भारत में वर्षा सिंचित कृषि की अवधारणा : सिंचित कृषि के समक्ष व्याप्त चुनौतियों

प्रश्न: भारत में वर्षा सिंचित कृषि में आने वाली बाधाओं पर प्रकाश डालिए। वर्षा सिंचित क्षेत्रों में कृषि उत्पादन को स्थायित्व प्रदान करने हेतु अपनाई जा सकने वाली कुछ कृषि-वैज्ञानिक पद्धतियों की चर्चा कीजिए।

दृष्टिकोण

  • वर्षा सिंचित कृषि की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए भारत में इसके महत्व की संक्षिप्त चर्चा कीजिए। 
  • भारत में वर्षा सिंचित कृषि के समक्ष व्याप्त चुनौतियों पर प्रकाश डालिए।
  • वर्षा सिंचित क्षेत्रों में कृषि उत्पादन को स्थायित्व प्रदान करने हेतु अपनाई जा सकने वाली कुछ कृषि वैज्ञानिक पद्धतियों की चर्चा कीजिए।
  • भविष्य के उपायों के साथ निष्कर्ष प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर

वर्षा सिंचित कृषि, कृषि का ही एक रूप होती है जो सिंचाई के लिए पूर्णतः वर्षा जल पर निर्भर करती है। भारत के खाद्य उत्पादन में वर्षा सिंचित क्षेत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं और शुद्ध बोए गए क्षेत्र का लगभग 65 प्रतिशत इसके अंतर्गत सम्मिलित है। बाजरा, दलहन, कपास, तिलहन और लगभग 40 प्रतिशत चावल उत्पादन में प्रमुख योगदान के साथ ही वर्षा सिंचित कृषि पशुधन अर्थव्यवस्था में भी महत्त्वपूर्ण योगदान देती है।

हालाँकि, वर्षा सिंचित कृषि द्वारा कुछ चुनौतियों का भी सामना किया जा रहा है जैसे:

  • कम सार्वजनिक निवेश: भले ही वर्षा सिंचित कृषि भारत के कृषि GDP के मूल्य में 60 प्रतिशत का योगदान करती है, किन्तु सार्वजनिक नीति की बात की जाए तो इस पर कम ध्यान दिया जाता है। इसे सिंचित क्षेत्रों की तुलना में वर्षा सिंचित क्षेत्रों में होने वाले सार्वजनिक निवेश की कमी के रूप में स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है।
  • कम पारिश्रमिक: राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण (NRAA) के आंकड़ों के अनुसार, वर्षा सिंचित क्षेत्रों में किसान अन्य किसानों की तुलना में कृषि संबंधित गतिविधियों से केवल 20-30 प्रतिशत अर्जित करते हैं। ग्रामीण सड़क अवसंरचना की कमी के कारण बाजार तक पहुंच भी एक वृहद् समस्या बनी हुई है।
  • न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) व्यवस्था के अंतर्गत कम खरीद: मूल्य निर्धारण नीति भी कुछ फसलों के समर्थन में पक्षपाती है। उदाहरण के लिए सरकार ने 2003-04 और 2012-13 के मध्य MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) पर चावल और गेहूं की खरीद पर 5,40,000 करोड़ रुपये व्यय किए थे, जबकि इसी अवधि के दौरान मोटे अनाज, बाजरा और दालों जैसी प्रमुख वर्षा सिंचित फसलों की खरीद पर 3,200 करोड़ रुपये व्यय किए थे।
  • कृषि पद्धतियों का दुरुपयोग (Misalignment): वर्षा सिंचित क्षेत्रों में जल गहन फसलों की कृषि परिस्थितियों को और विकृत कर देती है। उदाहरण के लिए वास्तव में यह तर्क दिया जाता है कि मराठवाड़ा में सूखे का मुख्य कारण गन्ने की फसल है।
  • अनुसंधान और विकास का अभाव: इन क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी का हस्तांतरण प्रयोगशाला से कृष्य भूमि तक निराशाजनक बना हुआ है। इसके अतिरिक्त, विभिन्न संकर बीज जल के अभाव के कारण वर्षा सिंचित क्षेत्रों के लिए उपयुक्त नहीं है और इस प्रकार अधिक उपज प्राप्त करने के प्रयासों में बाधा उत्पन्न करते हैं।
  • जलवायु परिवर्तन: जलवायु परिवर्तन के आलोक में मृदा की संरचना और वर्षा की परिवर्तनशीलता भी एक बड़ी चुनौती उत्पन्न करती है।

इन चुनौतियों का समाधान करने हेतु, कुछ कृषि संबंधी वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाया जा सकता है जो वर्षा सिंचित और सिंचित कृषि के मध्य विद्यमान असमानताओं को समाप्त कर सकती हैं। उदाहरण के लिए:

  • कृषि विज्ञान प्रबंधन व्यवहार (एग्रोनॉमिक मैनेजमेंट प्रैक्टिस): इन क्षेत्रों में फसल उत्पादन को स्थायित्व प्रदान करने हेतु विभिन्न पद्धतियों जैसे कि अंतर और बहु फसलीकरण एवं फसल चक्रण, गैर-कृषि गतिविधियों में परिवर्तन, बीमा कवर, सोलर पंप, ड्रिप सिंचाई और स्प्रिंकलर जैसी तकनीकों को अपनाया जा सकता है। भूमि और जल उपयोग का प्रबंधन: इन क्षेत्रों में शुष्क भूमि की कृषि, परिशुद्ध कृषि, और वर्षा सिंचित बंजर भूमि की बहाली के साथ-साथ वाटरशेड प्रबंधन जैसे उपाय किए जाने चाहिए।
  • समग्र मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन: मृदा-गुणवत्ता में कृषि पद्धतियों, संतुलित निषेचन, जैव उर्वरक और सूक्ष्मजीवों की क्षमता के साथ-साथ कार्बन प्रच्छादन पद्धतियों के माध्यम से सुधार किया जाना चाहिए।
  • फसल योजना: शुष्क क्षेत्रों के लिए फसल की किस्में कम अवधि की और अधिक उपज देने वाली होनी चाहिए, जिनकी कटाई वर्षा अवधि के भीतर हो सकती है और मानसून के बाद की फसल के लिए मृदा परिच्छेदिका में पर्याप्त नमी बनी रहती है।
  • एकीकृत खरपतवार प्रबंधन: अपेक्षाकृत अधिक आक्रामक, अनुकूली और निरंतर होने के कारण खरपतवार शुष्क भूमि वाले क्षेत्रों में फसल उत्पादन हेतु गंभीर खतरा उत्पन्न करते हैं। एकीकृत खरपतवार नियंत्रण की रणनीति इन क्षेत्रों में संधारणीय फसल उत्पादन और आजीविका सुरक्षा प्रदान कर सकती है।

इसके अतिरिक्त जलवायु स्मार्ट कृषि को अपनाने के माध्यम से कृषि में जलवायु अनुकूलन की प्रक्रिया को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। साथ ही, जोखिम का सामना बेहतर तरीके से करने वाले उपायों के लिए विशिष्ट और अधिक निधियों सहित किसानों और कृषि विज्ञान केंद्र के पुनर्स्थापन तथा अन्य जमीनी स्तर वाले कार्यशील संगठनों को शिक्षित करने की तत्काल आवश्यकता है।

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