भारत-चीन संबंधों का एक संक्षिप्त परिचय

प्रश्न: भारत-चीन संबंध, जो एक ओर अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर व्यापक अभिसरण और दूसरी तरफ भू-रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता द्वारा चिह्नित होते हैं, इनका न केवल इन दोनों देशों के लिए बल्कि वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली के लिए भी गंभीर निहितार्थ हैं। चर्चा कीजिए।

दृष्टिकोण

  • भारत-चीन संबंधों का एक संक्षिप्त परिचय दीजिए।
  • इन संबंधों में अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर व्यापक अभिसरण के साथ-साथ भू-रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता किस प्रकार है?
  • दोनों देशों पर इसका क्या प्रभाव है?
  • वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय प्रणाली पर इसका क्या प्रभाव है?

उत्तर

अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर व्यापक अभिसरण भारत-चीन संबंधों की महत्वपूर्ण विशेषता है क्योंकि दोनों देश निम्नलिखित मुद्दों पर व्यापक रूप से सहमत हैं या समान राय रखते हैं:

  • वैश्विक व्यापार में सुधार: चीन और भारत तेजी से बढ़ती हुई अर्थव्यवस्थाएं हैं।
  • अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के नियमों में स्थिरता इन दोनों देशों के हित में है।
  • अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक प्रणाली, ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण से संबंधित मामले।
  • राज्य की संप्रभुता का महत्व और शक्ति के नए संतुलन को प्रतिबिंबित करने के लिए वैश्विक शासन संस्थानों में सुधार करने की आवश्यकता।
  • एशियन इंफ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक और न्यू डेवलपमेंट बैंक जैसी व्यवस्थाओं और BRICS एवं SCO जैसे संगठनों में सक्रिय भागीदारी।
  • एक स्थिर एशिया-प्रशांत की इच्छा जिससे दोनों देश अपनी आर्थिक समृद्धि को बनाए रखने में समर्थ हो सकेंगे।
  • विश्व व्यापार में बढ़ते संरक्षणवाद का तीव्र विरोध।

दूसरी ओर, द्विपक्षीय संबंधों में भू-रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता भी सम्मिलित है जिसे निम्नलिखित मुद्दों में देखा जा सकता है:

  • चीन द्वारा परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में भारत के प्रवेश का समर्थन करने से इंकार करना।
  • बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के एक भाग के रूप में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे द्वारा भारत की संप्रभुता को क्षीण करना।
  • डोकलाम पठार में सैन्य गतिरोध ने सीमा-विवाद को उद्घाटित किया है।
  • भारत की सुरक्षा को प्रभावित करने वाले आतंकवाद से निपटने पर चीन का गैर-सहयोगात्मक दृष्टिकोण।
  • तिब्बत से निकलने वाली और भारत में प्रवाहित होने वाली नदियों के मार्ग परिवर्तन या उन पर बांध बनाने से संबंधित चीन की निर्दिष्ट योजनाएं।
  • UNSC के विस्तार पर मतभेद।
  • चीन ने अत्यधिक व्यापार घाटे की समस्या के समाधान हेतु बहुत कम प्रयास किए हैं।
  • भारत को घेरने के लिए हिन्द महासागर और उपमहाद्वीप में चीन का प्रवेश भारत के लिए चिंता का कारण रहा है।

कुछ अंतरराष्ट्रीय हितों के लिए भी, यहाँ तक कि अपने साझे हितों की प्राप्ति हेतु भी वे अलग-अलग रणनीतियों को प्राथमिकता देते हैं। उदाहरण के लिए भारत इस क्षेत्र में चीन के अत्यधिक प्रभाव का सामना करने के लिए अमेरिका की भूमिका में वृद्धि करना चाहता है, जबकि चीन इसे अपने रणनीतिक क्षेत्र में घुसपैठ के रूप में देखता है।

यह प्रतिद्वंद्विता दोनों देशों के हितों के साथ-साथ वैश्विक शासन प्रणाली को प्रभावित करती है:

  • भारत द्वारा अपनी रक्षा और सुरक्षा पर बल देना महत्वपूर्ण हो गया है और इससे दोनों देशों के मध्य विश्वास भी कम हुआ  है।
  • चीन की आक्रामकता ने अन्य शक्तियों को द्विपक्षीय संबंधों को प्रभावित करने का अवसर प्रदान किया है।
  • उदाहरण स्वरूप भारत द्वारा चीन की आक्रामकता से निपटने हेतु अमेरिका और जापान के साथ अपने सामरिक संबंधों को सुदृढ़ करने के प्रयास किए गए हैं।
  • यह वैश्विक शासन को प्रभावित करती है क्योंकि यह एक अधिक न्यायसांगत तथा उचित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक रणनीतिक समन्वय को बाधित करती है।

पर्यावरण, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के मामलों पर भारत तथा चीन अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का समान लाभ उठाते हैं। दोनों एक साथ 21वीं शताब्दी को एशियाई शताब्दी बनाने में योगदान दे सकते हैं। इस प्रकार, चीन और भारत दोनों को सह विकास के अपने उच्च लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाने और एक मजबूत सामाजिक एवं सार्वजनिक आधार के निर्माण हेतु प्रयास करने की आवश्यकता है।

Read More

 

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *