भारतीय गांवों पर डॉ अम्बेडकर के विचारों और ग्रामीण भारत को रूमानी छवि से अलंकृत करने के खतरों की संक्षिप्त व्याख्या

प्रश्न: भले ही, डॉक्टर अम्बेडकर ने ग्रामीण भारत को रूमानी छवि से अलंकृत करने के खतरे के प्रति आगाह किया था, लेकिन देश को रूपांतरित करने में ग्रामीण भारत के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता है। विश्लेषण कीजिए।

दृष्टिकोण

  • भारतीय गांवों पर डॉ अम्बेडकर के विचारों और ग्रामीण भारत को रूमानी छवि से अलंकृत करने के खतरों की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए।
  • चर्चा कीजिए कि गांव किस प्रकार देश को रूपांतरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
  • सकारात्मक निष्कर्ष के साथ उत्तर समाप्त कीजिए।

उत्तर

डॉ अम्बेडकर ने गांव को एक ऐसे अमानवीय स्थान के रूप में देखा जहां जाति या धर्म अथवा किसी के परिवार के इतिहास जैसी पहचान कभी समाप्त नहीं होती है। उदाहरण के लिए, एक आम भारतीय गांव, जाति या धर्म के आधार पर कई पृथक्कृत बस्तियों की एक श्रृंखला है, जिसमें दलित सीमांत क्षेत्रों पर सीमित हैं जहाँ उनके अपने कुएं, पूजा स्थल आदि हैं।

उनके अनुसार, निम्न जातियों के उत्पीड़न का मूल कारण भारतीय समाज में विद्यमान सामाजिक स्तरीकरण है, जो सदियों से अस्तित्व में है। उन्होंने गांव को ‘स्थानीयता के कुंड, अज्ञानता, संकीर्णता एवं सांप्रदायिकता की गुफा’ की संज्ञा दी तथा जाति के उन्मूलन का दृढ़ता से समर्थन किया।

असंख्य संवैधानिक सुरक्षा उपायों और कानूनों के बावजूद, डॉ अम्बेडकर के अवलोकन आज भी प्रासंगिक हैं। भारत में अनेक राज्यों में भूमि सुधारों के बावजूद लगभग दो-तिहाई ग्रामीण दलित भूमिहीन या लगभग भूमिहीन और करीबन आधे कृषि श्रम पर निर्भर हैं। इसके अतिरिक्त, मुजफ्फरनगर (उ.प्र) में अल्पसंख्यकों की सामूहिक हत्या की तथा पंजाब एवं हरियाणा में खाप पंचायतों द्वारा बाल विवाह का समर्थन और तथाकथित ‘ऑनर किलिंग्स‘ के नाम पर युवा जोड़ों की गैर-क़ानूनी हत्या को स्वीकृति देने जैसी घटनाएं दिखाई पड़ती हैं।

हालांकि, ग्रामीण भारत विगत पांच या छह दशकों में मूल रूप से परिवर्तित हुआ है। हालांकि इसे अभी पर्याप्त नहीं कहा जा सकता है तथापि इसकी सामाजिक संरचना, जजमानी संबंध, पितृसत्तात्मकता और पारंपरिक पदानुक्रमों का विघटन हुआ है। न केवल ग्रामवासी चुनाव प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लेते हैं, बल्कि अनेक वर्षों से, राजनीतिक अभिजात वर्ग का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण और कृषि पृष्ठभूमि से आ रहा है। 73वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम, 1992 के कारण ग्रामीण भारत में समाज के प्रत्येक वर्ग में राजनीतिक चेतना आ रही है। सरकारी सेवाओं या IIT जैसे प्रमुख संस्थानों के लिए प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं में भी अत्यधिक संख्या में ग्रामीण युवाओं का चयन देखा जा रहा है।

गांवों के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता है, क्योंकि:

  • भारतीय गांव एक महत्वपूर्ण जनसांख्यिकीय वास्तविकता बने हुए हैं क्योंकि भारत की लगभग दो तिहाई जनसंख्या लगभग आधा मिलियन ग्रामीण बस्तियों में निवास करती है।
  • कुल रोजगार का लगभग 53% कृषि क्षेत्र प्रदान करता है और देश के सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र लगभग 17% का योगदान देता है।
  • नेशनले काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) के अनुसार, भारत के ग्रामीण बाजार 2025 तक पांचवीं सबसे बड़ी उपभोक्ता अर्थव्यवस्था के रूप में उभरेंगे।
  • ग्रामीण क्षेत्रों के रूपांतरण के कारण गाँवों से शहरी प्रवास भी कम हुआ है।
  • ग्रामीण उद्यमिता भी बढ़ रही है और इससे किसानों के लिए नए अवसर उत्पन्न हो रहे हैं।
  • स्मार्ट विलेज, मेक इन इंडिया, MSMEs के लिए योजनाओं जैसी सरकारी पहले भारतीय अर्थव्यवस्था में ग्रामीण क्षेत्र के महत्व की ओर संकेत करती हैं।

गांधीजी का सही मानना था कि भारत की प्रगति उसके गांवों की प्रगति में निहित है, जिसके बिना समृद्ध भारत का सपना अपूर्ण रहेगा।

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