भारत-रूस के मध्य संबंध : भू-राजनीतिक वास्तविकताओं पर चर्चा
प्रश्न: यद्यपि सोवियत युग से ही भारत और रूस के सम्बन्ध मधुर रहे हैं, तथापि अतीत पर निर्भरता तेजी से विकसित होती भू राजनीतिक वास्तविकताओं के प्रकाश में, संबंधों में आए बदलाव से निपटने हेतु पर्याप्त नहीं भी हो सकती है। टिप्पणी कीजिए।
दृष्टिकोण
- अतीत में भारत-रूस के मध्य संबंधों को संक्षेप में लिखिए। तेजी से विकसित होती भू-राजनीतिक वास्तविकताओं पर चर्चा कीजिए।
- द्विपक्षीय संबंधों को पुनर्गठित करने हेतु उपायों का सुझाव देकर निष्कर्ष प्रस्तुत कीजिए।
उत्तर
भारत और रूस के मध्य सम्बन्ध दीर्घकालिक और विश्वसनीय रहे हैं। 1971 में ट्रीटी ऑफ़ फ्रेंडशिप एंड कोऑपरेशन ने संबंधों के लिए एक मजबूत रणनीतिक ढांचा प्रदान किया था। शीत युद्ध की समाप्ति के बाद, भारत ने पश्चिमी देशों के साथ संबंधों में सुधार किया है।
हालांकि, भारत के रूस के साथ द्विपक्षीय संबंध निरंतर बने रहे और उनमें प्रगति हुई। 2017 में व्यापार में 22 प्रतिशत की वृद्धि हुई थी और दोनों देशों ने कृषि से ऊर्जा एवं फार्मास्यूटिकल्स तक के विभिन्न क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा दिया था। रूस अभी भी भारत के लिए हथियारों का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। इसके अतिरिक्त, रूस ने शंघाई सहयोग संगठन में भारत की सदस्यता को सुगम बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। दोनों देशों के मध्य द्विपक्षीय संबंध निष्कलंक रहे हैं, किन्तु हाल ही में भू-राजनीतिक गतिशीलता में होने वाले परिवर्तन नए समीकरणों की ओर इंगित करते हैं। इन्हें निम्नलिखित कारकों की सहायता से समझा जा सकता है:
- अमेरिका और यूरोपीय देशों द्वारा आरोपित आर्थिक गतिरोध और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का रूसी अर्थव्यवस्था पर बरा प्रभाव पड़ा है। इस कारण रूस और चीन के मध्य आर्थिक सम्बन्ध निरंतर प्रगाढ़ हो रहे हैं।
- साथ ही, चीन के साथ निकटता के अतिरिक्त रूस का झुकाव पाकिस्तान की ओर भी हो रहा है। रूस ने पाकिस्तान के साथ सैन्य अभ्यास और रक्षा व्यापार भी आरम्भ किया है।
- रूस ने भारत से आह्वान किया कि वह चीन के नेतृत्व वाली अवसंरचनात्मक परियोजना- बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे में शामिल हो एवं इनसे लाभान्वित होने का माध्यम विकसित करे।
- हाल ही में, रूस और पश्चिम के देशों के मध्य राजनयिक संबंधों में गिरावट तथा बढ़ते मतभेदों के कारण भारत के लिए द्विपक्षीय संबंधों का प्रबंधन करना चुनौतीपूर्ण हो गया है।
- भारत और अमेरिका के मध्य संबंधों के तीव्र गति से विस्तार और बढ़ते रक्षा संबंधों तथा अमेरिका के नेतृत्व वाले क्वाड्रीलैटरल ग्रुप में शामिल होने के कारण भारत ने रूस के प्रति अपनी विदेश नीति में रणनीतिक बदलाव किया है।
इस प्रकार, द्विपक्षीय संबंधों पर प्रभाव डालने वाले प्रमुख रुझान स्पष्ट दिखायी दे रहे हैं और अतीत की भावनात्मकता पर आश्रित रहने का महत्व अब सीमित रह गया है। भारत के लिए अब यह आवश्यक हो गया है कि उचित उपायों के माध्यम वह संबंधों को पुनर्जीवित करे और उनकी दिशा को पुनर्निर्धारित करे। ऐसे कुछ उपाय है:
- द्विपक्षीय संबंधों में विश्वास की कमी को दूर करके रूस और पश्चिमी देशों के साथ संबंधों का कुशलतापूर्वक प्रबंधन और संतुलन।
- यह सुनिश्चित करके कि भारत के पड़ोसी देशों के साथ रूस की सहभागिता भारत के राष्ट्रीय हितों पर नकारात्मक प्रभाव न डाल सके।
- वैश्विक मुद्दों पर समान समझ विकसित करना। UNSC सुधारों और NSG सदस्यता के लिए रणनीतिक समर्थन प्राप्त करना।
- रूस के साथ मजबूत संबंध भारत की विदेश नीति का एक प्रमुख आधार है।
- इसलिए भारत को स्पष्ट वार्ता को प्रोत्साहित करना चाहिए और पारस्परिक विश्वास विकसित करना चाहिए।
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