भारत में महिलाओं के विरुद्ध घरेलू हिंसा की समस्या : सामाजिक स्तर पर हस्तक्षेप की आवश्यकता और कानूनी उपाय

प्रश्न: महिलाओं के विरूद्ध घरेलू हिंसा की समस्या को दूर करने हेतु केवल कानूनी उपाय ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि इसके लिए सामाजिक स्तर पर भी हस्तक्षेप की आवश्यकता है। चर्चा कीजिए।

दृष्टिकोण

  • भारत में महिलाओं के विरुद्ध घरेलू हिंसा की समस्या की विवेचना कीजिए। 
  • इस सन्दर्भ में कानूनी उपायों का उल्लेख कीजिए।
  • सामाजिक स्तर पर हस्तक्षेप की आवश्यकता पर टिप्पणी कीजिए।

उत्तर

भारत में महिलाओं के विरुद्ध घरेलू हिंसा एक सामाजिक वास्तविकता है और उनके मानवाधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। इसमें उनके पति एवं परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा शारीरिक, यौन या भावनात्मक शोषण सम्मिलित है। भारत में इस मुद्दे के समाधान हेतु कई कानूनी उपायों को अपनाया गया है। इन मुख्य कानूनी प्रावधानों में सम्मिलित हैं:

  •  घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 : इसमें शारीरिक, यौन, मौखिक, भावनात्मक और आर्थिक शोषण सहित उत्पीड़न की व्यापक परिभाषा सम्मिलित है। महिलाओं की सुरक्षा के दायरे में वृद्धि करते हुए इसमें दहेज की गैरकानूनी मांग को भी सम्मिलित किया गया है।
  • अन्य कानूनी प्रावधानों में दहेज निषेध अधिनियम, 1961 और भारतीय दंड संहिता (IPC) से सम्बन्धित प्रावधान सम्मिलित हैं। कानूनी प्रावधानों के बावजूद घरेलू हिंसा की प्रथा गुप्त और प्रत्यक्ष, दोनों रूपों में व्याप्त है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के आंकड़ों में निर्दिष्ट किया गया है कि 15 वर्ष की आयु से प्रत्येक तीसरी महिला ने किसी न किसी रूप में घरेलू हिंसा का सामना किया है। घरेलू हिंसा के मामलों हेतु न केवल निम्न स्तरीय कानून प्रवर्तन उत्तरदायी है, बल्कि इस समस्या की जड़ें हमारे सामाजिक ढांचों और पारिवारिक प्रथाओं में गहरी जमी हुई हैं।
  • सुदृढ़ पितृसत्तात्मक पारिवारिक ढांचे और महिलाओं की सीमित क्षमताओं एवं स्वायत्तता में एक स्पष्ट संबंध है, जिसका महिलाओं के विरुद्ध घरेलू हिंसा से दृढ सम्बन्ध है।
  • अधिकांश महिलाएं उत्पीड़ित होने पर किसी प्रकार की सहायता प्राप्ति का प्रयास नहीं करती हैं। चार में से केवल एक ही महिला उत्पीड़ित होने पर हिंसा समाप्त करने के लिए सहायता प्राप्त करने का प्रयास करती है। ऐसा प्रायः पारिवारिक कलह से संबद्ध वर्जनाओं के कारण होता है। विवाहित महिलाओं के मामलों में ऐसा विवाह संबंध को बचाए रखने की इच्छा से होता है क्योंकि तलाक को कलंक माना जाता है।
  • इसके अतिरिक्त, केवल कुछ ही उत्पीड़ित विवाहित महिलाएं किसी प्रकार के संस्थागत स्रोत, जैसे पुलिस, चिकित्सा संस्थान या
  • सामाजिक सेवा संगठनों से सहायता मांगती हैं। ऐसा इसलिए भी हो सकता है, क्योंकि घरेलू हिंसा को एक वैध अपराध या शिकायत की भांति नहीं समझा जाता है। इसे एक निजी या पारिवारिक मामला अधिक माना जाता है। सामाजिक-आर्थिक वर्ग, शैक्षणिक स्तर और पारिवारिक ढांचा अन्य कारण हैं, जिनके कारण घरेलू हिंसा का भारत में अभी तक अस्तित्व बना हुआ है।
  • एक अन्य मुद्दा वैवाहिक बलात्कार का है, जिसे भारत में अपराध नहीं माना जाता क्योंकि विवाह को पवित्र माना जाता  है।
  • यह कानूनी प्रवर्तन में कमियों के साथ-साथ कानूनी हस्तक्षेप से परे अन्य सामाजिक हस्तक्षेप की आवश्यकता पर बल देता है।

उपर्युक्त कारकों को सम्बोधित करने हेतु, पीड़िता को घरेलू हिंसा के मामलों की रिपोर्ट करने के लिए अपने परिवार और मित्रों के समर्थन की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त इस मुद्दे पर सामाजिक मंचों पर विचार-विमर्श की आवश्यकता है ताकि इसे कलंक के रूप में न माना जाए और जो महिलाएँ घरेलू हिंसा का सामना कर रही हैं, वे अपनी चिंताओं पर चर्चा कर सकें और सम्बंधित उपचार प्राप्त कर सकें।

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