सैन्य आधुनिकीकरण : हाल में उठाये गए कदम

नई रक्षा खरीद नीति 2016 (New Defence Procurment Policy)

  •  नई रक्षा खरीद नीति में प्रक्रियाओं के दोहराव को समाप्त कर खरीद में विलंब को कम करने पर बल दिया गया है
  • नई नीति में खरीद हेतु सर्वाधिक अधिमान्य (मोस्ट प्रेफर्ड) श्रेणी के रूप में स्वदेशी रूप से अभिकल्पित, विकसित एवं विनिर्मित (Indigenously Designed Developed and Manufactured: IDMM) नामक एक नई श्रेणी को शामिल किया गया है। “मेक (Make)” श्रेणी के अंतर्गत तीन उप-कार्यप्रणालियां घरेलू स्तर के निजी तथा लघु स्तरीय उद्योगों को बढ़ावा देंगी।
  • अधिग्रहण योजनाओं को मुख्यतः ‘बाइ (Buy)’, ‘बाइ एंड मेक (Buy and Make)’ तथा ‘मेक (Make)’ श्रेणियों में वर्गीकृत | किया गया है। ‘बाइ’ को पुनः ‘बाइ (IDDM)’, ‘बाइ (इंडियन)’ तथा बाइ (ग्लोबल)’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है। ‘बाइ एंड मेक’ का आशय पूर्णतः निर्मित (Fully Formed) अवस्था में उपकरणों की प्रारम्भिक खरीद और बाद के चरणों में प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण (ToT) के माध्यम से स्वदेशी उत्पादन से है। बाइ इंडियन या IDDM में कम से कम 40% स्वदेशी सामग्री शामिल होगी।
  • भारतीय विनिर्माताओं हेतु औद्योगिक लाइसेंस प्रदान करने की व्यवस्था को उदारीकृत किया गया है तथा औद्योगिक लाइसेंस की आवश्यकता वाले रक्षा उत्पादों की सूची में से अधिकांश अवयवों को हटा दिया गया है। यह नए प्रवेशकों (विशेष रूप से लघु एवं मध्यम उद्यमों) हेतु प्रवेश बाधाओं को कम करेगा।
  • भारतीय विक्रेताओं हेतु विनिमय दर परिवर्तन (ERV) से सुरक्षा, ‘बाइ (ग्लोबल)’ मामलों में ऑफसेट दायित्व तथा रक्षा उपकरणों पर उत्पाद/सीमा शुल्क जैसे उपाय भारतीय एवं विदेशी विनिर्माताओं के मध्य तथा सार्वजनिक क्षेत्रक एवं निजी क्षेत्रक के मध्य रक्षा क्षेत्र में प्रवेश के समान अवसर सुनिश्चित करेंगे।

रक्षा उत्पादन पर मसौदा नीति, 2018 (Draft Defence Production Policy, 2018)

हाल ही में, रक्षा मंत्रालय द्वारा रक्षा उत्पादन पर मसौदा नीति, 2018 (DProP, 2018) जारी की गयी।

पृष्ठभूमि

  •  भारत के रक्षा उत्पादन में उत्तरोत्तर वृद्धि देखने को मिली है। यह 2013-14 के 43,746 करोड़ रूपये से बढ़कर 2016-17 में 55,894 करोड़ रूपये हो गया।
  •  हालांकि, स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की रिपोर्ट के अनुसार 2013-17 के मध्य विश्व के हथियार आयात में भारत की 12% की हिस्सेदारी रही है। इस प्रकार यह दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश है।

मुख्य बिंदु

  •  इस नीति का उद्देश्य सार्वजनिक तथा निजी क्षेत्र की सक्रिय भागीदारी के माध्यम से एयरोस्पेस और रक्षा उद्योगों में भारत को विश्व के शीर्ष पांच देशों में सम्मिलित करना है।

उद्देश्य

  • एक ऐसे परिवेश का निर्माण करना, जो ‘मेक इन इंडिया’ पहल के एक महत्वपूर्ण भाग के रूप में एक गतिशील, सुदृढ़ और प्रतिस्पर्धी रक्षा उद्योग को प्रोत्साहित करे।और प्रतिस्पर्धी रक्षा उद्योग को प्रोत्साहित करे।
  • देश में प्रौद्योगिकी के तीव्र समावेशन की सुविधा प्रदान करना और एक श्रेणीबद्ध रक्षा औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना।
  • 2025 तक 13 निर्धारित क्षेत्रों जैसे कि लड़ाकू विमान, मिसाइल प्रणाली, छोटे हथियार, लैंड कॉम्बैट व्हीकल्स आदि के निर्माण में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना।
  • 2025 तक हथियारों की घरेलू बिक्री में वृद्धि कर इसे 1.7 लाख करोड़ रुपये (26 अरब डॉलर) करना तथा रक्षा वस्तुओं
    एवं सेवाओं के निर्यात को 35,000 करोड़ रुपये (5.0 अरब डॉलर) तक पहुँचाना।
  • साइबर स्पेस एवं आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीकों में भारत को वैश्विक स्तर पर अग्रणी देश बनाना।

नीति का उद्देश्य निम्नलिखित उपायों के माध्यम से ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस में सुधार करना है:

  • घरेलू विनिर्माण; मुख्यतः स्टार्टअप्स और MSMEs (सूक्षम, लघु एवं मध्यम उद्यम) का समर्थन करने के लिए कर
    प्रणाली को तर्कसंगत बनाना और लाइसेंसिंग प्रक्रिया का उदारीकरण करना।
  • MSMEs समेत निजी रक्षा उद्योगों की विभिन्न तकनीकों को अपनाने की मूल क्षमता/दक्षता के आकलन हेतु कॉम्पिटेंसी
    मैपिंग (Competency Mapping) प्रारम्भ करना।
  • हमारी सेनाओं द्वारा आगामी 10 वर्षों की समय-सीमा के भीतर खरीदे जाने हेतु विचाराधीन प्लेटफॉर्मो / हथियार
    प्रणालियों को सूचीबद्ध करने के लिए टेक्नोलॉजी पर्सपेक्टिव कैपेबिलिटी रोडमैप (TPCR) का निर्माण करना।।
  • रक्षा उत्पादन क्षेत्र में उद्योगों के सुगम प्रवेश हेतु रक्षा खरीद प्रक्रिया (DPP) 2016 की मेक-II प्रक्रिया को सुव्यवस्थित
    करना।
  • कुछ विशिष्ट प्रौद्योगिकियों के लिए स्वचालित मार्ग के तहत FDI की अधिकतम सीमा को वर्तमान 49% से बढ़ाकर
    74% तक करना।
  • DPP के अंतर्गत एक रक्षा निवेशक प्रकोष्ठ (डिफेन्स इन्वेस्टर सेल) की स्थापना करना। यह प्रकोष्ठ, राज्य और अन्य
    प्राधिकरणों से संबंधित मुद्दों के निस्तारण एवं रक्षा उत्पादन में MSMEs एवं अन्य निवेशकों को सहायता प्रदान करने
    का कार्य करेगा।

रक्षा उत्पादन पर मसौदा नीति के अन्य बिन्दु

  • रक्षा क्षेत्र में FDI व्यवस्था को उदारीकृत बनाया जाएगा और विशिष्ट प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में स्वचालित मार्ग के तहत 74% तक FDI सीमा को स्वीकृति दी जाएगी।
  • बौद्धिक संपदा अधिकारों के पंजीकरण की सुविधा के लिए बौद्धिक संपदा प्रकोष्ठ का सृजन किया जाएगा।
  •  स्टार्टअप्स को प्रोत्साहित करना: देश भर में रक्षा नवाचार केंद्रों की स्थापना हेतु इनोवेशन फॉर डिफेन्स एक्सीलेंस (IDex)स्कीम का निर्माण किया जाएगा। इसका मुख्य कार्य रक्षा क्षेत्र के स्टार्ट-अप्स को आवश्यक समर्थन और अवसंरचना सहायता प्रदान करना है। साथ ही यह स्टार्टअप्स के समक्ष उपस्थित रक्षा संबंधी विशिष्ट अनुसन्धान एवं विकास आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु 1,000 करोड़ रूपये के कोष की स्थापना भी करेगी। |
  • तमिलनाडु एवं उत्तर प्रदेश राज्यों में रक्षा औद्योगिक गलियारों की स्थापना की जाएगी। इनमें से प्रत्येक गलियारा एक केंद्रीय इकाई (एंकर यूनिट) और उसके आसपास विकसित अन्य रक्षा उत्पादन इकाइयों का एक बड़ा समूह होगा
  •  विदेशों में भारतीय रक्षा उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने के लिए उद्योग क्षेत्र के साथ संयुक्त रूप से रक्षा निर्यात संगठन को स्थापित किया जाएगा।
  •  OFB और सार्वजनिक क्षेत्र को बढ़ावा देनाः ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों को प्रतिस्पर्धी बनाने एवं उनकी उत्पादकता में सुधार करने हेतु उन्हें पेशेवर बनाया जाएगा।
  •  डिजाइन, विकास और विनिर्माण उद्योग को बढ़ावा देने के लिए, हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) और सरकार के मध्य 50:50 लागत साझाकरण के आधार पर एक एयरोनॉटिकल यूनिवर्सिटी की स्थापना की जाएगी
  •  विस्तार एवं स्वदेशीकरण से सम्बंधित सैन्य एवं नागरिक विमानन आवश्यकताओं को जोड़ने के लिए एक स्वायत्त नेशनल एयरोनॉटिकल कमीशन की स्थापना की जाएगी।
  •  संभावित अवसरों के विषय में जागरूकता के प्रसार तथा विभिन्न हितधारकों द्वारा अनुभव की जाने वाली चुनौतियों को जन सामान्य के समक्ष लाने के लिए देश के विभिन्न भागों में आउटरीच कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। |
  •  रक्षा मंत्रालय के अधीन रक्षा उत्पादन विभाग (DDP) रक्षा उत्पादन नीति, 2018 के कार्यान्वयन के लिए नोडल विभाग होगा।
  •  राज्य सरकारों को इस क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने के लिए राज्य विशिष्ट एयरोस्पेस एवं रक्षा नीतियों के निर्माण के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।

संबंधित चिंताएं

  • यद्यपि 2011 की नीति के विपरीत, 2018 की नीति का मसौदा एक स्पष्ट विज़न, उद्देश्यों का समुच्चय और रणनीतियाँ सुनिश्चित करता है; तथापि यह सरकार एवं निजी क्षेत्रक के मध्य विद्यमान विश्वास की कमी को सम्बोधित नहीं करता। इस विश्वास की कमी का कारण है सार्वजनिक क्षेत्र की रक्षा कंपनियों के गवर्निग बोर्ड में रक्षा मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों की उपस्थिति, जिसके कारण प्रायः बड़े अनुबंधों का आवंटन इनके पक्ष में हो जाता है।
  •  मसौदा नीति विभिन्न हितधारकों के भिन्न-भिन्न हितों के वास्तविक समाधान प्रस्तुत नहीं करती है। इन हितधारकों में DDP, | DRDO और MoD के अधिग्रहण विभाग सम्मिलित हैं जो एक-दूसरे से पूर्णतः या आंशिक रूप से स्वतंत्र हैं।
  • स्वदेशी उत्पादन हेतु चिह्नित की गई 13 भिन्न-भिन्न श्रेणियों में सम्मिलित वस्तुओं में से अधिकांश सामान्य सामग्री हैं तथा इनमें वे वस्तुएं शामिल हैं जिनका उत्पादन या तो किया जा रहा है अथवा जिन्हें निकट भविष्य में उत्पादन हेतु मंजूरी दी गई है। यह नीति ऐसी किसी विशिष्ट नई परियोजना के नाम का उल्लेख नहीं करती है जो उद्योग क्षेत्रक को संभावित व्यावसायिक अवसरों का संकेत देती हो।
  •  बजट संबंधी बाधाएं नीति के लिए निर्धारित निवेश को समयबद्ध तरीके से लाभप्रद होने से रोक सकती हैं।

रक्षा क्षेत्र में निजी भागीदारी (Private Participation In Defence)

  • हाल ही में, रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने ‘मेक ‘ प्रक्रिया को सरल बनाया है।
  • रक्षा मंत्रालय (MOD) ने निजी कंपनियों को सभी आर्मी बेस वर्कशॉप्स (ABW) का संचालन और प्रबंधन करने की अनुमति देने का भी निर्णय लिया है।

रक्षा खरीद प्रक्रिया में ‘मेक’ श्रेणी

  •  सार्वजनिक और निजी, दोनों क्षेत्रों में स्वदेशी क्षमताओं को प्रोत्साहित कर, ‘मेक इन इंडिया’ पहल में निहित दृष्टिकोण को साकार करने हेतु यह एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। DPP-2016 के अनुसार, ‘मेक’ प्रक्रिया की दो उप श्रेणियां निर्धारित की गई हैं।
  •  मेक-I (सरकार द्वारा वित्तपोषित): इसमें 90% का सरकारी वित्त पोषण शामिल है, जिसे चरणबद्ध तरीके से जारी किया जाएगा।
  • मेक-II (उद्योग द्वारा वित्तपोषित): इसके अंतर्गत, निजी उद्योग अपने उत्पाद के लिए अनुसंधान को निधि प्रदान करता है और उसका प्रोटोटाइप (मूल रूप) विकसित करता है। प्रोटोटाइप के विकास के लिए कोई सरकार द्वारा कोई वित्त प्रदान नहीं किया जाएगा, परंतु प्रोटोटाइप के सफल परीक्षण और विकास पर आर्डर दिए जाने का आश्वासन दिया जाता है।
    मेक । प्रोसीजर, रक्षा खरीद प्रक्रिया (DPP)-2016 के मौजूदा ‘मेक प्रोसीजर’ में संशोधन करेगा।
  • इससे रक्षा मंत्रालय को उद्योगों से प्राप्त स्व-प्रेरित प्रस्तावों को स्वीकार करने और साथ ही नए उद्यमों को भारतीय सशस्त्र बलों के लिए उपकरण विकसित करने की अनुमति प्राप्ति होगी।
  •  ‘मेक ||’ परियोजनाओं में भाग लेने के लिए न्यूनतम योग्यता मानदंडों में छूट प्रदान की गई है। साथ ही तीन करोड़ से कम | लागत वाली परियोजनाएं MSMEs के लिए आरक्षित रहेंगी।

आर्मी बेस वर्कशॉप्स (ABW) 

  • ABWs अब “GOCO (Government-Owned Contractor-Managed) मॉडल” के तहत संचालित किए जाएंगे। इस मॉडल में ठेकेदार उपलब्ध सुविधाओं का संचालन और उपयोग करता है एवं सभी प्रकार के कार्यों का प्रबंधन करता है। इसके साथ ही वह आपसी सहमति से निर्धारित लक्ष्यों को पूरा करने के लिए आवश्यक लाइसेंस, प्रमाणीकरण और प्रत्यायन प्राप्त करने के लिए भी उत्तरदायी होता है।
  •  यह निर्णय डी बी शेकाटकर समिति की सिफारिशों के आधार पर होने वाले व्यापक सैन्य सुधारों का एक भाग है।

निजी भागीदारी की आवश्यकता

  • रक्षा बजट का प्रभावी उपयोग: वर्तमान में रक्षा बजट का प्रमुख हिस्सा विदेश निर्मित उपकरणों को खरीदने में खर्च किया जाता है और इसके तहत विदेशों द्वारा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण भी नहीं किया जाता है। निजी क्षेत्र की भागीदारी में वृद्धि से स्वदेशी क्षमता निर्माण में वृद्धि होगी और टिकाऊ परिसम्पत्तियों का निर्माण किया जाएगा जिससे आयात निर्भरता कम होगी।
  • अर्थव्यवस्था में वृद्धिः विनिर्माण क्षेत्रक का एक प्रमुख घटक होने के कारण रक्षा क्षेत्र एक प्रेरक के रूप में कार्य करता है जो उद्यमिता, निवेश और रोजगार को बढ़ावा देगा।
  • खरीद प्रणाली सुव्यवस्थित हो जाएगीः विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता खरीद में देरी का कारण बनती है और कभीकभार उनके द्वारा खराब गुणवत्ता उपलब्ध करा दी जाती है। इसके अतिरिक्त स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति में BoosT TO NEW cos भी समस्याएं हैं।
  •  सामरिक स्वायत्तता और आत्मनिर्भरताः युद्ध जैसी
    गंभीर परिस्थितियों में सामरिक स्वायत्तता और आत्मनिर्भरता अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। कारगिल युद्ध के दौरान, अमेरिका द्वारा अपनी GPS सुविधा वापस ले लेने के कारण मृतकों की संख्या में
    वृद्धि हुई थी।

चुनौतियाँ

  • रक्षा खरीद प्रक्रियाओं में क्षमता और अनुभव के आधार पर भारतीय कंपनियों के साथ पक्षपात किया जाता है। निजी कंपनियों को रिक्वेस्ट फॉर प्रपोजल्स (RFP) के स्तर पर भी बाहर रखने के लिए प्राय: उनकी अनुभवहीनता को कारण बताया जाता है।
  •  अधिकांश रक्षा खरीद प्रक्रियाओं में रक्षा क्षेत्र की PSUs और ऑर्डनेंस फैक्ट्रियों के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नामांकन, निजी कंपनियों की कठिनाइयाँ बढ़ा देता है।
  •  अन्य देशों के साथ व्यापक विचार-विमर्श कर बनाई गई रणनीतिक योजनाओं की कमी अक्सर प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में बाधा उत्पन्न करती है। अधिकांश सरकारों द्वारा बनाये गए कठोर निर्यात नियंत्रण नियम भी निजी कंपनियों की भागीदारी को प्रतिबंधित करते हैं।
  •  जटिल भूमि अधिग्रहण और पर्यावरण अनापत्तियाँ तथा बौद्धिक संपदा अधिकारों पर स्पष्टता की कमी के साथ-साथ
    लाइसेंसिंग में विलंब आदि निजी क्षेत्र की भागीदारी में बाधा उत्पन्न करते हैं।
  •  अपर्याप्त औद्योगिक-शैक्षणिक सहयोग और प्रशिक्षित कर्मचारियों का अभाव भी रक्षा क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी के समक्ष विद्यमान प्रमुख चुनौतियां हैं।

सरकार द्वारा उठाए गए कदम

  • रक्षा खरीद प्रक्रिया (DPP) -2016 के अंतर्गत, ‘Buy (Indian-IDDM)’ ‘Buy (Indian)’, Buy & Make (Indian)’ और ‘Make’ जैसी अधिग्रहण की श्रेणियों को ‘Buy (Global)’ पर प्राथमिकता दी गई है। IDDM का अर्थ है – स्वदेश विकसित डिज़ाइन और विनिर्माण (Indigenously Designed Developed and Manufactured) जिसमें न्यूनतम 40% स्थानीय सामग्री प्रयुक्त की गई हो। |
  • रक्षा अधिग्रहण परिषद (DAC) ने सामरिक भागीदारी मॉडल (SPM: Strategic Partnership Model) के व्यापक ढाँचे को मंजूरी दी है। नीति का उद्देश्य भारत में उच्च तकनीक वाले रक्षा उपकरणों के निर्माण में भारतीय निजी क्षेत्र को शामिलकरना है।
  •  2014 में ‘मेक इन इंडिया’ पहल के बाद से ‘औद्योगिक नीति एवं संवर्द्धन विभाग (DIPP)’ ने विभिन्न रक्षा सामग्रियों के निर्माण के लिए 61 कंपनियों को 81 औद्योगिक लाइसेंस जारी किए हैं।
  • प्रत्येक विषय के आधार पर 49% तक विदेशी निवेश स्वचालित मार्ग से और 49% से अधिक विदेशी निवेश को सरकारी मार्ग से अनुमति दी गई है। इसके अतिरिक्त, सरकार रक्षा क्षेत्र में स्वचालित मार्ग के माध्यम से 100 प्रतिशत FDI देने के सम्बन्ध में विचार कर रही है।
  • भारतीय निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र के मध्य प्रतियोगिता का समान स्तर स्थापित करने के लिए उत्पाद शुल्क/सीमा शुल्क की विसंगतियों को समाप्त कर दिया गया है। |
  • रक्षा उत्पादन में निजी क्षेत्र (विशेष रूप से SMEs) की भागीदारी को बढ़ावा देने हेतु DPSUs और OFB के लिए
    आउटसोर्सिंग और वेंडर डेवलपमेंट गाइडलाइन्स तैयार की गई हैं। ये गाइडलाइन्स DPSUs और OFB को उपलब्ध भी करादी गई हैं।

भारतीय स्टार्ट-अप्स के लिए नए नियम

हाल ही में, रक्षा मंत्रालय ने भारतीय स्टार्ट-अप्स के लिए नए नियमों को निर्दिष्ट किया है ताकि वे सैन्य परियोजनाओं में भाग लेने में सक्षम हो सकें:

  •  नए नियमों के तहत, औद्योगिक नीति और संवर्धन विभाग (DIPP) द्वारा मान्यता प्राप्त कुछ निश्चित श्रेणियों के स्टार्टअप्स, निर्दिष्ट रक्षा परियोजनाओं में भाग लेने के लिए स्वतः अर्ह होंगे।
  •  स्टार्टअप्स की सहभागिता बढ़ाने हेतु, ऐसी परियोजनाओं के लिए जिनमें प्रोटोटाइप विकास की अवस्था की अनुमानित लागत 3 करोड़ रुपये से अधिक न हो ‘स्टार्ट अप्स’ और ‘स्टार्टअप्स से पृथक’, दोनों श्रेणियों के लिए कोई अलग तकनीकी या वित्तीय मानदंड परिभाषित नहीं किया जाएगा।
  • अपेक्षाकृत लघु अनुसन्धान एवं विकास परियोजनाओं हेतु सरकार ने भागीदारी के लिए आवश्यक कई नियमों को समाप्त कर नियमों को सरल बना दिया है।
  • ये नए नियम रक्षा खरीद प्रक्रिया के ‘मेक ||’ श्रेणी पर लागू होते हैं।
  •  इन निर्दिष्ट नियमों के तहत थल सेना, वायुसेना और नौसेना ऐसी परियोजनाओं का चुनाव करेंगी, जिन्हें इस श्रेणी के तहत प्रदान किया जा सकता है।

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