रीय संगीत ने विश्वव्यापी ख्याति अर्जित की है। संगीतज्ञों के मध्य पश्चिमी संगीत के साथ भारतीय संगीत के सम्मिश्रण को बढ़ावा दिया जा रहा है। पश्चिमी नृत्य शैली जैसे कि जैज़, हिप-हॉप, सालसा, बैले (ballet) आदि भारतीय युवाओं के मध्य काफी लोकप्रिय बन गए हैं। हालांकि, वैश्वीकरण की आलोचना भी की जाती है। इसने वृद्धजनों की प्रस्थिति पर नकारात्मक प्रभाव डाला है। इसके अतिरिक्त, स्वच्छंद व्यक्तिवाद, संस्कृति के एकरूपीकरण (होमोजेनिज़शन) की प्रवृत्ति तथा अत्यधिक उपभोक्तावाद ने भी समाज को प्रतिकूल रूप से प्रभावित किया है।

राजनीतिक पहलू (Political Aspects)

  • वैश्वीकरण ने वैश्विक राजनीतिक व्यवस्था को भी प्रभावित किया है। इसने लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, अधिकार आधारित कल्याणकारी दृष्टिकोण तथा विधि के शासन संबंधी मूल्यों को प्रसारित किया है। वैश्वीकरण विश्व भर में लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्थापना हेतु आंदोलनों के एक प्रमुख कारक के रूप में उभरा है। उदाहरण के लिए मध्य-पूर्व देशों में लोकतांत्रिक सरकारों की स्थापना की मांग से संबंधित अरब स्प्रिंग।
  • विश्व व्यापार, जलवायु परिवर्तन, आतंकवाद तथा विवाद समाधान जैसे वैश्विक मुद्दों से निपटने हेतु G-20, विश्व व्यापार संगठन, यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज आदि वैश्विक तथा क्षेत्रीय संस्थाओं एवं संगठनों की स्थापना की गयी है।
  • हालांकि, विकसित देशों का पक्ष लेने तथा विकासशील एवं कमजोर देशों की चिंताओं की उपेक्षा करने के कारण वैश्विक संस्थाओं की आलोचना की जाती है। उदाहरण के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक आदि वैश्विक संस्थाओं में सुधार के प्रति विकसित देश अनिच्छुक

क्या विश्व वैश्वीकरण की विपरीतुधारा का साक्षी बन रहा है?

Is the world Witnessing Reverse Globalization?

विश्व भर में, वैश्वीकरण और इसके दुष्प्रभावों के विरुद्ध प्रतिक्रिया में वृद्धि हुई है। राष्ट्रीय उद्योगों की सुरक्षा और रोजगार के अवसरों एवं आय में वृद्धि हेतु वैश्विक वित्तीय संकट के पश्चात से ही देश वैश्वीकरण की प्रक्रिया से तीव्रता से पीछे हट रहे हैं।

वैश्वीकरण द्वारा राष्ट्रीय नीतियों की प्रभावकारिता को जिस प्रकार से कम किया जा रहा है उससे सरकारों के मध्य निराशा में वृद्धि हुई हैं। उदाहरण के लिए, घरेलू मांग का समर्थन करने के लिए राजकोषीय विस्तार, वित्तीय रिसाव के रूप में व्यर्थ हो सकता है और घरेलू गतिविधि को प्रोत्साहित करने के स्थान पर आयात को बढ़ावा दे सकता है।


बहुत सी कंपनियों ने निम्न कौशल वाले रोजगारों (low-end job) की आउटसोर्सिंग के माध्यम से अत्यधिक लाभ अर्जित किया है। सीमाओं के बंद होने से बहुराष्ट्रीय कंपनियों की प्रगति मंद हो जाती है। | तथा स्थानीय श्रमिकों की सौदेबाजी करने की क्षमता में वृद्धि हो जाती है। 2012 से, अमेरिका की राष्ट्रीय आय में कॉर्पोरेट की हिस्सेदारी में कमी तथा श्रमिकों की हिस्सेदारी में वृद्धि देखी जा रही है। ट्रम्प जैसे नेताओं का उदय, जिनकी नीतियां कंपनियों और रोजगारों को अमेरिका में वापस लाने के प्रति समर्पित हैं, इस प्रवृत्ति को अधिक तीव्र करेगा।

निम्नलिखित मानदंडों के आधार पर यह देखा जा सकता है कि 2008 के वित्तीय कट के पश्चात वैश्वीकरण विपरीसंत दिशा में बढ़ रहा है:

  • व्यापार (Trade): 2008 तक कई दशकों में वैश्विक व्यापार में सकारात्मक रूप से वृद्धि हुई। परंतु संकट और मंदी ने व्यापार वृद्धि के मार्ग को अवरुद्ध कर दिया और इसमें पुन: सुधार संभव नहीं हो पाया। कुल उत्पादन के प्रतिशत के रूप में वैश्विक व्यापार 2008 में अपने सर्वोच्च स्तर पर था। IMF की वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक रिपोर्ट के अनुसार, व्यापार उदारीकरण में गिरावट और संरक्षणवाद का उदय वैश्विक व्यापार में कमी के प्रमुख कारणों के रूप में उभरे हैं।
  • आप्रवासन में गिरावट (Immigration Boom has fizzled): वैश्विक स्तर पर, अन्य देशों में रहने वाले प्रवासियों की संख्या में धीरे-धीरे किन्तु निरंतर वृद्धि हुई है। ग्रीस, मेसेडोनिया, हंगरी और रोमानिया जैसे देशों में आप्रवासन-रोधी अवरोधों (एंटी-इमिग्रंट फेन्स) का निर्माण किया जा रहा है। इसके अतिरिक्त, ग्वाटेमाला, अर्जेंटीना, एस्टोनिया, नॉर्वे जैसे देश भी ऐसी योजनाएँ बना रहे हैं। इस संबंध में एक अन्य उदाहरण ईरान, लीबिया, उत्तरी कोरिया इत्यादि देशों के लोगों के लिए अमेरिका द्वारा यात्रा प्रतिबंध लगाना और हाल ही में ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे देशों द्वारा वीजा व्यवस्था और वर्क परमिट को कठोर बनाया जाने का भी है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका में, बड़े स्तर पर होने वाला आप्रवासन समाप्त हो गया है। 2008 से 2014 तक, संयुक्त राज्य अमेरिका में रहने वाले मेक्सिकन लोगों की संख्या में 1 मिलियन से अधिक की गिरावट दर्ज की गई क्योंकि बड़ी संख्या में बिना दस्तावेज वाले आप्रवासी मेक्सिको वापस जा रहे हैं।
  • वित्त (Finance): वित्तीय उद्योग से संबंधित विनियामकीय कमी एक अन्य कारक है। वित्तीय संकट के समय अमेरिका और यूरोप में स्थित बड़े वैश्विक बैंकों को भारी नुकसान उठाना पड़ा था, लेकिन यह तो केवल शुरुआत भर थी। उसके बाद से उच्च पूंजी आवश्यकताओं, कठोर विनियामक जांच और संयुक्त राज्य अमेरिका के डॉड-फ्रैंक अधिनियम जैसे नए नियमों ने बैंकों के व्यापार मॉडल को कमजोर और उनकी लाभप्रदता को कम कर दिया है जिससे सीमापार वित्तीयन में कमी हो रही है।
  • पक्षपातपूर्ण व्यापार उपायों में वृद्धि (Increasing Discriminatory Trade Measures): वर्ष 2009 और 2015 के मध्य, उदारीकरण की पूर्व अवधि की तुलना में तीन गुना अधिक पक्षपातपूर्ण व्यापार उपायों को लागू किया गया। केवल वर्ष 2015 में ही, नवीनतम ग्लोबल ट्रेड अलर्ट डेटाबेस । के अंतर्गत विश्व भर में सरकारों द्वारा अपनायी गयी 539 ऐसी पहलों को दर्ज किया गया था तो विदेशी व्यापारियों, निवेशकों, श्रमिकों या बौद्धिक संपदा के स्वामियों को क्षति पहुँचाती हैं।
  • वर्तमान में, सरकारें इस प्रकार के प्रशुल्क अथवा अन्य कठोर अवरोधों को अधिरोपित नहीं कर सकती हैं जो विश्व व्यापार संगठन के नियमों का उल्लंघन करते हैं।

किन्तु व्यापार प्रवाह को नियंत्रित करने के प्रयासों में निरंतर वृद्धि हो रही है, यथाः

  • घरेलू उद्योगों के लिए वित्त का प्रवाह सुनिश्चित करना: संयुक्त राज्य अमेरिका (ऑटो बेलआउट) से लेकर ब्रिटेन, चीन, ब्राजील, कनाडा और कई यूरोपीय संघ के सदस्य देशों तक, सभी देश घरेलू उद्योगों को वित्तीय सहायता प्रदान कर रहे हैं।
  • राज्य खरीद नियम- चीन जैसे देशों द्वारा विदेशों से सामरिक और रक्षा प्रौद्योगिकी की खरीद को प्रतिबंधित करते हुए घरेलू आपूर्तिकर्ताओं को सर्थन प्रदान किया जा रहा है।
  • 2009 से संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में प्रारंभ किए गए ” बाई लोकल (Buy local)” जैसे अभियान।
  • कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक्स, उपकरण और विद्युत सामान, प्राथमिक धातुओं, मशीनरी, फर्नीचर, प्लास्टिक और रबड़, कागज और विनिर्मित धातुओं जैसे क्षेत्रों में “रि-शोरिंग” या “लोकल-टू-लोकल” जैसी पहले सामान्य बनती जा रही हैं। उदाहरण के लिए जनरल इलेक्ट्रिक (GE) द्वारा मेड इन यूएसए पहल के अतर्गत ओहियो और इलिनोइस संयंत्रों में उच्च दक्षता वाले लाइट बल्ब का निर्माण किया जा रहा है।
  • नए सुरक्षा और पर्यावरणीय मानकों ने सहायता प्रदान करने के साथ-साथ विदेशी उत्पादों के विरुद्ध अवरोध भी उत्पन्न किए हैं।
  • अनेक देशों द्वारा विभिन्न खाद्य आयातों पर प्रतिबंध आरोपित किए जाते हैं।
  • एक व्यापार उपाय के रूप में वित्तीय नीति: अमेरिका, यूरोप, ब्रिटेन और जापान द्वारा कृत्रिम रूप से निम्न ब्याज दरों, क्वांटिटेटिव इजिंग तथा मुद्रा और विदेशी विनिमय बाजारों में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के माध्यम से प्रतिस्पर्धात्मक लाभ प्राप्त करने हेतु मुद्रा स्तरों को जानबूझकर लक्षित किया गया है। अवमूल्यन ने विदेशी निवेशकों (जिनके द्वारा अवमूल्यनकर्ता देश से ऋण लिया गया है) की क्रय शक्ति को कमजोर कर दिया है।
  • विशिष्ट कर: कनाडा, हांगकांग, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया सहित अनेक देशों ने विदेशी संपत्ति खरीददारों पर विशिष्ट करों अथवा अन्य प्रतिबंधों को लागू किया है।
  • परिवर्तनशील और संभावित रूप से अस्थिरताकारी अन्तः प्रवाहों ने स्विट्ज़रलैंड, चीन, ब्राजील, दक्षिण कोरिया और भारत जैसे अनेक देशों को किसी न किसी रूप में पूंजी को संकुचित बनाये रखने हेतु प्रेरित किया है।
  • ऋण के उच्च स्तर के साथ स्पेन और पुर्तगाल जैसे राष्ट्रों ने वित्तीय संस्थानों और आर्थिक गतिविधियों का समर्थन करने हेतु घरेलू रूप से फंड को सुव्यवस्थित करने का प्रयास किया है।
  • अमेरिका, ब्रिटेन, यूरोजोन के देशों और अन्य देशों द्वारा बैंकों और निवेशकों को “पेट्रियोटिक (patriotic)” बैलेंस शीट को अपनाने, राष्ट्रीय सरकारी बांड क्रय करने अथवा ऋण प्रदान करने में घरेलू उधारकर्ता को प्राथमिकता देने के लिए प्रोत्साहित करने हेतु विनियमन और राजनीतिक दबाव का उपयोग किया गया है। ग्लोबल रेटिंग एजेंसी स्टैंडर्ड एंड पूअर्स के अनुसार, 2008 से बैंकों के ऋण में राज्य के ऋण की हिस्सेदारी दोगुनी हो गई है।
  • अमेरिका सहित अन्य राष्ट्र, संकीर्ण द्विपक्षीय और क्षेत्रीय समझौते करने हेतु प्रयासरत हैं, जहां अनेक वार्ता भागीदारों को अलग-अलग संतुष्ट करने की आवश्यकता नहीं होती है और महत्त्वपूर्ण क्षेत्रकों को संरक्षण प्रदान किया जा सकता है। ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप जैसे व्यापार समझौतों के समक्ष अकस्मात समस्या उत्पन्न हो गई है।

नसंख्या में गिरावट (Population decline):ज विश्व के अधिकांश देशों में प्रजनन दर का कम होना निस्संदेह विकास की गति को मंद करता है। चीन की कार्यशील-आयु की जनसंख्या में प्रत्येक वर्ष लाखों लोगों की कमी हो रही है और यह कमी आगे और तेजी से बढ़ेगी। यूरोप और पूर्वीएशिया में वृद्ध लोगों की संख्या तीव्रता से बढ़ रही है और विश्व के अनेक देशों में प्रजनन दर प्रतिस्थापन स्तर की तुलना में भी कम हो गई है। केवल विश्व का सर्वाधिक निर्धन क्षेत्र उप-सहारा अफ्रीका एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ निरंतर उच्च प्रजनन दर विद्यमान है।

वेतन (Wages): विश्व भर में वेतन समान होता जा रहा है तथा चीन में इसमें तीव्र वृद्धि हो रही है। यहाँ तक कि कुछ अनुमानों के अनुसार तो यह भी कहा जा रहा है कि गुणवत्ता, बौद्धिक संपदा की चोरी और सीमापार आपूर्ति श्रृंखलाओं के प्रबंधन की गंभीर समस्याओं को ध्यान में रखते हुए वर्तमान में चीन में वस्तुओं का निर्माण करना USA में निर्माण की तुलना में सस्ता नहीं रह गया है। इस प्रकार अपतटीय उत्पादन भी विगत दशक की तुलना में कमजोर प्रतीत होता है।

राजनीति (Politics): महान मंदी (Great Recession) के पश्चात् संरक्षणवाद की प्रवृत्ति में वृद्धि हुई है। ऐसे में चीन, विदेशी कंपनियों पर अपनी अर्थव्यवस्था की निर्भरता को कम करने का प्रयास कर सकता है। इसके साथ ही कई महाद्वीपों में लोकप्रिय समर्थन के साथ अधिनायकवाद (Authoritarianism) का उदय हुआ है। जहाँ एक ओर चीन (और रूस में व्लादिमीर पुतिन) पश्चिमी आधिपत्य के समक्ष गंभीर चुनौती प्रस्तुत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर पश्चिमी देशों के अंदर भी, विभिन्न व्यवस्था विरोधी, वामपंथी और दक्षिणपंथी जनवादी आंदोलनों द्वारा समूचे तंत्र को अस्थिर किया जा रहा है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प (और बर्नी सैंडर्स) की व्यवस्था विरोधी राजनीति की विजय और यूरोप में देशीयता समर्थक, अधिनायकवादी, राजनीतिक नेताओं का तीव्र उदय।

वैश्विक मंदी (Global Slowdown): विशेष रूप से विकसित अर्थव्यवस्थाओं में धीमी संवृद्धि के होने का आशय कम व्यापार का होना है, जिसके परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय वित्त में कमी हो जाती है। इससे आर्थिक कारणों से होने वाले आप्रवासन में भी कमी आती है। वर्तमान में चीन, जोकि वैश्विक विकास और अंतरराष्ट्रीय निवेश का एक बड़ा केंद्र है, की संवृद्धि दर में भी कमी आई

वैश्विक संस्थानों की भूमिका में गिरावट (Decline of global institutions): वैश्विक संस्थानों और अंतर्राष्ट्रीय समझौतों की अवमानना की जा रही है। हाल ही में जलवायु परिवर्तन पर हुए पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका का बाहर हो जाना इसका एक उदाहरण है। यहां तक कि पश्चिमी एशियाई संकट, विशेष रूप से सीरिया संकट का समाधान करने में विफल रहने के कारण, संयुक्त राष्ट्र संघ की गंभीर आलोचना की गई है। वैश्विक संस्थानों की भूमिका में गिरावट को प्रतिबिंबित करने वाले अन्य उदाहरणों में यूनेस्को से अमेरिका का बाहर होना, चीन द्वारा UNCLOS के निर्णय को अस्वीकार करना और तीव्र विरोध के बावजूद अमेरिका द्वारा येरुशलम में अपने दूतावास का उद्धाटन करना सम्मिलित है।

क्षेत्रीय संगठनों का कमजोर होना (Weakening of regional associations ): वैश्वीकरण की विपरीत धारा (रिवर्स ग्लोबलाइजेशन) के युग में क्षेत्रीय संगठनों (जो वैश्वीकरण का प्रतीक रहे हैं) के समक्ष संकट उत्पन्न हो गया है। इसी प्रकार यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के अलग होने को वैश्वीकरण की अस्वीकृति के रूप में व्याख्यायित किया जाता है। इसके अतिरिक्त, हाल ही में G-7, अमेरिका और अन्य देशों के मध्य असहमति के कारण एक साझा बयान जारी करने में विफल रहा है।

विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की मांग (Call for Boycott of foreign goods): वैश्वीकरण की विपरीत धारा की एक और अभिव्यक्ति विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की बढ़ती मांग है। इस सन्दर्भ में दो प्रमुख उदाहरण तुर्की (तुर्की राष्ट्रपति द्वारा अमेरिकी इलेक्ट्रॉनिक सामानों का बहिष्कार करने को कहा गया) और घाना ( घाना की अर्थव्यवस्था में वृद्धि के लिए विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार करने की मांग गई) हैं।

स्थानीय संस्कृति पर बल (Assertion of local culture): यह भी एक विचारणीय विषय है।

वैश्विक आंदोलन (Global movements): वर्तमान में, वैश्वीकरण की विपरीत धारा में वृद्धि सम्बन्धी मांग औपचारिक संरचना और नेतृत्व के साथ सामाजिक आंदोलन के रूप में प्रकट हुई है। 1999 की “बैटल ऑफ़ सिएटल” को वैश्वीकरण विरोधी आंदोलन की अनौपचारिक शुरुआत के रूप में चिह्नित किया जाता है। गुप्त रूप से आयोजित इस नए विरोध आंदोलन में अचानक हजारों लोग सड़कों पर एकत्रित हो गये थे। वर्तमान में, वैश्वीकरण विरोधी आंदोलन ने लोगों के मध्य स्वीकार्यता प्राप्त कर ली है। वे नव-उदार नीतियों और पारिस्थितिकी, श्रम और अल्प विकसित देशों पर इसके पड़ने वाले प्रभावों की गंभीर आलोचना कर रहे हैं। विश्व व्यापार संगठन, G-20, WEF आदि की बैठकों के दौरान वैश्वीकरण विरोधी आंदोलन के अंर्तगत कई विरोध प्रदर्शनों का आयोजन किया गया है। इनमें से कुछ आंदोलनों में संयुक्त राज्य अमेरिका में ऑक्यूपाई वॉल स्ट्रीट मूवमेंट, ब्राजील में होमलेस वर्कर्स मूवमेंट, दक्षिण अफ्रीका में लैंडलेस पीपुल्स मूवमेंट आदि सम्मिलित हैं।

पूँजी के बाह्य प्रवाह को रोकने हेतु नकारात्मक ब्याज दर जैसी नीतियों पर उत्तरोत्तर कठोर
नियंत्रण स्थापित करने की आवश्यकता होगी।

आगे की राह (Way Forward)

20वीं शताब्दी के अंत और 21वीं सदी के आरंभ में होने वाली वैश्वीकरण की तीव्र वृद्धि अब समाप्ति की कगार पर है। भावी वैश्वीकरण गतिकी की तीव्रता और व्यापकता पूर्ण रूप से उन शक्ति असंतुलनों द्वारा निर्धारित की जाएगी जिसमें एक तरफ औद्योगिक अर्थव्यवस्थाएं होंगी जिन्हें वर्तमान में भी सस्ते श्रम या वस्तुओं तक पहुंच की आवश्यकता है तथा दूसरी तरफ वे राष्ट्र होंगे जिनके पास संसाधन हैं, लेकिन औद्योगिक क्षमता या औद्योगिक क्षमता के निर्माण हेतु आवश्यक इच्छाशक्ति का अभाव है।

जब तक सरकारें सहकारी भावना को शीघ्रता से पुनस्र्थापित नहीं कर लेती हैं (जैसा कि उनके द्वारा वित्तीय संकट के प्रत्युत्तर में प्रदर्शित किया गया) तथा वैश्वीकरण के लाभ एवं लागत के न्यायोचित साझाकरण को सुनिश्चित करने की स्वयं की क्षमता के प्रति मतदाताओं में विश्वास उत्पन्न नहीं करती हैं। (जोकि एक कठिन कार्य है); तब तक भविष्य की अर्थव्यवस्थाएं वर्तमान की तुलना में कम खुली होंगी।

वस्तुतः कॉर्पोरेट शासन में और सुधार किये जाने की आवश्यकता है। इसके साथ ही निगमों के प्रति विश्वास को पुनस्र्थापित करने के लिए पूंजीवादी निगमों के प्रबंधन में नवाचार की आवश्यकता है।

बहुराष्ट्रीय कंपनियां एक व्यापक स्कोरकार्ड को अपना सकती हैं जिसके माध्यम से समुदायों की स्थितियों जैसे स्वास्थ्य, स्थानीय रोजगारों का सृजन, कौशल विकास, सकारात्मक कार्रवाई आदि तथा पर्यावरण पर निगमों के व्यवसाय संचालन एवं उत्पादों के प्रभावों की पारदर्शी तरीके से रिपोर्टिंग की जाएगी। इससे उन्हें न केवल निवेशकों के लिए सृजित लाभ और वित्तीय मूल्य पर बल्कि विकास प्रक्रिया में पीछे रह गए विभिन्न हितधारकों पर ध्यान केंद्रित करने में सहायता मिलेगी।

व्यवसायों द्वारा सामाजिक स्थितियों जैसे- रोजगार के अवसरों का सृजन, सकारात्मक कार्रवाई, स्थानीय समुदायों के सशक्तिकरण आदि के साथ-साथ पर्यावरण पर विकास के प्रभावों जैसे जल-अभाव, वायु प्रदूषण, हरित आवरण, नवीकरणीय ऊर्जा आदि के सन्दर्भ में सूचना प्रेषित की जानी चाहिए।

लोकतंत्र की गुणवत्ता में विश्वास की पुनस्र्थापना हेतु राजनीतिक दलों और चुनाव अभियानों के वित्तीयन में भी सुधार किया जाना चाहिए।मत प्राप्ति हेतु चलाए जाने वाले अभियानों के लिए धन की आवश्यकता होती है परंतु लोकतंत्र की गुणवत्ता को बनाए रखना अत्यावश्यक है। अधिक धन संपन्न लोगों के द्वारा चुनावों के परिणामों एवं सार्वजनिक नीतियों को कम धन संपन्न लोगों की तुलना में अधिक प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए।

वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) ने सुझाव दिया है कि विश्व भर में जनवादी राजनीतिक आंदोलनों के बढ़ते प्रभावों से निपटने के लिए पूंजीवाद की प्रकृति में सुधार की आवश्यकता होगी। इसके द्वारा अगले 10 वर्षों में वैश्विक मामलों में संभावित रूप से सबसे बड़े संचालक के रूप में बढ़ती आय और संपत्ति की असमानता” की पहचान की गई है।

इस बढ़ती असमानता के उदाहरण के रूप में, WEF ने कंपनियों के CEO के वेतन में अत्यधिक वृद्धि को इंगित किया है। यह वृद्धि ऐसे समय में हो रही हैं जब वैश्विक वित्तीय संकट के पश्चात विकसित अर्थव्यवस्थाओं में अनेक लोग अपनी आधारभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

वस्तुतः वैश्वीकरण की आलोचना नहीं की जा रही अपितु इसके प्रतिकूल प्रभावों की आलोचना की जा रही है। अत: भविष्य में वैश्वीकरण की दिशा में आगे बढ़ने हेतु इनमें सुधार किया जाना चाहिए। जैसा कि कोफी अन्नान ने कहा था कि “वैश्वीकरण के विरुद्ध तर्क करना गुरुत्वाकर्षण के नियमों के विरुद्ध तर्क करने के समान हैं। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि वैश्वीकरण विरोधी आंदोलन भी सर्वाधिक वैश्वीकृत आंदोलन है।

भारत की स्थिति (India’s Stance)

व्यापक संशय की स्थिति के बावजूद ऐसा माना जाता है कि वैश्वीकरण एक सतत प्रक्रिया है और भारत को अपने बेहतर जुनसांख्यिकीय लाभांश के माध्यम से इससे प्रतिस्पर्धा लाभ प्राप्त करने के अवसर को नहीं खोना चाहिए। विश्व व्यापार में संरक्षणवाद के पुनरुत्थान के बावजूद, भारतीय उद्योगों को विदेशी बाजारों में निर्यात वृद्धि को सुनिश्चित करने हेतु और भी अधिक प्रतिस्पर्धी बनने की आवश्यकता है।

NITI आयोग ने भारत के आक्रामक तरीके से वैश्वीकरण की ओर आगे बढ़ने, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश के लिए सभी शेष अनुमोदन आवश्यकताओं को समाप्त करने और श्रम-केंद्रित क्षेत्रों में रोजगार सृजन के प्रयासों को आगे बढ़ाने का समर्थन किया है। भारत ने वैश्वीकरण के मॉडल को परिवर्तित करने की आवश्यकता पर बल दिया है। इसे अधिक संतुलित, अधिक निष्पक्ष और अधिक समतापूर्ण होना चाहिए। उदाहरण के लिए जलवायु न्याय; दोहा विकास एजेंडा; विश्व व्यापार संगठन में सब्सिडी सुधार; संयुक्त राष्ट्र, IMF और विश्व बैंक में सुधार आदि।

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