ई. वी. रामास्वामी पेरियार का सामाजिक-राजनीतिक सुधारों में योगदान

प्रश्न: रूढ़िवाद को चुनौती देने और सामाजिक-राजनीतिक सुधारों को आरंभ करने में ई. वी. रामास्वामी पेरियार के योगदान पर प्रकाश डालिए।

दृष्टिकोण

  • ई. वी. रामास्वामी के राजनीतिक जीवन और कांग्रेस पार्टी के साथ उनके संबंधों की पृष्ठभूमि का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
  • रूढ़िवाद को चुनौती देने और सामाजिक-राजनीतिक सुधारों को आरंभ करने में ई.वी. रामास्वामी पेरियार के योगदान पर प्रकाश डालिए।

उत्तर

ई. वी. रामास्वामी, जिन्हें सामान्यतः ‘पेरियार’ के नाम से जाना जाता है, एक द्रविड़ सामाजिक-राजनीतिक सुधारक थे। वे राजनीतिक और सामाजिक सेवा में विभेद नहीं करते थे। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1919 में कांग्रेस पार्टी के साथ की और विभिन्न रचनात्मक कार्यक्रमों का संचालन किया, जैसे कि खादी के उपयोग का प्रचार, ताड़ी की दुकानों पर धरना, विदेशी वस्त्रों का विक्रय करने वाली दुकानों का बहिष्कार करना और अस्पृश्यता उन्मूलन हेतु प्रयास करना। यद्यपि कांग्रेस द्वारा ब्राह्मणों के हितों को वरीयता देने के कारण 1925 में उन्होंने पार्टी से त्याग-पत्र दे दिया।

पेरियार के योगदान

सामाजिक 

  • वायकोम मन्दिरों के सामने किये गए वायकोम सत्याग्रह में उनके योगदान के लिए उन्हें ‘वायकोमवीर’ कहा गया। इस सत्याग्रह में उन्होंने निम्न जाति के व्यक्तियों को सार्वजनिक पथ का उपयोग करने की अनुमति प्रदान किये जाने की मांग की।
  • कांग्रेस से त्याग-पत्र देने के बाद वह जस्टिस पार्टी से जुड़े और नौकरशाही एवं शिक्षा में गैर-ब्राह्मणों के लिए आरक्षण का समर्थन किया।
  • उन्होंने तमिल पहचान को एक जातिगत व्यवस्था से अप्रभावित समतावादी आदर्श के रूप में पुनः स्थापित करने का प्रयास किया और इसका प्रयोग कांग्रेस समर्थित भारतीय पहचान के विरोध हेतु किया।
  • अपनी साप्ताहिक पत्रिका ‘कुडी अरासु’ (अर्थात् गणतंत्र) में उन्होंने जाति उन्मूलन जैसे मुद्दों पर विस्तार से लिखा।
  • उन्होंने लोगों से अपने नाम से जाति संबंधी प्रत्यय का त्याग करने और सार्वजनिक सम्मेलनों में दलितों द्वारा पकाए गए भोजन के साथ सहभोज को प्रारंभ करने का अनुरोध किया।
  • ई. वी. रामास्वामी ने महिलाओं के अधिकारों का भी समर्थन किया। उन्होंने तर्क दिया कि महिलाओं को स्वतंत्रता प्राप्त होना आवश्यक है। साथ ही उन्होंने महिलाओं को रोजगार के समान अवसर प्रदान किये जाने का भी सशक्त आग्रह किया।
  • 1926 में उन्होंने आत्म सम्मान आंदोलन प्रारंभ किया, जिसमें कर्मकाण्ड रहित विवाहों को प्रोत्साहित किया गया और महिलाओं के लिए संपत्ति एवं तलाक के अधिकारों को स्वीकृति प्रदान की गयी। इसका लक्ष्य तर्कवाद के सिद्धांतों को बढ़ावा देने माध्यम से धार्मिक अनुष्ठानों वाले ब्राह्मणवादी धर्म और संस्कृति को अस्वीकृत करना भी था।

राजनीतिक

  • 1940 के दशक में उन्होंने द्रविड़ कड़गम पार्टी की स्थापना की। इस पार्टी द्वारा तमिल, मलयालम, तेलुगु और कन्नड़ भाषियों के लिए एक स्वतंत्र द्रविड़ नाडु की मांग की गई। कालान्तर में इसी पार्टी से DMK और AIADMK जैसे वर्तमान मुख्यधारा के तमिल राजनीतिक दलों की उत्पत्ति हुई।
  • 1930 के दशक के उत्तरार्द्ध में उन्होंने हिंदी-विरोधी प्रदर्शन का नेतृत्व किया। यह विरोध प्रदर्शन राज्य के स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य भाषा बनाए जाने के विरुद्ध प्रारंभ किया गया था।
  • सामाजिक और राजनीतिक सुधारों में इनके योगदान के लिए उन्हें अज्ञानता, अंधविश्वासों और निरर्थक रीति-रिवाजों के विरुद्ध संघर्ष करने वाले ‘दक्षिण पूर्व एशिया के सुकरात’ के रूप में भी जाना जाता है।

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