आपदा जोखिम न्यूनीकरण में प्रौद्योगिकी की भूमिका : आपदा प्रभावित क्षेत्रों में तकनीकी समाधानों के अनुप्रयोग में आने वाली चुनौतियां

प्रश्न: आपदा प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाने हेतु प्रौद्योगिकी ने महत्वपूर्ण साधन प्रदान किए हैं। आपदा जोखिम न्यूनीकरण में प्रौद्योगिकी की भूमिका पर विशेष ध्यान केंद्रित करते हुए सविस्तार वर्णन कीजिए। साथ ही, आपदा प्रभावित क्षेत्रों में तकनीकी समाधानों के अनुप्रयोग में आने वाली चुनौतियों पर भी प्रकाश डालिए।

दृष्टिकोण

  • आपदाओं के दौरान, विशेष रूप से आपदा जोखिम न्यूनीकरण में, प्रौद्योगिकी के महत्त्व को बताते हुए अपना उत्तर आरंभ कीजिए।
  • उन निरंतर विद्यमान चुनौतियों का उल्लेख कीजिए जो तकनीकी समाधानों के अनुप्रयोग में प्रमुख अवरोधक बनी हुई हैं।
  • आगे की राह का उल्लेख करते हुए उत्तर का समापन कीजिए।

उत्तर

आपदा जोखिम प्रबंधन हेतु प्रौद्योगिकी का प्रयोग एक अत्यंत उपयोगी कारक के रूप में स्थापित हुआ है तथा सुविज्ञ निर्णयन(informed decision making) हेतु उपयुक्त संचार, मानचित्र, आकंड़ा विश्लेषण आदि अनिवार्य आवश्यकता बनते जा रहे हैं। इसे ह्योगो (Hyogo) फ्रेमवर्क दिशा-निर्देशों में भी स्वीकृति प्रदान की गयी है।

आपदा जोखिम न्यूनीकरण में प्रौद्योगिकी का योगदान

  • सैटेलाइट एवं रिमोट सेंसिंग: यह तकनीक आपदा प्रबंधन के सभी चरणों यथा पूर्व-तैयारी, पूर्व-चेतावनी, अनुक्रिया, राहत, पुनर्वास, पुन:प्राप्ति और न्यूनीकरण को शामिल करते हुए सूचना की आवश्यकता को सम्बोधित करने में सहायता प्रदान करती है। यह प्राकृतिक जोखिम संबंधी आकलनों को विकास योजना अध्ययनों में समेकित करने हेतु उपयोगी है।
  • भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS): यह वैज्ञानिक प्रबंधन एवं नीति उन्मुख सूचना, दोनों के लिए सुदूर संवेदी आंकड़ों तथा स्थानिक व गैर-स्थानिक आंकड़ों का प्रभावी व कुशल संग्रह करता है।
  • वायरलेस कम्युनिकेशन: इससे वास्तविक समय (real time)में सूचनाओं के तीव्र हस्तांतरण में सहायता मिलती है।
  • हरीकेन, टॉरनेडो, तड़ितझंझा, भारी वर्षा, बाढ़, सूखा, हिमपात, तेज़ हवा और अन्य कठोर मौसमी जोखिमों हेतु पूर्व चेतावनी प्रणाली। इनके द्वारा दिशा-निर्देशों की सूचना प्रदान करने, सेवाएं प्रदान करने और स्थानों को उचित समय पर खाली करने में मदद मिली है जिससे जान-माल की हानि कम की जा सकी है।

आपदा प्रभावित क्षेत्रों में तकनीकी समाधानों के अनुप्रयोगों के समक्ष आने वाली चुनौतियाँ

  • पार-क्षेत्रीय एकीकरण(Cross-sectoral integration) संचार तकनीकों के अनुप्रयोग को लेकर समेकन का अभाव है जो आपदा जोखिम न्यूनीकरण, जलवायु परिवर्तन अनुक्रियाओं और संधारणीय विकास को एक साथ जोड़ सकता है।
  • प्रभावशाली पूर्व चेतावनी प्रणालियों के मूलभूत सिद्धांतों को समझने हेतु प्रोत्साहन का अभाव।
  • स्थानीय नवाचार का पूर्ण उपयोग करने की सीमाएं।
  • प्रभावी संचार हेतु भाषायी अवरोधों को दूर करना।
  • सभी स्तरों पर सभी संस्थानों द्वारा शोध तथा विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के वित्तपोषण हेतु सीमित संसाधन।
  • कुछ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी प्रणालियों की उच्च लागत, जो उनकी उपलब्धता और कुशल अनुप्रयोग में बाधा डालती है।
  • शिक्षा की कमी और निरक्षरता के कारण उपलब्ध विज्ञान एवं तकनीकी उत्पादों का प्रयोग करने में सुभेद्य समुदायों और देशों की सीमित क्षमता।
  • आपदाओं का पूर्वानुमान लगाने की तकनीकी सीमा, क्योंकि सभी प्रकार की आपदाओं का पूर्वानुमान नहीं लगाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, भूकंप अचानक निर्मुक्त होने वाली ऊर्जा है जिसका पता विध्वंस के केवल कुछ ही सेकंड पहले चल सकता है।

आपदा प्रबंधन हेतु विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को और बेहतर बनाने हेतु प्रासंगिक नीतियों तथा संस्थागत ढाँचे की आवश्यकता है। हाल ही में प्रारम्भ की गई राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना के साथ ही इसका शुभारम्भ हो चुका है। इसके अंतर्गत आपदा न्यूनीकरण एवं प्रबंधन में प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग पर विशेष ध्यान दिया गया है।

इसके साथ ही विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के सामर्थ्य तथा इसे अपनाये जाने के सम्बन्ध में सार्वजनिक शिक्षा और जागरूकता को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। यह समय के साथ समाज के सभी भागों को आपदा प्रबंधन हेतु उपलब्ध वैज्ञानिक ज्ञान और तकनीकों तक पहुँच बनाने तथा इसके प्रयोग करने हेतु प्रोत्साहित करेगा।

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