शहरीकरण : सामाजिक एकीकरण और आर्थिक अवसरों की सम्भावनायें

प्रश्न: जहाँ एक ओर, शहरीकरण सामाजिक एकीकरण और आर्थिक अवसर की सम्भावनाएं सृजित कर रहा है, वहीं दूसरी ओर, यह सामाजिक-आर्थिक अवस्थिति पर आधारित अलगाव एवं अपवर्जन को भी बढ़ावा दे रहा है। भारतीय शहरों के संदर्भ में इस विरोधाभास का परीक्षण कीजिए। शहरी क्षेत्रों को वास्तविक रूप से समावेशी बनाने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं?

दृष्टिकोण

  • सामाजिक एकीकरण और आर्थिक अवसरों की सम्भावनाओं को सृजित करने में शहरीकरण की क्षमताओं का वर्णन कीजिए।
  • समझाइए कि शहरीकरण किस प्रकार अलगाव और सामाजिक-आर्थिक अपवर्जन उत्पन्न कर रहा है।
  • शहरी क्षेत्रों को अधिक समावेशी बनाने के लिए उठाए जा सकने वाले कदमों को सुझाइए।

उत्तर

भारत में, पिछले दशक के दौरान, विशेषकर बड़े और मध्यम आकार के शहरों में, शहरीकरण की प्रवृत्ति में व्यापक तीव्रता देखी गयी। यू एन स्टेट ऑफ द वर्ल्ड पॉपूलेशन रिपोर्ट के द्वारा किये गए एक सर्वेक्षण में 2030 तक भारत की लगभग 41% जनसंख्या के शहरी क्षेत्रों में निवास करने की सम्भावना व्यक्त की गयी है। अतः यह समझ विकसित करना आवश्यक है कि शहरों को विकास और समावेशन या अलगाव के संदर्भ में, किस प्रकार तैयार किया गया है।

एकीकरण और समावेशन में शहरीकरण का योगदान:

  • वर्तमान में, भारत के सकल घरेलू उत्पाद में शहरों का 70 प्रतिशत योगदान है, अतः ये आर्थिक विकास के प्रमुख केंद्र हैं।
  • भारत जैसे समाजों के लिए, जहाँ ग्रामीण क्षेत्रों में जाति और पदानुक्रम के स्तर प्रायः व्यक्तिगत प्रगति में बाधा उत्पन्न करते हैं, शहर उत्तरोत्तर गतिशीलता और एकीकरण के अवसर प्रदान करते हैं।
  • शहर पारंपरिक सामाजिक अपवर्जन को समाप्त करने के लिए महिलाओं को आर्थिक अवसर प्रदान करते हैं।
  • शहरों के निवासियों के उपनामों को अधिक महत्व नहीं दिया जाता। यह अनामिता जाति आधारित अपवर्जन के आरोपण को चुनौती देती है।

शहरीकरण के कारण सामाजिक अपवर्जन:

  • भारतीय शहरों की अव्यवस्थित वृद्धि के कारण, आर्थिक रूप से हाशिये पर स्थित और सामाजिक रूप से अपवर्जित वर्ग मलिन बस्तियों में संकेंद्रित हो गये हैं, जहां बुनियादी सेवाओं की आपूर्ति अत्यधिक निम्नस्तरीय है।
  • 2011 की जनगणना के अनुसार, 17% शहरी परिवार मलिन बस्तियों में रहते हैं। यह परिघटना आर्थिक, सामाजिक, शैक्षिक, स्वास्थ्य संबंधी एवं अन्य असमानताओं को अधिक विस्तारित कर रही है।
  • कुछ लोगों के अनुसार, कुछ बड़े और मध्यम आकार के शहरों में विशेषकर मुस्लिम वर्ग के मामले में धर्म के आधार पर आवासीय अलगाव एक बढ़ती हुई प्रवृत्ति है।
  • पहचान के पर्याप्त दस्तावेजों की कमी के कारण प्रवासी श्रमिकों की अधिकांश वित्तीय सेवाओं तक पहुंच नहीं होती। अतः उन्हें अपवर्जन का सामना करना पड़ता है।
  • भारत में शहरी मध्यवर्ग द्वारा स्व-अपवर्जन (स्वयं को अलग कर लेने) से संबंधित तर्क भी दिए गये हैं। उदाहरण के लिए, गेटेड कम्यूनिटी। अतः, यह तर्क दिया गया है कि कई भारतीय शहरों में सामाजिक-आर्थिक आधार पर स्थानिक अलगाव विद्यमान है।

वस्तुतः शहर एक “मेल्टिंग पॉट” और सामाजिक गतिशीलता के अग्रदूत के रूप में विकसित न होकर तेजी से अपने ग्रामीण समकक्षों के समान बनते जा रहे हैं।

शहरी क्षेत्रों को वास्तविक रूप से समावेशी बनाने के लिए आवश्यक उपाय:

  • जनसंख्या के शहरीकरण के साथ समन्वय स्थापित करने के लिए शहरी प्रशासनिक संस्थानों की क्षमता को अधिक विकसित और विस्तारित किया जाना चाहिए।
  • नगर-नियोजन को अग्र-सक्रिय और वास्तविक रूप में विकेन्द्रीकृत होना चाहिए।
  • आधार के सार्वभौमीकरण के माध्यम से प्रवासियों की पहचान की समस्या का समाधान किया जा सकता है।
  • सभी को वहनीय घर उपलब्ध कराने के लिए मलिन बस्तियों के सब्सिडी आधारित पुनर्विकास पर सरकार को प्राथमिक रूप से ध्यान देना चाहिए।
  • सतत विकास और समावेशन के लिए स्वास्थ्य और स्वच्छता पर अधिक ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।

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