ENSO एवं वाकर परिसंचरण : एल नीनो एवं ला नीना के साथ इनकी सम्बद्धता

प्रश्न: एल नीनो और ला नीना परिघटना की व्याख्या कीजिए। वे विश्व के विभिन्न हिस्सों में मौसम प्रणाली को कैसे प्रभावित करते हैं?

दृष्टिकोण

  • ENSO एवं वाकर परिसंचरण तथा एल नीनो एवं ला नीना के साथ इनकी सम्बद्धता की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए।
  • एल नीनो परिघटना और विश्व के विभिन्न हिस्सों में मौसम प्रणालियों पर इसके प्रभावों की व्याख्या कीजिए।
  • इसी प्रकार, ला नीना का संक्षिप्त विवरण दीजिए तथा वैश्विक मौसम प्रणाली पर इसके प्रभावों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर

एल नीनो और ला नीना, एल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) चक्र के परस्पर विपरीत चरण हैं। ENSO चक्र महासागर की सतह के तापमान में परिवर्तन और पूर्वी-मध्य भूमध्य रेखीय प्रशांत महासागर में वायुमंडलीय दाब में परिवर्तन का वर्णन करता है। ये चरण वाकर परिसंचरण में परिवर्तन से संबंधित हैं, जो उष्ण महासागरीय क्षेत्र से वायु के आरोहण और ठंडे महासागरीय क्षेत्रों में अवरोहण की प्रक्रिया सहित उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के ऊपरी वायुमण्डल में पूर्व-पश्चिम परिसंचरण को संदर्भित करता है।

एल नीनो: पेरू तट पर ठंडी पेरुवियन धारा को प्रतिस्थापित करते हुए एक उष्ण महासागरीय धारा का निर्माण होता है, जिस कारण समुद्री सतह के तापमान में वृद्धि हो जाती है, परिणामस्वरूप व्यापारिक पवन एवं वाकर परिसंचरण कमजोर हो जाता है और एल नीनो की उत्पति होती है। प्राय: यह मध्य और पूर्वी-मध्य विषुवतरेखीय प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में क्रिसमस के आसपास प्रत्येक 3-5 वर्षों पर घटित होती है।

एल नीनो का वैश्विक मौसम पर प्रभाव:

  •  वर्षा की मात्रा में वृद्धि: चीन, पेरू, चिली, इक्वाडोर, उत्तरी अर्जेंटीना, भूमध्यरेखीय पूर्वी अफ्रीका, दक्षिणी संयुक्त राज्य अमेरिका आदि में एल नीनो वर्षों के दौरान भारी वर्षा होती है।
  • वर्षा की मात्रा में कमी: एल नीनो के कारण भारतीय उपमहाद्वीप (प्राय: भारतीय मानसून और एल नीनो के मध्य विपरीत संबंध होता है), इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिणी अफ्रीका, सऊदी अरब आदि में वर्षा की मात्रा में कमी और शुष्क परिस्थितियों का निर्माण हो जाता है।
  • एल नीनो परिघटना पूर्वी प्रशांत महासागर में अधिक उष्णकटिबंधीय तूफानों और हरिकेनों (चक्रवातों) का निर्माण करती  है।

ला नीना: यह मजबूत, पूर्व की ओर प्रवाहित होने वाली व्यापारिक पवनों और महासागरीय धाराओं के कारण ठंडे जल के उत्प्रवाह (अपवेलिंग) के माध्यम से सतह पर आने के कारण मध्य एवं पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के औसत समुद्री सतह के तापमान से और अधिक ठंडा होने से संबंधित है। ला नीना के दौरान वाकर परिसंचरण मजबूत हो जाता है और इसकी स्पष्ट आरोही और अवरोही शाखाएं स्थापित हो जाती हैं।

ला नीना का वैश्विक मौसम पर प्रभाव: 

  • वर्षा की मात्रा में वृद्धि: ला नीना के कारण भारतीय उपमहाद्वीप (विशेष रूप से भारत और बांग्लादेश), दक्षिणी अफ्रीकी क्षेत्र, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया, सऊदी अरब, उत्तर-पश्चिमी प्रशांत महासागर और पश्चिमी कनाडा इत्यादि क्षेत्रों में वर्षा की मात्रा में वृद्धि हो जाती है।
  • वर्षा की मात्रा में कमी: ला नीना के कारण, भूमध्यरेखीय पूर्वी अफ्रीका, चीन, दक्षिणी संयुक्त राज्य अमेरिका, अर्जेंटीना, पेरू, चिली इत्यादि क्षेत्रों में कम वर्षा होती है।
  • ला नीना चक्र के कारण अटलांटिक और कैरेबियन सागर में अधिक हरिकेनों (चक्रवातों) की उत्पत्ति होती है। इस प्रकार, वायुमंडलीय परिसंचरण यह दर्शाता है, कि एक स्थान पर परिवर्तन विश्व के अन्य हिस्सों में मौसम को प्रभावित करता है।

Read More

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *