अवसंरचनाओं की आपदाओं के प्रति सुनम्यता (DRI) की संक्षिप्त व्याख्या

प्रश्न: अवसंरचनाओं का आपदाओं के प्रति सुनम्य (रेजिलिएंट) होने के महत्व को स्पष्ट करते हुए, इससे संबंधित चुनौतियों की चर्चा कीजिए। इसे विकास प्रतिमान की मुख्यधारा में लाने हेतु कुछ उपाय सुझाइये।

दृष्टिकोण

  • अवसंरचनाओं की आपदाओं के प्रति सुनम्यता (DRI) की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए और इसके महत्व को रेखांकित कीजिए। 
  • DRI प्राप्त करने से संबंधित चुनौतियों का उल्लेख कीजिए। 
  • विकास की प्रक्रिया में DRI को मुख्यधारा में लाने के तरीकों का वर्णन कीजिए।
  • उपर्युक्त बिंदुओं के आधार पर संक्षेप में निष्कर्ष प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर

अवसंरचनाओं की आपदाओं के प्रति सुनम्यता (DRI) ऐसी अवसंरचनाओं को संदर्भित करता है, जो किसी भी प्रकार की प्राकृतिक अथवा मानव प्रेरित आपदा से होने वाली अत्यधिक क्षति का सामना कर सकती हैं। इन्हें इस प्रकार से अभिकल्पित, अवस्थित, निर्मित, संचालित और अनुरक्षित किया जाता है कि निर्मित परिसंपत्तियों और संबंधित सहायता प्रणालियों की क्षमता अधिकतम हो सके। यह अत्यधिक खतरों के प्रभावों का सामना करने, पुनः बहाली और न्यूनीकरण करने के लिए निर्मित परिसंपत्तियों में निवास अथवा कार्य करने वाले लोगों की भी सहायता करता है।

अवसंरचनाओं की आपदाओं के प्रति सुनम्यता प्राप्त करने का महत्व:

  • यह आपदाओं के प्रति तैयारी का एक प्रमुख घटक है। यह आपदाओं से होने वाली मृत्यु और प्रभावित लोगों की संख्या को कम करने में सहायता करेगा।
  • यह आधारभूत सामाजिक सेवाओं के वितरण में संभावित व्यवधान के साथ-साथ आर्थिक और विरासत संबंधी नुकसान को कम करेगा।
  • वैश्विक स्तर पर, अगले 15 वर्षों में निर्मित पर्यावरण में वैश्विक आपदा नुकसान $ 415 बिलियन होने का अनुमान है।
  • आपदा जोखिम न्यूनीकरण से संबंधित सेंडाई फ्रेमवर्क (SFDR), 2015-2030 और सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) के लक्ष्य 9 में आर्थिक विकास और विकास के महत्वपूर्ण चालक के रूप में अवसंरचनाओं की आपदाओं के प्रति सुनम्यता के महत्व को रेखांकित किया है।
  • यह परमाणु ऊर्जा संयंत्रों जैसी किसी भी महत्वपूर्ण अवसंरचना के लिए जोखिम को कम करेगा और फुकुशिमा जैसी किसी भी आपदा को रोकने में सहायता करेगा।
  • यह आपदाओं के मामले में प्रतिक्रिया (response) और पुनर्घाप्ति (recovery) प्रयासों में तीव्रता लाएगा ,क्योंकि इससे होने वाले नुकसान की तीव्रता और मात्रा में कमी आएगी।
  • यदि जलवायु संबंधी घटनाओं में अत्यल्प वृद्धि होती है, तो इसके परिणामस्वरूप होने वाले नुकसान में गुणात्मक वृद्धि होती है, जो कि DRI में निवेश के महत्व को दर्शाता है।
  • वर्ष 2050 तक एशिया में आवश्यक अवसंरचना का आधा भाग अभी भी निर्मित होना शेष है। यही कारण है कि DRI में निवेश भावी पीढ़ियों के लिए भी अवसंरचनाओं की आपदाओं के प्रति सुनम्यता (DRI) सुनिश्चित करेगा, जिससे पुनर्निर्माण और पुनर्वास संबंधी लागत में कमी आ सकती है।

अवसंरचनाओं की आपदाओं के प्रति सुनम्यता प्राप्त करने में चुनौतियाँ:

  • आपदाओं के प्रति सुनम्य अवसंरचना के निर्माण से संबंधित व्यापक नियामकीय ढांचे और तकनीकी विशेषज्ञता का अभाव।
  • तीव्र शहरीकरण और शहरों के अनियोजित विकास के कारण शहरी मलिन बस्तियों और अनधिकृत कॉलोनियों का निर्माण हुआ है।  उन्हें अधिक सामाजिक व्यवधान के बिना पुनर्स्थापित करना एक बहुत बड़ी चुनौती है।
  • मौजूदा संवेदनशील संरचनाओं को पुनर्स्थापित करने, सुनम्य भवन निर्माण संहिता और मानकों को लागू करने, जोखिम के प्रति सुनम्य डिजाइनों, विनिर्देशों, निर्माण विधियों, सामग्रियों और प्रौद्योगिकियों के उपयोग के लिए पर्याप्त मात्रा में धन की आवश्यकता होगी।
  • शहरी स्थानीय निकायों की अपर्याप्त वित्तीय एवं तकनीकी क्षमता और आपदा जोखिम न्यूनीकरण (DRR) हेतु आवश्यक मानव संसाधनों की कमी। 
  • पूर्व के जोखिम प्रतिरूप पर उपलब्ध आंकड़े प्रायः स्थानिक एवं सामयिक रूप से विषम होते हैं जो विश्लेषण एवं पूर्वानुमान को अवरुद्ध करते हैं। साथ ही, जलवायु परिवर्तन पूर्व आंकड़ों से अनुमान प्राप्त करने में कम उपयोगी होते हैं।
  • विनिर्माण क्षेत्र में भ्रष्टाचार एवं गैर-कानूनी गतिविधियां, नियोजन नियमों और अनुमोदन प्रणालियों से अधिक हैं।

विकास प्रतिमान की मुख्य धारा में अवसंरचना में आपदाओं के प्रति सुनम्यता लाने के उपाय:

  • नई अवसंरचनाओं में इष्टतम सुनम्यता सुनिश्चित करने के लिए, डिजाइन और जोखिम प्रबंधन प्रथाओं हेतु मानकों को प्राकृतिक खतरों के प्रति बढ़ती समझ के साथ-साथ इंजीनियरिंग प्रौद्योगिकियों में प्रगति के साथ साम्य बनाकर रखना होगा।
  • डिजाइन और निर्माण मानकों के लिए राष्ट्रीय ढांचे के बेहतर विनियमन, अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी और नवाचार के माध्यम से सुदृढ़ करने की आवश्यकता है।
  • अवसंरचनाओं के लिए आपदा जोखिम का आकलन करने के लिए अतीत के खतरों के (जैसे- वायु की गति, उच्च बाढ़ स्तर) अलग-अलग समयावधियों के आंकड़ों की आवश्यकता होती है और इन आंकड़ों का विश्लेषण करने की क्षमता संभावित जोखिम आकलन संपन्न करने के लिए होती है जो DRI में निवेश के लिए मार्गदर्शक का कार्य कर सकता है।
  • अवसंरचना क्षेत्रों में पुनर्निर्माण और पुनर्स्थापना के लिए “बिल्ड बैक बेटर” सिद्धांत का अनुसरण करना चाहिए। इसका अनुसरण न केवल बुनियादी ढांचे के संरचनात्मक डिजाइन के लिए, बल्कि इसके निकट की प्रबंधन प्रणालियों के संदर्भ में भी किया जाना चाहिए।
  • राष्ट्रीय, उप-राष्ट्रीय और स्थानीय स्तरों पर आपदा जोखिम वित्तपोषण रणनीतियों का विकास करना। इनमें बजट आरक्षित निधि के साथ-साथ आपदा जोखिम हस्तांतरण उपकरण जैसे कैटॉस्ट्रॉफिक बांड शामिल हो सकते हैं।

भारत का यह विचार है कि एक ‘आपदाओं के प्रति सुनम्य विश्व’ के लिएआपदाओं के प्रति सुनम्य अवसंरचना‘ की आवश्यकता होती है, इसलिए यह ज्ञान के आदान-प्रदान और क्षमता विकास भागीदारी के रूप में कोएलिशन फॉर डिज़ास्टर फॉर रेज़िलिएंट इन्फ्रास्ट्रक्चर (CDRI) की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

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