निबंध: भारत में शिक्षा (Essay on Education in India)

आप पढ़ोगे

प्रसिद्ध व्यक्तियों के कथन (Quotes by Famous Personalities)

  • “अधिगम अध्यापन का उत्पाद नहीं है। अधिगम, सीखने वालों की गतिविधि का उत्पाद है ” जॉन हॉल्ट
  • “शिक्षा सबसे शक्तिशाली हथियार है जिसका उपयोग आप विश्व को बदलने के लिए कर सकते हैं” – नेल्सन मंडेला
  • “एक सभ्य घर के समान कोई स्कूल नहीं है और एक सच्चरित्र अभिभावक के समान कोई शिक्षक नहीं है” – महात्मा गांधी
  • “किसी बच्चे की शिक्षा अपने ज्ञान तक सीमित मत रखिए, क्योंकि वह किसी और समय में पैदा हुआ है” – रवींद्रनाथ टैगोर
  • “सर्वश्रेष्ठ शिक्षक वे हैं जो यह दिखाते हैं कि आपको कहां देखना है, किन्तु आपको यह नहीं बताते कि आपको क्या देखना है” – अलेक्जांड्रा के. ट्रेनफर
  • “सच्ची शिक्षा का लक्ष्य चरित्र के साथ बुद्धिमता का विकास करना है” – मार्टिन लूथर किंग
  • “शिक्षा रचनात्मकता प्रदान करती है, रचनात्मकता, सोच विकसित करती है, सोच से ज्ञान प्राप्त होता है और ज्ञान आपको महान बनाता है” – डॉ. अब्दुल कलाम

परिभाषा (Definition)

  • शिक्षा की उत्पत्ति दो लैटिन शब्दों से मिलकर हुई है: “educare” जिसका अर्थ है प्रशिक्षित करना
    या साँचे में ढालना और “educere” जिसका तात्पर्य है निर्देशित करना।

शिक्षा साक्षरता से कैसे भिन्न है? (How does Education differ from Literacy?)

  • साक्षरता एक मात्रात्मक युक्ति है वहीं शिक्षा की प्रकृति गुणात्मक अधिक है।
  • साक्षरता अधिकांशतः औपचारिक स्कूली शिक्षा तक ही सीमित होती है, जबकि शिक्षा में न केवल औपचारिक स्कूली शिक्षा बल्कि माता-पिता, परिवार और समाज : सम्मिलित होता है।
  • साक्षरता जहां कौशल से संबद्ध है वहीं शिक्षा का संबंध मनुष्यों के समग्र विकास से है। इसमें
    केवल कौशल ही नहीं, अपितु मूल्य, नैतिकता इत्यादि भी सम्मिलित होती हैं।
  • महान दार्शनिक रवींद्रनाथ टैगोर ने भी शिक्षा पर अपने विचार अभिव्यक्त करते हुए कहा है। कि शिक्षा का उद्देश्य शारीरिक, मानसिक, सौंदर्यात्मक और नैतिक विकास के माध्यम से रचनात्मक स्व-अभिव्यक्ति का विकास करना है।

भारत में शिक्षा का इतिहास History of Education in India)

  • भारत में विकसित होने वाली बसे प्राचीन शिक्षा प्रणाली को ‘वैदिक प्रणाली’ के रूप में जाना जाता है, जिसका अंतिम लक्ष्य स्वयं का पूर्ण ज्ञान प्राप्त करना था। यह प्रणाली ‘गुरुकुल’ आधारित थी, जिसने गुरु और शिष्य के मध्य एक संबंध को बढ़ावा दिया और एक शिक्षक केंद्रित प्रणाली की स्थापना की। इस प्रणाली में शिष्यों को कठोर अनुशासन के अंतर्गत रखा जाता था और अपने गुरु के प्रति इनके कुछ दायित्व भी होते थे।
  • 700 ईसा पूर्व में, तक्षशिला में विश्व का प्रथम विश्वविद्यालय स्थापित किया गया था और इसके  पश्चात् चौथी शताब्दी ईस्वी में नालंदा विश्वविद्यालय का निर्माण हुआ। इन विश्वविद्यालयों में प्रसिद्ध भारतीय विद्वानों, जैसे- चरक, सुश्रुत, आर्यभट्ट, चाणक्य, पतंजलि आदि ने ज्ञान प्राप्त किया और ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों, जैसे- गणित, खगोल विज्ञान, भौतिकी, रसायन शास्त्र, चिकित्सा विज्ञान और शल्य चिकित्सा इत्यादि में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
  • स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान गोखले, राजा राम मोहन रॉय और महात्मा गांधी जैसे कई व्यक्तियों ने भारतीयों, विशेष रूप से महिलाओं की शिक्षा के लिए कार्य किए। शिक्षा का स्वदेशी मॉडल महात्मा गांधी के स्वराज और स्वदेशी की अवधारणा का एक प्रमुख घटक था। स्वतंत्रता के पश्चात नेताओं द्वारा शिक्षा के महत्व को विकास की पूर्व शर्त के रूप में पूर्ण रूप से मान्यता प्रदान की गयी थी।
  • विगत 20 वर्षों में, भारत में शिक्षा व्यवस्था में अनेक महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। साथ ही इसमें अनेक नई अवधारणाएं, जैसे- प्राथमिक शिक्षा के लिए अधिकार आधारित दृष्टिकोण; साक्षरता एवं बुनियादी शिक्षा से माध्यमिक, उच्च, तकनीकी एवं व्यवसायिक शिक्षा की ओर स्थानांतरण; माध्यमिक शिक्षा के सार्वभौमीकरण के विस्तार हेतु प्रयास करना; उच्च शिक्षा परिदृश्य को पुनः आकार प्रदान करना आदि विकसित हुई हैं।
विगत वर्षों में शिक्षा से संबंधित आयोग और समितियां (Commissions and Committees related with Education over the years)

  • डॉ. एस. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में गठित विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग (1948): इसके द्वारा
    क्षेत्र, जाति, लैंगिक विषमता पर ध्यान दिए बिना समाज के सभी वर्गों के लिए उच्च शिक्षा को सुलभ बनाने की अनुशंसा की गई।
  • डॉ. ए. लक्ष्मण स्वामी मुदलियार की अध्यक्षता में गठित माध्यमिक शिक्षा आयोग (1952): इस समिति ने आउटकम की दक्षता में वृद्धि, मैट्रिक पाठ्यक्रमों का विविधीकरण, बहुउद्देशीय मैट्रिक विद्यालयों की स्थापना, सम्पूर्ण भारत में एक समान प्रारूप लागू करने और तकनीकी विद्यालयों की स्थापना की सिफारिश की।
  • डी. एस. कोठारी की अध्यक्षता में गठित भारतीय शिक्षा आयोग (1964-66): इसके द्वारा तीन मुख्य पहलुओं, यथा- a) आंतरिक परिवर्तन b) गुणात्मक सुधार और c) शैक्षिक सुविधाओं का विस्तार, के आधार पर एक व्यापक पुनर्निर्माण की सिफारिश की गयी।
  • 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति: यह नीति कोठारी आयोग की सिफारिशों के अनुसार तैयार की गई थी। इसने भारतीय संविधान में प्रस्तावित 6-14 वर्ष की आयु वर्गों के बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा का प्रावधान करने; माध्यमिक विद्यालयों में क्षेत्रीय भाषाओं पर बल देने; अंग्रेजी को विद्यालयों में शिक्षा का माध्यम बनाने हिंदी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्वीकार करने एवं संस्कृत के विकास को बढ़ावा देने तथा राष्ट्रीय आय का 6 प्रतिशत शिक्षा पर व्यय करने की सिफारिश की।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986): इसके प्रमुख प्रावधानों में शामिल हैं- समाज के सभी वर्गों विशेष रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और महिलाओं को शिक्षा प्रदान करना; निर्धनों के लिए छात्रवृत्ति का प्रावधान, प्रौढ़ शिक्षा प्रदान करना, वंचित/पिछड़े वर्गों से शिक्षकों की भर्ती करना और नए स्कूलों एवं कॉलेजों का विकास करना; छात्रों को प्राथमिक शिक्षा प्रदान करना; गांधीवादी दर्शन के साथ ग्रामीण लोगों को शिक्षा प्रदान करना; मुक्त विश्वविद्यालयों की स्थापना करना; शिक्षा में IT का प्रचार करना; तकनीकी शिक्षा क्षेत्र को प्रारम्भ करने के अतिरिक्त वृहद स्तर पर निजी उद्यम को बढ़ावा देना।
  • राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1992): भारत सरकार द्वारा 1990 में आचार्य राममूर्ति की अध्यक्षता में 1986 की राष्ट्रीय नीति के परिणामों का पुनः आकलन करने के लिए एक आयोग का गठन किया गया। इसकी प्रमुख सिफारिशों में शामिल थीं- केंद्र और राज्य सरकारों को सलाह देने के लिए उच्चतम सलाहकार निकाय के रूप में केन्द्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड (Central Advisory Board of Education: CABE) का गठन; शिक्षा की गुणवत्ता में वृद्धि पर ध्यान केंद्रित करना; छात्रों में नैतिक मूल्यों को विकसित करना तथा जीवन में शिक्षा को आत्मसात करने पर बल देना।
  • T.S.R. सुब्रमण्यम समिति की प्रमुख सिफारिशें: एक अखिल भारतीय सेवा के रूप में भारतीय शिक्षा सेवा (Indian Education Service: IES) का गठन किया जाना चाहिए; शिक्षा पर व्यय GDP का कम से कम 6% तक बढ़ाया जाना चाहिए; मौजूदा B.Ed पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए स्नातक स्तर पर 50% अंकों के साथ न्यूनतम पात्रता शर्त होनी चाहिए; सभी शिक्षकों की भर्ती के लिए शिक्षक पात्रता परीक्षा (Teacher Eligibility Test: TET) अनिवार्य किया जाना चाहिए; सरकार और निजी स्कूलों में शिक्षकों के लिए लाइसेंसिंग या प्रमाणीकरण को अनिवार्य बनाना चाहिए; 4 से 5 वर्ष की आयु वर्ग के बच्चों के लिए पूर्व-विद्यालय शिक्षा को अधिकार के रूप में घोषित किया जाना चाहिए; मिड डे मील (MDM) कार्यक्रम का विस्तार माध्यमिक विद्यालयों तक किया जाना चाहिए; भारत में कैंपस खोलने के लिए शीर्ष 200 विदेशी विश्वविद्यालयों को अनुमति दी जानी चाहिए।
  • केंद्र सरकार द्वारा भारत के लिए एक नई शिक्षा नीति तैयार करने हेतु कस्तूरीरंगन आयोग (2017) का गठन किया गया है। नई शिक्षा नीति में ध्यान केंद्रित किए जाने वाले प्रमुख बिंदु हैं: ।। प्रमुख चिंताओं, जैसे – पहुंच एवं भागीदारी, गुणवत्ता, समानता, अनुसंधान एवं विकास और शिक्षा के विकास के लिए वित्तीय प्रतिबद्धता आदि का समाधान करना। ‘नैतिक शिक्षा से संबंधित संस्कृति शिक्षा का समावेश करना, इसे प्राथमिक रूप से प्री-स्कूल एवं किशोरावस्था शिक्षा, पाठ्यक्रम विकास और परीक्षा सुधार, शिक्षक और संकाय प्रशिक्षण, आजीवन साक्षरता, उच्च शिक्षा और दूरस्थ शिक्षा में नीतिगत पहलों के माध्यम से समाधान किया जायेगा।

भारत में शिक्षा के विभिन्न स्तर- इनसे संबंधित मुद्दे, चुनौतियां एवं समाधान

(Different Levels, Education in India – Their Issues, Challanges and Solutions)

प्री-स्कूल स्तर (Pre-Schooling level)

मुद्दे और चुनौतियाँ (Issues and Chalienges)

  • बचपन व्यक्ति के जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। इसी समय आजीवन सीखने एवं मानव विकास की नींव रखी जाती है।
  • तीव्र शहरीकरण, एकल परिवारों में वृद्धि और संयुक्त परिवार के विघटन के कारण अनेक माता-पिता अपने बच्चों को प्री-स्कूल में भेजने के लिए विवश हैं।

राज्य की भूमिका:

  • 6 वर्ष की आयु तक के बच्चों की देखभाल और शिक्षा केंद्र या राज्य सरकारों के तहत औपचारिक शिक्षा का भाग नहीं है। इसके अतिरिक्त, इस रिक्तता की पूर्ति स्कूलों और प्री-स्कूलों द्वारा आंशिक रूप से की जा रही है, जो बिना उचित विनियमन के निजी क्षेत्र में विकसित हो रहे हैं।
  • अधिकांशतः प्री-स्कूलों द्वारा बच्चों की विभिन्न आवश्यकताओं को ध्यान में रखे बिना प्रीस्कूल शिक्षा के लिए एक सार्वभौमिक अथवा सभी के लिए अनुकूल (वन-साइज़-फिट्सआल) दृष्टिकोण पर बल दिया जाता है। साथ ही, प्री-स्कूल शिक्षा सीखने हेतु एक मंच के बजाय प्रतिष्ठित स्कूलों में प्रवेश के लिए एक मंच बन गया है।
  • संसाधनों का अभाव और सार्वभौमिक पाठ्यक्रम की अनुपस्थिति।

 समाधान (Solutions)

  • बचपन की देखभाल और 4-5 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए शिक्षा के अधिकार को शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2008 के तहत अधिकार के रूप में घोषित किया जाना चाहिए।
  • प्री-स्कूलों के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा हेतु तैयार करने के लिए, आंगनवाड़ी केन्द्रों में एक नये शिक्षा संबंधी कार्यक्रम को लागू करने की आवश्यकता है।
  • NCERT और SCERTs को शिक्षकों को प्री-स्कूलों के बच्चों की देख-रेख हेतु सक्षम बनाने के लिए गहन प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने के अतिरिक्त प्री-प्राथमिक शिक्षा के लिए पाठ्यक्रम ढांचा तैयार करना चाहिए।

प्राथमिक स्तर (Primary level)

 मुद्दे एवं चुनौतियाँ (Issues and Challenges)

  • स्कूल से बाहर बच्चेः एक आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, 92 लाख से अधिक बच्चे अभी
    भी स्कूलों से बाहर हैं।
  • ड्रॉपऑउट (बीच में स्कूल छोड़ने) की उच्च दर और निम्न उपस्थिति।
  • निम्नस्तरीय अधिगम परिणाम: एनुअल स्टेटस ऑफ़ एजुकेशन सर्वे द्वारा इसकी पुष्टि की गई है।
  • आधारभूत सुविधाओं की कमी।
  • स्कूलों से बाहर सहायता का अभाव।
  • महिलाओं, आदिवासियों आदि जैसे सुभेद्य वर्गों के लिए अपर्याप्त सहायता।
  • निजी स्कूलों की संख्या बढ़ने के कारण शिक्षा की लागत में वृद्धि।

समाधान (Solutions)

  • अधिगम संबंधी आउटकम (जो प्रत्यक्ष रूप से शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं)
    को मानदंड प्रदान करने के लिए RTE अधिनियम में संशोधन करने की आवश्यकता है।
  • RTE के तहत विशेष रूप से उच्च प्राथमिक चरण में उपचारात्मक कोचिंग के प्रावधानों और उच्च कक्षा में जाने के लिए कम से कम दो अतिरिक्त अवसरों के प्रस्ताव के साथ “फेल न करने की नीति” (No deterilion policy) को पुनः प्रारंभ करने की आवश्यकता है।
  • धीमी गति से सीखने वालों की सहायता हेतु तकनीक के उपयोग की आवश्यकता है,
    जिससे बच्चे अपने कमजोर पक्षों को मजबूत कर सकें।

माध्यमिक स्तर (Secondary level)

मुद्दे और चुनौतियाँ (Issues and Challenges)

  • स्कूली शिक्षा तक पहुंच: राज्य मुख्य रूप से माध्यमिक स्तर पर शिक्षा के प्रबंधन हेतु
    उत्तरदायी होते हैं और केंद्र सरकार के साथ शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए केवल सीमित भूमिका निभाते हैं।
  • ड्रॉपआउट की उच्च दर: निर्धनता, सामाजिक प्रतिबंध या शिक्षा की उपयोगिता में विश्वास की कमी के कारण विशेष रूप से सुभेद्य वर्गों में माध्यमिक शिक्षा ड्रॉपआउट के उच्च स्तर को दर्शाती है।
  • पाठ्यक्रम: इस स्तर पर IT और व्यावसायिक क्षेत्रों से संबंधित पाठ्यक्रम की अवहेलना की गयी है अथवा इसे विशेष महत्व प्रदान नहीं किया गया है।
  • उच्च शिक्षा के साथ निम्न जुड़ाव: माध्यमिक स्तर की शिक्षा कौशल या योग्यता के संदर्भ में, छात्रों को उच्च शिक्षा हेतु तैयार करने में विफल रही है। परिणामस्वरुप कोचिंग संस्थानों का प्रसार हुआ है।

समाधान (Solutions)

  • माध्यमिक शिक्षा को सम्मिलित करने के लिए RTE के प्रावधान को क्रमशः विस्तारित करने की आवश्यकता है।
  • अधिक छात्रों को कवर करने के लिए विद्यमान राष्ट्रीय कौशल योग्यता फ्रेमवर्क को बढ़ाए जाने की आवश्यकता है। स्थानीय अवसरों और संसाधनों के अनुरूप व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के विकल्पों में वृद्धि करने की भी आवश्यकता है।

उच्च स्तर (Higher level)

मुद्दे एवं चुनौतियाँ (Issues, Challenges)

  • नामांकन एवं साम्यता (Enrolment and Equity): सकल नामांकन अनुपात (Gross
    Enrolment Ratio: GER) लगभग 25% है जो समान स्तर पर अन्य देशों की तुलना में निम्न है। इसके अतिरिक्त, समाज के विभिन्न संप्रदायों के मध्य GER में कोई साम्यता नहीं है।
  • विनियमन: भारतीय चिकित्सा परिषद (Medical Council of India: MC!), विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (The University Grants Commission: UGC), अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (All India Council of Technical Education: AICTE) जैसे विनियामकों में वित्तीय अपर्याप्तता एवं मानव संसाधनों की कमी, भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार एवं पक्षपात की समस्या निरंतर विद्यमान रही है।
  • राजनीतिक हस्तक्षेप: उच्च शिक्षा तीव्रता से एक आकर्षक व्यवसाय के रूप में उभर रही | है और राजनीतिक नेताओं के स्वामित्व वाले अनेक संस्थानों का भी उद्भव हुआ है। इसके अतिरिक्त, शैक्षणिक संस्थान को संचालित करने में राजनीतिक हस्तक्षेप में वृद्धि हुई है, जैसा कि दिल्ली विश्वविद्यालय के मामले में देखा गया है।
  • संसाधन: वित्तीय और मानवीय संसाधन दोनों की कमी।
  • रोजगार: एस्पायरिंग माइंड्स (एम्प्लॉयमेंट सॉल्यूशन कंपनी) द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, केवल 7% इजीनियरिंग स्नातक नियुक्ति के योग्य हैं।
  • उद्योगों के साथ अनुसन्धान एवं सहयोग पर अपर्याप्त बल।

समाधान (Solutions)

  •  उच्च शिक्षा क्षेत्र के वित्तपोषण को सुव्यवस्थित करने के अतिरिक्त नियामकीय निरीक्षण
    करने की आवश्यकता है।
  • इसके अतिरिक्त, शिक्षकों के लिए भर्ती, अवसर आदि की प्रक्रिया में सुधार की आवश्यकता है। शिक्षकों को रैंक प्रदान करने और प्रोत्साहित करने के लिए वस्तुनिष्ठ मानदंडों पर प्रदर्शन-आधारित प्रोत्साहनों को लागू करने की आवश्यकता है।
  • इसके अतिरिक्त, मान्यता प्रदान करने वाले संस्थानों, उनकी पद्धति और जवाबदेहिता में सुधार करने की आवश्यकता भी है।

शिक्षा क्षेत्र में विभिन्न हितधारक – इनसे संबंधित मुद्दे, चुनौतियां तथा समाधान

(Stakeholders in Education – Issues, Challenges & Solutions)

परिवार

“घर बच्चों की प्रथम पाठशाला और माता-पिता उसके प्रथम शिक्षक होते हैं।”

शहरी परिवार

  • बच्चों के साथ व्यतीत किए जाने वाले समय के अभाव के कारण कम्युनिकेशन गैप/जनरेशन
    गैप में वृद्धि हुई है।
  • 10वीं कक्षा की बोर्ड की परीक्षा के बाद कैरियर विकल्पों/विषयों (विज्ञान/कला) के चयन में
    छात्रों पर बलपूर्वक अपना निर्णय थोपना।
  • उच्च ग्रेड के साथ उत्तीर्ण होने के लिए बच्चों पर दबाव बनाना।
  • उच्च आय वर्ग वाले परिवार अपने बच्चों को बेस्ट स्कूलों में नामांकन करवाने हेतु शिक्षा के वास्तविक मूल्य या सार को समझे बिना अत्यधिक डोनेशन का सहारा लेते हैं। उदाहरणस्वरुप कई माता-पिता फर्जी डिग्री, धोखाधड़ी जैसे कृत्यों का समर्थन कर रहे हैं।
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की एक रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के 6.2 घंटे एवं ब्रिटेन के 3.6 घंटे के औसत की तुलना में भारतीय अभिभावकों द्वारा अपने बच्चों के होमवर्क पर सप्ताह में औसतन 12 घंटे समय व्यतीत किया जाता है। इसके अतिरिक्त, 62 प्रतिशत भारतीय माता-पिता अपने बच्चों के होमवर्क में सहायता करते हैं, जो अन्य देशों की तुलना में अधिक है।

ग्रामीण परिवार

  • शिक्षा को सिर्फ एक डिग्री प्राप्त करने के साधन के रूप में देखा जाता है।
  • कल्याणकारी योजनाओं की जानकारी के अभाव एवं अवहनीय स्कूल फ़ीस के कारण बीज में
    स्कूल छोड़ने (ड्रापआउट) की उच्च दर।
  •  लड़कियों तक शिक्षा की पहुंच सुनिश्चित करने में परिवहन या संचार एक बड़ी बाधा है।
  • निर्देश का माध्यम भी एक बड़ी बाधा है।
  • जाति आधारित भेदभाव।
  • स्कूलों में बच्चों को प्राप्त होने वाले परिवेश और माता-पिता की शिक्षा के मध्य व्यापक अंतराल।
  • शिक्षा के मूल्य एवं महत्व के संबंध में प्रथम पीढ़ी के छात्रों के माता-पिता को समझाने की
    जरुरत है।

छात्र

“एक आदर्श छात्र वही होता है जो सिर्फ ग्रेड प्राप्त करने और अपने सहपाठियों से प्रतिस्पर्धा करने हेतु अध्ययन नहीं करता, अपितु वह अपनी रूचि के कारण अध्ययन करता है।

विशेष ध्यान दिए जाने वाले बच्चे (Childrer: with Special Needs)

  • भारत में दिव्यांग बच्चों की संख्या काफी अधिक है, जिन्हें RTE के विधिक प्रावधानों के बावजूद इस अधिकार से वंचित किया जा रहा है।
  • CAG की एक हालिया रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया गया है कि सभी योग्य दिव्यांग बच्चों को अधिनियम में प्रावधातित परिवहन, सहायता और उपकरण संबंधी सुविधाएं उपलब्ध नहीं करायी गयी हैं।
  • यह स्पष्ट है कि बच्चों की इस श्रेणी में अशिक्षित बच्चों का अनुपात शेष बच्चों की तुलना में बहुत अधिक है।
  • आगे किए जाने वाले उपायों में उचित अध्ययन सामग्री की उपलब्धता, शिक्षकों और उनके उचित प्रशिक्षण के मध्य पर्याप्त संवेदनशीलता, शिक्षा के लिए सहायता उपकरणों की उपलब्धता आदि शामिल होना चाहिए।

 मुद्दे एवं चुनौतियां (Issues & Challenges) 

  • परिवार की अधिक अपेक्षाओं और दबाव के कारण, कॉलेज में प्रवेश, बोर्ड परीक्षा में अच्छे ग्रेड लाने इत्यादि के लिए अंधाधुंध प्रतिस्पर्धा का भाग बनना पड़ता है।
  • परीक्षा उत्तीर्ण करने के लिए नकल एवं अनुचित साधनों का उपयोग करना।
  • रचनात्मक अन्वेषण क्षमताओं, स्पष्ट एवं तार्किक रूप से सोचने की क्षमता एवं चिंतनशील प्रक्रिया से जुड़ाव, स्वतंत्र और मौलिक सोच आदि का अभाव।
  • मीडिया का प्रभाव: फिल्में, इंटरनेट और कंप्यूटर गेम इत्यादि।
  • मानसिक विकार: अवसाद, एकाग्रता-अभाव संबंधी अवसाद, चिंता, लत आदि।
  • चोरी, यौन दुर्व्यवहार, शिक्षकों के प्रति असहिष्णुता जैसे अपराध।
  • इंटरनेट एवं दोस्तों के साथ बिताए गए अधिक समय के कारण परिवार से अलगाव।

शिक्षक

“आधुनिक शिक्षक का कार्य वनों की सफ़ाई कर भूमि तैयार करना नहीं है, बल्कि रेगिस्तान की सिंचाई करना है।”

मुद्दे एवं चुनौतियां (Issues & Challenges)

  • वर्तमान में शिक्षा को छात्रों के भविष्य के निर्माण के कार्य की बजाय एक पेशे के रूप में
    माना जाने लगा है।
  • अधिकांश मामलों में, शिक्षण संबंधी पेशे को अपनाना रूचि की अपेक्षा बाध्यता अधिक बन गया है, विशेषतः महिलाओं के लिए (इसे ‘पिंक कॉलर जॉब’, अच्छे विवाह प्रस्तावों में वृद्धि आदि के साधन के रूप में देखा जाता है)।
  • यांत्रिक/अप्रचलित तकनीकों का प्रयोग एवं अध्यापन हेतु नवाचारी पद्धतियों का  अभाव।
  • शिक्षकों पर अध्यापन के अतिरिक्त अन्य कार्यों की अतिभारिता एवं अतिसंलग्नता।
  • कार्यभार की तुलना में कम वेतनमान, मुख्यतः निजी संस्थानों में, कार्य करने में अनिच्छुकता को बढ़ावा देता है। इसके अतिरिक्त कठोर परिश्रम तथा सुधार करने के लिए प्रोत्साहन का अभाव है। अतः युवा वर्ग में अध्यापन हेतु उत्साह एवं जोश की कमी
  • शिक्षकों की जवाबदेही एवं छात्रों से फीडबैक प्राप्त करने की प्रणाली का अभाव।
शिक्षा पर व्यय (Expenditure on Education)

  • आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 के अनुसार, भारत में शिक्षा पर कुल औसत व्यय सकल घरेलू
    उत्पाद (GDP) का 2.8% है।
  • दक्षिण अफ्रीका तथा ब्राजील जैसे विकासशील देश शिक्षा पर अपनी GDP का लगभग 5.8% व्यय करते हैं, वहीं पड़ोसी देश भूटान शिक्षा पर अपनी GDP का 7% से अधिक व्यय करता है।
  • विश्व बैंक के अनुसार:  नॉर्वे, स्वीडन तथा फिनलैंड जैरे देश शिक्षा पर अपनी GDP का लगभग 7.5% व्यय
    करते हैं।  जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी एवं ऑस्ट्रेलिया द्वारा शिक्षा पर 5 से 6 | प्रतिशत तक व्यय किया जाता है।

समाधान (Solutions)

  • संवेदनशीलता/भावनात्मक बुद्धिमत्ता की आवश्यकता: शिक्षकों को बच्चों की सामाजिक
    आर्थिक पृष्ठभूमि को समझने की आवश्यकता है, उदाहरण के लिए भूख अथवा दुर्व्यवहार से पीड़ित छात्र प्रभावी रूप से सीखने में सक्षम नहीं हो सकता। कार्यक्रमों के द्वारा शिक्षकों का मार्गदर्शन किया जाना चाहिए कि इस समूह के बच्चों को कैसे पोषित तथा विकसित किया जाए। शिक्षक छात्र के विषय में जितनी अधिक समझ विकसित करेगा, वह उन्हें सिखाने एवं उनकी प्रगति में उतने ही बेहतर ढंग से अपना योगदान देने में सक्षम होगा।
  • स्कूल प्रबंधन समितियों की भागीदारी में वृद्धि के माध्यम से शिक्षकों को अधिक जवाबदेह बनाने की आवश्यकता है।
  • शिक्षकों के प्रदर्शन एवं उसकी जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए सहायक पर्यवेक्षण तथा प्रोत्साहन की आवश्यकता की पहचान करना, साथ ही शिक्षकों की उपस्थिति की निगरानी करने के लिए एवं उनकी अनुपस्थिति को कम करने के लिए प्रौद्योगिकी का प्रयोग करना।
  • भारत एवं विश्व में प्रचलित अन्य सर्वोत्तम पद्धतियों से परिचित होने की आवश्यकता है तथा छात्रों द्वारा ज्ञान को आत्मसात करने एवं उनके बेहतर रीति से सीखने के लिए नवीन तकनीकों को अपनाए जाने की आवश्यकता है।

संस्थान

“विद्यालय चार दीवारों से युक्त एक भवन है जिसमें भविष्य की प्रतिभाओं का निर्माण होता है।” शिक्षण संस्थानों को विद्या प्रदान करने वाले मंदिरों के रूप में माना जाता है, किन्तु वर्तमान में ये शिक्षण संस्थान उद्योगों के समान कार्य कर रहे हैं।

मुद्दे एवं चुनौतियां (Issues & Challenges)

  • पहुंच तथा साम्यता (Access and Equity)
  • शिक्षा का व्यवसायीकरण: स्कूल तथा कॉलेज गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के बजाय केवल धन अर्जित करने वाले संस्थान बन गए हैं, जैसे- कैपिटेशन फीस, अत्यधिक शुल्क वृद्धि, ड्रेस, किताबों आदि के लिए अतिरिक्त शुल्क वसूल करना आदि।
  • शिक्षा को सब्सिडी प्रदान किए जाने के बावजूद, अभी भी यह निर्धन वर्ग के लिए अवहनीय है, परिणामतः उन्हें बीच में स्कूल छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ता है। गैर-अनुदान प्राप्त स्कूलों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (Economically Weaker Section: EWS)/वंचित वर्गों (Disadvantaged Groups: DG) के लिए 25% आरक्षण जैसे नियमों का इन स्कूलों द्वारा नियमित रूप से उल्लंघन किया जाता है।
  • मिड डे मील जैसी कल्याणकारी योजनाओं को विकृत रूप में प्रस्तुत करना एवं इसके तहत मिलन वाले भोजन के लिए माता-पिता से भुगतान की मांग करना।
  • फर्जी आय तथा जाति प्रमाण पत्र की समस्या के कारण सरकारी योजनाओं का लाभ लक्षित लाभार्थियों तक नहीं पहुंच पाता है।
  • बाल श्रम, प्रवासन, बाल विवाह आदि भी शिक्षा के मार्ग में बड़ी बाधाएं हैं।
  • प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता तथा निष्पक्षता का अभाव एवं शिकायत निवारण तंत्र का अभाव, शिक्षा के अधिकार अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन में मुख्य बाधाएं हैं।
शिक्षा में गुणवत्ता सुधार से सम्बंधित मुद्दों का समाधान (Solutions to improve quality issue in education)

  • उन्नत तकनीकों का प्रयोग: शिक्षा संबंधी आउटकम में सुधार करने के साथ-साथ शिक्षण प्रक्रिया को छात्रों के लिए सरल एवं रूचिकर बनाने हेतु शिक्षण संस्थानों में उन्नत तकनीकों को तीव्रता से प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।
  • अजीम प्रेमजी फाउंडेशन तथा डिजिटल स्टडी हॉल जैसे गैर सरकारी संगठनों एवं ILFS (Infrastructure Leasing & Financial Services), एजुकॉम, इंटेल, मीडियालैब जैसे निगमों ने शिक्षण सामग्री के निर्माण, शिक्षकों के प्रशिक्षण एवं कक्षा अधिगम में अग्रणी भूमिका निभाई है।
  • अध्यापन के लिए विशेषज्ञ एवं फैकल्टी उपलब्ध कराने, पाठ्यक्रम निर्माण और छात्र तथा शिक्षक आदान-प्रदान कार्यक्रमों को आयोजित करने हेतु विदेशी तथा भारतीय संस्थानों के मध्य समझौता किया जा सकता है।

गुणवत्ता (Quality)

  • अवसंरचना का अभाव: स्कूलों में पेयजल, शौचालय आदि जैसी मूलभूत सुविधाओं की कमी, अत्यधिक भीड़ युक्त कक्षाएं तथा कक्षाओं/ स्कूलों का अनुपयुक्त निर्माण (वेंटिलेशन तथा प्रकाश की अपर्याप्त व्यवस्था), छात्रों के लिए खुले स्थानों, हरियाली एवं खेल के मैदानों का अभाव।
  • मुख्य रूप से सार्वजनिक संस्थानों में निम्न प्रशिक्षित संकाय, रिक्तियों की अधिक संख्या एवं । शिक्षकों की अनुपस्थिति।
  • छात्रों पर होमवर्क का अत्यधिक भार।
  •  स्कूलों में बच्चों को प्रदान किए जाने वाले सुरक्षित परिवेश का अभाव। सुरक्षा संबंधी नियमों के
    उल्लंघन के कारण दुष्कर्म एवं बच्चों की हत्या आदि घटनाओं में वृद्धि हुई है।
  • अपर्याप्त इंटर्नशिप, शिक्षण की गुणवत्ता और तकनीकों जैसे इंटरनेट ऑफ़ थिंग्स (Internet of Things: IOT), आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इंडस्ट्री 4.0, का अपर्याप्त प्रयोग।
  • पाठ्यक्रम के चयन में विविधता का अभाव: लगभग 180 पाठ्यक्रमों (स्ट्रीम) में से केवल 10 में ही उच्च शिक्षा में नामांकित कुल छात्रों का 83% भाग सम्मिलित है। (All India Survey on Higher Education: AISHE)||
  • एनुअल सर्वे ऑफ़ एजुकेशन रिपोर्ट (ASER) के अनुसार उच्च नामांकन के बावजूद भी शिक्षा निष्पादन निम्न है। उदाहरण के लिए, 14-18 आयु वर्ग के लगभग 25% छात्र अपनी भाषा में स्पष्ट रूप से मूल पाठ को पढ़ने में सक्षम नहीं है।
शिक्षा में भाषा एवं संस्कृति (Language and Culture in Education)

  • मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा एवं देशज संस्कृति से संबंधित ज्ञान मानव जाति के बेहतर विकास || के लिए अत्यधिक लाभप्रद माने जाते हैं।
  • हालांकि, इस संदर्भ में भारत की प्रगति अत्यधिक निराशाजनक रही है।
  • शिक्षा के लिए अनेक समितियों द्वारा समर्थन करने तथा संविधान द्वारा इसके लिए प्रावधान करने के पश्चात भी, भारत द्वारा इन मुद्दों को क्रियान्वित करने के लिए बहुत कर कार्य किया गया है।
  • संबंधित मुद्देः शिक्षकों का निम्न प्रशिक्षण, पुस्तकों तथा अध्ययन सामग्री जैसे साधनों का अभाव; अपर्याप्त धन आदि।।
  • इस संबंध में कुछ कदमों को अवश्य सम्मिलित किया जाना चाहिए, जैसे- मातृभाषा, स्थानीय अथवा क्षेत्रीय भाषा में कक्षा पांचवीं तक की शिक्षा का प्रावधान, स्कूली शिक्षा में भारतीय संस्कृति, स्थानीय एवं पारंपरिक ज्ञान को पर्याप्त स्थान दिया जाना चाहिए।

पाठ्यक्रम (Curriculum)

  • व्यावहारिक ज्ञान के बजाय तथ्यात्मक सूचनाओं को याद करने पर बल।
  • बह-विषयी शिक्षा की आवश्यकताः वास्तविक जीवन की समस्याओं का समाधान करने एवं जटिल सामाजिक तथा व्यावसायिक चुनौतियों का हल ढूढ़ने के लिए पारंपरिक एकल विषय केंद्रित शिक्षा के स्थान पर संयुक्त बहु-विषयी शिक्षा अपनाने की आवश्यकता है।
  • परीक्षा प्रणाली को पुनर्संरचित करना: इसके अंतर्गत प्रत्येक सत्र में एक समान असाइनमेंट एवं  परीक्षा की प्रणाली को समाप्त किया जाना चाहिए क्योंकि इससे सूचनाओं तक निर्बाध पहुँच के इस युग में साहित्य चोरी/धोखाधड़ी की संभावना में वृद्धि होती है। साथ ही छात्रों को नैतिकता तथा अकादमिक सत्यनिष्ठा भी पढ़ाने की आवश्यकता है।
  • भारत की अकादमिक संस्कृति में सभी स्तरों पर योग्यता आधारित व्यवहार सुनिश्चित करने हेतु महत्वपूर्ण परिवर्तन किये जाने की आवश्यकता है।

व्यवसायिक शिक्षा: ‘NEET’ (नॉट इन एम्प्लॉयमेंट, एजुकेशन ऑर ट्रेनिंग) को टैप करने की आवश्यकता

(Vocational Education: A need to tap the ‘NEET’ (Not in Employment, Education or Training)

  • नॉट इन एम्प्लॉयमेंट, एजुकेशन ऑर ट्रेनिंग अथवा NEET, 21वीं सदी के प्रथम दशक के प्रारंभिक वर्षों में प्रचलित एक कम ज्ञात युक्ति थी। विद्यालय को बीच में छोड़ने वाले किशोरों द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियों को उजागर करने हेतु इसका प्रयोग किया गया था। वर्तमान में यह और भी अधिक महत्वपूर्ण बन गया है क्योंकि वर्तमान में, युवा उत्पादकता (विशिष्ट तौर पर वंचित एवं उच्च जोखिम पृष्ठभूमि वाले युवा वयस्कों) पर समग्र रूप से विचार किया जाता है।
  • आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (Organization for Economic Co-operation and Development: OECD) के अनुसार, युवा निष्क्रियता वस्तुतः NEET में शामिल युवाओं (1529 आयु) की हिस्सेदारी को इसी आयु वर्ग के युवाओं की कुल संख्या के प्रतिशत के रूप में प्रस्तुत करती है।
  • अतः, NEET में उन सभी युवाओं को शामिल किया गया है जो भुगतान रोजगार, औपचारिक शिक्षा तथा प्रशिक्षण प्रणाली से बाहर हैं। व्यवस्था में पर्याप्त मात्रा में गुणवत्ता युक्त नौकरियों का सृजन न हो पाने के कारण और इन्हें शिक्षा एवं प्रशिक्षण व्यवस्थाओं में शामिल होने के लिए कम प्रोत्साहन प्राप्त होने या अधिक बाधाएं विद्यमान होने के कारण NEET के रूप में वर्णित किया जाता है।
  • विश्व बैंक तथा अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO), (2017) के अनुसार भारत में NEET युवाओं की हिस्सेदारी 32.6% (युवा जनसंख्या का आयु प्रतिशत) है।
  • OECD तथा आर्थिक सर्वेक्षण, 2017-18 के अनुसार भारत में 15-29 आयु वर्ग के 30% (30.83) से अधिक युवा NEETs है। जो कि OECD (14.56%) की औसत से दोगुनी तथा चीन से लगभग तीन गुना (11.22%) अधिक हैं।
हाल ही में सरकार द्वारा कौशल प्रशिक्षण हेतु उठाए गए कदम (Steps taken recently by the government in Skill training)

  • स्किल इंडिया डेवलपमेंट मिशन;
  • प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY);
  • दीन दयाल उपाध्याय ग्राम कौशल योजना (DDU-GKY);
  • जम्मू एवं कश्मीर के लिए उड़ान (Udaan); और
  • राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन (National Urban Livelihoods Mission: NULM)।

व्यावसायिक/कौशल शिक्षा तथा प्रशिक्षण में चुनौतियाँ (Challenges in vocational/skills education and training)

  • ऑटोमेशन, एनालिटिक्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस इत्यादि के रोजगार सृजन पर पड़ने वाले
    प्रभावों की पृष्ठभूमि में व्यापक स्तर पर कृषि छोड़ने वाले ग्रामीण/अर्ध-शहरी श्रमिकों के साथ
    प्रवास को नियंत्रित करना तथा मांग-आपूर्ति में अंतराल को कम करना।
  • देश में एक कुशल श्रम बल का सृजन करने में औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों (Industrial
    Training Institutes: ITIs) की विफलता।
  • देश में कौशल प्रशिक्षण अभी भी विभागीय स्तर पर अव्यवस्थित तथा विखंडित स्थिति में है।
  • उच्च शिक्षा प्रणाली कौशल परिवेश से पूर्णतः पृथक है। कौशल शिक्षा एवं प्रशिक्षण प्रदान करने
    में उच्चतर शिक्षा विभाग का योगदान केवल 4% है, जबकि कौशल विकास एवं उद्यमिता
    मंत्रालय (MSDE) का योगदान 58% है।
  • 2017 में प्रकाशित शारदा प्रसाद समिति की रिपोर्ट वर्णित करती है कि किस प्रकार निजी
    प्रशिक्षण भागीदारों ने अल्पावधि पाठ्यक्रमों का दुरूपयोग कर कौशल प्रशिक्षण की उपेक्षा की
  • भारत सरकार की राष्ट्रीय प्रशिक्षु संवर्द्धन योजना (National Apprenticeship
    Promotion Scheme) के दायरे को उच्च शिक्षा संस्थानों तक विस्तृत करने की आवश्यकता
    है, जो कि अभी तक मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधीन है।।
  • भारत को ब्रिटेन जैसे देशों के उदाहरणों से सीखने की आवश्यकता है। ब्रिटेन का व्यावसायिक
    शिक्षा का मॉडल ‘तकनीकी एवं व्यावसायिक शिक्षा तथा प्रशिक्षण’ (Technical & Vocational Education & Training.TVET) कहलाता है। इसके अंतर्गत नीति, वित्त पोषण और कार्यान्वयन के स्तर पर कौशल एवं उच्च शिक्षा को एकीकृत किया गया है। इसमें कौशल की जांच तथा मूल्यांकन करने हेतु नियामक शक्तियां एक गैर-मंत्रालयी विभाग को दी
    गई हैं।
  • शैक्षणिक संस्थानों तथा कॉर्पोरेट उद्योग के मध्य एक संवादात्मक मंच स्थापित करने की आवश्यकता है ताकि छात्रों की अपेक्षाओं पर भी ध्यान केंद्रित किया जा सके।

शिक्षा में वित्तपोषण (Financing in Education)

  • 2016 में गठित उच्च शिक्षा वित्तपोषण एजेंसी (Higher Education Financing Agency: HEFA) का उद्देश्य शीर्ष शैक्षिक संस्थानों में उच्च गुणवत्ता वाली अवसंरचना के निर्माण को बढ़ावा
    देना है।
  • इसे 2,000 करोड़ रुपये की अधिकृत पूंजी के साथ चिन्हित प्रमोटरों तथा मानव संसाधन विकास मंत्रालय (MHRD) द्वारा संयुक्त रूप से बढ़ावा दिया जा रहा है।
  • यह इक्विटी के माध्यम से 20,000 करोड़ रूपये की राशि जुटाएगा, जिससे IITS/IIMS/NITS तथा इसी प्रकार के अन्य शीर्ष शिक्षण संस्थानों में विश्व स्तरीय प्रयोगशालाओं तथा अवसंरचना के विकास संबंधी परियोजनाओं का वित्तपोषण किया जाएगा।
  • इसके अतिरिक्त HEFA अनुसंधान एवं नवाचार को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs) तथा कॉर्पोरेट क्षेत्र द्वारा कॉर्पोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी (CSR) के माध्यम से भी धन जुटाएगा।
  • हाल ही में, सरकार ने HEFA को 2022 तक शिक्षा में अवसंरचना और प्रणालियों को सुदृढ़ (Revitalizing Infrastructure and Systems in Education: RISE) करने के लिए 1,00,000 करोड़ रुपये की निधि सृजित करने का कार्य प्रदान करते हुए इसके
  • कार्यक्षेत्र में विस्तार करने और इसके पूंजी आधार को बढाकर 10,000 करोड़ रुपये करने के प्रस्ताव को स्वीकृति प्रदान की है।

चिंताएँ (Concerns)

  •  HEFA से धन उधार लेने तथा वापस करने हेतु संस्थानों को राजस्व अधिशेष की स्थिति में होना आवश्यक है, इससे संभावित फीस वृद्धि हो सकती है।
  • कुछ आलोचकों के अनुसार शिक्षा एक सार्वजनिक वस्तु तथा राज्य का मौलिक उत्तरदायित्व है। अतः, HEFA की स्थापना राज्यों की शिक्षा के प्रति उत्तरदायित्व को कम करती है।

सुरक्षा संबंधी मुद्दे एवं चुनौतियाँ (Security Issues & Challenges)

  • यद्यपि विद्यालयों को शिक्षा के मंदिर” के रूप में जाना जाता है, परंतु हाल के दिनों में ये बच्चों के विरुद्ध अपराध के प्रमुख स्थल बन गए हैं।
  • 2017 में गुरुग्राम के एक स्कूल के अंदर एक छात्र मृत पाया गया और अगले ही दिन दिल्ली के एक स्कूल में 5 वर्षीय छात्रा के साथ दुष्कर्म की घटना घटित हुई।

स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा से संबंधित पहलू (Areas of Security of children in schools)

शारीरिक सुरक्षा (Physical Safety)

  • स्कूली इमारतों का निर्माण “जीवन की सुरक्षा” को सुनिश्चित करते हेतु किया जाना चाहिए और इन्हें आपदा के प्रति अधिक प्रतिरोधी होना चाहिए।
  • स्कूल प्रशासन, कर्मचारियों, शिक्षकों एवं छात्रों को किसी भी प्रकार की आपदा (प्राकृतिक या मानव निर्मित) से निपटने के लिए अधिक जागरूक एवं तैयार रहने की आवश्यकता है।
  • स्कूलों को इमारतों की संरचनात्मक सुदृढ़ता तथा सुरक्षा पर समझौता किए बिना कम लागत एवं पर्यावरण अनुकूल प्रौद्योगिकियों का लाभ उठाना चाहिए।

मनो-सामाजिक सुरक्षा (Psychosocial Safety)

  • हिंसा से पीड़ित बच्चे डिप्रेशन, असंतोषजनक प्रतिक्रियाएं, असहायता की भावना,भावनात्मक समझ का अभाव एवं आक्रामकता इत्यादि के लक्षणों का प्रदर्शन करते हैं।
  • स्कूल परिसर में असुरक्षित स्थानों पर सीसीटीवी कैमरे लगाने से स्कूल में बच्चे की दैनिक गतिविधियों की रिकॉर्डिंग और उन पर निरंतर निगरानी को सुनिश्चित किया जा सकेगा।
  • सिक्योरिटी कैमरे स्कूल की सुरक्षा जांचों में प्रभावी सिद्ध हो सकते हैं या फिर इस प्रकार की गतिविधियों के प्रति निवारक के रूप में कार्य कर सकते हैं।
  • स्कूल को सदैव सतर्क रहना चाहिए और किसी भी प्रकार के बाल उत्पीड़न संबंधी गतिविधियों (शारीरिक, भावनात्मक या यौन) पर निरंतर निगरानी रखनी चाहिए। कर्मचारियों को बाल-उत्पीड़न के प्रमुख संकेतकों को समझने के लिए प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए और उन्हें अनुचित अथवा उत्पीड़क गतिविधि से तुरंत निपटने के लिए तत्पर रहना चाहिए।
  • स्कूलों की नीति-निर्माण की प्रक्रिया में जोखिम प्रबंधन के PPRR (Prevention, Preparedness, Response, and Recovery) (निवारण, तत्परता, प्रतिक्रिया और रिकवरी) मॉडल का अनुपालन करना चाहिए। बाल सुरक्षा से संबंधित मुद्दों में यह मॉडल स्कूल प्रशासन को सतर्क रहने में सहायता करेगा।

स्कूल परिवहन व्यवस्था एवं सुरक्षा (School transportation and safety)

  • 2014 में, CBSE ने सभी स्कूल बसों में GPS प्रणाली को लगाना अनिवार्य कर दिया था ताकि बच्चों को स्कूल से लाते-ले जाते समय सुरक्षित परिवहन को सुनिश्चित किया जा सके।
  • हालांकि, समय की मांग है कि रीयल-टाइम में बच्चों तथा फ्लीट मैनेजमेंट की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्कूल प्रशासन को एक सुगम प्रणाली प्रदान की जाए तथा अभिभावकों को उनके बच्चों की अवस्थिति से संबंधित निरंतर सूचना भी प्रदान की जाए।
  • GPS लगाने से ड्राइवर के प्रदर्शन पर निगरानी रखी जा सकती है, जबकि लाइव व्हीकल ट्रैकिंग ऐप अभिभावकों को अपने बच्चे की सुरक्षा हेतु आश्वस्त करेगा।

कर्मचारियों की पृष्ठभूमि का सत्यापन (Background verification of staff)

  • शिक्षकों, प्रशासकों एवं अन्य स्कूल कर्मचारियों की भर्ती करते समय छात्र सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए नियुक्ति से पूर्व उनकी पृष्ठभूमि की जांच करने के अनेक आवश्यक कारण विद्यमान होते हैं।
  • सत्यापन में निवास स्थान, पिछले रोजगार तथा पिछले कोई भी आपराधिक रिकॉर्ड के साथ-साथ वर्तमान में चल रहे आपराधिक मामलों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
  • इससे स्कूल परिसर के अंतर्गत छात्रों के संपर्क में आने वाले लोगों की जांच करने में स्कूल को सहायता मिलेगी, जिनमें शिक्षक, प्रशासक, खेल-कोच, सफाई कर्मचारी और स्वयंसेवक शामिल हैं।

आगंतुक प्रबंधन प्रणाली (Visitor Management System)

  • आगंतुकों हेतु जेनेरिक टैग और छात्रों के लिए हैंडरिटन लेट स्लिप एवं अनुमति पर्ची वास्तविक तौर पर जानकारी को दर्ज करने तथा विश्लेषण के उद्देश्य को प्राप्त करने में सक्षम नहीं है।
  •  विज़िटर साइन-इन इनफॉर्मेशन एवं फोटो आईडी बैज के साथ ही एक डिजिटल विज़िटर प्रबंधन प्रणाली से स्कूलों में सुरक्षा के स्तर में वृद्धि होगी।
  • स्कूलों में बॉयोमीट्रिक सुरक्षा प्रणाली स्वचालित रूप से छात्र के स्वाइप टाइम के आधार पर उसकी उपस्थिति के रिकॉर्ड को ट्रैक कर सकेगी।
  • RFID (रेडियो फ्रीक्वेंसी आइडेंटिटीफिकेशन) कार्ड से लेकर फिंगरप्रिंट एवं चेहरे की पहचान करने वाले उपलब्ध उपकरण, स्कूल परिसर में किसी भी प्रकार के अनधिकृत प्रवेश को रोकने में सहायता कर सकते हैं।

बच्चों की सुरक्षा के लिए उठाए जा सकने वाले अन्य कदम

(Other Steps that can be taken for security of children)

  • यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि स्कूल के प्रत्येक भाग को विशेष रूप से भोजन अवकाश और खेल-कूद के दौरान शिक्षक द्वारा पर्यवेक्षण किया जाए। कॉरिडोर, भोजन अवकाश तथा खेल के मैदान की ड्यूटी को शिक्षण ड्यूटी से पृथक किया जाना चाहिए।
  • बडी सिस्टम (Buddy System) का विकास किया जाना चाहिए, जिसमें बच्चों को एक युग्म अथवा तीन के समूह में संगठित किया जाए। इसमें वे अपने दोस्तों की हर समय की स्थिति को जानने और प्राथमिकता के तौर पर सदैव उनके संपर्क में रहने हेतु उत्तरदायी होंगे। इससे डरानेधमकाने संबंधी घटनाओं को कम किया जा सकेगा या कम से कम इस प्रकार के मामलों की त्वरित रिपोर्टिंग में सहायता मिलेगी।
  • जागरूकता: बच्चों को शिक्षित करना चाहिए और उन्हें अपने शारीरिक अधिकारों, बाल-अनुकूल तथा आयु-अनुकूल तरीके से यौन शिक्षा के संबंध में जागरूक करना चाहिए।
  • सुरक्षा समुदाय में माता-पिता को शामिल किया जाना चाहिए, ताकि वे भी बच्चों को सुरक्षित रखने से संबंधित अपने सुझाव एवं विचारों को साझा कर सकें।
  • स्कूल में मुक्त संचार के वातावरण का निर्माण करना चाहिए। जिसमें बचे मुक्त रूप से शिक्षकों, मुख्य शिक्षकों तथा एक-दूसरे के समक्ष अपनी बातों को रखने के अतिरिक्त अपने भय और आशाओं को भी साझा कर सकें।

शिक्षा का निजीकरण (Privatisation of Education)

आवश्यकता (Need)

  • हाल ही में, प्रकाशित टाइम्स हायर एजुकेशन (Times Higher Education: THE)
    इमर्जिग इकोनॉमीज यूनिवर्सिटी रैंकिंग- 2018 के आधार पर देखा जा सकता है कि भारत में
    उच्च शिक्षा की स्थिति निराशाजनक बनी हुई है।
  • भारत में शिक्षा संबंधित मुद्देः वित्त पोषण की कमी, शिक्षकों की निम्न गुणवत्ता, अधिगम के
    निम्न परिणाम और ब्रेन ड्रेन की समस्या।
  • अमर्त्य सेन के अनुसार, ” भारत अशिक्षित और अस्वस्थ श्रम बल के साथ एक औद्योगिक
    शक्ति बनने का प्रयास करने वाला प्रथम देश है”।

लाभ (Benefits)

  • उच्च स्तर के शोध और नवाचार के साथ अवसंरचना, फैकल्टी, वैश्विक अवसर और वैश्विक शैक्षणिक संस्थानों के साथ व्यापक संपर्क तक बेहतर पहुंच।
  •  यह विभिन्न संस्थानों के मध्य फैकल्टी के आदान-प्रदान के लिए मंच के रूप में कार्य करेगा। जिससे शिक्षकों को बेहतर प्रशिक्षण एवं बेहतर अवसर प्राप्त होंगे।
  • इससे शिक्षा क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा का विस्तार होगा जिसके कारण छात्रों की गुणवत्ता बेहतर होगी।
  • मानव संसाधन विकास मंत्रालय के उच्च शिक्षा पर अखिल भारतीय सर्वेक्षण के अनुसार, 201415 में निजी संस्थानों में नामांकित 22 मिलियन छात्रों (65%) के साथ उच्च शिक्षण संस्थानों में कुल 34.2 मिलियन छात्रों का नामांकन किया गया था। जिनमें से लगभग 53% कॉलेज छात्रों ने पर्याप्त सार्वजनिक उच्च शिक्षण संस्थान नहीं होने के कारण निजी संस्थानों में नामांकन कराया था।
  • 1950 में, भारत में विश्वविद्यालयों की संख्या केवल 20 थी जो जून 2017 तक, 819 हो गयी है। इनमें 47 केंद्रीय, 367 राज्य, 123 डीम्ड और 282 निजी विश्वविद्यालय शामिल हैं।
  • उच्च शिक्षा पर अखिल भारतीय सर्वेक्षण के अनुसार, 1,26,451 छात्रों ने Ph.D. में नामांकन | कराया है। यह संख्या कुल नामांकित छात्रों की संख्या के 0.4% से भी कम है।
  • अंतर्राष्ट्रीय बौद्धिक संपदा अधिकार सूचकांक (International Property Rights Index: IPRI) रिपोर्ट, 2017 के अनुसार, शोध प्रकाशनों के संदर्भ में, भारत विश्व में पांचवें स्थान पर है, किन्तु इसके पेटेंट प्रोफाइल के क्षेत्र में व्यापक प्रोत्साहन की आवश्यकता है क्योंकि बौद्धिक संपदा अधिकारों (Intellectual Property Rights: IPR) के संकेतकों के संदर्भ में भारत 45वें स्थान पर है।

चुनौतियां (Challenges)

  • अत्यधिक असमानता: क्योंकि यह भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली में पहले से ही प्रचलित वर्गीय विभाजन को और अधिक गहरा कर देगा।
  • शिक्षा के निजीकरण ने मुख्य रूप से कोचिंग क्लासेज की समांतर प्रणाली को लाभान्वित किया है। मध्य और यहां तक कि निम्न वर्ग के लोग कोचिंग क्लासेज में नामांकन के लिए धन व्यय कर रहे हैं।
  • कोचिंग संस्थानों के औद्योगिक कारखानों के रूप में परिवर्तित होने का उत्कृष्ट उदाहरण राजस्थान का कोटा जिला है। आराम और विश्राम के बिना छात्रों पर अपने प्रदर्शन के लिए अत्यधिक दबाव होता है। इन कोचिंग कारखानों में ट्यूशन लेने वाले 24. छात्रों द्वारा 2017 में आत्महत्या की गयी, जो इन कोचिंग संस्थानों के कठोर कार्यक्रम का सामना करने में असमर्थ थे। गत वर्ष आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में लगभग 450 किशोरों ने अकादमिक प्रदर्शन के दबाव के कारण आत्महत्या का मार्ग अपनाया।
  • निजीकरण शिक्षा की वस्तुनिष्ठता को बढ़ावा देती है क्योंकि शिक्षा से संबंधित अधिकांश निजी व्यवसायी इसे व्यवसाय के रूप में देखते हैं। इसके प्रमुख उदाहरण अत्यधिक कैपिटेशन फीस, निम्न जवाबदेही, फर्जी डिग्री, फ्लाई-बाय-नाइट ऑपरेटर इत्यादि मुद्दे हैं। निजीकरण को सार्वजनिक संस्थानों की भ्रष्ट और अकुशल कार्य पद्धति के लिए एक विकल्प के रूप में नहीं अपनाया जाना चाहिए।
  • शिक्षा के अंधाधुंध निजीकरण ने कमजोर एवं सुविधाहीन वर्ग के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अवसरों से वंचित कर दिया है।
UPSC-2002, भारत में उच्च शिक्षा का निजीकरण।

 

शारीरिक शिक्षा (Physical Education)

  • 2010 से केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा निर्मित एक नीति के तहत स्कूलों द्वारा शारीरिक
    शिक्षा हेतु कक्षा 1 से कक्षा 10 तक के बच्चों को प्रतिदिन स्कूल अवधि के दौरान कम से कम 40 से 45 मिनट की शारीरिक गतिविधियों और कक्षा 10 से कक्षा 12 के लिए कम से कम 90-120 मिनट प्रति साप्ताह शारीरिक गतिविधियां/प्रशिक्षण/योग की शिक्षा देने का प्रावधान किया गया है।
  • एक्टिव हेल्दी किड्स ग्लोबल अलायन्स द्वारा जारी India’s 2016 रिपोर्ट कार्ड ऑन फिजिकल एक्टिविटी फॉर चिल्ड्रेन एंड यूथ’ के अनुसार, अधिकांश भारतीय बच्चे शारीरिक गतिविधि के अनुशंसित स्तर तक नहीं पहुंच पाए हैं और अपनी अधिकांश दैनिक अवधि निष्क्रिय गतिविधियों/कार्यों में व्यतीत करते हैं।
  • हाल ही में हुए एक सरकारी शोध के अनुसार बच्चे 7.2 घंटे (बिना शारीरिक गतिविधि के) अध्ययन करते हैं, वही इसकी तुलना में प्रतिदिन मात्र 39 मिनट खेल संबंधी गतिविधियों में व्यतीत करते

मुद्दे और चुनौतियाँ (Issues & Challenges)

  • बजट का अनुचित आबंटन और उपयोग: युवा मामले एवं खेल मंत्रालय के अंतर्गत खेल के लिए दिया जाने वाला बजटीय आबंटन ओलंपिक और अन्य अंतर्राष्ट्रीय खेल आयोजनों में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले देशों के आबंटन की तुलना में काफी कम है।
  • प्रशिक्षित कोच की कमी: भारत में कोच प्रशिक्षण कार्यक्रमों को प्रोत्साहित नहीं किया जाता है, जिसके कारण यहां प्रशिक्षित कोचों की कमी है।
  • सुविधाओं, उपकरणों और शिक्षण सामग्री, बड़े आकर के खेल कक्ष आदि हेतु अपर्याप्त प्रावधान।
  • खेल में उत्कृष्ट प्रदर्शन हेतु स्कूलों के साथ-साथ माता-पिता द्वारा निवेश का अभाव।

समाधान (Solutions)

  • बच्चों और युवाओं की शारीरिक गतिविधियों के लिए राष्ट्रीय रणनीति का विकास।
  • राष्ट्रीय, राज्य, स्थानीय क्षेत्राधिकार और स्कूल एवं सामुदायिक स्तर पर निवेश।
  • सांस्कृतिक और भौगोलिक दृष्टिकोण से उचित हस्तक्षेप वाली नीतियाँ।
  • नगरीय नियोजन नीति के माध्यम से सक्रिय जीवन पद्धति हेतु सुविधाएं प्रदान करना।
  • परिवार और शिक्षकों द्वारा शारीरिक गतिविधियों को प्रोत्साहित किया जाना।
  • 2016 में प्रारंभ खेलो इंडिया कार्यक्रम युवाओं के मध्य खेलों को बढ़ावा देने के लिए एक सकारात्मक पहल है।
शारीरिक शिक्षा का महत्व (Importance of Physical Education)-

  • खेल बच्चों की शिक्षा का एक बड़ा हिस्सा है। यह नेतृत्व, सामूहिकता, टीम भावना, आज्ञाकारिता, अनुशासन, इच्छाशक्ति और सहनशीलता के गुणों के निर्माण में सहायता करता है।
  • यह उनके शारीरिक और मानसिक विकास में वृद्धि करके उनके अकादमिक प्रदर्शन में सुधार करता |
    है।
  • यह टीम के साथी तथा प्रतिद्वंदी का सम्मान करना और आचरण के नियमों को सिखाता है।

उद्यमिता, नवाचार और अनुसंधान (Entrepreneurship, Innovation and Research)

  • वर्तमान में भारत में शोध प्रणाली निम्नस्तरीय मानक एवं गुणवत्ता आदि समस्यायों से ग्रस्त है, साथ ही छात्रवृति के तौर पर दी जाने वाली अल्प राशि के कारण करियर के तौर पर शोध कार्य करने में छात्रों की रुचि भी कम है।
  • मौद्रिक लाभ हेतु “प्रेडटॉरी जर्नल्स” (predatory journals) की एक सीमा से अधिक चोरी (plagiarism) जाली दस्तावेजों का निर्माण और फेक पीर रिव्यू के मुद्दे। शोधकर्ता पेटेंट दर्ज कराने की बजाय केवल शोध परिणामों को प्रकाशित करने और वित्तीय लाभों को प्राप्त करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं।
  • अधिकांश छात्र बेहतर सुविधाओं, प्रयोगशालाओं, अनुसंधान के लिए अनुकूल परिवेश, सुलभ शीर्ष संकाय, प्रयोगशाला या संस्थान तक सुगम पहुँच और भारतीय रोजगार बाजार में विदेश से प्राप्त डिग्री को वरीयता दिए जाने की उच्च अवधारणा के कारण अनुसंधान हेतु विदेश जाने को अधिक वरीयता देते हैं।

इस संबंध में उठाए जा सकने वाले कदम (Steps that can be take in this regard) –

  • पेटेंट फाइलिंग और नवाचारों के व्यवसायीकरण के लिए औद्योगिक क्षेत्र के साथ सम्बद्धता के लाभ के संदर्भ में शोधार्थियों और संकायों को जागरूक करने की आवश्यकता है।
  • वैसे मुद्दे जिनका समाधान किया जा सकता है – पेटेंट की फाइलिंग और रखरखाव हेतु सरकार
    की ओर से वित्तीय सहायता की कमी, भारत में पेटेंट फाइलिंग में लगने वाला अत्यधिक समय और पेटेंट फाइलिंग के लिए प्रोत्साहन या मान्यता का अभाव।
  • उन्नत डिग्री हेतु शीर्ष गुणवत्तायुक्त कार्यक्रम की कमी – राष्ट्रीय संस्थानों में प्रमुख विषयों से संबंधित उच्च गुणवत्तायुक्त क्षमता के निर्माण की आवश्यकता है।

सरकार द्वारा उठाए गए कदमः

  • प्रधानमंत्री रिसर्च फेलो (Prime Minister’s Research Fellows: PMRF) योजना के
    तहत 70,000 रुपये मासिक छात्रवृति तथा शिक्षा में बुनियादी ढांचे एवं प्रणालियों का पुनरुद्धार (Revitalising Infrastructure and Systems in Education: RISE) योजना की घोषणा 2018-2019 के केन्द्रीय बजट में की गई। इसके द्वारा 2022 तक आगामी चार वर्षों में 1,00,000 करोड़ रुपए का निवेश किया जायेगा। यह शोध को बढ़ावा देने हेतु एक सकारात्मक पहल है।
  • अटल नवाचार मिशन (Atal Innovation Missic})- इस मिशन का उद्देश्य अटल टिंकरिंग
    लैब्स और अटल इन्क्यूबेटर्स की स्थापना के भाध्यम से स्कूलों, विश्वविद्यालयों, लघु और मध्यम उद्योगों, कॉर्पोरेट, गैर सरकारी संगठनों (NGO’s) और अनुसंधान संस्थानों में
    नवाचारी परिवेश को प्रोत्साहित करना है।

उच्च शिक्षा में विनियमॅन (Regulation in Higher Education)

  • वर्तमान में भारत की उच्च शिक्षा UGC, MCI, AICTE आदि जैसी विभिन्न एजेंसियों द्वारा | विनियमित होती है।

मुद्दे और चुनौतियां (Issues and Challenges)

  • विश्व रैंकिंग में निम्न स्थान: वर्तमान में, भारत का उच्च शैक्षणिक संस्थानों की वैश्विक रैंकिंग में
    निराशाजनक प्रदर्शन रहा है।
  • पुरातन कानून (Archaic law): विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम 1956 में अधिनियमित किया गया था। हालांकि, यह वर्तमान परिदृश्य में विनियमन के लिए अनुपयुक्त है और बढ़ती जटिलता एवं उच्च शैक्षणिक संस्थानों की संख्या में वृद्धि के अनुरूप विनियमन व्यवस्था में भी परिवर्तन की आवश्यकता है।
  • अपर्याप्त वित्तीय संसाधन और भ्रष्टाचार,भाई-भतीजावाद, पक्षपात की समस्याएं: भारत में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अपर्याप्त वित्तीय संसाधन और भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार तथा पक्षपात की समस्याएं विद्यमान हैं।
  • प्रमाणन: भारतीय प्रमाणन व्यवस्था को राजनीतिकरण, हितों के संघर्ष, भ्रष्टाचार और अवैज्ञानिक पद्धति द्वारा चिह्नित किया गया है।
  • अन्य चुनौतियां : अन्य चुनौतियों में डीम्ड विश्वविद्यालय, फ़र्जी (फेक) विश्वविद्यालय, जाली डिग्री, UGC का राजनीतिकरण (चार वर्षीय स्नातक कार्यक्रम इत्यादि) शामिल हैं।

हाल ही में सरकार द्वारा की गई नई पहल (Recent initiatives by government): 

  • हाल ही में, सरकार ने UGC को समाप्त करके उसके स्थान पर भारतीय उच्च शिक्षा आयोग (Higher Education Commission of India: HECI) की स्थापना के लिए एक मसौदा तैयार किया है।
  • सरकार द्वारा राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग विधेयक (National Medical Commission Bil) प्रस्तावित किया गया है जिसका उद्देश्य भारत में चिकित्सा शिक्षा की जाँच करना और मेडिकल काउंसिल ऑफ़ इंडिया (Medical Council of India) को प्रतिस्थापित करना है।

आगे की राह (Way forward)

  • राष्ट्रीय उच्च शिक्षा फैलोशिप कार्यक्रम (national higher education fellowship programme) के प्रबंधन हेतु एक स्वतंत्र तंत्र स्थापित करना।
  • उच्च गुणवत्ता वाले सांख्यिकीय विशेषज्ञों से युक्त केंद्रीय डेटा संग्रह, संकलन और समेकन एजेंसी के रूप में केन्द्रीय शैक्षिक सांख्यिकी एजेंसी (Central Educational Statistics Agency: CESA) को स्थापित किया जाना चाहिए। इसके साथ ही पूर्वानुमानित विश्लेषण, जन संसाधन संबंधी योजना और भविष्य में शिक्षा प्रणाली को सही दिशा में ले जाने के लिए प्रबंधन सूचना प्रणाली का उपयोग किया जाना चाहिए।
  • अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रचलित प्रमाणन प्रणालियों का अध्ययन करने हेतु एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया जाना चाहिए।

मूल्य आधारित शिक्षा (Value Based Education)

  • शिक्षा के विषय में प्राचीन काल से ही यह प्रसिद्ध है कि “सा विद्या या विमुक्तये”, जिसका अर्थ है। कि ‘विद्या वह है जो मुक्ति प्रदान करे। यह छोटा संस्कृत वाक्यांश अनिवार्य रूप से मूल्य आधारित शिक्षा का विचार और सार है जो प्रत्येक दृष्टिकोण से प्रासंगिक है।
  • सरल शब्दों में मूल्य-आधारित शिक्षा वह है जो किसी बच्चे के सम्पूर्ण विकास के माध्यम से उनके व्यक्तित्व के निर्माण हेतु कुछ आवश्यक नैतिक, सदाचार, सांस्कृतिक, सामाजिक, आध्यात्मिक मूल्य प्रदान करती है।

मूल्य आधारित शिक्षा का महत्व – क्यों ? (Importance of Value-based Education -WHY?)

  • एकल और कामकाजी माता-पिता के परिवार की आवश्यकता- ऐसे परिवारों में अधिकांश सदस्य काम में व्यस्त होने के कारण अपने बच्चों के साथ केवल कुछ ही घंटे व्यतीत कर पाते हैं।
  • समाज में अत्यधिक हिंसा और बेईमानी की उपस्थिति- छात्र प्रति दिन मीडिया और वास्तविक दुनिया में हिंसा, बेईमानी और अन्य सामाजिक समस्याओं को देखते हैं।वे इन अपराधों जैसे- यौन हिंसा, स्कूल में गोली चलाना, धौंस दिखाना (bullying) और गुटों के बीच होने वाले झगड़े आदि को देखने और उनका अनुकरण करने का प्रयास करते हैं। स्कूलों में नैतिक मूल्यों की शिक्षा दिए जाने की स्थिति में ऐसी घटनाएं कम घटित होंगी।
  • समाज पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों का सामना करना – दुर्भाग्यवश, युवाओं को प्रेरित करने वाले उनके आदर्श (role model) अनैतिक उदहारण प्रस्तुत कर रहे हैं। ये सफलता प्राप्त करने के लिए अनैतिक मार्गों यथा यौन संकीर्णता, महिलाओं का अपमान, हिंसा, बेईमानी का मार्ग अपनाने हेतु तैयार हैं।

मूल्य-आधारित शिक्षा छात्रों को क्या सीख देगी? (What Value-Based Education can instill in students?)

  • समाज में भविष्य की भूमिकाओं हेतु बच्चों को तैयार करना: शिक्षा का प्राथमिक लक्ष्य छात्रों को ज्ञान  और नैतिक मूल्य प्राप्त करने में सक्षम बनाना है। बच्चों को एक बेहतर माता-पिता और नागरिक के रूप में स्वयं को तैयार करने के लिए उपर्युक्त दोनों की आवश्यकता है।
  • यह चरित्र का निर्माण करता है और किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक है। इसके अंतर्गत शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य, शिष्टाचार एवं सामाजिक व्यवहार, नागरिक अधिकार एवं कर्तव्य आदि सम्मिलित हैं।
  • नैतिक मूल्य सही और गलत के मध्य विभेद करने में सक्षम बनाते हैं जिससे व्यक्ति अपने जीवन को सही दिशा में ले जा सकते हैं।
  • बच्चे स्वयं के प्रति एक सुरक्षित समझ का विकास करेंगे। इससे वे अपने अध्ययन की ज़िम्मेदारी लेने हेतु अधिक सक्षम हो जाते हैं।
स्कूल पाठ्यक्रम में कुछ महत्वपूर्ण नैतिक मूल्य (Some Important Moral Values in School Curriculum)

1.स्वामी विवेकानंद: “यदि हम अपने छात्रों को जैतक इंसान बनाना चाहते हैं, तो विद्यालयी पाठ्यक्रम इस उद्देश्य को पूरा करने के सर्वोत्तम माध्यमों में से एक है।” उन्होंने कुछ महत्वपूर्ण नैतिक मूल्यों का सुझाव दिया जो विद्यालयी पाठ्यक्रम में शामिल किए जाने चाहिए।

  • शर्त रहित प्रेम और दयालुता: विश्व में अत्यधिक प्रेम के भाव से दयालुता की भावना में वृद्धि होगी और यह क्रूरता का स्थान ले लेगी।
  • ईमानदारी और कठिन परिश्रम: स्कूलों में किसी भी प्रकार की धोखाधड़ी नहीं करना, एवं सदैव सत्य बोलना।
  • दूसरों के प्रति सम्मान अर्थात विभिन्न धर्म, जाति, लिंग, मत, जीवन शैली आदि का सम्मान करना।
  • सहयोग: उनका आदर्श-वाक्य था- “संगठित होकर हम खड़े रह सकते हैं, विभाजित होकर हम बिखर जायेंगे”।
  • करुणा: यदि विश्व में करुणा के भाव का प्रसार होगा तो बेघर, भूख, युद्ध, और दुःख संबंधी समस्याओं में कमी होगी।
  • क्षमा: अधिकांश मामलों में क्षमा करने के प्रति अनिच्छा ही क्रोध का कारण होती है। यदि छात्र इस नैतिक गुण को सीख लेंगे तब स्कूलों में कम हिंसा और झगड़ा होगा।

2.महात्मा गांधी: “शिक्षा का अर्थ बालक और मनुष्य के शरीर, मस्तिष्क और आत्मा के सर्वोत्तम गुणों का सर्वांगीण विकास करना है।” उन्होंने दक्षिण-अफ्रीका में फीनिक्स आश्रम और टॉल्स्टॉय बाड़ी (उद्यान) में शैक्षणिक प्रयोग किए। इनमें शामिल हैं:

  • चरित्र निर्माण के लिए शिक्षा।
  • आत्मा की शिक्षा के लिए पुस्तकों की अपेक्षा शिक्षक (model) के जीवन से शिक्षा लेनी
    चाहिए।
  • स्वास्थ्य और शारीरिक फिटनेस के लिए शारीरिक शिक्षा तथा सादा जीवन जीने पर बल।
  • स्वयं सहायता और आत्मनिर्भरता का महत्व, सम्पूर्णता के लिए शिक्षा (शक्ति)
  • सभी धर्मों की समानता के लिए शिक्षा और सत्य, अहिंसा और न्याय पर आधारित शिक्षा।
  • उनके द्वारा (1937 में) “वर्धा शिक्षा योजना (जिसे नई तालीम भी कहा जाता है। प्रस्तुत की गई: सभी लड़कों और लड़कियों के लिए सात से चौदह वर्ष की आयु तक नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा; शिल्प या उत्पादक कार्यों के माध्यम से शिक्षा; मातृभाषा के माध्यम से
    शिक्षा; नागरिकता के आदर्श संबंधी शिक्षा।

3.रवींद्रनाथ टैगोर: “उच्चतम शिक्षा वो है जो हमें मात्र जानकारी ही नहीं देती बल्कि हमारे जीवन को समस्त अस्तित्व के साथ सद्भाव में लाती है।
टैगोर के शैक्षिक दर्शन में चार मौलिक सिद्धांत हैं;प्रकृतिवाद , मानवतावाद, अंतर्राष्ट्रीयतावाद और आदर्शवाद।

ये निम्नलिखित के माध्यम से परस्पर संबद्ध हैं –

  • टैगोर की शिक्षा ने पूर्व और पश्चिम के विचारों के एक नवीन सम्मिश्रण को चिनित किया।
  • उन्होंने कहा है कि प्रकृति छात्र के लिए सर्वश्रेष्ठ शिक्षक है।
  • उन्होंने छात्रों के लिए पुस्तक आधारित शिक्षा को अस्वीकृत कर दिया
  • इन उद्देश्यों के साथ उन्होंने शांति निकेतन, श्री निकेतन और ब्रह्मचारी आश्रम की स्थापना
  • उन्होंने ललित कला (नृत्य, नाटक, संगीत, कविता, चित्रकारी इत्यादि) को महत्व दिया है।  उनके अनुसार ये मानव जीवन के ये उत्कृष्ट आयाम आत्मा को समृद्ध करने के लिए अनिवार्य
  • वह शिक्षा के माध्यम से गरीबी उन्मूलन कर (बिशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में कौशल प्रशिक्षण के
    माध्यम से) ग्रामीण पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में सहायता करना चाहते थे।

4. जे कृष्णमूर्ति – “जीवन को समझना स्वयं को समझना है और यह शिक्षा का प्रारंभ और अंत दोनों

  • शिक्षा का उद्देश्य सभी छात्रों को अपनी विशिष्ट व्यक्तिगत प्रतिभा को खोजने और इसे यथासंभव पूर्ण रूप से विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करना है।
  • उन्होंने जन शिक्षा की वर्तमान प्रणाली की निंदा करते हुए व्यक्तिगत शिक्षक-छात्र संबंधों की वकालत की।
  • स्कूल को सीखने का मंदिर होना चाहिए न कि ज्ञान का कारखाना। उन्होंने तुलना और प्रतिस्पर्धा की अनुपस्थिति की वकालत की है।
  • उनका मानना था कि आज के बच्चों (जो भविष्य के पिता बनेगे) को केवल सूचना और ज्ञान प्रदान करने के बजाय उनका सर्वांगीण विकास, शिक्षकों का प्रथम उत्तरदायित्व होना चाहिए।
  • उनका मानना था कि आधुनिक विश्व में शिक्षा का प्रसार सूचनाओं के आधार पर न होकर ज्ञान आधारित स्मरण शक्ति और कौशल पर हो। इस प्रक्रिया में शिक्षक के द्वारा पढ़ाने के माध्यम से सूचना दी जाती है जिसमें थोड़ा ही सही मानवीय संबंध भी है। अगर किसी के पास प्रतिभा नहीं है, तो वह उस परिवेश में दास (slave) जैसा जीवन जीने के लिए अभिशप्त है।

 

विगत वर्षों में संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) द्वारा पूछे गए निबंध के टॉपिक (UPSC Essay Previous Year Topics)

मूल्य आधारित विज्ञान और शिक्षा। (1999)

आधुनिक तकनीकी शिक्षा और मानवीय मूल्य (2002)

वास्तविक शिक्षा क्या है? (2005)

मूल्यों से वंचित शिक्षा, जैसी अभी उपयोगी है,व्यक्ति को अधिक चतुर शैतान बनाने जैसी लगती है। (2015)

क्रेडिट-आधारित उच्च शिक्षा प्रणाली – स्थिति, अवसर और चुनौतियां – UPSC 2011

(Credit – based higher education system :CBES – status, opportunities and challenges – UPSC 2011)

  • ग्रेडिंग की एक लचीली प्रणाली स्थापित की जानी चाहिए जिसमें छात्रों को अन्य पाठ्यक्रमों से
    विषयों का चयन करने की सुविधा प्राप्त हो।

CBES के सकारात्मक पक्ष (Positives of CBES)

  • विषयों का चयन करने के लिए अत्यधिक लचीलापन।
  • छात्रों की रुचि के अनुसार व्यापक विकल्प।
  • संज्ञानात्मक, भावनात्मक, आध्यात्मिक, अभिनव, सामाजिक, नैतिक, पर्यावरणीय
    अभिवृत्ति(aptitude) का विकास।
  • ‘रेनबो’ इंटेलिजेंस की अवधारणा को क्रियान्वित करना।
  • स्नातकों के प्रशिक्षण की आवश्यकता को कम करना।
  • संस्थानों के मध्य एक स्वस्थ सहयोग और प्रतिस्पद्धों को प्रोत्साहित करना।
  • उच्चतर शिक्षा के लिए भारतीय छात्रों के विदेशों में पलायन को सीमित करना।
  • बेहतर अधिगम परिणामों को प्राप्त करने में सहायक होना।
  • भारतीय विश्वविद्यालयों की रैंकिंग में सुधार को प्रोत्साहित करना।
  • छात्रों को विभिन्न विश्वविद्यालयों में विषयों के चयन का विकल्प प्रदान करते हुए एक अंतर
    विश्वविद्यालय मॉडल स्थापित करना।

चुनौतियां

  • उच्च शिक्षा में संकाय और अवसंरचना की व्यापक कमी, केंद्रीय विश्वविद्यालयों और ITS में
    संकाय सदस्यों के लगभग 40% पद रिक्त हैं।
  • विश्वविद्यालयों में अधिदेश, भूमिका, रूपरेखा इत्यादि में एकरूपता का अभाव।
  • मुख्य रूप से व्यावसायिक आवश्यकताओं पर बल और अनुसंधान एवं नवाचार संबंधी आवश्यकताओं की उपेक्षा।

मूल्यांकन व्यवस्था- मुद्दे एवं पहलें (Evalution Systems – Issues & Initiatives)

छात्र (Students)

  •  ‘छात्रों का मूल्यांकन’ शिक्षा के क्षेत्र में अत्यधिक विवादास्पद विषयों में से एक रहा है।
  •  हालाँकि मूल्यांकन के लिए मात्रात्मक मानकों जैसे-सकल नामांकन अनुपात (Gross enrolment ratio: GER), विद्यालयी शिक्षा के औसत वर्ष, ड्रॉपआउट रेट (स्कूल छोड़ने की दर) आदि पर सर्वसम्मति बनी है किन्तु मूल्यांकन हेतु गुणात्मक मापदंड सम्बन्धी विवाद अभी भी जारी हैं।
  • गैर-सरकारी संगठन ‘प्रथम’ द्वारा प्रकाशित ‘एनुअल स्टेटस ऑफ़ एजुकेशन रिपोर्ट’ (Annual Status of Education Report: ASER) अधिगम परिणामों (learning outcomes) के मापन के लिए प्रमुख पहलों में से एक है।

इसमें कुछ निम्नलिखित मापदंडों का प्रयोग किया गया है:

  • अक्षर की पहचान के माध्यम से बुनियादी पठन कौशल, शब्द कूटानुवाद (decoding) तथा परिच्छेद पठन।
  • मौलिक गणितीय योग्यताएं जैसे-संख्यात्मक अभिज्ञान, घटाना तथा भाग करना।

इसके अतिरिक्त सतत और व्यापक मूल्यांकन (Comprehensive and Continuous
evaluation: CCE) हेतु प्रावधान होने के बावजूद रटकर सीखने पर ही मुख्य बल दिया जा रहा है।

सरकारी पहलें (Government Initiatives)

  • हाल ही में, सरकार द्वारा विद्यालयों में वार्षिक अधिगम परिणामों के पन की एक प्रणाली
    की स्थापना हेतु प्रस्ताव लाया गया है।
  • नीति आयोग भी विद्यालयी छात्रों के मध्य अधिगम परिणामों में सुधार हेतु विद्यालय शिक्षा – गुणवत्ता सूचकांक (School Education Quality Index: SEQI) पर कार्यशालाओं का  संचालन कर रहा है।

राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (National Testing Agency: NTA)

  • हाल ही में, सरकार ने यह घोषणा की है कि 2019 से JEE Main और NEET
    परीक्षाएं NTA द्वारा वर्ष में दो बार आयोजित की जाएंगी।
  • इनके अतिरिक्त NTA द्वारा राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (NET), कॉमन मैनेजमेंट एडमिशन टेस्ट (CMAT) तथा ग्रेजुएट फार्मेसी ऐप्टिटूड टेस्ट (GPAT) जैसी परीक्षाओं का भी संचालन किया जाएगा।

आगे की राह (Way Forward)

  • अधिगम परिणामों के लिए विकसित मानदंड निजी एवं सरकारी दोनों तरह के विद्यालयों में
    समान रूप से लागू होने चाहिए।
  • राज्यों को शिक्षा के अधिकार अधिनियम द्वारा निर्धारित मानदंडों के अंतर्गत स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए अवसंरचना के लिए परिकल्पना और योजना का निर्माण करना चाहिए।
  • रटकर सीखने और केवल तथ्यों को याद करने के स्थान पर समझ एवं ज्ञान पर बल देते हुए परीक्षा प्रणाली में सुधार अत्यावश्यक है।

शिक्षक (Teachers)

  • वर्तमान में शिक्षक के प्रदर्शन के मूल्यांकन हेतु एकसमान प्रक्रिया का अभाव है।
  • मूल्यांकन की एकसमान प्रक्रिया हेतु कुछ निम्नलिखित संभावित कदम उठाए जा सकते हैं।
  • समय-समय पर शिक्षक के प्रदर्शन के मूल्यांकन हेतु पारदर्शी और योग्यता आधारित मानदंड सूत्रबद्ध किए जाने चाहिए।
  • टीचर्स एजुकेशन के विभिन्न पहलुओं के उत्तरदायित्व को सुनिश्चित करने और ऐसे मानदंडों को विकसित करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक टीचर एजुकेशन यूनिवर्सिटी की स्थापना अवश्य की जानी चाहिए।

संस्थान (Institutions)

रैंकिंग्स

  • यद्यपि टाइम्स हायर एजुकेशन वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग्स, Qs रैंकिंग्स इत्यादि जैसी
    वैश्विक रैंकिंग्स ने वैश्विक स्तर पर उच्च शैक्षणिक संस्थानों की तुलना करने हेतु एक  स्थायी पद्धति विकसित की है, परन्तु वे स्थानीय परिस्थतियों को तुलनात्मक अध्ययन में शामिल करने में विफल रही हैं।
  • भारत में मीडिया जैसे इंडिया टुडे, डेटाक्वेस्ट सहित अनेक निजी संगठनों द्वारा, राष्ट्रीय स्तर पर शैक्षणिक संस्थाओं की रैंकिंग जारी करने का प्रयास किया गया है।
  • हाल ही में, वर्ष 2015 में सरकार ने पांच विस्तृत सामान्य मापदंडों जैसे – शिक्षण, अधिगम और संसाधन, अनुसंधान एवं क्रियान्वित संस्थाओं की रैंकिंग हेतु संस्थागत
    रैंकिंग फ्रेमवर्क प्रारंभ किया है।

प्रत्यायन (Accreditation)

  • राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (National Assessment and Accreditation Council: NAAC) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के अंतर्गत एक नोडल एजेंसी है। जो प्रत्यायन हेतु उत्तरदायी है। इसके अतिरिक्त अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) के अंतर्गत राष्ट्रीय प्रलयन बोर्ड (National Board of Accreditation: NBA)
    तकनीकी संस्थाओं के आवधिक मूल्यांकन के लिए उत्तरदायी है।

मुद्दे और चुनौतियाँ (Issues and Challenges)

  •  प्रत्यायन से संबंधित पिछले अधिशेष मामलों (backlog) की अत्यधिक संख्या।
  • सभी इकाइयों के लिए उनकी विशिष्ट विशेषताओं को ध्यान में रखे बिना मूल्यांकन हेतु समान
    मानक लागू किए गए हैं, जो मूल्यांकन को वृहद रूप से अप्रासंगिक बना देते हैं।
  • बाह्य अभिकर्ताओं के लिए मूल्यांकन और प्रत्यायन क्षेत्र में भागीदारी के अवसरों का अभाव है।

एक विस्तृत क्षेत्राधिकार युक्त प्रबंधन बोर्ड के रूप में राष्ट्रीय प्रत्यायन बोर्ड’ (NBA) की स्थापना की जानी चाहिए जो निम्नलिखित कार्य करेगा:

  • सम्पूर्ण प्रक्रिया का मूल्यांकन,
  •  मानकों का निर्धारण तथा दिशा-निर्देशों को परिभाषित करना,
  • पर्याप्त संख्या में निजी एजेंसियों को लाइसेंस प्रदान करना (लाभ हेतु नहीं)।

शैक्षणिक संस्थाओं की ग्रेडिंग उनकी विशेषताओं के अनुरूप करने हेतु एक वैज्ञानिक कार्य पद्धति
को विकसित करने की आवश्यकता है।

शिक्षा से संबंधित प्रावधान NBA (Provision Related To Education)

  • सतत विकास लक्ष्य 4: सभी के लिए समावेशी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना तथा
    आजीवन अधिगम को प्रोत्साहित करना।
  • राज्य के नीति के निदेशक तत्व (DPSPs) : अनुच्छेद 41 (कुछ दशाओं में काम, शिक्षा और लोक सहायता प्राप्त करने का अधिकार), अनुच्छेद 45 (6 वर्ष से कम आयु के बालकों हेतु प्रारम्भिक शैशवावस्था देखरेख तथा शिक्षा का प्रावधान) एवं अनुच्छेद 46 (अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य दुर्बल वर्गों के शिक्षा एवं अर्थ संबंधी हितों की अभिवृद्धि)।
  • मौलिक अधिकारः अनुच्छेद 21A यह प्रावधान करता है कि राज्य 6-14 वर्ष तक की आयु के सभी ।
    बच्चों को नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा राज्य विधि के अधीन निर्धारित रीति से प्रदान करेगा।
  • मौलिक कर्तव्य: अनुछेद 51A(k) प्रत्येक नागरिक यदि वह माता-पिता या संरक्षक है तो वह 6 -14 वर्ष के बीच की आयु के अपने बच्चे या प्रतिपाल्य को शिक्षा प्राप्त करने के अवसर प्रदान करेगा।
शिक्षा के अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 के मुख्य बिंदु

  •  6-14 वर्ष तक के सभी बच्चों के लिए अनिवार्य और नि:शुल्क शिक्षा एक मौलिक अधिकार है।
  • न्यूनतम मानक निर्धारित किए गए हैं।
  • शिक्षकों की संख्या एवं योग्यता।
  • कोई भेदभाव और उत्पीड़न नहीं।
  • विद्यालय प्रबंधन समितियां – लोगों द्वारा, बच्चों के लिए।
  • किसी प्रमाणपत्र (जैसे कि जन्म प्रमाणपत्र) के अभाव में बच्चे के नामाकंन से इंकार नहीं।

RTE नवाचार

वैश्विक स्तर पर विधिमान्य अवधारणाएं – आयु के अनुसार उपयुक्त कक्षा में प्रवेश (Admission to Age Appropriate Class : AAAC)- आयु के अनुसार उपयुक्त कक्षा में सभी के लिए प्रवेश:

  • सतत और व्यापक मूल्यांकन (Continuous and Comprehensive Evaluation: CCE),
    तथा
  • अनुत्तीर्ण न करने की नीति (No Detention Policy: NDP)।

RTE अधिनियम में बाधाएं एवं कमियां

  • निजी विद्यालयों (सहायता प्राप्त या गैर-सहायता प्राप्त) में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS)|
    हेतु 25% सीटों का आरक्षण। ।
  • अनुत्तीर्ण न करने की नीति बनाम पुरानी उत्तीर्ण एवं अनुत्तीर्ण प्रणाली।

शिक्षा के क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय उदाहरण (International Examples In The Field Of Education)

  • ऑस्ट्रेलिया-ग्रामीण क्षेत्रों में पोस्टिंग लेने वाले शिक्षकों को सरकार द्वारा प्रोत्साहन, 20 वर्षों से
    अधिक स्कूली शिक्षा की प्रत्याशा।
  • जापान- अकादमिक शिक्षा पर अत्यधिक ध्यान जिसका आरम्भ 6 वर्ष की आयु से होता है (निम्न
    प्राथमिक स्तर पर ड्रॉपआउट की दर 0.2%)।
  • फ़िनलैंड- पांच घंटे के विद्यालयी दिवस के प्रत्येक घंटे में 15 मिनट का अनिवार्य विराम, चतुर्थ
    श्रेणी तक कोई ग्रेडिंग नहीं।
  • नीदरलैंड- विद्यार्थियों के लिए सभी विषयों में अध्ययन को प्रोत्साहन देने के लिए डच के अतिरिक्त अन्य भाषाओं में शिक्षण, निर्धन और नृजातीय अल्पसंख्यक विद्यार्थी हेतु अतिरिक्त वित्तपोषण, वंचित विद्यार्थियों के अधिकतम अनुपात वाले प्राथमिक विद्यालयों में लगभग 58 प्रतिशत अधिक शिक्षक और सहायक कर्मचारी की नियुक्ति।

ऑनलाइन शिक्षा – लाभ एवं हानियाँ (Online Education Advantages & Disadvantages)

लाभ (Advantages)

  • सस्ता माध्यम: कोई भी व्यक्ति इंटरनेट से जुड़े किसी भी डिवाइस का उपयोग करके ज्ञान प्राप्त
    कर सकता है। इसके लिए बहुत अधिक धन व्यय करने जैसे कि-भवनों को किराए पर लेने, अत्यधिक बिजली बिल का भुगतान करने, इन्टरनेट इत्यदि की आवश्यकता नहीं होती है।
  • समय की बचत: शिक्षक और विद्यार्थी दोनों को कक्षा में आने-जाने में समय व्यर्थ करने की आवश्यकता नहीं होती है। साथ ही, शिक्षक/प्रशिक्षक को विद्यार्थियों के विभिन्न समूह को एक
    समान विषय बार-बार पढ़ाने की आवश्यकता नहीं होती।
  • अपनी सुविधानुसार (self-paced) अध्ययन की अनुमतिः विद्यार्थी या प्रशिक्षु अपने डिवाइसेज का प्रयोग करते हुए किसी भी समय कहीं भी अपने कोर्सेज को पूरा कर सकते हैं। वे विद्यार्थी जिनके पास नियमित कक्षाओं के लिए समय नहीं होता, अपनी सुविधानुसार ऑनलाइन अध्ययन कर सकते हैं।
  • आधुनिक: आज अधिकांश लोग किसी अन्य साधन की बजाए इन्टरनेट का प्रयोग करते हुए अध्ययन सामग्री प्राप्त करना पसंद करते हैं।
  • आत्मानुशासन सुनिश्चित करता है: यद्यपि प्राप्त अनुभव दर्शाते हैं कि ऑनलाइन अध्ययन करने वाले विद्यार्थी अधिक आत्मानुशासित बन गए हैं।

हानियाँ (Disadvantages)

  • साहित्यिक चोरी: विद्यार्थी निबन्धों और अन्य असाइन्मेंन्टस की चोरी कर सकते हैं।
  • नकल करना: ऑनलाइन परीक्षा में नकल करना सरल हो सकता है।
  • अलगाव: चूँकि अध्ययन हेतु कक्षा में शारीरिक रूप से उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए अन्य विद्यार्थियों के सम्पर्क में रहना अत्यंत कठिन (या असम्भव) हो सकता है।
विगत वर्षों में संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) द्वारा पूछे गए निबंध के टॉपिक (UPSC Essay Previous Year Topics)

  • भारत में “सभी के लिए शिक्षा अभियान: मिथक या वास्तविकता। (2006)
  • साक्षरता तेजी से बढ़ रही है, परन्तु शिक्षा में कोई अनुरूप वृद्धि नहीं हुई है। (1996)
    भारतीय शिक्षा प्रणाली का पुनर्गठन। (1995)
  • कक्षा की अप्रासंगिकता। (2001)
  • राष्ट्र के भाग्य का स्वरूप -निर्माण उसकी कक्षाओं में होता है। (2017)

योजना – उत्कृष्टता के संस्थान (Institutions of Eminence: loE)

  • भारत में उच्च शिक्षा की निरंतर निराशाजनक स्थिति विभिन्न वैश्विक सूचकांकों में भारत के
    प्रदर्शन के आधार पर प्रतिबिम्बित होती है। इसीलिए, गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा की बढ़ती मांग, उभरते मध्यम वर्ग तथा जनांकिकीय लाभांश हेतु उत्कृष्टता के संस्थान (IoE) योजना प्रारम्भ की गई है। इस योजना का उद्देश्य 20 विश्व स्तरीय शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना करना है।

हालाँकि सकारात्मक उद्देश्य के बावजूद loE में निम्नलिखित विभिन्न मुद्दे एवं चुनौतियां विद्यमान हैं

  • ऐसे संस्थानों के विनियमन के विषय में स्पष्ट और निश्चित रूप से परिभाषित नहीं किया गया है।
  • ऐसे संस्थानों को सुचारू रूप से चलाने हेतु योग्य शिक्षकों की आवश्यकता होगी जो भारतीय उच्च शिक्षा क्षेत्र में एक प्रमुख मुद्दा बना हुआ है।
  • ऐसे संस्थानों से शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् प्रतिभा पलायन (brain drain) जैसे मुद्दे से भी निपटने की आवश्यकता है।

निष्कर्ष  (Conclusion)

  • वृद्ध होते विश्व में भारत सर्वाधिक युवा जनसंख्या वाले देशों में से एक है। वर्ष 2020 तक भारत में औसत आयु, चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के 37, पश्चिमी यूरोप के 45 तथा जापान के 49 वर्ष के औसत की तुलना में, केवल 28 वर्ष होगी।
  • समग्र दृष्टिकोण के साथ शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति के बौद्धिक, भावनात्मक सामाजिक, भौतिक,
    कलात्मक, रचनात्मक तथा आध्यात्मिक क्षमताओं के विकास से संबंधित है।
  • जनांकिकीय लाभांश का फायदा उठाने के लिए भारत को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, पाठ्यचर्या और
    शैक्षणिक प्रक्रिया में सुधार, सार्वजनिक-निजी भागीदारी के उपयोग द्वारा आपूर्ति में सुधार, एक सक्षम लेखांकन एवं उत्तरदायित्व तंत्र के विकास तथा प्रचलित संस्थागत प्रणाली में विद्यमान कमियों के समाधान के माध्यम से अपनी विपुल मानीय पूँजी में निवेश करने की आवश्यकता है। इससे भारतीय नागरिकों की वास्तविक क्षमताओं का दोहन करने में सहायता मिलेगी तथा आर्थिक
    एवं सामाजिक समृद्धि की भी प्राप्ति होगी।
  • चाणक्य नीति का एक श्लोक – ८९ माता शत्रु पिता वैरी येन बालो न पाठितः न शोभते सभा मध्ये हंस मध्ये वको यथा” (अर्थात जो माता-पिता अपने बच्चों को शिक्षित नहीं करते वे अपनी संतान के लिए सबसे बड़े शत्रु के समान होते हैं। शिक्षित व्यक्तियों में एक अशिक्षित व्यक्ति की स्थिति हंसों के बीच एक बगुले के समान होती है।)

Read More 

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *