उत्तर प्रदेश में कृषि क्षेत्र के समक्ष मौजूद चुनौतियाँ क्या हैं? इन चुनौतियों के समाधान हेतु राज्य सरकार के प्रयासों का संक्षिप्त वर्णन करें।

उत्तर की संरचनाः

भूमिका:

  • कृषि के लगातार चर्चा में बने रहने का कारण बतायें।

मुख्य भाग:

  • उत्तर प्रदेश के आर्थिक विकास में कृषि क्षेत्र की भूमिका बतायें।
  • कृषि क्षेत्र की प्रमुख चुनौतियाँ बतायें।
  • चुनौतियों के समाधान हेतु राज्य सरकार के प्रयास (तात्कालिक एवं दीर्घकालिक) बतायें।

निष्कर्ष:

  • मूल्यांकन एवं भावी सुधार के सलाह के साथ निष्कर्ष लिखें।

उत्तर

भूमिकाः

कृषि ऋण संकट तथा किसान आत्महत्या जैसी घटनाएँ उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ कहे जाने वाले कृषि क्षेत्र को निरंतर चर्चा में बनाये रखता है।

मुख्य भागः

उत्तर प्रदेश की जनसंख्या का लगभग दो-तिहाई भाग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कृषि क्षेत्र पर निर्भर है। यह खाद्यान्न आपूर्ति के साथ-साथ उद्योगों के लिए कच्चे माल की आपूर्ति का एक प्रमुख स्रोत भी है। कृषि एवं संवर्गीय क्षेत्र का सकल राज्य घरेलू उत्पाद में योगदान वर्ष 2014-15 में 26.0% रहा, जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था में कृषि क्षेत्र की महत्वपूर्ण भूमिका का पता चलता है। 

उपर्युक्त उपलब्धियों के बावजूद उत्तर प्रदेश में कृषि क्षेत्र के समक्ष विभिन्न चुनौतियाँ प्रस्तुत हो रही है।

प्रमुख चुनौतियाँ-

  • भूमि सुधार की समस्याएँ, भूमि का असमान वितरण और भूमि का छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित होना कृषि क्षेत्र की प्रमुख समस्या है। इससे उत्पादन लागत में वृद्धि तथा उत्पादन में कमी की समस्या उभरती है। कृषि गणना 2005-06 के अनुसार उत्तर प्रदेश में कुल जोतों में से एक हेक्टेयर से कम आकार वाली जोतों का प्रतिशत 78. 0% था, जो वर्ष 2010-11 में बढ़कर 79.5% हो गया। स्पष्ट है कि प्रदेश में जोतों का औसत आकार घटता जा रहा है।
  • आर्थिक उदारीकरण के पिछले दो दशक के दौरान कृषि क्षेत्र की निरंतर उपेक्षा हुई है। इस दौरान कृषि क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश की मात्रा में गिरावट आयी है।
  • आधारभूत ढाँचे का पिछड़ापन और जल संसाधनों का प्रबंधन कृषि क्षेत्र की एक प्रमुख समस्या है। इसके अतिरिक्त ऊर्जा, परिवहन, भंडारण और विपणन की समस्या भी गंभीर है।
  • कृषि-साख (एग्रीकल्चर क्रेडिट) की समस्या किसानों की एक प्रमुख समस्या है। सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद आज भी एक-तिहाई से अधिक किसान अपनी साख-संबंधी जरूरतों के लिए असंगठित क्षेत्र पर निर्भर हैं, जहाँ ब्याज की दर आरबीआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक 60-150% तक है।
  • कृषि विविधीकरण का अभाव है। इसके लिए सरकार की न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) नीति जिम्मेदार है, जो खाद्यान्न फसलों के पक्ष में है।
  • आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया को कृषि क्षेत्र से सम्बद्ध नहीं किया जा सका। अर्थात् कृषि क्षेत्र को बाजार से जोड़ते हुए इसके लाभों को गाँवों और किसानों तक पहुँचाने में सफलता नहीं मिल सकी है।
  • किसान परम्परागत खेती करते हैं और नवीन तकनीक अपनाने में कम रूचि रखते हैं। इसके पीछे मुख्य वजह किसानों की कमजोर आर्थिक स्थिति है। क्योंकि किसानों में नुकसान झेलने की क्षमता का अभाव है। इसलिए नवीन तकनीक के प्रति संशयग्रस्त रहते हैं।
  • अनुसंधान एवं विकास कार्यों को अपेक्षित महत्व नहीं दिया गया और न ही अनुसंधान को खेतों तक पहुँचाया जा सका है।
  • उत्तर प्रदेश में कृषि क्षेत्र की एक प्रमुख समस्या निम्न उत्पादकता भी है। उदाहरणस्वरूप उत्तर प्रदेश में चावल की प्रति हेक्टेयर उत्पादकता 2132 किग्रा. है जो पंजाब के लगभग एक-तिहाई है।
  • मृदा प्रदूषण, कृषि क्षेत्र में नवीन सकट का जन्म दे रहा है। इससे एक ओर जहाँ उत्पादन में गिरावट हो रहा है, वहीं आहार श्रृंखला में पोषक तत्वों की भी कमी होती जा रही है।
  • आज उत्तर प्रदेश के कृषि क्षेत्र के समक्ष एक प्रमुख चुनौती कृषि क्षेत्र को लाभकारी पेशा बनाने और बनाये रखने की है।

चुनौतियों के समाधान हेतु राज्य सरकार के प्रयास-

तात्कालिक प्रयास-

  • समर्थन मल्य (एमएसपी) की घोषणा के जरिए किसानों की आय को सुरक्षा प्रदान किया जा रहा है।
  • मण्डी कानून में सुधार कर बिचौलियों के हस्तक्षेप को कम करके किसानों के उत्पादों को उचित कीमत दिलाने का प्रयास किया जा रहा है।
  • कृषि ऋण पर ब्याज अनुदान उपलब्ध कराया जा रहा है।
  • कृषि ऋण माफी योजना के तहत किसानों के ऋण को माफ किया गया है।

दीर्घकालिक प्रयास-

  • प्रदेश को 9 कृषि जलवायु प्रदेशों में बांटकर भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप फसल प्रणाली अपनाने को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
  • उत्तर प्रदेश राज्य कृषि नीति, 2013 की घोषणा की गयी है, जिसका उद्देश्य सम्पूर्ण पर्यावरण हितैषी कृषि पद्धति को अपनाते हुए कृषि क्षेत्र में 5.1% की उच्च वृद्धि दर को प्राप्त करना है।
  • राज्य में खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों की स्थापना कर किसानों को फसल का प्रतिस्पर्धात्मक कीमत दिलाकर उनकी आय में वृद्धि का प्रयास किया जा रहा है।
  • कानपुर, मेरठ, इलाहाबाद, फैजाबाद, बांदा आदि जिलों में कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना कर कृषि संबंधी शोध, शिक्षण, प्रशिक्षण तथा अनुसंधान को प्रोत्साहित किया जा रहा है।
  • उत्तर प्रदेश भूमि सुधार निगम की स्थापना की गयी है, जो राज्य के 29 जिलों में ऊसर भूमि सुधार परियोजना चला रही है।
  • लखनऊ में उत्तर प्रदेश भूमि विकास एवं जल संसाधन विकास प्रशिक्षण संस्थान की स्थापना की गयी है। इस संस्थान के नेतृत्व में बंजर भूमि विकास कार्यक्रम, समादेश विकास एवं जल प्रबंधन कार्यक्रम तथा सूखा बहुल क्षेत्र कार्यक्रम चल रहा है।
  • उत्तर प्रदेश भूमि सुधार निगम की स्थापना की गयी है, जो राज्य के 29 जिलों में ऊसर भूमि सुधार परियोजना चला रहा है।
  • मृदा के स्वास्थ्य में सुधार हेतु किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किया जा रहा है। जिससे मृदा में मौजूद विभिन्न पोषक तत्वों की जानकारी प्राप्त हो सकेगी और किसान आवश्यकतानुसार उर्वरकों का इस्तेमाल कर सकेगे
  • मृदा के पोषक तत्वों में संतुलन बनाये रखने के लिए जैविक कृषि को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
  • सिंचाई साधनों के विकास हेतु लघु, मध्यम एवं वृहद सिंचाई परियोजनायें क्रियान्वित की गयी हैं, जैसे- शारदा नहर, ऊपरी गंगा नहर, गंडक नहर आदि। इसके अतिरिक्त नलकूप, तालाब एवं कुओं के समधिकरण द्वारा सिंचाई साथ नों का विकास किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में सिंचाई का प्रमुख साधन नलकूप है।
  • प्रदेश में कृषकों को विभिन्न फसलों के प्रमाणित बीज उचित मूल्य पर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश बीज विकास निगम की स्थापना की गयी है।
  • किसानों की वित्त तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए ‘किसाना क्रेडिट कार्ड’ उपलब्ध कराया जा रहा हा इस अतिरिक्त न्यूनतम प्रीमियम पर किसानों को फसल बीमा उपलब्ध कराया जा रहा है। प्रधानमंत्री फसल बीमा या के तहत रही फसल के लिए 1.5% तथा खरीफ फसल के लिए 2.0% एवं बागानी फसल के लिए 5.0% प्रीमियम निर्धारित की गयी है।
  • आगरा (आलू), लखनऊ एवं सहारनपुर (आम) में कृषि निर्यात जोनों की स्थापना की गयी है।
  • हापुड़, लखनऊ, वाराणसी तथा सहारनपुर में किसानों को उनके उत्पादों का उचित मूल्य दिलाने के लिए कृषि पार्क स्थापित किया गया है।
  • किसान ऋण मोचन पोर्टल के माध्यम से लघु एवं सीमांत किसानों की समस्याओं का त्वरित निराकरण किया जा रहा है।
  • कृषकों की समस्याओं के समाधान हेतु ‘कृषक सूचना केन्द्र’, किसानों के तकनीकी समस्याओं के समाधान हेतु ‘किसान कॉल सेंटर’ तथा कृषि की नवीनतम प्रौद्योगिकियों के प्रसार एवं किसानों में जागरूकता लाने के लिए ‘कृषि चिन्तन’ नामक मासिक बुलेटिन का प्रकाशन किया जाता है।
  • समावेशी विकास के लिए हरित क्रांति का पूर्वी उत्तर प्रदेश में भी विस्तार किया जा रहा है।

निष्कर्षः

उपर्युक्त प्रयास के बावजूद पूँजी की कमी तथा नवोन्मेष के अभाव में विकास की गति काफी धीमी रही है किन्तु सार्वजनिक-निजी भागीदारी को प्रोत्साहन, फसल आधारित भविष्यवाणी (किस वर्ष कौन-सी फसल कितना चाहिए) आदि के जरिए कृषि में व्यावसायिकता लाकर कृषि को एक लाभदायक व्यवसाय में परिवर्तित किया जा सकता है।

 

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