भारत में ऊर्जा के मिश्रित स्रोतों में परमाणु ऊर्जा के महत्व : विभिन्न स्थानिक एवं गैर-स्थानिक कारकों, जैसे – भूमि की उपलब्धता, प्रौद्योगिकी, जल उपलब्धता, आपदा-सुरक्षा इत्यादि की चर्चा

प्रश्न: नाभिकीय ऊर्जा सयंत्रों की अवस्थिति निर्धारित करने में विचार किये जाने वाले महत्वपूर्ण कारकों पर प्रकाश डालिए । साथ ही, असैन्य परमाणु कार्यक्रम के भाग के रूप में थोरियम के विशाल भंडारों का उपयोग करने में भारत के सामने आने वाली कठिनाइयों की भी व्याख्या कीजिए। (150 शब्द)

दृष्टिकोण

  • भारत में ऊर्जा के मिश्रित स्रोतों में परमाणु ऊर्जा के महत्व को बताते हुए परिचय दीजिए।
  • विभिन्न स्थानिक एवं गैर-स्थानिक कारकों, जैसे – भूमि की उपलब्धता, प्रौद्योगिकी, जल उपलब्धता, आपदा-सुरक्षा इत्यादि की चर्चा कीजिए।
  • थोरियम भंडारों के उपयोग में भारत के सामने आने वाली चुनौतियों को रेखांकित कीजिए।

उत्तर

आयातित ऊर्जा संसाधनों पर भारत की निर्भरता बढ़ती ऊर्जा मांग के लिए एक चुनौती है, जिसका संभावित स्वदेशी समाधान नाभिकीय ऊर्जा है। हाल ही में केन्द्रीय कैबिनेट द्वारा 10 नए परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की स्थापना को मंजूरी प्रदान की गई है। परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के कारण प्रदूषण और दुर्घटना का खतरा हमेशा बना रहता है (जैसे फुकुशिमा दुर्घटना), जो संयंत्रों को अवस्थिति के प्रति संवेदनशील बनाता है। संयंत्रों की स्थापना सम्बन्धी महत्वपूर्ण कारक निम्नलिखित हैं:

  • दूरी – संयंत्र सघन जनसंख्या वाले क्षेत्रों से दूर होना चाहिए।
  • ऊर्जा संयंत्रों एवं अपशिष्ट निपटान के लिए भूमि की पर्याप्त उपलब्धता होनी चाहिए।
  • जल स्रोतों से निकटता – शीतलक, मंदक इत्यादि के लिए जल की अधिक मात्रा में आवश्यकता होती है।
  • आपदा-सुरक्षित क्षेत्र – नाभिकीय दुर्घटना की सुभेद्यता को कम करने के लिए आवश्यक है।
  • गैर-स्थानिक कारक- प्रौद्योगिकी, कुशल श्रम शक्ति, पूंजी, विद्युत् के लिए पर्याप्त मांग।

भारत के पास जहाँ यूरेनियम के वैश्विक भण्डार का 1% से भी कम है, वहीं थोरियम का विशाल भण्डार मौजूद है। परन्तु इसके उपयोग में आने वाली चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं

  • अविखंडनीय होने के कारण, थोरियम का प्रयोग सीधे नहीं किया जा सकता है। इसे विखंडनीय यूरेनियम- 233 के समस्थानिक में परिवर्तित करने के लिए अन्य विखंडनीय पदार्थों की उपस्थिति में रूपांतरण प्रक्रिया से गुजारने की आवश्यकता होती है। इसलिए, भारत में तीन-चरणों वाले परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को अंगीकृत किया गया है। इसमें पहले दो चरणों में विखंडनीय पदार्थों जैसे कि प्लूटोनियम के भण्डार का निर्माण किया जाएगा, जिसका उपयोग तृतीय चरण में थोरियम के साथ किया जाएगा। अतः यूरेनियम ईंधन की कमी को पूरा करना सबसे बड़ी चुनौती है ताकि नाभिकीय उर्वर ईंधन (fertile fuel) को स्थायी चेन रिएक्शन प्रदान करने वाले विखंडनीय ईंधन (fissile fuel) में परिवर्तित किया जा सके।
  • भारत के फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर्स का द्वितीय चरण अभी प्रारम्भिक अवस्था में है और अनेक मुद्दों जैसे कि NSG का सदस्य न होने, NPT का गैर-हस्ताक्षरकर्ता देश होने के कारण भारत का अन्य देशों से विखंडनीय पदार्थों को प्राप्त करना पाना अत्यंत सीमित है। विशेषज्ञों के अनुसार, भारत को और अधिक फ़ास्ट ब्रीडर रिएक्टर्स की आवश्यकता होगी, साथ ही पर्याप्त विखंडनीय पदार्थों के भंडार के निर्माण हेतु कम से कम चार दशकों का समय लगेगा।
  • रिएक्टर प्रौद्योगिकी अर्थात एडवांस्ड हैवी वाटर रिएक्टर (चरण III) का विकास एक अन्य चुनौती है।

भारत की विकास यात्रा में विकास के अनुरूप ऊर्जा की मांग में वृद्धि देखने को मिलेगी। थोरियम भंडार, भारतीय नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम के लिए चुनौती और साथ-साथ एक अवसर भी प्रदान करता है। परन्तु इन भंडारों की क्षमता का लाभ उठाने के लिए विखंडनीय पदार्थों की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु भारत को विदेशी शक्तियों के साथ अपने असैन्य परमाणु समझौतों का सकारात्मक रूप से दोहन करने की आवश्यकता है।

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