राजनीति का अपराधीकरण (Criminalization of Politics)

कुछ व्यक्तियों द्वारा राजनीतिक शक्तियों का विशेषाधिकारों की प्राप्ति हेतु अनुचित प्रयोग किया जाता है। जब यह प्रवृत्ति राजनीति के क्षेत्र में व्यापक रूप से प्रचलित हो जाती है तो इसे राजनीति के अपराधीकरण के रूप में वर्णित किया जाता है।

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महत्वपूर्ण आंकड़े – 2014 लोक सभा चुनाव (Association of Democratic Reforms: ADR)

  • 542 विजेताओं के संबंध में की गयी जाँच से ज्ञात हुआ कि इनमें से 185 (346) विजयी उम्मीदवारों के विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज थे।
  • इन उम्मीदवारों में से 112 (21%) पर हत्या, हत्या के प्रयास, साम्प्रदायिक विद्वेष, अपहरण, महिलाओं के विरुद्ध अपराध इत्यादि जैसे गंभीर आपराधिक मामले दर्ज थे।
  • चुनावों में एक आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवार के विजयी होने की सम्भावना 13% थी, जबकि एक स्वच्छ छवि वाले उम्मीदवार के जीतने के अवसर मात्र 5% थे।

राजनीति के बढ़ते अपराधीकरण के लिए उत्तरदायी कारण:

  • बाहुबल: भारतीय राजनीति में बाहुबल का प्रभाव दीर्घकाल से राजनीतिक जीवन का एक महत्वपूर्ण तथ्य बना हुआ है। अनेक राजनेताओं द्वारा अपने वोटबैंक में वृद्धि हेतु अपराधियों के बाहुबल का उपयोग किया जाता है।
  • धनबल: आपराधिक गतिविधियाँ विशाल चुनावी व्यय हेतु धन उपलब्ध कराती हैं।
  • चुनाव की कार्यप्रणाली में कमियां: मतदाता सामान्यतया एक उम्मीदवार के इतिहास, योग्यता तथा उसके विरुद्ध लम्बित मामलों के प्रति जागरूक नहीं होते।
  • दुर्बल न्यायिक प्रणाली तथा न्याय की अस्वीकृति: जिला न्यायालयों, उच्च न्यायालयों तथा उच्चतम न्यायालय में इन अपराधी-सह
    राजनेताओं के विरुद्ध हजारों मामले लम्बित हैं।

राजनीति के अपराधीकरण पर गठित विभिन्न समितियों का पर्यवेक्षण

संथानम समिति रिपोर्ट 1963

इस समिति ने संदर्भित किया कि राजनीतिक भ्रष्टाचार अधिकारियों के भ्रष्टाचार से अधिक हानिकारक हैं। इसने केंद्र तथा राज्य दोनों स्तरों पर सतर्कता आयोग की स्थापना की अनुशंसा की थी।

वोहरा समिति रिपोर्ट (1993)

इसने भारत में राजनीति के अपराधीकरण की समस्या तथा अपराधियों, राजनेताओं तथा नौकरशाहों के मध्य गठजोड़ का
अध्ययन किया था। हालांकि, 25 वर्ष पूर्व प्रस्तुत की गई रिपोर्ट को गृह मंत्रालय द्वारा अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है।

पुलिस सुधारों पर पद्मनाभैया समिति

  •  इस समिति ने पाया कि पुलिस के राजनीतिकरण तथा अपराधीकरण का मूल कारक भ्रष्टाचार है।
  •  पुलिस के अपराधीकरण को राजनीति के अपराधीकरण से पृथक नहीं किया जा सकता है। राजनीति के अपराधीकरण ने
    दंडाभाव की संस्कृति को सृजित एवं प्रोत्साहित किया है। यह संस्कृति एक अनैतिक पुलिसकर्मी को उसके किए गए कृत्यों एवं
    न किये गए कृत्यों के लिए अपराधों से संरक्षण प्रदान करती है।

राजनीति के अपराधीकरण के कारण

  •  राजनीतिक दलों का संस्थानीकरण का अभाव: राजनीतिक दलों की गतिविधियों को विनियमित करने, किसी दल के राष्ट्रीय या
    क्षेत्रीय दल के रूप में पंजीकरण हेतु मानदंड निर्धारित करने तथा दलों की मान्यता रद्द करने जैसे व्यापक विधानों का अभाव है।
  • राजनीतिक दलों द्वारा नियमित खातों का निर्माण नहीं करना- राजनीतिक दलों के ऑडिटेड खाते मुक्त निरीक्षण हेतु उपलब्ध नहीं
  • संरचनात्मक एवं संगठनात्मक सुधार न होना – दलों में आंतरिक लोकतंत्र, नियमित दलीय चुनाव, दलों में कार्यकर्ताओं की भर्ती तथा सामाजीकरण, विकास और प्रशिक्षण, अनुसंधान, चिंतन एवं नीति नियोजन जैसी गतिविधियों का अभाव है।

अपराधीकरण का प्रभाव

  • कानून तोड़ने वालों का विधि निर्माता के रूप में चयन: विभिन्न अपराधों में संलिप्त व्यक्तियों को सम्पूर्ण देश के लिए विधि निर्माण
    का अवसर प्रदान कर दिया जाता है। यह संसद की पवित्रता को भंग करता है।
  • न्यायिक प्रणाली के प्रति जन विश्वास में कमी: यह स्पष्ट है कि राजनीतिक प्रभुत्व वाले लोग सुनवाई में विलम्ब, पुनरावृत्त स्थगन
    प्राप्त करके और किसी भी सार्थक प्रगति को रोकने हेतु विभिन्न अंतर्वादीय याचिकाएं (interlocutory petitions) दायरकर अपनी शक्ति का लाभ उठाते हैं। यह न्यायिक प्रणाली की विश्वसनीयता को संदेह के दायरे में लाता है।
  • विकृत लोकतंत्र: जहाँ विधि का शासन अप्रभावी तथा सामाजिक विभाजन अधिक प्रभावी एवं अनियंत्रित है, वहां एक उम्मीदवार की आपराधिक प्रतिष्ठा एक गुण के रूप में स्वीकार की जाती है। यह राजनीति के अपराधीकरण तथा राजनीति में धन एवं बाहुबल
    के प्रयोग की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन देता है।
  • संसद की कार्य क्षमता को प्रभावित करता है: ऐसी आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति संसद की कार्य प्रणाली में बाधा उत्पन्न करते हैं,
    जो दीर्घावधि में इसकी क्षमता को प्रभावित करती है।
  • अपराधिक प्रवृत्ति का स्थायीकरण : चूंकि राजनीतिक दलों द्वारा केवल उम्मीदवारों की जीतने की क्षमता (दल के आंतरिक लोकतंत्र में बाधा पंहुचाने पर भी) पर अधिक ध्यान दिया जाता है अतः वे अधिक से अधिक प्रभावशाली तत्वों को दल में शामिल करते हैं। इस प्रकार, राजनीति का अपराधीकरण स्वयं को स्थायी बनाए रखता है तथा सम्पूर्ण चुनावी संस्कृति को विकृत करता है।
  • निजी कल्याण बनाम लोक कल्याण: कुछ सदस्य अवैध गठजोड़ में संलग्न हो जाते हैं जिससे क्रोनी कैपिटलिज्म का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। इस प्रकार संसद सदस्य स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (MPLADs) के लिए प्रदत्त निधि के अपर्याप्त उपयोग द्वारा लोक कल्याण की उपेक्षा करते हैं। केन्द्रीय सूचना आयोग के आंकड़ों के अनुसार 2016-17 में लोकसभा सांसदों हेतु MPLADs के तहत
    अधिकृत 2,725 करोड़ रूपए की कुल निधि में से केवल 1,620 करोड़ रूपए जारी किए गए।

 नेताओं से सम्बंधित मुकदमों की सुनवाई हेतु विशेष न्यायालय

उच्चतम न्यायालय ने 12 फास्ट ट्रैक न्यायालयों की स्थापना के लिए केंद्र सरकार की योजना को स्वीकार कर लिया है। इन न्यायालयों की स्थापना का उद्देश्य एक वर्ष के भीतर सांसदों और विधायकों के विरुद्ध लंबित 1,581 आपराधिक मामलों पर  विशेष रूप से मुकदमा चलाना और उनका निपटान करना है।

विश्लेषण

  • नेताओं के लिए विशेष न्यायालयों की स्थापना करने का उच्चतम न्यायालय का निर्णय एक सकारात्मक प्रयोजन से लिया गया निर्णय है। इनके द्वारा प्रभावशाली राजनेताओं के मामलों में शीघ्रता से न्याय सुनिश्चित किया जा सकेगा, जिनमें अन्यथा अनेक वर्ष लगते हैं। इसके अतिरिक्त, यह नेताओं के हित में भी होगा, क्योंकि मामलों में शीघ्रता से निर्णय दिए जाने से निर्दोष नेताओं की छवि में सुधार होगा।
  • इस योजना का समयबद्ध स्वरूप मतदाताओं को भी उनके प्रतिनिधियों के बारे में बेहतर जानकारी प्रदान करेगा।
  • हालांकि, व्यक्ति की किसी विशिष्ट श्रेणी यथा नेताओं के लिए एक पृथक न्यायालय की स्थापना करना एक भेदभावपूर्ण कदम है।
    इसके अतिरिक्त, ऐसे कदम से नियमित न्यायालयों की विश्वसनीयता पर भी प्रश्न चिन्ह लगेगा, क्योंकि ऐसा समझा जायेगा कि नियमित न्यायालयों द्वारा न्याय नहीं प्रदान किया जा सकता है।
  • चिंता का एक विषय यह भी है कि ऐसे विशेष न्यायालयों के निर्णयों को अपील के बाद पलट दिया जाना एक अतिसंवेदनशील स्थिति उत्पन्न करेगा।
  • भारत में फास्ट ट्रैक न्यायालयों की स्थापना पहले भी की गई है, लेकिन इससे न्याय वितरण की गुणवत्ता में वास्तविक परिवर्तन नहीं किया जा सका है। राजनेताओं से जुड़े मामलों की सुनवाई में तेज़ी लाने के अतिरिक्त चुनावी सुधारों (ऊपर की गई चर्चा के अनुरूप) और राजनीतिक दलों में सुधारों की भी आवश्यकता है।

 राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र (Inner Party Democracy)

प्रधानमंत्री ने देश में राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र की आवश्यकता के सम्बन्ध में अपने विचार व्यक्त किए।

दलों में आंतरिक लोकतंत्र के बारे में

  •  राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र से आशय दलों की संरचना के अंतर्गत निर्णय लेने और विचार-विमर्श करने में दल के सदस्यों को शामिल करने के स्तर और प्रणाली से है।
  • स्वतंत्रता के बाद से, संगठनात्मक मामलों में प्राधिकारिता अधिकतर उच्च से निम्न स्तर के रूप में व्यवस्थित है। इस प्रकार, भारत में अधिकतर राजनीतिक दलों में नेतृत्व दिखने में तो लोकतांत्रिक हो सकता है लेकिन वास्तविकता में यह अत्यधिक कुलीन तंत्र आधारित है।
  • कुछ देशों जैसे जर्मनी और पुर्तगाल के विपरीत भारत में जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA) की धारा 29A में कुछ संबंधित प्रावधानों और निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देशों के अतिरिक्त राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र को लागू करने से सम्बंधित कोई कानूनी प्रावधान नहीं है।

इससे संबंधित प्रगति

  • निर्वाचन कानूनों में सुधार पर भारतीय विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट (1999) “दलों में आंतरिक लोकतंत्र से संबंधित कानून प्रदान करने की आवश्यकता” पर केंद्रित थी।
  • ARC की 2008 की एथिक्स एंड गवर्नेस रिपोर्ट में अत्यधिक केंद्रीकरण के कारण भ्रष्टाचार के सम्बन्ध में चर्चा की गयी थी।
  • भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एम.एन. वेंकटचलैया की अध्यक्षता वाली एक समिति ने राजनीतिक दलों की कार्य प्रणाली को
    विनियमित करने के लिए एक विधेयक का प्रारूप तैयार किया था।

दलों में आंतरिक लोकतंत्र के पक्ष में तर्क

  • यह नेताओं को जवाबदेह बनाने और नीति निर्णय प्रक्रियाओं में सार्थक ढंग से शामिल करने में दल के सदस्यों की सहायता करेगा,
    क्योंकि इससे दल के अंदर प्रतियोगिता, भागीदारी और प्रतिनिधित्व को बढ़ावा मिलता है।
  • इससे भाई-भतीजावाद और वंशवादी राजनीति (पारिवारिक पृष्ठभूमि, जाति, धर्म आदि पर आधारित संबद्धता) का उन्मूलन करना संभव हो सकता है।
  • यह दल के अंदर असहमति को उचित स्थान देगा जिससे राजनीतिक दलों के भीतर विभिन्न धड़ों के गठन की संभावना कम हो जाएगी।
  • यह दल के कोष के रखरखाव में पारदर्शिता को बढ़ावा दे सकता है, जिससे धन और बल के प्रभाव में कमी आएगी।
  • चूँकि नीतिगत निर्णयों में पार्टी के भीतर विचार-विमर्श और बहस शामिल हो सकेगी, अतः यह देश के समक्ष बड़े मुद्दों में स्थानीय
    राजनेताओं के भीतर स्वामित्व की भावना उत्पन्न कर सकता है।

दलों में आंतरिक लोकतंत्र के विरुद्ध कुछ मत

  • यह राजनीतिक दलों के भीतर आंतरिक कलह को बढ़ाकर दलीय संगठनों की दक्षता के लिए खतरा उत्पन्न कर सकता है।
  • यह माना जाता है कि राजनीतिक दलों को अपनी आंतरिक संरचनाओं और प्रक्रियाओं को शासित करने की अनुमति दी जानी
    चाहिए। उनके कामकाज में किसी भी प्रकार का बाहरी हस्तक्षेप बहुदलीय प्रतियोगिता के लिए खतरा उत्पन्न कर सकता है।

आगे की राह

  • वस्तुतः एक ऐसे व्यापक कानून की आवश्यकता है जो विशेष रूप से दलों में आंतरिक लोकतंत्र के ढाँचे और प्रासंगिक प्रावधानों पर
    ध्यान केंद्रित करता हो।
  • दलों द्वारा गैर-अनुपालन के विरुद्ध कुछ दंडनीय प्रावधानों के माध्यम से मौजूदा आंतरिक लोकतंत्र के उपायों के बेहतर कार्यान्वयन
    को सुनिश्चित करने के लिए ECI को सक्षम बनाया जाना चाहिए।
  • एक बाहरी संगठन द्वारा आंतरिक चुनावों को मान्यता देना उन्हें अधिक वैधता प्रदान करेगा तथा दल के सदस्यगण भी प्रतिकूल परिणाम स्वीकार करने के प्रति अधिक सहज होंगे।
  • दल-बदल कानून में संशोधन किया जाना चाहिए, क्योंकि वर्तमान में यह किसी विधायिका के निर्वाचित सदस्यों को उनके दल के
    आदेश के विरुद्ध मतदान करने से रोकता है। यह भारतीय लोकतंत्र, प्रतिनिधित्व और असहमति की बुनियादी विशेषताओं के विरुद्ध  है।

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