मनोवृत्ति (अभिवृत्ति)

  • वस्तुत: मनोवृत्ति किसी व्यक्ति की मानसिक तस्वीर या प्रतिच्छाया है जिसके आधार पर वह व्यक्ति, समूह, वस्तु, परिस्थिति या फिर किसा घटना के प्रति अनुकूल या प्रतिकूल दृष्टिकोण अथवा विचार को प्रकट करता है।
  • मनोवृत्ति का प्रभाव व्यक्ति के व्यवहार पर दिशासूचक रूप से पड़ता है। मनोवृत्ति व्यक्ति की शक्ति को एक खास दिशा में लगा देती है, जिसके कारण वह अन्य दिशाओं को छोड़कर एक निश्चित दिशा में व्यवहार करने लगता है।
  • जैसा कि इसको परिभाषा से स्पष्ट है- मनोवृत्ति सकारात्मक भी हो सकती है और नकारात्मक भी। अगर व्यक्ति की मनोवृत्ति सकारात्मक है तो उसकी प्रतिक्रिया भी अनुकूल होगी, परन्तु अगर मनोवृत्ति नकारात्मक है तो प्रतिक्रिया अनुकूल नहीं बल्कि प्रतिकूल होगी।
  • अर्थात् व्यक्ति की मनोवृत्ति तथा उसके व्यवहार के बीच सदा सम्बद्धता होती है।
  • दूसरे शब्दों में, अगर एक व्यक्ति की मनोवृत्ति अपने काम अथवा संगठन (जिसका वह सदस्य है) के प्रति सकारात्मक है तो उससे इस बात की उम्मीद की जा सकती है कि वह अपने संगठन के प्रति अपना महत्तम योगदान देगा।

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मनोवृत्ति (अभिवृत्ति) के संघटक

मनोवृत्ति के तीन महत्वपूर्ण घटक हैं। ये हैं-

  1. संज्ञानात्मक संघटक (Cognitive Component)
  2. भावात्मक संघटक (Affective Component)
  3. व्यवहारात्मक संघटक (Behavioural Component)

संक्षेप में इसे कैब (CAB) कहा जाता है।

संज्ञानात्मक संघटक (Cognitive Component)

  • किसी वस्त से संबंधित व्यक्ति के विचार और विश्वासों को संज्ञाना कहते हैं।
  • अर्थात् किसी वस्तु के बारे में उपलब्ध सूचना के आधार पर ही इस बारे में अपनी धारणा बनाते हैं या फिर कोई निर्णय देते हैं।
  • इसी आधार पर उस वस्तु के बारे में हमारी मनोवृत्ति सकारात्मक या नकारात्मक होती है। मनोवृत्ति का यही संघटक संज्ञानात्मक कहलाता है।

उदाहरण

अगर हम किसी व्यक्ति के प्रति यह विश्वास रखते हैं कि वह असभ्य है तो इसका अर्थ यह है कि हम उसे एक असभ्य मनुष्य के रूप में देखते हैं। उस व्यक्ति के प्रति हमारे इसी विश्वास को संज्ञानात्मक घटक कहा जाएगा।

भावात्मक संघटक (Affective Component)

  • यह संघटक मनोवृत्ति परिवर्तन, निर्णयन, सामाजिक प्रभाव तथा प्रत्यायन (Persuasion) सभी में समान रूप से पाया जाता है।
  • भावात्मक संघटक का तात्पर्य किसी मनोवृत्ति वस्तु (attitude object) के प्रति व्यक्ति के भाव अथवा पसंद या नापसंद तथा सहानुभूति आदि से है।
  • भावात्मक संघटक वास्तव में मनोवृत्ति का सारभाग (Core) होता है तथा अन्य संघटक सिर्फ सहायक की भूमिका में होते हैं।

व्यवहारात्मक संघटक (Beharioural Component)

  • किसी वस्तु के प्रति व्यवहार या क्रिया करने की तत्परता को व्यवहारात्मक संघटक कहते हैं।
  • यह क्रियात्मक संघटक के नाम से भी जाना जाता है।
  • क्रियात्मक संघटक का तात्पर्य किसी मनोवृत्ति-वस्तु के प्रति व्यक्ति की क्रिया प्रवृत्ति से है। इसका अर्थ यह है कि व्यक्ति किसी मनोवृत्ति-वस्तु के प्रति कैसा व्यवहार करता है।

उदाहरण

अगर एक व्यक्ति को यह विश्वास है जिस संस्था में वह कार्यरत है वहां का मालिक भ्रष्ट है तथा संस्था के पैसों का दुरुपयोग कर रहा है तो ऐसे में हो सकता है अपने मालिक के प्रति वह वैसा व्यवहार न करे जैसा कि उससे उम्मीद की जाती है या फिर यह भी हो सकता है कि वह अपनी नौकरी ही छोड़ दे।

मनोवृत्ति (अभिवृत्ति) के प्रकार

मनोवृत्ति को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है –

  1. व्यक्त (प्रत्यक्ष) – सजगता का परिणाम
  2. अंतर्निहित (अप्रत्यक्ष) – अचेतन मन में निहित

दोनों में मौलिक अन्तर यह है कि जहां मनुष्य व्यक्त (प्रत्यक्ष) मनोवृत्ति के निर्माण के प्रति सजग रहता है अर्थात् उसे अपनी मनोवृत्ति का ज्ञान रहता है वहीं अंतर्निहित अर्थात् अप्रत्यक्ष मनोवृत्ति के प्रति वह सचेत नहीं रहता बल्कि भूतकाल की यादें इस मनोवृत्ति के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

नैतिक मनोवृत्ति (अभिवृत्ति) (Moral Attitude)

  • नैतिक प्रवृत्तियां प्रत्येक व्यक्ति के व्यवहार में परिलक्षित होती हैं।
  • यहां प्रवृत्तियों के ‘नैतिक’ होने का अर्थ है किसी वस्तु या व्यक्ति के बारे में नैतिक निर्णय देना अर्थात् मूल्यांकन करना कि वह उचित है या अनुचित।

उदाहरण

वर्तमान विश्व में कई राष्ट्र हैं और इन राष्ट्रों के बारे में अच्छा या बुरा कहने मात्र से भी किसी व्यक्ति के नैतिक मनोवृत्ति का पता चलता है यानी उसके इस प्रकार के वक्तव्य से विश्व के प्रति उसकी मनोवृत्ति तथा मूल्यों में उसकी आस्था का पता चलता है।

नैतिक मनोवृत्ति तथा मूल्यों का संस्कृति से संबंध

प्रत्येक संस्कृति का अपना-अपना सांस्कृतिक प्रतिरूप होता है। उसके अपने-अपने मूल्य, मानदंड तथा परंपराएं होती हैं। अत: किसी संस्कृति के सदस्यों की मनोवृत्ति के निर्माण पर उसके सांस्कृतिक प्रतिरूपों का भी प्रभाव पड़ता है। इसी कारण जहां एक संस्कृति के लोगों की मनोवृत्ति में अधिक समानता पाई जाती है, वहां भिन्न-भिन्न संस्कृतियों के लोगों की मनोवृत्ति में अधिक भिन्नता।

नैतिक मूल्य सभी प्राकृतिक मूल्यों में सर्वश्रेष्ठ है – अच्छाई, पवित्रता, सत्यवादिता, विनम्रता। ये नैतिक मूल्य, बुद्धिमत्ता, मेधाविता, खुशी, शक्ति-संपन्नता, प्राकृतिक सन्दरता अथवा कला या फिर किसी राज्य में व्याप्त शक्ति एवं स्थायित्व आदि मूल्यों से कहीं अधिक उच्चतर स्थान रखते हैं।

वैसे तो सांस्कृतिक मूल्य अनेक हैं दया, करुणा, दानशीलता, नि:स्वार्थ प्रेम जैसे नैतिक मूल्यों की बात ही अलग है। ये अन्य नैतिक मूल्यों की अपेक्षा चिरस्थायी हैं तथा ज्यादा सार्थक भी।

राजनीतिक मनोवृत्ति (अभिवृत्ति) (Political Attitude)

जैसा कि पिछली चर्चाओं में भी कहा गया है- विशिष्ट वस्तुओं के प्रति विशेष रूप से व्यवहार करने की प्रवृत्ति (झुकाव) को मनोवृत्ति कहते हैं। जहां तक राजनीतिक मनोवृत्ति का प्रश्न है, यहां मनोवृत्ति वस्तु (Attitude-object) राजनीति से जुड़े होते हैं, जैसे कि राजनीतिक उम्मीदवार, राजनीतिक मुद्दे, राजनीतिक दल अथवा राजनीतिक संस्थाएं आदि ।

राजनीतिक मनोवृत्ति और व्यक्तित्व के शीलगुण (Political Attitude & Personality Traits)

व्यक्तित्व के कुछ ऐसे शीलगुण (Traits) हैं जिनका राजनीतिक मनोवृत्ति पर स्पष्ट रूप से प्रभाव पड़ता है। ऐसे पांच शीलगुणों (Traits) की पहचान की गई है जिनकी चर्चा नीचे की जा रही है ।

बहिर्मुखता (Extroversion)

  • इसका अर्थ है ऊर्जावान, कर्मठ तथा क्रियाशील होना। जिन व्यक्तियों में यह शीलगुण पाया जाता है वे समाज तथा देश-दुनिया के प्रति अधिक सजग तथा क्रियाशील होते हैं।
  • बहिर्मुखी व्यक्ति वह है जिसमें सामाजिकता, आधिपत्य, सहकारिता, प्रतियोगिता आदि शीलगुण पाए जाते हैं।
  • इनमें किसी विषय पर निर्णय लेने तथा उसे कार्यान्वित करने की क्षमता भी अधिक होती है। ये स्वभावत: व्यवहार कुशल, सामाजिक एवं मिलनसार होते हैं।

सत्यागशीलता (Agreeableness)

  • यह व्यक्तित्व का प्रमुख शीलगुण है जो सामाजिक तथा साम्प्रदायिक मनोवृत्ति से बिल्कुल भिन्न होता है।
  • इस शीलगुण से युक्त व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी ईमानदार बना रहता है। ऐसे व्यक्तियों में परोपकारिता, विनम्रता जैसी भावना होती है।
  • कई बार इनके व्यवहार से मानसिक अपरिपक्वता भी झलकती है अर्थात् ये संवेदनशील भी होते हैं।

निष्ठता (Conscientiousness)

  • इस शलिगुण से युक्त व्यक्ति लक्ष्य प्रधान होते हैं। इन्हें स्वयं पर नियंत्रण होता है।
  • ऐसे शीलगुण वाले व्यक्ति नियमों व मान्यताओं के पालन में विश्वास रखते हैं।
  • ये अपनी प्राथमिकताओं को समझते हैं और उसी के अनुसार एक व्यवस्थित योजना पर कार्य करते हैं।

संवेगात्मक स्थिरता (Emotional Stability)

ऐसे शीलगुण वाले व्यक्ति संवेगात्मक रूप में परिपक्व होते हैं। जिस व्यक्ति का व्यक्तित्व विकास सामान्य एवं संतुलित होता है उसमें संवेगात्मक स्थिरता रहती है। ये परिस्थिति को समझकर उसके अनुकूल प्रतिक्रिया करते हैं। इनमें नकारात्मक प्रवृत्ति अर्थात् चिन्ता, उदासी, क्रोध या तनाव आदि अनावश्यक रूप से नहीं पाया जाता जैसा कि संवेगात्मक रूप से अस्थिर व्यक्तित्व में देखने को मिलता है।

खुलापन तथा अनुभव के प्रति उन्मुखता (Openness to Experience)

ऐसे व्यक्ति महत्वाकांक्षी होते हैं। ये संकीर्ण सोच वाले व्यक्तियों से भिन्न होते हैं। खुले दिमाग तथा अनुभवों के प्रति उत्सुक शीलगुण वाले व्यक्ति में स्वाभाविकता होती है। ये गहन विचारशील तथा उच्च आकांक्षा स्तर वाले व्यक्ति होते हैं। इनका मानसिक क्षितिज विकसित किन्तु थोड़ा जटिल भी हो सकता है। | उपर्युक्त शीलगुणों में बहिर्मुखता को छोड़कर बाकी सभी शीलगुण हमारे अर्थ संबंधी आदर्शों पर काफी कुछ प्रभाव डाल सकते हैं। मारा सामाजिक आदर्श भी इनसे प्रभावित हो सकता है। जहां तक अर्थ संबंधी आदर्शों का प्रश्न है तो कोई मुक्त बाजार व्यवस्था को पसंद कर सकता है या फिर कुछ लोग हस्तक्षेप – सिद्धान्त की वालत कर सकते हैं। इसी प्रकार समाज के संदर्भ में कोई परम्पराओं को ज्यादा तरजीह देने वाला होता है तो कोई व्यक्तिगत स्वतंत्रता को ज्यादा महत्व देता है या फिर सामाजिक समानता व असमानता के बारे में अलग-अलग विचार प्रकट कर सकता है। बहिर्मुखता ही वह शीलगुण है जो हमारे आदर्शों को नहीं बल्कि राजनीति में हमारी भागीदारी को प्रभावित कर सकता है।

मनोवृत्ति (अभिवृत्ति) के कार्य (Functions of Attitude)

मनोवृत्ति द्वारा कुछ कार्य संपन्न किए जाते हैं और इन्हीं कार्यों के विश्लेषण से मनोवृत्तियों की बेहतर पहचान की जा सकती है। प्रत्येक व्यक्ति कुछ खास
मनोवृत्तियों को तरजीह देता है।

मनोवृत्ति के प्रमुख कार्य (वृत्तियां) ये हैं:

उपयोगितावादी/साधनात्मक कार्य (Utilitarian/Instrumental Functions)

साधनात्मक कार्य का अर्थ यह है कि जिस व्यवहार से व्यक्ति को लाभ या पुरस्कार मिलता है या फिर मिलने की। संभावना रहती है, वह उसे बार-बार करने की कोशिश करता है लेकिन जिस व्यवहार से दण्ड मिलता । है या फिर मिलने की संभावना भी होती है वह वैसे कार्य करने से परहेज करता है। यहां काज के कहने का अभिप्राय यह है कि जिन वस्तुओं अथवा व्यक्तियों से हमें पुरस्कार मिलता है या मिलने की संभावना होती है उनके प्रति हमारी मनोवृत्ति सकारात्मक होती है। दूसरी ओर, वैसे व्यक्ति या कार्य जिनसे हमें नुकसान का डर होता है उनके प्रति हमारी मनोवृत्ति सकारात्मक नहीं बल्कि नकारात्मक बन जाती है। अत: यहां मनोवृत्ति का मुख्य कार्य यह है कि वह पुरस्कार पाने या दण्ड से बचने के एक साधन के रूप में काम करती है।

ज्ञान कार्य (Knowledge Question)

मनोवृत्ति का ज्ञान से संबंधित कार्य भी महत्वपूर्ण है। हममें से प्रत्येक को अर्थपूर्ण, स्पष्ट तथा सार्थक ज्ञान की आवश्यकता होती है ताकि हम व्यावहारिक जीवन में समाज तथा देश-दुनिया के बारे में एक बेहतर समझ बना सके तथा उनसे सामंजस्य भी
स्थापित कर सके। हमारी इस आवश्यकता को पूरा करने में मनोवृत्ति भी काफी महत्वपूर्ण भूमिका | निभाती है। अगर मनोवृत्ति अनुकूल हो तो ऐसी स्थिति में गान में वृद्धि होने की गुंजाइश रहती है जबकितिकूल होने पर ज्ञानवर्धन की गुंजाइश नहीं रहती। किसी वस्तु, व्यक्ति या घटना के प्रति नोवृात रखने से व्यक्ति के अनुभवों में वृद्धि होती है क्योंकि उसमें जानने की प्रवृत्ति विकसित होती है।

अह रक्षात्मक कार्य (Ego-Defensive Function)

मनोवृत्ति का एक महत्वपूर्ण कार्य है। चिन्ता, निराशा तथा द्वन्द्व से व्यक्ति की रक्षा करना। अपने अहं रक्षा के लिए व्यक्ति कई बार अपनी वर्तमान मनोवृत्ति को बदल लेता है अर्थात् नई मनोवृत्ति विकसित कर लेता है और स्वयं के बारे में सत्य सुनने या जानने की उसमें क्षमता आ जाती है। वह जीवन के कटू सत्यों को भी आसानी से स्वीकार कर लेता है। इसे युक्त्याभास (Rationalization) भी कहते हैं।

मूल्य अभिव्यंजक कार्य (Value Expressive Function)

मनोवृत्ति का एक महत्वपूर्ण कार्य यह भी है कि व्यक्ति इसके माध्यम से स्वयं को बेहतर तरीके से समझ पाता है। दूसरे शब्दों में, मनोवृत्ति का कार्य यह भी है कि व्यक्ति अपने व्यक्तिगत मूल्य के अनुकूल अपनी मनोवृत्ति में बदलाव लाता है। तो उसे संतुष्टि मिलती है। अर्थात् मनोवृत्ति व्यक्ति को अपने मूल्य के अनुकूल व्यवहार करने को प्रेरित | करती है और व्यक्ति स्वयं को दूसरों के समक्ष मूल्यों में अपनी व्यक्तिगत आस्था को बेहतर ढंग से । अभिव्यजित कर पाता है।

सामाजिक पहचान कार्य (Social Identity Function)

सामाजिक पहचान कार्य का अर्थ यह है कि मनोवृत्ति के माध्यम से व्यक्ति को सामाजिक तौर पर एक पहचान भी मिलती है। यहां किसी व्यक्ति की मनोवृत्ति उसके बारे में दूसरों को सूचना संप्रेषित करने का कार्य करती है। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति अगर गणतंत्र दिवस के अवसर पर भारत का तिरंगा झंडा खरीदता है तो यह संभव है। कि उसने समाज में अपनी पहचान बनाने के उद्देश्य से ऐसा किया हो।

मनोवृत्ति (अभिवृत्ति) एवं व्यवहार में संबंध (Influence of Attitude on Behaviour)

अभिवृत्ति (मनोवृत्ति) व्यवहार को काफी हद तक प्रभावित करती है। हालांकि मनोवृत्ति एवं व्यवहार का संबंध थोड़ा जटिल अवश्य प्रतीत होता है और कई बार व्यवहार के आधार पर मनोवृत्ति के बारे में जानना कठिन होता है, परन्तु सत्य यही है कि हमारी मनोवृत्ति हमारे व्यवहार को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करती है।

अलपोर्ट ने भी मनोवृत्ति को परिभाषित करते हुए कहा है कि यह विशिष्ट वस्तुओं के प्रति विशेष रूपों से व्यवहार करने की प्रवत्ति है। मनोवृत्ति न केवल व्यवहार की दिशा निर्धारित करती है बल्कि व्यवहार करने की शक्ति भी प्रदान करती है।

अत्याधुनिक शोधों से पता चला है कि व्यवहार पर मनोवृत्तियों के प्रभाव से व्यवहार में बदलाव के लिए कुछ खास कारक उत्तरदायी होते हैं। जोकि निम्नलिखित हैं:

वास्तविक बनाम अभिव्यक्त मनोवृत्ति (अभिवृत्ति) (True Versus Expressed Attitudes)

  • वास्तविक और अभिव्यक्त मनोवृत्ति हमेशा एक जैसे नहीं होते, अर्थात् ऐसा भी होता है कि व्यक्ति की वास्तविक मनोवृत्ति कुछ और होती है, परन्तु उसके क्रिया या व्यवहार से उसकी वह मनोवृत्ति नहीं बल्कि कुछ और ही मनोवृत्ति झलकती है।
  • व्यावहारिक जीवन में भी हम पाते है वि किसी विषय पर या संवेदनशील परिस्थितियों में हम सोचते तो कुछ और हैं, परन्तु हमारी प्रतिक्रिया कुछ और होती है जो हमारी वास्तविक मनोवृत्ति का प्रतिनिधित्व नहीं करती।
  • ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारी दोनों मनोवृत्तियां अलग-अलग कारणों से प्रभावित होती है जिसके कारण हमारी अधि मनोवृत्ति तथा वास्तविक मनोवृत्ति में अंतर आ जाता है।

मनोवृत्ति विशेष बनाम सामान्य मनोवृत्ति (अभिवृत्ति) (One Instance Versus Aggregate)

  • किसी व्यक्ति के एक कार्य अथवा किसी एक वक्तव्य के आधार पर हम उस व्यक्ति की औसत मनोवृत्ति का मापन नहीं कर सकते हैं।
  • कई शोधों में यह पाया गया है कि अगर हम किसी व्यक्ति की धर्म संबंधी सामान्य मनोवृत्ति को समझकर निश्चित रूप से यह अनुमान नहीं लगा सकते कि वह अमूक दिन धर्म संबंधी अमूक काम करेगा ही।
  • उसकी धर्म संबंधी औसत मनोवृत्ति और उसके कार्य-व्यवहार के बीच कई ऐसे कारक आ जाते हैं जिसके कारण यह भी हो सकता है कि वह अपनी मनोवृत्ति को क्रियात्मक रूप न दे पाए।
  • ऐसा भी हो सकता है कि एक व्यक्ति धर्मपरायण तो है, परन्तु वह मौसम, मन:स्थिति अथवा समयाभाव के कारण रोज पूजा-अर्चना करने मंदिर न जा पाए।

मनोवृत्ति (अभिवृत्ति) व्यवहार-विशिष्टता का स्तर (Level of Attitude Behaviour Specificity)

  • मनोवृत्ति के आधार पर व्यवहार के बारे में पूर्वानुमान तभी लगाया जा सकता है। जब किसी विशिष्ट वस्तु या स्थिति के संबंध में मनोवृत्ति तथा व्यवहार के बीच संगति हो।
  • एक व्यक्ति मेक्सिकन व्यंजन खाना पसंद करता है या नहीं तथा वही व्यक्ति बाहर जाकर भोजन करना पसंद करता है या नहीं – ये दोनों बातें विशेष तथा सामान्य व्यवहार को परिलक्षित करते हैं और यह उस व्यक्ति की मनोवृत्ति से ही निर्देशित होता है।
  • मनोवृत्ति वस्तु जितना विशेषीकृत होता जाएगा मनोवृत्ति एवं व्यवहार के बीच का संबंध उतना ही स्पष्ट होता जाएगा।

स्वजागरूकता (Self Awareness)

  • किसी व्यक्ति के व्यवहार पर इस बात का भी फर्क पड़ता है कि वह स्वयं अपनी मनोवृति के प्रति कितना जागरूक है।
  • इसका एक अर्थ यह भी हुआ कि एक व्यक्ति अपनी मनोवृत्ति के प्रति जितना कम भिज्ञ (सजग) होगा, उसकी मनोवृत्ति उसके व्यवहार में उतना ही स्पष्ट रूप से परिलक्षित होगी।

मनोवृत्ति (अभिवृत्ति) तीव्रता (Attitude Strength)

  • चूंकि मनोवृत्ति व्यवहार करने की तत्परता है, अत: मनोवृत्ति जितनी ही अधिक तीव्र अथवा प्रबल होगी व्यवहार में भी वह उतना ही स्पष्ट रूप से उभर कर आएगी।
  • मनोवृत्ति चाहे सकारात्मक हो या नकारात्मक उसकी अपनी तीव्रता होती है, क्योंकि मनोवृत्ति के निर्माण में कई प्रकार के अनुभवों की भूमिका होती है।
  • अत: मनोवृत्ति अगर तीव्र और प्रबल (Intense) है तो वह निश्चित रूप से व्यवहार को प्रभावित करेगी।

मनोवृत्ति (अभिवृत्ति) अभिगम्यता (Attitude Accessibility)

  • मनोवृत्ति प्राय: अवचेतन मन में निर्मित होती है। यह हमारे पूर्व अनुभवों एवं घटनाओं के कारण भी निर्मित होती है जो अचानक हमारे व्यवहार में परिलक्षित हो जाती है।
  • मनोवृत्ति हमारे व्यवहार को इस रूप में भी प्रभावित करती है कि कितनी तेजी और सहजता से हमारे अंत:स्थल में स्थित मनोवृत्ति को हम कार्य-व्यवहार रूप दे पाते हैं।
  • अर्थात्, जितनी सहजता से हम अपनी मनोवृत्ति को तलाश पाएंगे हमारा व्यवहार उतना ही स्वाभाविक व अबाधित होगा।

सामाजिक प्रभाव (Social Influence)

व्यक्ति का यह अधिकार है कि वह अपने समूह से अपनी सुरक्षा तथा अपने निर्वाह आदि आवश्यकताओं की पूर्ति की मांग करे। इसके साथ-साथ उसका यह कर्तव्य है कि वह अपने समूह के व्यवहार प्रतिमानों, विश्वासों तथा मानदंडों के अनुकूल व्यवहार करे।

ऐसे में समाज मनोविज्ञान की विषय वस्तु इस बात पर भी केन्द्रित है कि वे कौन से बाह्य कारक हैं जो एक व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करते हैं।

पुन: ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया कार्य-व्यवहार स्वयं व्यक्ति को अपना निजी एवं स्वाभाविक व्यवहार है या उसका यह व्यवहार उस पूरे समूह का प्रतिनिधित्व करता है जिसका वह सदस्य है। इस संबंध में कई विद्वानों ने इस बात पर मंथन किया है कि एक व्यक्ति सामाजिक प्रभावों के प्रति किस प्रकार अनुक्रिया करता है?

प्रोफेसर हरबर्ट केलमेन जो कि समाज मनोविज्ञान के एक प्रतिष्ठित विद्वान हैं, के अनुसार, एक व्यक्ति सामाजिक या समूह प्रभाव के अन्तर्गत तीन प्रकार से अनुक्रिया करता है

  1. पालन (Compliance)
  2. आन्तरीकरण (Internalization)
  3. आत्मीकरण (Identification)

पालन (Compliance)

सामाजिक प्रभाव का एक प्रकार है जिसके अंतर्गत एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से प्रत्यक्ष रूप से अनुरोध करता है। पालन शब्द से यह प्रतीत होता है कि दोनों व्यक्तियों में एक प्रकार की सहमति है परन्तु यह भी हो सकता है कि पालन करने वाला व्यक्ति अनुरोध करने वाले व्यक्ति की बातों से पूर्ण रूप से सहमत ही हो।

उदाहरण

दो लोगों के बीच बातचीत के क्रम में एक व्यक्ति नस्लभेदी टिप्पणी करता है और दूसरा व्यक्ति आहत महसूस करने के बाद भी मान रहता है तो इससे यह प्रतीत हो सकता है कि दूसरा व्यक्ति टिप्पणी करने वाले व्यक्ति से सहमत है अथात यह ‘पालन’ जैसा ही प्रतीत हो सकता है जबकि ऐसा भी हो सकता है पहला व्यक्ति सिर्फ दिखाने के लिए सहमति बनाए रखने हेतु मौन हो।

आत्मीकरण (Identification)

  • आत्मीकरण का अर्थ यह है कि हम जिस व्यक्ति की प्रशंसा करते हैं या फिर उसे काफी नजदीक से जानते हैं, हम उसके विचार तथा व्यवहार का अनुकरण करने लगते हैं, जिस कारण हमारे विचार तथा व्यवहार प्रभावित होते हैं।

उदाहरण

अगर एक व्यक्ति किसी फैशन विशेषज्ञ या सुपरमॉडल के पहनावे की नकल करता है तो इसका अर्थ यह है कि उसके विचार व व्यवहार उस सुपरमॉडल से प्रभावित है और वह उस मॉडल का अनुकरण कर रहा है।

आन्तरीकरण (Internalization)

  • इसके के अंतर्गत वह दूसरों के विश्वासों व मान्यताओं को अपना लेता है।

उदाहरण

आपस में बातचीत कर रहे दो व्यक्तियों में अगर दोनों ही नस्लभेदी टिप्पणी कर रहे हों तो इसका अर्थ यह हुआ कि दोनों व्यक्ति एक ही प्रकार की सोच वाले हैं तथा उनकी मान्यताएं व विश्वास एक ही है अर्थात् आन्तरीकरण (Internalization) में दो व्यक्तियों में पूर्ण सहमति होती है जबकि पालन (Compliance) में आपसी सहमति तथा एक जैसे विश्वासों का अभाव होता है।

समूह प्रभावों के कुछ अन्य संदर्भ

व्यक्ति पर पड़ने वाले समूह प्रभावों को कुछ अन्य संदर्भो में भी समझा जा सकता है। एक औसत व्यक्ति का व्यवहार कुछ अन्य सामाजिक कारकों पर भी निर्भर करता है। इन कारकों के अन्तर्गत व्यक्ति का परिवार, पारिवारिक मान्यताएं व विश्वास तथा परिवार की संरचना मुख्य रूप से भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा व्यक्तित्व का विकास, उसकी उम्र तथा व्यक्ति के अपने मित्रगण आदि के व्यवहार का भी प्रभाव एक व्यक्ति के व्यवहार को काफी हद तक प्रभावित करता है।

सामाजिक प्रभाव के स्वरूप व प्रकार (Types of Social Influence)

बुशमैन ने व्यक्ति के व्यवहार पर पड़ने वाले सामाजिक प्रभावों को मुख्य रूप से दो वर्गों में बांटा है:

  1. नियामक/आदी प्रभाव (Normative Influence)
  2. सूचनात्मक प्रभाव (Informational Influence)

नियामक/आदशी प्रभाव (Normative Influence)

नियामक प्रभाव एक प्रकार का सामाजिक दबाव है जो समाज के प्रत्येक सदस्य के व्यवहार को किसी न किसी रूप में प्रभावित करता है। किसी समूह का प्रत्येक सदस्य यह जानता है कि यदि वह अपने समूह के प्रतिमान (Norm) के अनुकूल व्यवहार नहीं करेगा तो उसे सामूहिक तिरस्कार मिल सकता है, उसे भौतिक अथवा मौलिक दण्ड भी दिया जा सकता है।

ऐश का क्लासिक अध्ययन (1955) (Asch’s Classic Study)

  • इस प्रयोग में उसने एक प्रयोगात्मक समूह तैयार किया तथा इसमें शामिल सदस्यों के सामने सरल रेखाओं की एक श्रृंखला प्रत्यक्षीकरण हेतु प्रस्तुत की।
  • इन रेखाओं, एक रेखा मानक रेखा (Standard line) तथा अन्य A, B तथा C भिन्न लंबाई की रेखाएं थी। सदस्यों को इन तीन रेखाओं A, B तथा C में कौन मानक रेखा के बराबर है, यह निर्णय करन था।
  • प्रयोगात्मक समूह के सदस्यों में से बहुमत ने गलत निर्णय दिया, परन्तु अधिकांश लोगों ने इस गलत निर्णय को ही सही मानकर उनके अनुरूप अपना उत्तर दिया। इससे समूह दबाव के कारण व्यक्ति के निर्णय में अनुरूपता की धारणा प्रमाणित हुई।

सूचनात्मक प्रभाव (Informational Influence)

  • व्यक्ति दो प्रकार से सूचना प्राप्त करता है- एक तो अपने व्यक्तिगत अनुभव से और दूसरा, अपने समूह के दूसरे सदस्यों से। दूसरों के माध्यम से प्राप्त सूचना को सामाजिक सूचना कहते हैं।
  • यहां व्यक्ति दूसरों पर भरोसा या विश्वास रखता है और अपने व्यवहार एवं विचार का मूल्यांकन करते समय वह सामाजिक सूचना के अनुकूल दबाव महसूस करता है, क्योंकि उसे लगता है कि समूह उसकी अपेक्षा ज्यादा समझ रखता है।
  • खासकर ऐसा तब होता है जब कोई विकट परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है जहां व्यक्ति यह नहीं समझ पाता कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं।
  • इसे ही सूचनात्मक दबाव कहते हैं जो अनुपालन का कारण बनता है।

सूचनात्मक प्रभाव खासकर दो परिस्थितियों में किसी व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करती है-

  1. परिस्थिति की अस्पष्टता/संदिग्धता (Ambiguous Situation): यह वह परिस्थिति है जिसमें व्यक्ति यह नहीं समझ पाता कि क्या किया जाए।
  2. संकट की स्थिति में (Crisis Situation): यह वह स्थिति है जब व्यक्ति के पास इतना भी समय नहीं होता कि वह यह सोच सके कि क्या करे।

इन्हीं परिस्थितियों में व्यक्ति समूह के व्यवहार का अनुपालन करता है क्योंकि वह यह सोचता है कि जो समूह का निर्णय है, वही सही है क्योंकि उनकी समझ बेहतर है।

सामाजिक प्रभाव के सिद्धान्त (Principles of Social Influence)

आधुनिक परिप्रेक्ष्य में समाचार-पत्र, रेडियो, सिनेमा, दूरदर्शन आदि प्रचार माध्यमों द्वारा व्यवहार परिवर्तन का कार्य आम हो चुका है। अत: अगर इन सब सामाजिक कारकों के प्रभावों से खुद को बचाना हो तो इनकी कार्यप्रणाली तथा उस संदर्भ को समझना जरूरी है जिसके कारण व्यक्ति आसानी से इनका शिकार हो जाता है।

सामाजिक प्रभावों की भूमिका को समझने के लिए इनसे जुड़े सिद्धान्तों को जानना आवश्यक है। जो मुख्य रूप से छह हैं:

पारस्परिकता (Reciprocity)

  • पारस्परिकता व्यक्ति की मौलिक प्रवृत्तियों तथा सामाजिक मांगों के बीच पारस्परिक प्रतिक्रिया और लेन-देन होता है।
  • इसके अन्तर्गत  द्विगामी प्रक्रिया (two-way process) चलती है जिसमें एक और व्यक्ति समाज से प्रभावित होता है और दूसरी ओर समाज उस व्यक्ति से प्रभावित होता है।
  • जैसे अगर आप मुस्कुरा कर लोगों से मिलते हैं तो देखिए कि कितने लोग मुस्कराते हुए आपकी मुस्कराहट का जवाब देते हैं?

निरन्तरता (Consistency)

  • निरन्तरता का सिद्धान्त इस बात पर आधारित है कि ज्यादातर लोगों का व्यवहार उनके द्वारा पूर्व में किए गए कार्य-व्यवहार से साम्य रखता है।
  • वे वहीं प्रक्रिया, प्रणाली या परम्परा का निर्वाह करते हैं जिसे वे पूर्व में भी अपनाते रहे हैं।

सामाजिक प्रमाण (Social Proof)

  • इस सिद्धान्त के अन्तर्गत इस तथ्य पर बल दिया गया है कि लोग अधिकांश वहीं कार्य करते हैं अथवा वही निर्णय लेते हैं जो समाज अथवा उनके समूह द्वारा अपनाया जाता है।
  • दूसरे शब्दों में, व्यक्ति ज्यादातर उदाहरणों में समाज का ही अनुपालन करता है और खासकर यह तब अवश्य होता है जब परिस्थिति विकट या फिर अस्पष्ट हो और व्यक्ति यह न समझे पाए कि उसे अमूक परिस्थिति में क्या करना चाहिए।

रुचि (Liking)

  • रुचि अथवा पसंद से संबंधित सिद्धान्त इस तथ्य पर बल देता है कि एक व्यक्ति अपनी रुचि व पसंद की वस्तु से आसानीपूर्वक और जल्द ही प्रभावित होता है।
  • किसी व्यक्ति से के प्रति हमारी रुचि के कई कारण हो सकते हैं, जैसे शारीरिक आकर्षण, वैचारिक समता, आपसी संबध अथवा व्यक्ति विशेष का प्रशंसित व्यक्तित्व आदि।

प्राधिकार (Authority)

  • प्राधिकार से अभिप्राय यहां प्रभावशीलता है।
  • परिवार में होने पर व्यक्ति अपने माता-पिता के प्राधिकार के अन्तर्गत रहता है खासकर वयस्क होने से पह या संस्था से जुड़े होने पर अपने बॉस के अधीन।

अभाव (Scarcity)

  • इस सिद्धान्त के अन्तर्गत हम उन वस्तुओं या अवसरॉं को पाने की कौशिश करते है जिनको पाना आसान नहीं होता या फिर जिनका हमारे पास अभाव होता है|

प्रशासन और जनता के बीच सामंजस्य (Reconciliation of Public and Administration)

यहां यक्ष प्रश्न यह है कि क्या इन दो भिन्न-भिन्न विचारों में सामंजस्य स्थापित करना संभव है? क्या प्रशापन (नौकरशाही) तथा जनसाधारण के बीच विश्वास को स्थापित कर पाना संभव है?

इस संदर्भ में सी.पी. भाम्बरी के सुझावों पर गौर करना काफी फायदेमंद साबित हो सकता है।

प्रो. भाम्बरी का यह कथन है कि आम जनता तथा नौकरशाही के बीच विश्वास की कड़ी को मजबूत करने के लिए अब तक जो प्रयास किए गए हैं वो नाकाफी है। प्रशासन और जनता के बीच एक बहुत बड़ा अन्तराल है जिसे समाप्त करने की आवश्यकता है। यह तभी हो सकता है जब इन दोनों के बीच एक सम्पर्क सूत्र का निर्माण किया जाए। इस सम्पर्क सूत्र के सहारे ही दोनों के बीच आपसी विश्वास का संबंध बन पाएगा।

सम्पर्क सूत्र का निर्माण

इसके लिए प्रयास की जरूरत है। यह प्रयास इस रूप में हो कि लोक सेवक अपने दायित्व को समझे तथा यह जानने की कोशिश करें कि जनता उनके कार्य-कलापों के बारे में कैसी सोच रखती है, प्रशासकीय नीतियों के प्रति उनकी क्या मनोवृत्ति है तथा जनसाधारण उनसे क्या उम्मीदें रखते हैं।

लोक संबंध एजेन्सी

अगर ऐसा किया जाता है तो दोनों के बीच का सौहार्द्र बढेगा। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रशासन के अन्तर्गत एक एजेन्सी के गठन की जरूरत है जो लोक संबंध (Public Relation) के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित है। इस एजेंसी के माध्यम से ही प्रशासन (नौकरशाही) को नागरिकों की इच्छाओं तथा आकांक्षाओं के बारे में जानकारी मिलती रहेगी।

एजेंसी जनता के लिए एक शिक्षक (Tutor) का काम कर सकती है, उन्हें सलाह दे सकती है, उनकी मनोवृत्ति में बदलाव ला सकती है तथा उनके कार्य व्यवहार को भी एक दिशा में सकती है। इससे नागरिकों तथा कर्मचारियों के बीच एक संतोषजनक रिश्ता कायम हो सकता है।

वस्तुत: यह एजेंसी इन दोनों के बीच एक सेतु का कार्य कर सकती है तथा जनसाधारण तक इस बात का प्रेषित कर सकती है कि प्रशासन (नौकरशाही) किस प्रकार उनके विकास में सहायक है।

भारतीय संविधान में एक समतावादी समाज की स्थापना का लक्ष्य रखा गया है। परन्तु इसको पाना सिर्फ प्रशासन (नौकरशाही) के वश की बात नहीं है। इसके लिए आम नागरिको का भी आगे आना होगा।

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