भारत में खाद्यान्नों की मौजूदा लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS) की संक्षिप्त व्याख्या

प्रश्न: भारत में लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS) के प्रभावी कार्यान्वयन में क्या समस्याएं हैं? क्या आप मानते हैं कि TPDS के विकल्प के रूप में प्रत्यक्ष लाभ अंतरण खाद्य सुरक्षा प्राप्त करने का एक व्यवहारिक समाधान है?

दृष्टिकोण

  • भारत में खाद्यान्नों की मौजूदा लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS) की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए।
  • उन मुद्दों का उल्लेख कीजिए जो TPDS के प्रभावी कार्यान्वयन में बाधा उत्पन्न करते हैं।
  • विश्लेषण कीजिए कि प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) प्रणाली खाद्य सुरक्षा प्राप्त करने के लिए TPDS का एक व्यवहार्य विकल्प है या नहीं।

उत्तर

लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (TPDS) एक बहुस्तरीय प्रक्रिया के माध्यम से संचालित होती है जिसमें केंद्र सरकार, किसानों से MSP पर खाद्यान्नों की खरीद कर, उसे राज्यों को आवंटित करती है। राज्य सरकार, पात्र परिवारों की पहचान करती है और डिपो से राशन की दुकानों तक अनाज पहुँचाती है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA), 2013 में TPDS कार्यक्रम में संशोधन कर कल्याणकारी दृष्टिकोण के बजाय सामाजिक सुरक्षा के अधिकार-आधारित दृष्टिकोण को अपनाया गया

TPDS के प्रभावी कार्यान्वयन में निम्नलिखित मुद्दे सम्मिलित हैं:

  • लाभार्थियों की त्रुटिपूर्ण पहचान: नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार, तेंदुलकर समिति की गरीबी रेखा के आधार पर केवल 29% BPL कार्डधारक और 13 % APL कार्डधारक ही गरीब हैं।
  • राशन की दुकानों तक परिवहन के दौरान सब्सिडीयुक्त खाद्यान्नों का लीकेज तथा राशन की दुकानों से उनका खुले बाजारों में डायवर्जन।
  • अधिकांश खरीद कुछ अधिशेष राज्यों से और ज्यादातर बड़े किसानों से की जाती है जबकि वितरण संपूर्ण देश में किया जाता है। ऐसी स्थिति में अनाजों को लम्बी दूरी (जैसे पंजाब और उत्तर-पूर्वी राज्यों के मध्य) तक परिवहन करना पड़ता है, जिससे लागत और हानि बढ़ जाती है।
  • इसमें खरीद सम्बन्धी समग्र व्यय (खरीद और भंडारण में किए गए खर्च) भी अधिक हैं।
  • CAG के ऑडिट में सरकार की भंडारण क्षमता में कमी और विभिन्न क्षेत्रों में भंडारण क्षमता के संबंध में असंतुलन पाया गया है।
  • शीत-गृह सुविधाओं की कमी के कारण खाद्यान्नों की बर्बादी। शांता कुमार समिति की रिपोर्ट ने इस प्रणाली में अकुशलता और भ्रष्टाचार को उजागर किया है।
  • NFSA के अंतर्गत खरीद के लिए आवश्यक राशि के बढ़ने की संभावना है, जिससे इसके स्थायित्व के संबंध में चिंताएं बढ़ रही हैं। इसके परिणामस्वरूप खुले बाजार में खाद्यान्नों की कीमत में भी वृद्धि होती है।

JAM ट्रिनिटी के माध्यम से DBT को, विधवाओं की पेंशन, छात्रवृत्ति, LPG सब्सिडी (जैसे PAHAL) आदि में आय हस्तांतरण हेतु सफलतापूर्वक कार्यान्वित किया गया है। इसी प्रकार, खाद्य सब्सिडी में DBT द्वारा गरीब उपभोक्ताओं के अपवर्जन की समस्या में कमी लाई जा सकती है और मध्यस्थों को हटाकर लाभार्थियों के लक्ष्यीकरण को आसान बनाया जा सकता है। परिणामस्वरूप, यह लीकेज की रोकथाम और भारी लागत में कमी के साथ एक विस्तृत PDS प्रणाली को समाप्त करने में भी सक्षम होगा।

खाद्य सब्सिडी के लिए DBT की चुनौतियां

  • यह बैंकिंग प्रणाली पर एक नई निर्भरता उत्पन्न करता है। बैंकिंग प्रणाली का क्षेत्र और लाभार्थियों के मामले में सीमित करेज है।
  • DBT के माध्यम से भोजन हेतु दी गयी सब्सिडी का गैर-खाद्य उपयोगों के लिए विचलन होने का जोखिम विद्यमान है।
  • भोजन हेतु DBT, मुद्रास्फीति से संबद्ध नहीं है अतः यह उच्च कीमतों के दौरान भोजन को अवहनीय बना देगा।
  • किसानों के लिए लाभकारी मूल्य के रूप में MSP, TPDS का अविभाज्य हिस्सा है।  DBT के मामले में इस तथ्य की अवहेलना हो जाती है।

इस प्रकार एक व्यवहार्य समाधान यह हो सकता है कि भलीभाँति शोध के उपरांत विकल्प आधारित DBT की व्यवस्था विकसित की जाए, जहां लाभार्थी यह चयन कर सकें कि वे PDS के माध्यम से वस्तुओं के रूप में लाभों के बजाए नकद DBT का लाभ उठाना पसंद करेंगे।

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