मार्क्सवादी और समाजवादी विचारधारा

इस इकाई का उद्देश्य आपको समाजवादी धारणा के अर्थ और उन्नीसवीं-बीसवीं शताब्दी के यूरोप में इसकी उत्पत्ति तथा विकास से परिचित कराना है।

  • समझ पायेंगे कि समाजवादी धारणा का क्या अर्थ है,
  • वे कौन से घटक थे जिन्होंने यूरोप में समाजवादी विचारों के विकास में बढ़ावा दिया,
  • समाजवादी विचारों व समाजवादी आंदोलन के विकास के मुख्य चरणों को ढूँढ पायेंगे,
  • काल्पनिक तथा वैज्ञानिक समाजवाद में अंतर समझ पायेंगे,
  • समाजवादी समाज के मूल सिद्धांतों को पहचान पायेंगे,
  • सामाजिक व राजनैतिक सिद्धांत के क्षेत्र में कार्ल मार्क्स के योगदान के विषय में जान जायेंगे।

आपने अनेकों बार समाजवादी व समाजवाद शब्द तथा पूँजीवादी व पूँजीवाद शब्द सुने होंगे। आपने यह भी सुना होगा कि संयुक्त राज्य अमरीका एक पूँजीवादी देश है और सोवियत संघ एक समाजवादी देश है।

शायद आपको यह स्पष्ट नहीं होगा कि वे कौन सी मुख्य विशेषताएँ हैं जो एक समाज को पूँजीवादी या समाजवादी बनाती हैं। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि कई बार इन ऐतिहासिक धारणाओं का प्रयोग बहुत असावधानी से व उनके वैज्ञानिक अर्थ के स्पष्ट संदर्भ के बिना होता है। इसीलिए सबसे पहले आपको यह जानना आवश्यक है कि इस शब्द का सही-सही क्या अर्थ है।

आज विश्व की लगभग एक तिहाई जनता समाजवादी समाज में रहती है। सैंकड़ों करोड़ों अपने देश में समाजवाद की स्थापना के लिए लड़ रहे हैं। यह किस लिए लड़ रहे हैं क्या आप जानते हैं। वे क्यों अपने समाज को समाजवादी समाज में बदलने के लिए जाने गँवाने को तैयार हैं? क्यों इतिहास में अब तक सैंकड़ों करोड़ों लोग समाजवादी उद्देश्य के लिए जाने दे चुके हैं? यह आप तभी समझ पायेंगे जब आपको मालूम होगा कि समाजवाद का अर्थ क्या है और समाजवादी समाज किस तरह का समाज है।

मनुष्य ने सबसे पहले समाजवादी समाज के बारे में कब सोचा? कहाँ के लोगों ने सर्वप्रथम इसके बारे में सोचा? और उन्होंने इसके बारे में इतिहास के एक खास चरण में ही क्यों। सोचा? मानव ने हमेशा ही एक बेहतर समाज बनाने की कल्पना की है, किंत कब और क्यों वह समाजवाद के बारे में सोचने लगा? आप शायद उन लोगों के विचारों के बारे में जानना चाहेंगे जो पूरे विश्व में एक शोषण-मुक्त समाज बनाना चाहते थे, ऐसा समाज जो समान हो और जहाँ विश्व के संसाधनों का उपयोग समान रूप से हो। ऐसे लोगों के विचार समाजवादी विचार के रूप में जाने जाते हैं और वे जिस तरह के समाज को बनाना चाहते थे उसे समाजवादी समाज के रूप में जाना जाता है। उनके आंदोलनों जिनका उद्देश्य समाजवादी समाज को बनाना था, समाजवादी आंदोलन के रूप में जाने जाते हैं।

सबसे प्रमुख समाजवादी विचारक कार्ल मार्क्स थे, किंतु वे अपने समय के सभी समाजवादी विचारकों से आगे निकल गये उन्होंने साम्यवादी (कम्यनिस्ट) समाज का खाका तैयार किया। उन्होंने इतिहास द्वारा समाज के वैज्ञानिक विश्लेषण को विश्व को बदलने के अपने विचारों का आधार बनाया। उन्होंने मानव-इतिहास की अंतिम अवस्था को एक ऐसी अवस्था के रूप में देखा जहाँ साम्यवादी समाज होगा। उन्होंने यह भी बताया कि ऐसा कैसे हो सकता है। इसीलिए उनके विचारों को अन्य समाजवादियों के विचारों से भिन्न रखने के लिए उनके अनुयायी अपने आपको कम्युनिस्ट (साम्यवादी) कहने लगे और उनके विचार मार्क्सवाद के नाम से पहचाने जाने लगे। हम इस पाठ में यह भी पढ़ेंगे कि समाजवादी विचारधारा में मार्क्सवाद का क्या योगदान था।

1917 की क्रांति के बाद सोवियत संघ ऐसा पहला देश था जिसमें समाजवाद, या वैसा समाज जिसके लिए कम्युनिस्ट संघर्ष कर रहे थे, की स्थापना हुई।

समाजवाद की परिभाषा

शुरुआत हम यह प्रश्न पूछ कर करते हैं कि समाजवाद क्या है? समाजवाद वह सामाजिक व्यवस्था है जो समाजवादी सर्वहारा क्रांति के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आती है। यह समाज का वह रूप है जो पूँजीवादी व्यवस्था को पलटने का परिणाम है। कोई भी समाज पँजीवादी अवस्था से गजरे बिना समाजवादी नहीं हो सकता। यह पूँजीवाद ही है जो समाजवादी आंदोलनों और इसकी विचारधारा के विकास के लिए और अंततः समाजवादी समाज की स्थापना के लिए परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है। जब हम मार्क्स के विचारों की परिचर्चा करेंगे तब इसके बारे में और बातें करेंगे।

समाजवादी समाज उत्पादन के साधनों पर से निजी स्वामित्व को नष्ट करके इसके बदले में सार्वजनिक स्वामित्व की रचना करता है। इसका अर्थ है कि वे सभी संसाधन जिनसे धन-दौलत बनायी जा सकती है- भूमि, फैक्ट्रियाँ, खदान, बैंक- अब किसी एक व्यक्ति या व्यक्ति समूह की सम्पत्ति नहीं रहते। वे जन सामान्य की सम्पत्ति हो जाते हैं। इसका यह भी अर्थ है कि अब कोई सिर्फ इन साधनों का मालिक होने भर से, व अन्य व्यक्तियों से उस पर काम करा कर, धनी नहीं हो सकता। वे मजदर ही, जो उस पर काम करते हैं, उसके असली मालिक हैं और वे उससे अपने ही श्रम द्वारा अर्जित धन-दौलत लेते हैं क्योंकि अब वे ही उन संसाधनों के मालिक हैं।

समाजवादी समाजों से पूर्व के सभी समाज, संसाधनों के मालिकों व उन संसाधनों से धन उत्पन्न करने के लिए काम करने वाले मजदूरों के बीच के वर्ग हित के अन्तविरोध पर आधारित वर्ग समाज है। समाजवादी समाज इस अतविरोध को समाप्त करता है क्योंकि अब वे ही लोग उन संसाधनों के मालिक हैं जो उस पर काम करते हैं। इसीलिए समाजवादी समाज में एक वर्ग द्वारा दसरे वर्ग का शोषण नहीं होता है और यह मानव समानता पर आधारित समाज है। यह समानता न सिर्फ राजनैतिक व कानूनी है जैसा कि पूँजीवादी समाजों में होता है बल्कि यह सामाजिक व आर्थिक भी है क्योंकि समाजवादी समाज में किसी सम्पत्ति, जो असमानता की जड़ है, का अंत हो जाता है। समाजवादी समाज इसीलिए सामाजिक न्याय द्वारा लक्षित समाज है।

यद्यपि इसका यह अर्थ नहीं है कि लोग निजी रूप से कुछ नहीं रख सकते। समाजवादी समाज में लोगों को निजी सामान रखने का अवसर भी मिलता है जैसे घर की परना, वाहन, मकान, अपने संचित धन हेत बैंक एकाउंट इत्यादि।

वे सिर्फ उन वस्तुओं के उत्पादन के साधनों का मालिक नहीं बनते जिनका उपयोग वे अन्य व्यक्तियों को उनके मेहनत के फल से वंचित रखने के लिए कर सकते हैं। वास्तविकता में समाजवादी समाज में बढ़े हुए उत्पादन के फलस्वरूप जैसे-तैसे धन-दौलत बढ़ती है, सिर्फ कछ लोग ही नहीं बल्कि सभी लोग ज्यादा से ज्यादा निजी सामान रख सकते हैं।

समाजवादी समाज में उत्पादन में वृद्धि योजनावद्ध उत्पादन से ही होती है। आपने पंचवर्षीय योजना के बारे में सुना होगा। यह समाजवादी समाज की केंद्रित योजना है जो समाज की सभी आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर यह तय करती है कि सभी लोगों के हितों से संबंधित किस आवश्यकता को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। समाजवादी समाज मजदूर जनता के हित में मजदूर जनता के राज्य की भी स्थापना करता है। वह यह सरक्षित करता है कि हर एक अपनी क्षमता के अनुसार काम करे और हर एक को उसके काम के अनसार ही वेतन मिले। समाजवादी जनतंत्र सभी लोगों के लिए कछ निश्चित सामाजिक अधिकारों की भी सुरक्षा करता है जैसे राज्य तथा सार्वजनिक मामलों के प्रबंध में हिस्सेदारी के अधिकार के अलावा रोजगार का अधिकार, आराम और अवकाश, स्वास्थ्य सुरक्षा, वृद्धावस्था में सुरक्षा, मकान, मुफ्त व समान शिक्षा।

एक समाजवादी समाज राजनीति और धर्म के पूर्ण अलगाव का आश्वासन देता है। इसका यह अर्थ नहीं कि लोग अपनी कोई निजी आस्था नहीं रख सकते। इसका सिर्फ यही अर्थ है कि वे धर्म को सार्वजनिक महा नहीं बना सकते या इसका उपयोग राजनीति में नहीं कर सकते या विद्यालयों में इसका प्रचार नहीं कर सकते इत्यादि। हम सभी अपने देश में होने वाले सांप्रदायिक दंगों से परिचित हैं तथा जानते हैं कि किस तरह सांप्रदायिक गुट सांप्रदायिक भावनाओं का शोषण करते हैं और इसीलिए धर्म को राजनीति से अलग करके उसे मात्र एक निजी आस्था के रूप में देखना तथा एक वैज्ञानिक मनोदशा का बनाना भी अत्यंत आवश्यक है।

एक समाजवादी समाज स्त्रियों को पूर्ण समानता भी प्रदान करता है। यह इस समानता के लिए छोटे बच्चों वाली स्त्रियों के लिए काम के कम घंटे, कार्य स्थल पर क्रेचों, ताकि दिन के समय वे अपने बच्चों को खिला-पिला सके, कार्यस्थलों पर कैंटीनों व सार्वजनिक रसोइयों,  इत्यादि द्वारा भौतिक आधार भी तैयार करता है। विकसित पूँजीवादी देशों में भी ये सभी सुविधाएँ उपलब्ध हैं किंतु उनके लिए लोगों को व्यक्तिगत रूप से भारी कीमत चुकानी पड़ती है। वे मुनाफा कमाने के व्यापारिक उद्यम भर हैं और केवल धनी लोग ही इन सुविधाओं का उपयोग करने में समर्थ हो सकते हैं। यह बच्चों के लिए भत्ता देता है। बच्चों को पूरे समाज की जिम्मेदारी समझा जाता है यद्यपि परिवार ही उनकी देख-रेख व परवरिश करता है।

एक समाजवादी राज्य सभी राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलनों और शोषण के खिलाफ चल रहे मजदूरों के आंदोलनों का भी समर्थन करता है। यहाँ हम यह भी बताना चाहेंगे कि समाजवादी विचारधारा से क्या अर्थ है।

समाजवादी विचारधारा विचारों का वह हिस्सा है जो समाज का वैज्ञानिक विश्लेषण करता है और जो न केवल विश्व को समझना भर चाहता है बल्कि इसे बेहतर बनाने के लिए इसे बदलना भी चाहता है। यह मानव इतिहास के अनुभव को केवल राजाओं, शासकों और विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के हितों की दृष्टि से ही नहीं देखता बल्कि उत्पीड़ित जनता के हितों की दृष्टि से देखता है। यह मानव सभ्यता को बनाने और विभिन्न चरणों के दौरान समाज में हुए परिवर्तनों को लाने में मजदूर वर्ग के योगदान पर जोर देता है यह एक ऐसे समाज का खाका बनाने का उद्देश्य रखता है जो समान, मानवीय और न्यायसंगत हो और ऐसे समाज की रचना के लिए ही मजदूर जनता को संगठित करने का प्रयास करता है। इसी उद्देश्य से यह पूँजीवादी समाज की आलोचना करता है और दिखाता है कि वह किसी तरह एक असमान तथा अन्यायसंगत समाज है। एक समाजवादी विचारधारा इसी कारण पूँजीवादी व्यवस्था के अंत का भी आह्वान करती है और मजदूर जनता के संगठनों तथा आंदोलनों को बनाने में मदद करती है।

समाजवादी विचारधारा की उत्पत्ति

समाजवादी विचारधारा कैसे उभरी? ऐतिहासिक रूप से समाजवादी विचारधारा पूँजीवादी यथार्थ के प्रतिक्रिया स्वरूप उभरी। चूँकि पूँजीवाद सर्वप्रथम पश्चिमी यूरोप में विकसित हुआ, इसके विरोध के रूप में समाजवादी सिद्धांत भी सर्वप्रथम यूरोप में ही विकसित हुआ। 1917 की रूसी क्रांति समाजवादी आदर्शों और समाज के समाजवादी परिवर्तन पर आधारित प्रथम क्रांति थी।

यूरोप में समाजवादी आंदोलनों के उत्थान की चर्चा करने से पहले उस ऐतिहासिक संदर्भ, जिसमें कि वे उभरे, का ब्यौरा देना आवश्यक है। बहुसंख्यक जनता पर होने वाले परिणामों सहित पूँजीवाद ही वह संदर्भ है जिसने समाजवादी विचारों को जन्म दिया। पूँजीवाद समाज का वह रूप है जो पश्चिम यूरोप में उन्नीसवीं शताब्दी के दौरान अपनी विकसित अवस्था में फल-फूल रहा था। पूँजीवाद वह समाज है जहाँ उत्पादन के साधनों या धन प्राप्ति के स्रोतों जैसे भूमि, कारखाने, खदानें, कच्चा माल इत्यादि के मालिक कुछ गिने-चुने व्यक्ति होते हैं जो पूँजीपति के रूप में जाने जाते हैं।

किंतु माल के उत्पादन के लिए एक अन्य वस्तु की भी आवश्यकता है और वह है श्रम। क्योंकि यदि कारखानों, खदानों या भूमि पर कच्चे माल के साथ काम करने के लिए कोई नहीं होगा तो माल का उत्पादन कैसे होगा? उत्पादन के लिए श्रम सबसे जरूरी आवश्यकताओं में से एक है। इसी कारण कारखाना मालिक ऐसे मजदूरों को रोजगार पर लगाते हैं जिनके पास अपने काम करने वाले हाथों के सिवाय आय-प्राप्ति का कोई अन्य साधन नहीं है।

अतः आप देख सकते हैं कि पूँजीवादी व्यवस्था में एक वर्ग उन लोगों का है जो उन साधनों के मालिक होते हैं जिनसे आय प्राप्त की जा सकती है और दूसरा वर्ग उन लोगों का है जो इन साधनों पर काम करते हैं। वे, आय साधनों के मालिक हैं, काम नहीं करते। किंत. फिर भी दूसरे के श्रम का शोषण करते हैं। वे ही अमीर भी है। जो काम करते हैं गरीब हैं क्योंकि वे अपने द्वारा किये गये उत्पादन को बाजार में खरीद या बेच नहीं सकते।

किंतु अब आप मुझसे यह प्रश्न करेंगे कि इसमें गलत ही क्या है। आखिरकार पूँजीपति मजदूर को अपने लिए कराये गए काम का वेतन देता है तथा यदि एक को बाजार से लाभ मिलता है तो दूसरे को वेतन।

किंतु क्या आप जानते हैं कि मजदूरों को उनके द्वारा किये गये उत्पादन की पूरी रकम अदा नहीं की जाती। फैक्ट्री मालिक मजदूर को उसके द्वारा फैक्ट्री में किये गये काम के घंटों की संख्या के अनुसार अदायगी करता है। किंतु मजदूरों द्वारा फैक्ट्री में सामूहिक रूप से उत्पादित माल की कीमत ज्यादा है तथा वह बाजार में ऊँचे दामों में बेची जाती है और इस धन को फैक्ट्री मालिक अपने लिए रख लेता है। यह फैक्ट्री मालिक का लाभ है जिससे वह अमीर बनता है जबकि मजदूर जो कि वास्तविक उत्पादनकर्ता है गरीब रहता है।

असमानता का यह संबंध पूँजीवादी समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है और यही वह संबंध है जो समाजवादी समाज को अन्यायपूर्ण बनाता है। एक वर्ग मालिक बनकर जीता है, दूसरा वर्ग कमा कर जिंदा रहता है। एक बिना काम किये जीता है, दूसरा जब तक काम न करे जीवित नहीं रह सकता।

अब क्या आप देख सकते हैं कि पूँजीवादी समाज असमानता, सामाजिक अन्याय और बहुसंख्यक जनता के शोषण का समाज है? और किस तरह निजी संपत्ति व मुनाफे का नतीजा यह असमानता है?

इस बढ़ती हुई पूँजीवादी फैक्ट्री व्यवस्था के विरोध में दी हुई समाजवादी विचारधारा उभरी। मनुष्य समस्या के विषय में तभी सोच सकता है जब कोई समस्या हो। पूँजीवाद समाज की समस्या के बारे में मनष्य तभी सोच पाया जब पँजीवाद के परिणाम देखे और अनभव किये गये। इसीलिए समाजवादी विचारधारा पूँजीवाद के विकास के साथ ही तब उभरी, जब यह सोचना जरूरी हो गया कि फैक्ट्रियों में मजदरों के जीवन-स्तर में कैसे सधार लाया जाये।

किंतु क्या समाजवादी विचारक अचानक ही बुद्धिजीवी के बिना प्रकट हो गये। क्या उनसे पहले किसी और ने उत्पीडितों के बारे में नहीं सोचा? नहीं, ऐसा नहीं हुआ।

किंतु मनुष्य संभावना के रूप में केवल उसी के बारे में सोच सकता है जो उसके समय और उम्र की संभावनाओं से अधिक दूर या अलग नहीं है। उदाहरण के लिए सोलहवीं शताब्दी में जब विज्ञान व तकनीक इतने विकसित नहीं थे, चाँद पर जाना केवल एक स्वप्न भर रहा होगा। मनुष्य को तब यह एक स्वप्न लगता था। बीसवीं शताब्दी में जब विज्ञान व तकनीक इतनी अधिक विकसित हो गई कि मनुष्य को लगने लगा कि चाँद पर जाना संभव है। यदि वह कोशिश करे तथा इस दिशा में काम करे तो ऐसा हो सकता है। और ऐसा हआ भी।

क्या आप सोच सकते हैं कि सोलहवीं शताब्दी में ऐसा हो सकता था। इसी तरह मनष्य की बद्धि सभी के जीवन की तमाम आवश्यकताओं को पूरा करने व सभी के लिए अच्छी जिंदगी की संभावनाएँ बनी थी सिर्फ पूँजीवाद और कारखानों के विकास के तहत जब उत्पादन इतना बढ़ गया कि सबकी जरूरतों-भौतिक व अन्य जरूरतें जैसे आराम, स्वास्थ्य तथा सभी के लिए शिक्षा को पूरा करने का विचार यथार्थवादी बना। इसीलिए मानव जीवन को बेहतर बनाने का विचार उसी समय से अस्तित्व में है जब से मनुष्य स्वयं अस्तित्व में है, किंतु समाजवाद का विचार उन्नसीवीं शताब्दी में ही कारखाना उद्योग के विकास के साथ ही उभरा।

पहले के विचारकों ने सामाजिक न्याय और समानता के विषय में विवाद किया था। किंतु उन्होंने न्याय और समानता को अपने समाज के शासकों, धनाढ्यों तथा शिक्षित दर्जे के लोगों के ही संदर्भ में देखा था। उदाहरण के लिए प्लेटो, जिसके विषय में आपने सुना होगा, ने अपने समय की दासता पर सवाल नहीं उठाये। मध्ययुगीन दंतकथाओं के उदान्त और वीर “नाईट” अपने समय के किसानों, जो कि अर्द्धगुलाम थे, के प्रति संवेदनशील नहीं थे।

यह तो अठाहरवीं शताब्दी के प्रबुद्ध विचारक थे जिन्होंने सबकी मुक्ति का विचार दिया। किंतु मुक्ति का विचार सीमित था समाजवादियों ने इन विचारों को आगे बढ़ाया और मुक्ति के दृष्टिकोण को व्यापक बनाया। वास्तव में हम समाजवादी विचारों के बारे में अठाहरवीं शताब्दी के प्रबुद्ध विचारकों की बुद्धिजीवी परंपरा के बिना सोच ही नहीं सकते। ठीक वैसे ही जैसे कारखाना उद्योग जो कि समाजवाद के लिए परिस्थितियाँ बनाती है  के बिना समाजवाद संभव नहीं था, प्रबद्ध विचारकों के बिना समाजवादी विचार संभव नहीं थे। इतिहास में सब कुछ निरंतरता व अतविरोध के द्वारा विकसित होता है जो संघर्ष को इसकी ऊँची अवस्था तक तेज बनाता है। अतः समाजवादी विचारधारा न केवल पूँजीवाद की ही उपज है बल्कि अठाहरवीं शताब्दी के प्रबुद्ध बुद्धिजीवी परंपरा की देन भी है।

समाजवादी विचारधारा का पूर्व इतिहास

यह अज्ञात है कि ‘समाजवाद” और “समाजवादी’ शब्दों का प्रयोग सबसे पहले किसने किया। 1800 के आस-पास इंग्लैंड और फ्रांस दोनों जगह पूँजीवाद के विरोध में किताबें, पैम्फलैट और भाषण प्रकट होने शुरू हुए। आमतौर से यह जाना जाता है “समाजवाद” शब्द  सबसे पहले 1832 में “ले ग्लोब” नाम की एक फ्रांसीसी पत्रिका में छपा हुआ देखा गया।

समाजवाद के वास्तविक पथप्रदर्शक फ्रांस में चार्ल्स फरियेर व सेंत साइमन तथा इंग्लैंड के . गर्बट ओवेन थे और प्रत्येक के इर्द-गिर्द एक बड़ा आंदोलन विकसित हुआ। उनकी किताबें परे यूरोप और संयुक्त राज्य अमरीका में व्यापक रूप से पढ़ी गयी। उन्होंने एक साथ मिलकर अपने समय की सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक उन्नति के लिए महान योगदान दिया। उन्होंने पँजीवादी समाज की कठोर आलोचन की। उन्होंने अपने लेखों में यह दिखाया कि किस तरह से यह एक अन्यायपूर्ण व असमान समाज है तथा यह भी कि किस तरह से बहुसंख्यक जनता को अच्छे जीवन से वंचित रखना इसका मुख्य परिणाम है। यद्यपि जैसा कि उन्होंने बताया पूँजीवाद ने उत्पादन बढ़ाने की जबरदस्त संभावनाओं को बनाया।

किंत यह रखना महत्वपर्ण है कि वे सिर्फ पंजीवाद समाज की आलोचन से संतुष्ट नहीं थे। उनमें से हर एक ने अपने आदर्श समाज की झलक को, यानी समाज ऐसा होना चाहिए, को सक्ष्म से सूक्ष्म विवरण के साथ प्रस्तुत किया जिसमें वे अठाहरवीं शताब्दी के प्रबुद्ध विचारकों से कहीं ज्यादा आगे निकल गये।

प्रबुद्ध विचारकों ने कहा था कि हर चीज का विश्लेषण व फैसला तर्क तथा विवेक के आधार पर होना जरूरी है और विवेकपर्ण सरकार वह है जो तर्क संगत कानन के अनसार चलती है व अपने नागरिकों को गजनैतिक तथा वैधानिक स्वतंत्रता देती है। उन्होंने व्यक्ति के मौलिक अधिकारों जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक सहिष्णता, कानून के समक्ष समानता इत्यादि पर जोर दिया। क्योकि ये चीजें विवेकपर्ण थी इसीलिए हर एक को उसका अधिकार होना चाहिए। उन्होंने जनप्रिय सर्वसत्ता या लोगों के द्वारा उनकी सरकार में हिस्सेदारी के अधिकार की भी बात की। आपने शायद मोन्टेस्क्यू के बारे में मना हो जिसने “सत्ता के अलगाव” की बात की और कहा कि सभी अधिकार एक ही अधिकारी के हाथ में केंद्रित नहीं होने चाहिए। आपने शायद रूसी और उसकी आम इच्छा के बारे में भी सुना होगा।

समाजवादी विचारकों ने समानता की भी मांग की, किंतु उनकी योजना में समानता की भी माँग राजनैतिक अधिकारों या कानून के समक्ष समानता तक ही सीमित नहीं थी। उन्होंने मामाजिक और आर्थिक समानता की भी मांग की। वे न सिर्फ विशेषाधिकार की समाप्ति चाहते थे बल्कि वर्ग-भेद को ही खत्म करना चाहते थे।

दूसरे, वे पूँजीवाद का अंत चाहते थे। वे इसका अंत केवल इसलिए नहीं चाहते थे कि यह शोषक है। चैकि वे पहचान गये थे कि यह इतिहास की शाश्वत अवस्था नहीं है। उन्होंने सोचा कि चूँकि यह असंगत है, इसमें निहित समस्याओं और अनविरोधों के कारण भी इसे तो समाप्त होना ही है। उन्होंने इतिहास को उत्पीड़ितों के हितों के परिपेक्ष्य में देखा और इसीलिए बिना किसी समझौते के पूँजीवाद का विरोध किया। उन्होंने लाभ के स्रोत के रूप में निजी सम्पत्ति का भी विरोध किया। इसीलिए वे उत्पादन के साधनों पर सामान्य या मामाजिक स्वामित्व चाहते थे इसी कारण वे समाजवादी कहलाये।।

किंतु वे यह नहीं जानते थे कि इस नये तरह के समाज को अस्तित्व में कैम लाना है। ऐसा होने का कारण यह है कि वे उस यग में जब पूंजीवाद इतना विकसित हो चका था कि वे इसके द्वारा मजदूर जनता की दगति को देख सकें कित अभी तक मजदूर वर्ग, जिसके हित प्रत्यक्ष और बिना किसी समझौते के पूंजीपतियों के विरुद्ध थे, ने इतनी वर्ग चेतना और संगठन विकसित नहीं किया था कि वे स्वतंत्र रूप से राजनैतिक कार्यवाही कर सके 

साथ ही पूँजीवादी व्यवस्था की कार्य प्रणाली भी अभी तक स्पष्ट नहीं थी और अभी तक यह भी ज्ञात नहीं था कि पूँजीवाद में एक व्यवस्था के रूप में इतन अधिक न टाले जा सकने वाल संकट निहित हैं। इसीलिए उनके सिद्धाता ने पंजीवाद की अविकसित पा प्रागंभक अवस्था की झलक दी। वे समझ नहीं पाये कि मजदूर वर्ग की ऐतिहासिक भमिका क्या होगी। वे यह नहीं पहचान पाये कि मजदूर और पंजीपतियों के बीच का वर्ग-संघर्ष पंजीवाद की आवश्यक , विशेषता है। सच ता यह है कि वे वास्तव में पूँजीवाद व्यवस्था की कार्यप्रणाली को समझ नहीं पाये। उन्होंने इस तथ्य को ध्यान में ही नहीं रखा कि मालिकों का लाभ इसी वजह से मजदूरों और पूँजीपतियों के हितों का सामंजस्य नहीं हो सकता।

उन्होंने इसके विपरीत ही सोचा। उनके लिए समाधान हृदय परिवर्तन या नये आदर्श मल्यों के विकास में निहित था। ये नये आदर्श व सही शिक्षा, प्रचार तथा प्रयोगों द्वारा प्राप्त किये जा सकते हैं जो दूसरों के लिए उदाहरण का काम करेंगे। वे यह नहीं समझे कि अर्थव्यवस्था राजनैतिक संस्थाओं और सामाजिक जीवन में परिवर्तन के आधार पर बदलती है। इसी कारण वे काल्पनिक समाजवादियों के रूप में जाने जाते हैं।

सेंत साइमन

काल्पनिक समाजवादियों में से एक सेंत साइमन थे। उन्होंने अपने समय के समाज का विश्लेषण इस प्रकार किया कि समाज सम्पत्तिधारी निठल्लों और काम करने वाले उद्योगपतियों-दो मुख्य वर्गो से बना है। इसका अर्थ है कि दूसरे वर्ग यानी काम करने वाले में, उन्होंने न केवल मजदूरों व किसानों बल्कि धनी फैक्ट्री मालिकों, जो कि मजदूरों का शोषण करते हैं, को भी जोड़ा जैसा कि आप देख सकते हैं उन्होंने उद्योगपतियों व मजदूर वर्ग के बीच वर्गभेद नही देखा।

परिणामस्वरूप उन्होंने निजी सम्पत्ति का विरोध नहीं किया जो कि जैसे हम देख चके हैं, शोषण की जड़ है। उन्होंने सिर्फ गलत उपयोग का विरोध किया जो उनके विचारानुसार संभव था। उन्हें समाज के धीमे और शांतिपूर्वक परिवर्तन में भी विश्वास . था। उन्होंने ऐतिहासिक अनुभव से यह नहीं सीखा कि कुछ लोग भले ही खुशी-खुशी उन फायदों को छोड़ दें जिनका उपयोग वे कर रहे हैं, किंत परा वर्ग ऐसा नहीं करेगा। बाद में उनके अनुयायियों ने निजी सम्पत्ति का समापन तथा योजना के श्रम के मताबिक माल के बँटवारे की मांग की। हालांकि उन्होंने भी सोचा कि समाज के और आगे उन्नति करने से स्वतः ही समाजवाद का फल प्राप्त हो जाएगा। उन्होंने भी साधनों और बचत के बँटवारे यानी मजदरों के शोषण के साधनों का विश्लेषण नहीं किया।

चार्ल्स फरियेर

चार्ल्स फरियेर के लेखों में औरतों की स्थिति सहित पूँजीवादी समाज की एक व्यवस्थागत आलोचना है। वह यह कहने वाले पहले व्यक्ति थे कि किसी समाज की आय सही-सलामती की अभिसूचना इस बात से पता चल जाती है कि वह अपनी औरतों के साथ कैसा बर्बर आचरण है। उनके पास समाज के इतिहास की भी एक निश्चित परिकल्पना थी-बर्बर, समाज की मुक्त होड़। उन्होंने यह भी पहचान लिया कि पूँजीवादी समाज में कुछ चुने लोगों की धन-दौलत अधिकसंख्यकों की गरीबी से आयी है। वह इस बात के प्रति भी सचेत थे कि प्रत्येक ऐतिहामिक युग में एक उत्थान की अवस्था होती है और एक अवसान की। उन्होंने अपने आपको समाज की गति के सिद्धांतों की खोज में लगा दिया ठीक वैसे ही जैसे वैज्ञानिकों ने धात की गति के सिद्धांत को खोजा था। उन्हें पता था कि पूँजीवादी इतिहास की सिर्फ एक अवस्था है-कि इतिहास की प्रत्येक अवस्था उस स्थिति में होने वाले उत्पादन की स्थिति पर आधारित है।

किंतु सेंत साइमन की तरह वे भी यह नहीं देख पाये कि पूँजीवादी समाज में अन्याय का मूल कारण क्या है। अन्य काल्पनिक समाजवादियों की तरह ही उन्होंने भी सोचा कि लोगों के हृदय परिवर्तन के साथ समाज का शांतिपूर्ण परिवर्तन संभव है।

राबर्ट ओवेन

राबर्ट ओवेन अपने सोचने के ढंग में ज्यादा वैज्ञानिक थे। वे जान गये थे कि परिवेश चेतना का निर्धारण करती है, इसका अर्थ है कि मनुष्य न केवल वंशानुगत गुणों बल्कि अपने जीवन विशेष रूप से अपने विकास काल के परिवेश की देन है। उद्योग के विकास में उन्होंने : नाज के पुनर्निर्माण का आधार देखा। उस समाज का जिसमें सबके लिए प्रचर मात्रा में हो, क्योंकि जब तक पहले उत्पादन नहीं बढ़ेगा आपके पास सबके लिए पचा पात्रा में कहाँ से आयेगा। उनके नये समाज की कल्पना ऐसी थी जिसमें सम्पत्ति सार्वजनिक होगी और उस पर सबके लिए सार्वजनिक सामान बनाने हेतु काम होगा।

उन्हें रिकार्डों के श्रम-मूल्य सिद्धांत पर विश्वास था यानी यह श्रम ही है जो तैयार की गई वस्तु का मूल्य निश्चित करती है। उन्होंने यह भी पहचान लिया कि पूँजीवादी व्यवस्था में मजदूर को उसके श्रम का पूरा (योग्य) मूल्य नहीं मिलता।

किंतु उन्हें हर चीज पैसे की गलती के कारण होती जान पड़ती थी। वह इस प्रक्रिया को नहीं समझ पाये जहाँ से यह असमान विनिमय आया। वे यह बताने में भी असमर्थ थे कि समाज का पुनर्निर्माण कैसे किया जायेगा। क्या उत्पादन के साधन उनके मालिकों द्वारा पूरी जनता को सरल ढंग से दे दिये जायेंगे या क्या उसको पाने के लिए जनता को लड़ाई लड़नी पड़ेगी? वह स्पष्ट नहीं थे। उन्होंने कुछ सहकारी समितियाँ स्थापित करने का प्रयत्न किया। उन्होंने सोचा कि इसके द्वारा वे परिवर्तन का एक ऐसा माप दण्ड प्राप्त कर सकेंगे जो समाज को न्यायसंगत बनायेगा किंत सहकारी समितियाँ किसी भी चीज में कोई आधारभत परिवर्तन नहीं ला पायी क्योंकि वे मौजदा समाज के दायरे के भीतर ही बनी थी।

लेनिन ने काल्पनिक समाजवाद का अपनी पुस्तक ‘मार्क्सवाद के तीन स्रोत और तीन घटक’ में उपयुक्त मूल्यांकन किया है इसमें उन्होंने कहा :

इसने पूँजीवादी समाज की आलोचना की, इसकी निन्दा की और इसे कोसा, इसने इसके नष्ट होने का स्वप्न देखा, इसके पास बेहतर व्यवस्था की कल्पना दृष्टि थी और इसने अमीरों को शोषण की अनैतिकतता के बारे में समझाने की कोशिश की, किंत काल्पनिक समाजवाद वास्तविक समाधान की ओर इशारा नहीं कर पाया। यह पूँजीवाद के तहत वेतन-गुलामी की वास्तविक प्रकृति को नहीं समझा पाया, यह पँजीवादी विकास के नियमों को उजागर नहीं कर पाया। यह नहीं दिखा पाया कि वे कौन सी सामाजिक शक्तियाँ हैं जिनमें नये समाज का निर्माता बन सकने का सामर्थ्य है।

मार्क्सवाद : आर्थिक और सामाजिक समीक्षा

मार्क्सवाद उन वैज्ञानिक समाजवादी विचारों से संबंध रखता है जो यूरोप में उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में विकसित हुए। वह हस्ती काल मार्क्स थी जिन्होंने इन विचारों को व्यक्त करने, विकसित करने व इन्हें विचारधारा के संकाय के रूप में एक निश्चित विशिष्टता देने के लिए सर्वाधिक कार्य किया। उन्ही के नाम से वैज्ञानिक समाजवाद के विचारों को मार्क्सवाद के नाम से भी जाना जाता है। फ्रेड्रिक ऐगल्स कार्ल मार्क्स के आजीवन मित्र और सहयोगी थे। सरल शब्दों में, 1848 में जब उनके द्वारा लिखा कम्यनिस्ट घोषणा पत्र प्रकाशित हुआ, तो पहली बार उनके विचारों ने यूरोप को झकझोर दिया। उसके बाद उनकी किताबों का अनेक भाषओं में अनुवाद हुआ। उनके विचार उत्पीड़ितों के संघर्ष, जिनके हितों व मक्ति के वे साथी थे, का आधार बन गये।

मार्क्स और एंगेल्स के विचार किसी शून्य से जादुई रूप में नहीं आये। उन्होंने जर्मन दर्शन अंग्रेजी राजनैतिक अर्थशास्त्र व फ्रांसीसी समाजवाद के महान प्रतिनिधियों की शिक्षा को समाविष्ट किया, उसे आगे बढ़ाया। उन्होंने उसे नये ढंग से जोड़ा।

दार्शनिक रूप से मार्क्सवाद का अर्थ है इतिहास और जीवन का भौतिकवादी दृष्टिकोण, यानी लोग अपने समाज व राजनैतिक ढाँचे को किस ढंग से बनाते हैं इस बात पर निर्भर करता है कि वे किस ढंग से अपने जीवन की आवश्यकताओं का उत्पादन करते हैं, तथा वे किस ढंग से इसके लिए अपने श्रम को संगठित करते हैं और अंततः इस पर भी कि वे किस ढंग से सोचते हैं। संक्षेप में उन्होंने दिखाया कि यह परिवेश ही है कि जो चेतना का निर्धारण करती है इसके विपरीत नहीं, क्योंकि एक भौतिक पदार्थ पहले से ही अस्तित्व में है और इस बात से स्वतंत्र है कि लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं-उदाहरण के लिए, पेड़ अस्तित्व में था, इसीलिए लोगों ने उसे देखा, पहचाना और उसे एक नाम दिया। यदि उन्होंने ऐसा नहीं किया होता तो भी वह अस्तित्व में रहता।

मानव इतिहास के अनुप्रयोग में मार्क्सवाद ने दिखाया कि जिसने इतिहास के खास दौर का निर्धारण किया वह थी मौजदा उत्पादन-प्रणाली यानी एक समाज की उत्पादन शक्तियों और उत्पादन संबंध। दूसरे शब्दों में, समाज में जीने के भौतिक आधार आर्थिक व्यवस्था, जीने के साधनों का उत्पादन। वे कैसे करते हैं, व इसे करने के लिए वे अपने आपको कैसे संगठित करते हैं। दासता, सामंतवाद तथा पूँजीवाद ने भिन्न आर्थिक व्यवस्थाओं व भिन्न वर्ग-संबंधों को प्रस्तुत किया। यहाँ पर आपको यह जानना आवश्यक है कि वह मार्क्स ही थे जिन्होंने भिन्न सामाजिक व्यवस्थाओं की समीक्षा व वर्गीकरण किया। उन्होंने दिखाया कि जीवन के भौतिक आधार ही समाज की प्रकृति का निर्धारण करते हैं व इन भौतिक आधारों के परिणामस्वरूप उभरे वर्ग-संघर्ष ही समाज के परिवर्तन तथा विकास का कारण बनता है।

ऐतिहासिक विकास तथा परिवर्तन का निर्देशक व प्रमख कारण मानव विचारों में परिवर्तन नहीं बल्कि वर्ग संघर्ष है। इसके बदले में वर्ग संघर्ष इस वास्तविकता का फल था कि लोगों का कछ हिस्सा या वर्ग तो विशेषाधिकार प्राप्त व शासक वर्ग था। तथा दसरा अधिकार विहीन उत्पीडित व शोषित वर्ग था। बदले में उनकी भिन्न व अतविरोधी स्थितियाँ उनके आय-साधनों के संबंध पर आधारित थीं-चाहे वे उनके मालिक हों और उस पर काम करने के लिए दूसरों को रोजगार पर लगाते हों या चाहे वे उस पर काम करके दसरों के लिए लाभ कमाते हों। स्वाभाविक है कि दोनों के हित एक दसरे के विरोधी थे व जिसका सामंजस्य नहीं हो सकता।

संक्षेप में मार्क्सवाद ने दिखाया कि प्रचलित अर्थव्यवस्था समाज का आधार थी। जिसने इसके अन्य क्षेत्रों को निर्धारित किया और वर्ग संघर्ष ऐसे किसी भी समाज का अभिन्न अंग थी जहाँ संसाधन किसी की निजी सम्पत्ति थी तथा जो दूसरों के श्रम पर जीवित रहने का जरिया बन गई थी। इसीलिए इतिहास में जब तक निजी सम्पत्ति अस्तित्व में है वर्ग संघर्ष को टाला नहीं जा सकता यानी समाजवादी क्रांति के आने तक, जहाँ संसाधनों का सामूहिक स्वामित्व होगा, यह ऐतिहासिक विकास की हर अवस्था का आवश्यक हिस्सा है। इन्हीं विचारों से ऐतिहासिक भौतिकवाद बना।

इन्हीं विचारों को आधार बनाकर उन्होंने दिखाया कि किस तरह से प्रत्येक समाज एक सी ही विकासावस्था से गुजरा-आदिम, साम्यवादी, दासता, सामंतवाद, पूँजीवाद, समाजवाद और किस तरह भले ही भिन्न देशों में कुछ विशेषताएँ फर्क हों इनमें से किसी भी अवस्था का छूट जाना संभव नहीं था।

किंतु मार्क्सवाद और ऐंगेल्स ने न केवल ऐतिहासिक विकास की समझ को व्यक्त किया, बल्कि इतिहास की उनकी अपनी अवस्था का वखुबी विश्लेषण करने के प्रति भी उनका विशेष रूप से ध्यान था। ऐसा इसलिए कि वे न केवल विश्व को समझना भर चाहते थे बल्कि इसे बदलना भी चाहते थे। इसे बदलने के लिए यद्यपि सर्वप्रथम यह समझना आवश्यक था कि मौजूदा वस्तस्थिति की कार्यप्रणाली कैसी है, इसीलिए उनका दूसरा प्रमुख योगदान पूँजीवाद समाज की पूर्ण व कटु आलोचना करना था खासतौर से इसके परिणामस्वरूप पूँजीपति जिस तरह मजदूर वर्ग का शोषण कर रहे थे। यह होता कैसे है इसके विषय में हम इस पाठ में पहले ही चर्चा कर चुके हैं। यह मार्क्स और एंगेल्स ही थे जिन्होंने इस विषय पर काम किया।

इस तरह उन्होंने आर्थिक सिद्धांत को भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने दिखाया कि किस तरह पूँजीवाद में एक मजदूर दिन का एक हिस्सा अपने और अपने परिवार के खर्चे की कीमत (वेतन) निकालने में बिताता है, जबकि दिन के बाकी हिस्सों में वह बिना सुविधाओं के काम करता है, क्योंकि अब वे अपने पाये जाने वाले वेतन से कहीं अधिक न ज्यादा उत्पादन कर रहा है तथा जिसके द्वारा यह अधिशेष मूल्य की रचना करता है तथा जो पूँजीपति के मुनाफे का स्रोत है और वह जरिया है जिसके चलते मजदूर को अपने श्रम का फल नहीं मिलता।

अतः पूँजीवाद सिर्फ एक आर्थिक व्यवस्था ही नहीं है, यह कुछ निश्चित सामाजिक संबंधों का समह भी है यानी पूँजीपति और मजदूर के बीच का विशिष्ट संबंध जो मजदूर के हित के खिलाफ है व जो सामाजिक रूप से न्यायसंगत भी नहीं है। मजदूर व्यवस्था का आवश्यक अंग है क्योंकि श्रम के बिना कोई भी उत्पादन नहीं किया जा सकता अतः यहाँ श्रम का एक निश्चित सामाजिक संगठन है किंतु यह  सामाजिक संगठन पूंजीपतियों के स्वामित्व वाली पूँजी या धन के द्वारा शासित है और जो मजदूरों के पास नहीं है।

 मार्क्सवाद : राजनैतिक सिद्धांत

पूँजीवाद के इस आर्थिक विश्लेषण द्वारा मार्क्स और एंगेल्स ने अपने राजनैतिक सिद्धांत व्यक्त किये। उन्होंने इशारा किया कि पूँजीवाद खुद ही पूँजीवादी समाज का तख्ता पलटने की परिस्थितियाँ पैदा करता है, यानी पाने समाज के गर्भ में ही नये समाज के बीज अंकरित होते हैं। सर्वप्रथम, उन्होंने यह बताया कि पूँजीवाद समय-समय पर खतरों से घिरा रहेगा। ये खतरे खुद इसी की प्रकृति से आते हैं। जहाँ पूँजीवाद ज्यादा से ज्यादा उत्पादन करता है, लोग ज्यादा से ज्यादा गरीब होते जाते हैं और जो उत्पादन है उसको खरीदने में असमर्थ होते हैं।

मार्क्स के अनुसार यह अधिक उत्पादन और कम खपत के खतरे तथा पूँजीपति व मजदुर के हितों के असामजस्य जैसी स्थिति की ओर धकेलती है। यह पूँजीवाद का मख्य अन्तविरोध भी है। अधिक मुनाफा पाने के लिए पूँजीपति मजदर को कम से कम वेतन देता है, किंतु अपना माल बेचने के लिए मजदूर के पास खरीदने के लिए ज्यादा से ज्यादा पैसे होने चाहिए यानी उसे उन्हें ज्यादा वेतन देना चाहिए क्योंकि उनके पास आय का कोई अन्य जरिया नहीं है। जाहिर है कि वह यह दोनों काम एक साथ नहीं कर सकता। कुछ समय के लिए पूँजीवाद नये बाजारों के पुर्नआबंटन के लिए यद्ध छेड़कर या मजदूरों को आकर्षित करने के लिए सधार के कछ कदम उठाकर इन खतरों से उभर सकता है। किंत यह अनंत नहीं चलता रह सकता। क्योंकि अन्तविरोध खद व्यवस्था में ही है। इसलिए पंजीवाद के आर्थिक विश्लेषण से मार्क्स और ऐंगेल्स ने यह राजनैतिक निष्कर्ष निकाला कि पूँजीवाद के बदलने को टाला नहीं जा सकता।

उन्होंने कहा कि वह वर्ग जो इस व्यवस्था को बदलेगा मजदूर वर्ग या सर्वहारा है। उन्होंने बताया कि बडी फैक्ट्रियों की स्थापना से उसमें मजदूर वर्ग यानी सर्वहारा वर्ग भी उभरता है जिनके पास काम करके कमाने के सिवाय और कुछ नहीं है। इसीलिए निजी सम्पत्ति पर आधारित पूँजीवाद जैमी व्यवस्था में इस वर्ग का कुछ भी दाँव पर नहीं लगा है। इसीलिए पूँजीवाद के विरुद्ध संघर्ष में उनके पास अपनी वेडिंयों को खोने के सिवाय और कछ नहीं है। दूसरे पूँजीवाद के तहत सर्वहारा समाज का सबसे अधिक उत्पीड़ित हिस्सा है और इस कारण बदलाव में सबसे ज्यादा रुचि रखने वाला हिस्सा है। तीसरे, सर्वहारा के पास उस व्यवस्था जो उसका शोषण करती है, के खिलाफ लड़ने के सिवाय अन्य कोई दीर्घकालिक रास्ता नहीं था, क्योंकि यदि परे दिन में एक पहर जो काम करता है उसका अधिकतर हिस्सा उमे खुद को नहीं बल्कि पूँजीपति को धनी बनाने में चला जाता है तो वह कैसे स्वतंत्र रहकर एक अर्थपर्ण जीवन व्यतीत कर सकता है इसलिए पूँजीवाद को बदलना सर्वहारा के लिए एक आवश्यक और मनपसंद कार्य भी बन गया क्योंकि इसी पर उसके काप के कम घंटे, आराम, संस्कृति स्त्री पुरुषों के बीच समानता और अच्छे स्वास्थ्य व शिक्षा का अधिकार निर्भर करेगा।

मार्क्स और एंगेल्स ने यह भी संकेत किया कि मजदर वर्ग की मक्ति के साथ ही समाज के अन्य हिस्सों की भी मक्ति मिल सकती है। क्योंकि यह मजदूर वर्ग ही है जो समाज की सबसे निचली तह को बनाता है। साथ ही परिस्थितियों के चलते मजदूर वर्ग ही पूँजीवाद के बदलने के संघर्ष में समझौता न करने वाला एकमात्र वर्ग हो सकता है। अतः मार्क्स और रोंगेल्स पूँजीवाद के अपने आर्थिक विश्लेषण में जिस दसरे मख्य राजनैतिक निष्कर्ष पर पहँचे वह यह है कि यह मजदूर वर्ग ही है जो संघर्ष का नेतृत्व करेगा और समाजवादी क्रांति का सेनापति होगा। अतः पूँजीवाद ने स्वयं ही नष्ट होने के साधन जुटाए।

संक्षेप में, उन्होंने कहा कि पूँजीवाद के पहले या उसके बिना कोई समाजवाद नहीं हो सकता, पूंजीवाद अपनी फैक्ट्रियों द्वारा उत्पादन बढ़ाने की संभावना बनाता है ताकि हर एक को । उसके काम के मुताबिक बाँटने के लिए पर्याप्त हो। पूँजीवाद अपनी फैक्ट्री व्यवस्था द्वाग मजदूर वर्ग को भी जन्म देता है जो इसे पलट सकता है।

 मार्क्सवाद : क्रांति का सिद्धांत

मार्क्स ने सवाल किया क्या पूँजीपति स्वेच्छा से और अपने आप अपने लाभ को छोड़ देंगे? कछ विशिष्ट पँजीपति शायद अपने लाभ का कछ अंश दान के रूप में दे देंगे। लेकिन इमसे ज्यादा कुछ नहीं। उन्होंने ऐसा अपने निजी विचार के रूप में नहीं कहा। उन्होंने विभिन्न यगों में मानव समाज के इतिहास की ओर इशारा किया – लोगों ने बिना संघर्ष किये कछ नहीं पाया, समाज के विशेषाधिकार प्राप्त हिस्से ने तब तक कछ नहीं दिया जब तक लड़ाई से उनका सामना नहीं हुआ। उन्होंने कहा कि इसीलिए मजदूर वर्ग की मुक्ति केवल मजदूर वर्ग के वर्ग-संघर्ष से ही हो सकती है।

लेकिन यह संघर्ष क्या रूप धारण करेगा- क्या यह शांतिपूर्ण हो सकता है? इसके जवाब में मार्क्स का यह कहना था : सशक्त फौजें व राज्य तंत्र शासक वर्ग के हाथों में है और वे इसका प्रयोग अपने प्रभुत्व को बनाये रखने के लिए ही करते हैं। पूँजीवाद के समाजवाद में परिवर्तन शांतिपूर्वक नहीं हो सकता। मजदूर वर्ग को क्रांति द्वारा राज्य शक्ति पर कब्जा करना होगा और एक नये राज्य द्वारा समाजवादी राज्य का निर्माण करने का आश्वासन देना होगा जो सर्वहारा का अधिनायकवाद होगा।

लेकिन क्या यह लड़ाई मजदर वर्ग और पूँजीपति के बीच होने वाली केवल एक आर्थिक लड़ाई ही होगी? नहीं मार्क्स के अनुसार यह केवल एक आर्थिक लड़ाई नहीं होगी और हालांकि मजदूर वर्ग क्रांति की प्रेरक सामाजिक शक्ति होगी इसमें दूसरे भाग भी हिस्सा लेंगे। दूसरों के सामाजिक भूल के कारण यद्यपि उनकी भूमिका केवल गौण होगी और कभी-कभी ठल-मिल भी। मार्क्स ने बताया कि पूँजीवाद का विकास गिने-चुने हाथों में धन के व्यापक केन्द्रीयकरण और अधिकतर लोगों में बढ़ती हई गरीबी की स्थिति की ओर ले जाता है। पूँजीवाद के संकट ने न केवल मजदूर वर्ग पर प्रभाव डाला, मध्यम वर्ग पर भी, खासतौर से निम्न मध्यम वर्ग और किसानों पर इसका प्रभाव पड़ा।

इसीलिए पूँजीवाद के खिलाफ लड़ाई न केवल मजदूर वर्ग द्वारा बल्कि मध्यम बुद्धिजीवी वर्ग के कुछ हिस्सों, व मध्यम वर्ग द्वारा भी लड़ी जाएगी जो मजदर वर्ग के राजनैतिक निर्णय को अपनायेंगे क्योंकि वह राजनैतिक व सामाजिक रूप में न्याय संगत है तथा गाँवों में रहने वाले कृषि मजदूरों द्वारा भी जो कि समान रूप से शोषित हैं पर चूँकि मध्यम वर्ग का सामाजिक मूल निजी संपत्ति की जड़ में है, वे कभी भी समझौता न कर सकने वाली भूमिका नहीं निभा पायेंगे-उनमें हमेशा ढलमलापन रहेगा। यदि उनका एक भाग क्रांति के साथ होगा तो दसरा बर्जाआ की या पूँजीपतियों के साथ। अतः मख्य भमिका मजदर वर्ग की ही होगी। जैसा कि मार्क्स ने जोर देकर कहा। दसरे, लड़ाई कई क्षेत्रों में लड़ी साधनों पर पूँजीपतियों का स्वामित्व है, यह एक राजनैतिक लड़ाई होगी, क्योंकि राजनैतिक ढाँचा पूँजीपतियों के प्रभुत्व में है, सामाजिक असमानता व नैतिकता के कारण, सामाजिक होगी क्योंकि यह एक अधिक मानवीय समाज के लिए है।

राज्य शक्ति पर कब्जा करने का पहला प्रयास 1871 में पेरिस के मजदूर वर्ग द्वारा हुआ था। आपने पेरिस कम्यून के बारे में जरूर सुना होगा। पेरिस कम्यून की स्थापना करने में हजारों मजदूरों ने अपनी जानें गवाँ दी लेकिन उन्होंने शासक वर्ग के पुराने राजकीय तंत्र को नष्ट नहीं किया। इसीलिए पेरिस कम्यून चल नहीं पाया। इसे निर्दयता से कुचल दिया गया। इस अनुभव ने मार्क्स की इस समझ के सत्य को प्रत्यक्ष रूप से दिखा दिया कि समाजवादी राज्य की स्थापना के आश्वासन को परा करने के लिए सर्वहारा का अधिनायकवाद तब तक जरूरी है जब तक कि समाज से शासक वर्ग के आर्थिक, सामाजिक व राजनैतिक आधार की शक्ति को समाप्त नहीं कर दिया जाता। इसे समझना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि मार्क्स शासक वर्ग की शारीरिक रूप से समाप्ति या हत्या की वकालत नहीं कर रहे थे- वे इसी बात की वकालत कर रहे थे कि उस तबके को शासक वर्ग बने रहने की और इजाजत न दी जाये। संक्षेप में वे पूर्ण समानता-आर्थिक समानता भी-पर आधारित एक वर्गविहीन समाज की वकालत कर रहे थे।

क्रांति किस तरह से लायी जाये, इसके बारे में कहने को उनके पास कुछ और भी था। उन्होंने कहा था कि इसके उत्तराधिकार में प्राप्त अतविरोधों और इसमें मजदूर वर्ग की स्थिति के चलते पूंजीवाद के पलटने को टाला नहीं जा सकता। किंतु वे कोई ज्योतिष नहीं थे। वे एक समाज वैज्ञानिक थे। वे कोई भविष्यवाणी नहीं कर रहे थे। वे भविष्य में समाज के विकास की संभावनाओं व उस सामान्य रुख को दिखा रहे थे जिसकी ओर समाज अग्रसर था तथा कैसे इसके परिणाम अंततः इसे समाजवाद की ओर ले जायेंगे। उन्होंने भविष्य में होने वाली क्रांतियों की कोई सही समय सूची नहीं दी। उन्होंने दिखाया कि कैसे यह वर्ग संघर्ष पर निर्भर होगा जो पूँजीतियों और मजदूरों के बीच का संघर्ष है व इन संघर्षों के परिणाम क्या होंगे मजदूर वर्ग को सफल होने के लिए सर्वप्रथम क्रांतिकारी सिद्धांतों की सही समझ होनी चाहिए और इसके लिए उसे अच्छी तरह से संगठित होना चाहिए। इस उद्देश्य के लिए उन्होंने मजदूर वर्ग के बीच राजनैतिक शिक्षा और मजदूर वर्ग के संघर्ष को नेतृत्व देने के लिए मजदूर वर्ग पार्टी की स्थापना पर जोर दिया।

मार्क्स ने न केवल सिद्धांतों में ही योगदान दिया उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय सर्वहारा पर आधारित मजदूरों की सर्वप्रथम अन्तर्राष्ट्रीय सभा की स्थापना की। दूसरे शब्दों में, यह इस बात को मान्यता देता है कि दुनियाँ के संपूर्ण मजदूर वर्ग के हित समान हैं, इसीलिए, उन्हें एकजुट होकर लडना चाहिए। इसीलिए अन्तर्राष्ट्रीय पुरुष मजदूर सभा का नारा था- “दुनिया के मजदूरों एक हो।” 

मजदूर वर्ग द्वारा सफल क्रांति सर्वप्रथम रूस में 1917 में हुई। रूस के मजदूर वर्ग ने न केवल उद्योग पर से निजी सम्पत्ति की समाप्ति की, उसने किसान वर्ग के साथ मिलकर भूमि का राष्ट्रीयकरण किया। उसने एक नये राज्य की रचना की – मजदूर जनता के शासन पर आधारित एक समाजवादी राज्य की। उसने समाजवादी जनतंत्र पर आधारित आर्थिक समानता व सामाजिक न्याय की स्थापना की।

सारांश

  • किस तरह से समाजवादी व्यवस्था पूर्ण सामाजिक व आर्थिक समानता के पक्ष में है।
  • कि, यह अन्यायपूर्ण पूँजीवादी व्यवस्था का अतविरोध ही था जिसने समाजवादी विचारधारा के उभार को बढ़ावा दिया।
  • कि सर्वप्रथम, चेतना की कमी के कारण समाजवादी विचारधारा ने तर्क दिया कि पँजीवाद के अन्याय को हृदय से नैतिकताओं में परिवर्तन से हटाया जा सकता है।
  • यद्यपि पूँजीवाद की अन्दरूनी शोषण व्यवस्था की समझ के साथ, समाजवादी विचारधारा ने इस असमानता को और बढ़े हुए रूप से बनाया।
  • समाजवादी समाज, अधिसंख्यक यानी सर्वहारा के राज्य की स्थापना के द्वारा ऐसी परिस्थितियाँ बनाता है जहाँ पूर्ण सामाजिक व आर्थिक समानता का आश्वासन हो।
  • कि यह कार्ल मार्क्स थे जिन्होंने पूँजीवाद के साम्यहीन ढाँचे व आर्थिक आधार को सामाजिक परिवर्तन के सिद्धांत मे ठोस रूप से जोडा

ऐसा करने से काल्पनिक समाजवाद इत्यादि विचारों पर आधारित सामाजिक सिद्धांत, जो सामाजिक परिवर्तन व अन्यायपूर्ण ढाँचों को हटाने के सिद्धांत रूप से जोड पाने में असमर्थ थे, से अलग हट गये। ऐसा करने में उन्होंने हमें एक सामाजिक सिद्धांत दिया- जो अर्थशास्त्र, राजनीति व इतिहास को आपस में जोड़ता है।

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *