आपदा : संकट और सुभेद्यता के मध्य संबंध

प्रश्न: आपदा वस्तुतः संकट (hazard) एवं सुभेद्यता का संयुक्त प्रभाव है। उपयुक्त उदाहरणों के साथ सविस्तार वर्णन कीजिए।

दृष्टिकोण:

  • आपदा, संकट एवं सुभेद्यता को परिभाषित करते हुए उत्तर प्रारम्भ कीजिए।
  • आपदा के लिए संयुक्त रूप से उत्तरदायी संकट और सुभेद्यता के मध्य संबंध को स्पष्ट कीजिए।
  • इसके लिए उपयुक्त उदाहरण दीजिए। आगे की राह सुझाते हुए निष्कर्ष प्रस्तुत कीजिए।

उत्तरः

आपदा (disaster) किसी समुदाय या समाज के दिन-प्रतिदिन के कार्यसंचालन में उत्पन्न एक गंभीर व्यवधान होता है, जिसके कारण व्यापक पैमाने पर मानवीय, भौतिक, आर्थिक और पर्यावरणीय क्षति होती है। यह क्षति उस समुदाय/समाज द्वारा अपने संसाधनों का उपयोग करते हुए इसका सामना करने की क्षमता की तुलना में कहीं अधिक होती है। संकट (Hazard) मुख्यतया मानवीय क्षति, संपत्ति की हानि, पर्यावरणीय क्षति या इनके संयोजन के संदर्भ में हानि उत्पन्न करने की संभाव्य स्थिति को दर्शाता है। यह प्राकृतिक जैसे- चक्रवात, भूकंप आदि अथवा मानव जनित जैसे- विस्फोट, प्रदूषण इत्यादि के रूप में हो सकता है।

संकट के प्रभाव के प्रति किसी समुदाय की संवेदनशीलता सुभेद्यता कहलाती है। यह उनकी भौगोलिक निकटता, आर्थिक स्थितियों, अवसंरचना या सामाजिक स्थिति के कारण हो सकती है। संकट और सुभेद्यता किसी स्थान पर होने वाली अपेक्षित क्षति को निर्धारित करते हैं, इसे जोखिम के रूप में संदर्भित किया जाता है।

चक्रवात, भूस्खलन या बाढ़ जैसी संकटपूर्ण घटनाएं केवल एक प्रेरक बिंदु (trigger point) के रूप में कार्य करती हैं और उच्च तीव्रता वाली होने के बावजूद भी इनके परिणाम सदैव विनाशकारी नहीं होते हैं। यद्यपि, जब ये संकटपूर्ण घटनाएं सुभेद्य और इनके नकारात्मक प्रभाव को कम करने में अक्षम लोगों द्वारा आवासित क्षेत्रों (बीमार या वृद्ध लोगों वाले, सीमित जागरुकता वाले, संसाधनों की पहुंच के अभाव वाले क्षेत्र आदि) में घटित होती हैं, तब इनके कारण व्यापक पैमाने पर क्षति होती है। इस प्रकार ‘आपदा’ संकट और सुभेद्यता के संयुक्त होने से उत्पन्न प्रभाव है, इन्हें संकट से संबंधित संभावित जोखिम को कम करने की अपर्याप्त क्षमता के रूप में भी संदर्भित किया जा सकता है।

संकट और सुभेद्यता के मध्य संबंध को स्पष्ट करने वाले उदाहरण

  • भूकंप: यह संभव है कि एक उच्च तीव्रता वाला भूकंप किसी निर्जन मरुस्थल (uninhabited desert) में विनाशकारी परिणाम उत्पन्न न करे। इसे तब ही आपदा की श्रेणी में रखा जाएगा जब इससे जीवन, संपत्ति और संसाधनों की क्षति हो।
  • बाढ़: संभव है कि नियोजित विकास और पर्याप्त क्षमता वाले क्षेत्रों में जल स्तर में अकस्मात हुई वृद्धि अत्यधिक क्षति का कारण न बने। किन्तु बाढ़ की स्थिति में सुभेद्य वर्ग जैसे बच्चे, वृद्धजन और दिव्यांगजन स्वयं की रक्षा करने में असमर्थ हो सकते हैं, जिससे क्षति होती है और परिणामस्वरूप यह आपदा में परिवर्तित हो जाती है।

समुदायों में प्रत्यास्थता (Resilience) का निर्माण संकट/आपदाओं से संबंधित जोखिमों को कम करने में सहायक सिद्ध हो सकता है। इस प्रकार संकट को पूर्णतः समाप्त करना संभव नहीं है, किन्तु उचित नीतिगत ढांचे और नियोजित विकास पद्धतियों को अपनाने से उनके प्रभावों को कम किया जा सकता है। साथ ही अग्र-सक्रिय आपदा प्रतिक्रिया उपायों को विकसित करने हेतु राज्य को तकनीकी हस्तक्षेप में पर्याप्त निवेश करना चाहिए।

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