कार्पोरेट शासन (Corporate Governance)
कार्पोरेट गवर्नेस यानि निगम शासन व्यवस्था उन व्यवस्थाओं सिद्धांतों एवं प्रक्रियाओं के समूह को कहा जाता है जिसके द्वारा कोई कंपनी शामिल होती है। कंपनी को कैसे निर्देशित या नियंत्रित किया जाए, इस संबंध में दिशानिर्देश निगम द्वारा ही उपलब्ध कराया जाता है ताकि कंपनी अपने लक्ष्यों एवं उद्देश्यों को इस ढंग से पूरा करे ताकि कंपनी में नैतिक मूल्यों एवं मान्यताओं के अनुरूप कार्यव्यवहार हो, साथ ही भविष्य में सभी अंशधारकों को इसका लाभ मिले। कार्पोरेट शासन जिसका लक्ष्य प्रबंधन की उपयुक्तता, पारदर्शिता और एकता का संवर्द्धन है, न केवल एक विधिक अनिर्णयता है बल्कि जीवन का एक द्रष्टिकोण भी जो कंपनी के लिए निदेशकों के आत्मविश्वास और प्रतिबद्धता को प्रेरित और मजबूत करने में मदद करता है।
लोक उद्यमों में कार्पोरेट गवर्नेस
(Corporate Governance in Public Enterprises)
लोक उद्यमों में कार्पोरेट शासन हाल ही में चर्चा में आया है। चर्चा का विषय मुख्य रूप से यह रहता है कि सरकार द्वारा नियंत्रित उद्यमों के द्वारा किसी प्रकार लोक सेवा प्रदान की जा रही है और इस प्रक्रिया में किस हद तक पारदर्शिता बरती जा रही है। लोक उद्यमों के माध्यम से सरकार एक साथ सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और अन्य दूसरे लक्ष्यों को भी प्राप्त करना चाहती है। यही कारण है कि राज्य नियंत्रित उद्यमों में कार्पोरेट शासन एक बेहद जटिल प्रक्रिया बन चुकी है। इस संदर्भ में सरकार द्वारा नियंत्रित बिजनेस (उद्यमों) पर सरकार के एकाधिकार, नियामक निर्देश एवं उत्पाद के लिए वितरण से संबंधित कई प्रश्न उठने लगे हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था में लोक उद्यमों के महत्वपूर्ण योगदान से इंकार नहीं किया जा सकता और भविष्य में इसकी भूमिका महत्वपूर्ण बनी रहेगी। परंतु इन उद्यमों में कार्पोरेट शासन को लेकर एक आपातकाल जैसी स्थिति उत्पन्न होती दिख रही है। नैतिक मूल्यों को ध्यान में रखते हुए अब यह जरूरी हो गया है कि सरकार द्वारा इस प्रकार की विशेषज्ञता हासिल की जाए ताकि राज्य नियंत्रित लोक उद्यमों में शासन व्यवस्था की गुणवत्ता में सुधार हो सके। लोक उद्यमों से होने वाले लाभ तो प्रत्यक्ष हैं परंतु राज्य नियंत्रित उद्यमों में एक बेहतर कार्पोरेट व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने की प्रक्रिया जटिलकर होती जा रही है। इस संदर्भ में लोक उद्यमों पर सरकार के स्वामित्व तथा इसके प्रबंधन में राजनीतिक हस्तक्षेप के बीच संतुलन स्थापित करने की आवश्यकता एक बड़ी चुनौती के रूप में उभरा है। एक अन्य महत्वपूर्ण समस्या यह भी है कि लोक उद्यमों में कार्पोरेट शासन को नियमित व निर्देशित करने के क्रम में सरकार व्यावसायिक प्रतियोगिता जैसे बातों की अनदेखी न कर दे।
कार्पोरेट शासन : लोक उद्यमों के समक्ष चुनौतियां
(Corporate Governance : Challenge in Public Enterprises)
राज्य नियंत्रित उद्यमों में कार्पोरेट शासन कई देशों में एक चुनौती पूर्ण कार्य बन गया है। गंभीर परीक्षण के पश्चात यह स्पष्ट रूप से सामने आया है कि लोक उद्यमों में एक बेहतर कार्पोरेट शासन सुनिश्चित करना तथा इसके लिए अनुकूल माहौल तैयार करना सरकार के लिए एक कठिन कार्य बन चुका है। पुन: लोक उद्यमों को बाजार व्यवस्था से जोडना भी अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। इस संदर्भ जो मुद्दे उभर कर आए हैं उनमें कुछ प्रमुख है:
- अस्पष्ट उद्देश्य (Unclear Ownership Objectives): लोक उद्यमों को एक साथ कई उद्देश्यों एवं लक्ष्यों को प्राप्त करने का दायित्व दिया जाता है, जैसे मूल्य नियंत्रण, उत्पादन लक्ष्य रोजगार से संबंधित लक्ष्य तथा सामाजिक सेवा प्रदान करने का लक्ष्य आदि। इनमें से कछ उद्देश्य ऐसे भी होते हैं जिनके बीच संघर्ष उत्पन्न होने की स्थिति बन जाती है। अर्थात् दो लक्ष्यों के बीच तालमेल नहीं बन पाता। ऐसे में लोक उद्यमों के प्रबंधकों के लिए यह तय करना मुश्किल होता है कि किस लक्ष्य और उद्देश्य को तरजीह दी जाए। राजनीतिक नेतागण इसी परिस्थिति का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं तथा लोक उद्यमों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करते हैं। अत: लोक उद्यमों में लक्ष्यों एवं उद्देश्यों की स्पष्टता निहायत जरूरी है ताकि राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावना कम अथवा न बने। इसके लिए भी एक तंत्र की आवश्यकता है जिससे भ्रष्टाचार के अवसर पैदा ही न हो पाएं।
- अशक्त एवं निर्बल स्वामित्व (Weak Ownership): एक प्राइवेट कंपनी में स्वयं कंपनी का मालिक ही कार्पोरेट शासन में मुख्य भूमिका निभाता है। परंतु सरकार द्वारा नियंत्रित कंपनियों/उद्यमों के साथ ऐसी बात नहीं होती। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो लोक उद्यमों का स्वामित्व सरकार में निहित होता है। सरकार द्वारा नियंत्रित लोक उपक्रमों में कार्पोरेट शासन संगठन की प्रशासनिक इकाइयों द्वारा संचालित होती है और यही इकाइयां स्वामित्व का प्रतिनिधित्व भी करती हैं। परंतु ये इकाइयां सक्षम नहीं होती और न ही इनका कोई स्पष्ट लक्ष्य ही निर्धारित रहता है। संक्षेप में कहा जाए तो सरकार के स्वामित्व का विकेंद्रीकरण हो जाता है और ऐसे में सरकार नियंत्रित उद्यमों में एकता, पारदर्शिता एवं जवाबदेयता का अभाव दिखता है। इसके कारण कार्पोरेट शासन व्यवस्थित रूप से नहीं चल पाता अर्थात् कार्पोरेट शासन से जुड़े नैतिक मानदंडों की अनदेखी की जाती है।
- पारदर्शिता का निम्न स्तर (Low Levels of Transparency and Disclosure): सरकार नियंत्रित उद्यमों में पारदर्शिता का अभाव रहता है। इससे उद्यमों के अंदर शासन व्यवस्था मे जवाबदेयता, प्रतिबद्धता और शासन संबंधी कई बातों को प्रबंधनकर्ताओं से छिपाया भी नहीं जाता है जिसके कारण भ्रष्टाचार पनपने की संभावना बढ़ जाती है। अतः सरकार नियंत्रित उद्यमों में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए संगठन के अंदर अंकेक्षण तथा लेखा परीक्षण की व्यवस्था करना अत्यंत आवश्यक है।
- निदेशक मंडल की गैर-व्यावसायिक मनोवृत्तिः सरकार नियंत्रित उद्यमों में अक्सर यह पाया जाता है कि वहां के निदेशक मंडल बहुत प्रभावी नहीं होते तथा उनके निर्णयों पर सरकार का स्पष्ट प्रभाव रहता है। अतः निदेशक मंडल को अधिक प्रभावी बनाने के लिए उन्हें और अधिक प्राधिकार तथा स्वायत्ता देने की जरूरत है।
- कॉर्पोरेट शासन की आवश्यकता व सिद्धांत : कॉर्पोरेट शासन, कॉर्पोरेट औचित्य, पारदर्शिता तथा जवाबदेयता के संवर्द्धन से संबंधित है। अन्य शब्दों में, अच्छा कॉर्पोरेट गवर्नेस अच्छा व्यवसाय है।
यह निम्न उद्देश्यों को सुनिश्चित करता है:
- कॉर्पोरेट उद्देश्यों को हासिल करने के लिए पर्याप्त प्रकटन (डिस्क्लोजर) तथा प्रभावी निर्णयन
- व्यवसाय लेन-देन में पारदर्शिता
- सांविधिक तथा कानूनी अनुपालन शेयर धारकों के हितों का संरक्षण
- व्यवसाय के मूल्यों तथा नैतिक आचरण के प्रति प्रतिबद्धता
अन्य शब्दों में, कॉर्पोरेट शासन प्रबंधन द्वारा कॉर्पोरेट के सही मालिकों के रूप में शेयरधारको के स्वाधिकारों तथा शेयर धारकों की ओर से न्यासियों के रूप में उनकी अपनी भूमिका की स्वीकृति है। यह कपनी के कार्यों का इस प्रकार संचालन करने से संबंधित है कि सभी शेयर धारकों के साथ उचित व्यवहार हो तथा इसके लाभ अधिकाधिक संस्था में धारकों को लाभान्वित करें। इस संबंध में प्रबंधन के द्वारा शेयरधारकों के विभिन्न संभागों, विशेष मालिक, प्रबंधकों तथा शेयरधारकों के बीच लाभों की विषमता का निवारण करने की आवश्यकता है।
यह मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता के बारे में, नैतिक व्यवसाय आचरण के बारे में तथा कंपनी के प्रबंधन में वैयक्तिक तथा कॉर्पोरेट निधियों के बीच अंतर करने के बारे में है। नैतिक असमंजस संलग्न हितधारकों के संघर्षकारी हितों से उत्पन्न होता है। इस संबंध में, प्रबंधन संगठन के मल्यों, संदर्भ तथा संस्कृति से प्रभावित सिद्धांतों के समूह के आधार पर निर्णय करते हैं। नैतिक नेतृत्व व्यवसाय के लिए अच्छा है, क्योंकि संगठन सभी स्टॉक होल्डर्स की आकांक्षाओं के समनुरूप अपने व्यवासय का संचालन करता है।
अच्छे कॉर्पोरेट शासन का उद्देश्य :
अच्छे कॉर्पोरेट शासन का उद्देश्य निम्न लक्ष्यों को हासिल करना है:
- कार्यकलापों के क्षेत्र में स्वतंत्र तथा वस्तुनिष्ठ निर्णयन लेने में सक्षम एक उचित प्रक्रिया द्वारा गठित बोर्ड की व्यवस्था।
- गैर कार्यपालिका तथा स्वतंत्र निदेशकों की पर्याप्त संस्था के प्रतिनिधित्व के संबंध में बोर्ड में संतुलन स्थापित करना जो उनके हितों तथा सभी स्टॉक होल्डर्स की बेहतरी का ध्यान रख सके।
- बोर्ड द्वारा पारदर्शी प्रक्रियाओं तथा व्यवहारों का अनुसरण करना तथा पर्याप्त सूचना के आधार पर निर्णय लेना।
- बोर्ड में स्टॉक होल्डर्स की चिंताओं के निवारण के लिए प्रभावी तंत्र।
- बोर्ड शेयरधारकों को कंपनी को प्रभावित करने वाले संगत घटनाक्रमों की निगरानी करना।
कॉर्पोरेट शासन के उत्तरदायित्व
कॉर्पोरेट शासन के अलग-अलग मॉडल होने के बावजूद कॉर्पोरेट उत्तरदायित्व के तीन विभिन्न स्वरूप हैं जिन्हें सभी मॉडल स्वीकारते हैं। ये हैं
- राजनीतिक उत्तरदायित्व (Political Responsibilities): बुनियादी राजनैतिक बाध्यताएं वैध कानून का अनुपालन करना, अधिकारों की प्रणाली का आदर करना तथा संवैधानिक राज्य के सिद्धांतों को स्वीकारना है।
- सामाजिक उत्तदायित्व (Social Responsibilities): कॉर्पोरेट नैतिक उत्तरदायित्व, जिन्हें कंपनी साझे मूल्यों वाले समुदाय के रूप में अथवा साझे मूल्यों वाले अपेक्षाकृत बड़े समुदाय के भाग के रूप में समझती है या उनका संवर्द्धन करती है।
- आर्थिक उत्तरदायित्व (Economic Responsibilities): नवाचार तथा शेयरधारकों के अधिकारों/लोकतंत्र के लिए सम्मान के आधार पर लाभार्जन के लिए प्रतिस्पर्धी बाजारों के तर्काधार के अनुसार कार्य करना जिसे ‘शेयरधारक मूल्य को अधिकतम करना’ जैसे बाध्यता के रूप में व्यक्त किया जाता है। अत: बाध्यता प्रबंधक की होती है।
कॉर्पोरेट शासन के लाभ तथा सीमाएं
कॉर्पोरेट शासन की संकल्पना काफी समय से जनता का ध्यान आकृष्ट कर रही है। उद्योग तथा अर्थव्यवस्था में इसकी संगतता तथा महत्व के कारण इसे व्यापक स्वीकार्यता प्राप्त हो रही है। यह न केवल किसी व्यवसाय उद्यम की कुशलता में योगदान देता है बल्कि देश की अर्थव्यवस्था की तथा प्रगति में भी सहायक है। प्रगामी रूप से कार्यों ने स्वेच्छा से अच्छे कॉर्पोरेट शासन की पस निम्न कारण से सुव्यवस्थित की है:
- कई अध्ययनों से यह संकेत मिला है कि बाजार तथा निदेशक सुप्रबंधित कंपनियों पर ध्यान देने हैं, उनके प्रति उनकी सकारात्मक अनुक्रिया होती है।
- आज के भूमंडलीकृत विश्व में, कॉर्पोरेट के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे पूंजी के वैश्विक स्रोत तक पहुंचे तथा साथ ही विश्व के विभिन्न भागों में सर्वोत्तम मानव पूंजी को आकष्ट को तथा उन्हें अपने पास बनाए रखे। अगर कॉर्पोरेट नैतिक आचरण को नहीं अपनाएंगे तो वे सफल नहीं हो सकते।
- अच्छा कॉर्पोरेट शासन प्रक्रियाओं द्वारा प्रस्तुत विश्वसनीयता भी अधिक दीर्घावधिक पूंजी आकृष्ट करने के लिए विदेशी तथा घरेलू निदेशकों के विश्वास को बनाए रखने में सहायता करती है।
- एक कॉर्पोरेट विभिन्न स्टॉक होल्डर्स जैसे ग्राहकों, कार्यकारियों, निवेशकों, विक्रेता, भागीदारों तथा समाज का समूह है। इसकी संवृद्धि के लिए सभी स्टॉकहोल्डर्स का सहयोग अपेक्षित है।
कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय (एमसीए)
कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय जिसे पहले वित्त मंत्रालय के तहत कॉर्पोरेट कार्य विभाग के नाम से जाना जाता था, प्राथमिक रूप से कंपनी अधिनियम 1956 (और अब कंपनी अधिनियम 2012) और कानून के अनुसार कॉर्पोरेट क्षेत्र की कार्यशैली के विनिमयन हेतु उनके तहत बनाए गए अन्य संबद्ध अधिनियमों आदि के साथ संबंधित है यह केंद्रीय सरकार के प्रतिमाणित अधिनियम, 1932 कंपनी (राष्ट्रीय कोष में दान) अधिनियम, 1951 और संस्था पंजीकरण अधिनियम, 1980 से संबंधित कार्यों के निर्वहन हेतु भी उत्तरदायी है।
राष्ट्रीय कॉर्पोरेट शासन फाउंडेशन (एनएफसीजी) कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय ने अच्छे कॉर्पोरेट शासन, कॉर्पोरेट अग्रणियों को अच्छी कॉर्पोरेट शासन प्रथाओं के महत्व की जानकारी देने और नीति निर्माताओं, नियामकों, कानून प्रवर्तन एजेंसियों और गैर-सरकारी संगठनों के बीच अनुभव तथा विचारों के आदान-प्रदान से संबंधित मुद्दों पर विचार विमर्श के लिए एक मंच उपलब्ध कराने के उद्देश्य से राष्ट्रीय कॉर्पोरेट शासन प्रतिष्ठान का गठन एक लाभ रहित ट्रस्ट के रूप में किया है। राष्ट्रीय कॉर्पोरेट शासन प्रतिष्ठान के प्रबंधन का एक तीन स्तरीय ढांचा है जिसमें शामिल हैं, कॉर्पोरेट कार्य मंत्री की अध्यक्षता में शासी-परिषद, ट्रस्टी बोर्ड और कार्यकारी निदेशालय। एनएफसीजी अच्छी कॉर्पोरेट शासन की प्रथाओं का प्रचार करने के लिए विभिन्न उत्कृष्ट संस्थानों के माध्यम द्वारा निदेशकों के लिए ओरिएंटेशन कार्यक्रमों का आयोजन करता रहता है। एनएफसीजी ने एक कार्य योजना तैयार की है, जिसमें अभिज्ञात विषय वस्तुओं पर अच्छे कार्पोरेशन शासन सिद्धांतों का विकास शामिल है, अर्थात्
- संस्थागत निदेशकों के लिए कॉर्पोरेट शासन मानक
- स्वतंत्र निदेशकों के लिए कॉर्पोरेट शासन मानक और
लेखा परीक्षण के लिए कॉर्पोरेट शासन फाउंडेशन का गठन निम्नलिखित मिशन के साथ किया गया है।
- सुशासन संबर्द्धन को प्रोत्साहन देना, स्वैच्छिक अनुपालन और विभिन्न स्टॉकहोल्डर्स की प्रभावी सहभागिता के लिए सुविधा प्रदान करना।
- सर्वोत्तम अभिक्रियाओं, संरचना, प्रक्रम और नैतिकता का एक नेटवर्क तैयार करना।
- भारत में स्थायित्व और वृद्धि पाने की दिशा में कॉर्पोरेट शासन के मानक ऊंचे बनाकर भारतीय कॉर्पोरेट क्षेत्र में अंतर लाना।
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- भारत में कॉर्पोरेट गवर्नेस से सम्बंधित मुद्दे
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