जलभृत एवं जलभृत प्रणालियों के अर्थ : उनकी संधारणीयता और इस संबंध में उठाए गए कदम

प्रश्न: देश में जलभृत (एक्विफर) प्रणालियों को सीमांकित करने की आवश्यकता का अनुभव किया जा रहा है, ताकि उनकी संधारणीयता संबंधी योजना बनाने हेतु महत्वपूर्ण सूचना प्रदान की जा सके। विश्लेषण कीजिए। साथ ही, इस संबंध में भारत सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का भी उल्लेख कीजिए।

दृष्टिकोण

  • जलभृत एवं जलभृत प्रणालियों के अर्थ की संक्षेप में व्याख्या कीजिए। 
  • उनकी संधारणीयता की योजना का निर्माण करने हेतु उन्हें सीमांकित करने की आवश्यकता का विश्लेषण कीजिए। 
  • इस संबंध में उठाए गए कदमों की चर्चा कीजिए।

उत्तर

जलभृत पारगम्य पदार्थों का एक विशाल निकाय होता है जहाँ भूजल विद्यमान होता है और यह भूजल संपूर्ण रंध्र युक्त क्षेत्र में भरा होता है। चट्टानों के प्रकार या नदी बेसिन जैसी कुछ समान विशेषताओं के आधार पर जलभृत प्रणालियों में अनेक जलभृत इकाइयाँ संयुक्त होती हैं। ।

Aquifer

जल-भूविज्ञान (hydro geological) संबंधी विशेषताओं के आधार पर भारत को 14 प्रमुख जलभृत प्रणालियों एवं 42 प्रमुख जलभृतों में वर्गीकृत किया गया है, जिनमें भारत में सबसे अधिक जलभृत प्रणाली जलोढ़क (Alluvium) है।

 

संधारणीय जलभृतों की योजना बनाने हेतु जलभृतों को सीमांकित करने की आवश्यकता:

  • अनेक क्षेत्रों में नलकूपों के माध्यम से गहन व अनियंत्रित भूजल निकासी के कारण भूजल में तीव्र और व्यापक गिरावट हो रही है।
  • जलभृत में भूजल की मात्रा और गुणवत्ता का आकलन करने हेतु।
  • भूजल निष्कर्षण के संधारणीय स्तर का आकलन करने के लिए।
  • देश को जलवायु परिवर्तन के प्रति मजबूत (resilient) बनाने हेतु।

“भूजल बिकास” से “भूजल प्रबंधन” की दिशा में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए हैं। भारत में जलभृत के मानचित्रण एवं सीमांकन के माध्यम से भूजल की सटीक और व्यापक सूक्ष्म-स्तरीय जानकारी प्राप्त की गई है जो इस साझे संसाधन हेतु उपयुक्त पैमाने पर मजबूत भूजल प्रबंधन योजनाओं का निर्माण और कार्यान्वयन करने में सक्षम बनाएगा।

इसके वैज्ञानिक और सामाजिक दोनों प्रकार के लाभ होंगे।

वैज्ञानिक

  • जल धारण करने वाली संरचनाओं की जानकारी
  • विभिन्न क्षेत्रों की जल धारण क्षमता का आकलन
  • जलभृत की गुणवत्ता का प्रबंधन
  • मांग-आपूर्ति विश्लेषण।
  • संधारणीय प्रबंधन के लिए रणनीतियाँ।
  • कृषि, उद्योगों, पेयजल प्रयोजनों के लिए कार्यशील कुँओं का यथार्थ आकलन।
  • जलभृत प्रबंधन इकाई का गठन
  • संधारणीय भूजल प्रबंधन के लिए जलभृत प्रबंधन योजनाओं का निर्माण।

सामाजिक

  • समुदाय और हितधारकों की भागीदारी को सुनिश्चित करेगा, परिणामस्वरूप राज्यों को संसाधनों का कुशल और न्यायोचित प्रबंधन करने में सक्षम बनाएगा।
  • इससे सामुदायिक स्तर पर जलभृतों की बेहतर समझ विकसित हो सकेगी। वैज्ञानिक इनपुट और पारंपरिक ज्ञान दोनों मिलकर संधारणीय भूजल संसाधन प्रबंधन को सुनिश्चित करेंगे।
  • संधारणीय फसल पैटर्न को सुनिश्चत बनाएगा, फलस्वरूप खाद्य सुरक्षा में योगदान बढ़ेगा।
  • ग्रामीण और शहरी भारत के बड़े भागों में पेयजल सुरक्षा, उन्नत सिंचाई सुविधा एवं जल संसाधन विकास में संधारणीयता प्राप्त करने में सहायता करेगा।

सरकार द्वारा उठाए गए कदम

  • देश में महत्वपूर्ण जल-भूवैज्ञानिक इकाइयों की सीमाओं, विशेषताएँ, उत्पादन क्षमताओं और विकास की संभावनाओं को समझने हेतु केंद्रीय भूजल बोर्ड द्वारा जल भूविज्ञान संबंधी अध्ययन।
  • भारत की प्रमुख नदी बेसिनों में जल संतुलन अध्ययन सम्पन्न करने के लिए अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के सहयोग से अनेक परियोजनाएं आरम्भ की गईं जिनमें जलभृतों की भूजल व्यवस्था एवं इसकी विकास संभावनाओं का अध्ययन किया गया था।
  • नेशनल प्रोजेक्ट ऑन एक्वीफर मैनेजमेंट (NAQUIM)- 2012 – हेली बोर्न जियोफिजिकल सर्वे जैसी उन्नत प्रौद्योगिकियों और RockWorks, ARC GIS, Modflow, Map info आदि उन्नत सॉफ्टवेर का उपयोग कर प्रबंधन योजनाएँ तैयार करना।

अंतिम उद्देश्य हितधारकों और राज्य सरकारों के परामर्श से प्रबंधन योजनाएँ तैयार करना है, जो भूजल के गिरते स्तर के पुनर्भरण (recharge) और अन्य उपायों की पहचान करेंगे एवं उसके संधारणीय उपयोग एवं विकास हेतु दिशा-निर्देश तैयार करेंगे।

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