केस स्टडीज : मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं के प्रति प्रचलित सामाजिक दृष्टिकोण की विवेचना

प्रश्न: विभिन्न अध्ययनों से पता चला है कि हाल के दिनों में अवसाद और मानसिक रोगों के मामले तेजी से बढ़े हैं। साथ ही, 1530 वर्ष के आयु वर्ग में, यह समस्या और स्पष्ट है। इसके अतिरिक्त, इस आयु वर्ग में आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति के लिए अवसाद को उत्तरदायी ठहराया गया है।

इस स्थिति को देखते हुए, निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

(a) मानसिक बीमारी के प्रति प्रचलित सामाजिक अभिवृत्ति की नीतिशास्त्रीय आलोचना प्रस्तुत कीजिए।

(b) युवा पीढ़ी/युवा वयस्कों के मध्य इस समस्या की भयावहता को देखते हुए, निम्नलिखित की भूमिका का विश्लेषण कीजिए: i. परवरिश (Parenting) ii. सोशल मीडिया iii. वीडियो गेम

दृष्टिकोण

  • मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के उपलब्ध आँकड़ों के साथ उत्तर आरंभ कीजिए।
  • मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं के प्रति प्रचलित सामाजिक दृष्टिकोण की विवेचना कीजिए और इसकी नीतिशास्त्रीय आलोचना पर प्रकाश डालिए।
  • इन समस्याओं से निपटने के लिए आवश्यक अनुभूति संबंधी परिवर्तनों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए।
  • मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं को जन्म देने में परवरिश, सोशल मीडिया और वीडियो गेम की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
  • संक्षेप में निष्कर्ष प्रस्तुत कीजिए।

उत्तर

WHO के अनुसार पिछले दशक में तनाव और अवसाद के मामलों में 18% की वृद्धि हुई है, लेकिन भारत में मानसिक स्वास्थ्य पर खर्च GDP का केवल 0.06% ही है। 15-30 वर्ष के आयु वर्ग में मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं और अंततः आत्महत्या की दर में वृद्धि के लिए सांस्कृतिक परिवर्तनों और बढ़ते शहरीकरण के आलोक में व्यवहार संबंधी परिवर्तनों, रोजगार और भावनात्मक अनिश्चितता, सोशल मीडिया जनित ऑनलाइन अपराध और मित्र-समूह के दबाव को उत्तरदायी ठहराया जा सकता है।

(a) मानसिक बीमारी के संबंध में दृष्टिकोण और मान्यताओं को कई कारकों द्वारा स्वरूप दिया जा सकता है:

  • उत्सुकता के माध्यम से प्राप्त ज्ञान
  • मानसिक बीमारी से ग्रसित किसी व्यक्ति का अनुभव / उसके साथ बातचीत
  • सांस्कृतिक रूढ़ियाँ
  • मीडिया की ख़बरें 
  • संस्थागत पद्धतियों और अतीत के प्रतिबंधों (जैसे- रोजगार प्रतिबंध) से सुपरिचित होना

इसलिए, मानसिक बीमारी के प्रति प्रचलित सामाजिक दृष्टिकोण, सहानुभूति और देखभाल से लेकर उपेक्षा, दया और कमगुणवान मानव समझकर घृणास्पद व्यवहार करने तक भिन्न-भिन्न होते हैं । यद्यपि मानसिक बीमारी के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण धीरे-धीरे विकसित हो रहा है, तथापि निम्नलिखित नीतिशास्त्रीय मुद्दे बने हुए हैं। उदाहरण के लिए:

  • तुच्छीकरण (Trivialisation): यह कम आंकने वाला व्यवहार है, जिसमें किसी बीमारी के होने, उसे सहने या उसके उपचार को आसान माना जाता है। मानसिक स्वास्थ्य के प्रति दृष्टिकोण अभी भी शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति दृष्टिकोण के समान नहीं है।
  • लांछनीकरण (Stigmatisation): यह विभिन्न मानसिक स्वास्थ्य स्थितियों का शीघ्र पता लगाने और उपचार में आड़े आने वाली एक महत्वपूर्ण बाधा है। मानसिक स्वास्थ्य समस्या से ग्रसित लोगों को यदि लगता है कि उनकी स्थिति को कलंकित समझा जा रहा है, तो उनके सहायता लेने की संभावना कम होती है।
  • सामाजिक ठप्पा लगा देना (Social Labelling): बहुत सारे मामलों में अवसाद को ‘पहली दुनिया की समस्या’ या ‘विलासिता की समस्या’ के रूप में रूढ़िबद्ध किया जाता है और माना जाता है कि तीसरी दुनिया में ऐसी कोई समस्या नहीं है। यह असत्य है, क्योंकि भारत जैसे विकासशील देशों में भी बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं, महिलाएं और किसान आत्महत्या कर रहे हैं।

  • उपचार की समस्याएं और अभिज्ञता संबंधी पक्षपात (Treatment issues and perceptional biases):

मानसिक विकार के निदान और उपचार पर शोध भी कुछ विशेष नीतिशास्त्रीय समस्याएं प्रस्तुत करते हैं। उदाहरण के लिए, जहां मनोभ्रंश (डिमेंशिया) को स्पष्ट तौर पर एक चिकित्सीय समस्या’ माना जाता है, वहीं व्यक्तित्व विकार जैसी कुछ अन्य बीमारियों को कभी-कभी अलग ढंग से देखा जाता है और कलंक माना जाता है।

परिवार से आरंभ करके, समग्र रूप से समाज को मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों पर चर्चा करने के लिए खुला होना चाहिए। मनोचिकित्सक से परामर्श या दवाओं को वर्जित नहीं माना जाना चाहिए तथा तत्काल सहायता और पारिवारिक समर्थन प्रदान किए जाने चाहिए। इसके लिए जिला प्रशासन संवेदीकरण अभियान का सृजन करके बड़ी भूमिका निभा सकता है। युवा मन को प्रखर बनाने के लिए दिल्ली सरकार द्वारा प्रचलित ‘हैपीनेस करीकुलम’ जैसे उपाय, जिसमें ध्यान, खेलकूद गतिविधियां व प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करना सम्मिलित हैं, आरंभ किए जाने चाहिए।

(b) मानसिक स्वास्थ्य समस्या वैज्ञानिक रूप से उपचार योग्य बीमारी है। किसी बीमारी का कारण, गंभीर स्थिति और अंत में उपचार होता है। अत्यधिक दबाव और प्रतिस्पर्धा यह बीमारी होने का सामान्य कारण है और इसकी उपेक्षा इसके गंभीर होने का कारण बनती है। युवा पीढ़ी के लिए मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं हेतु परवरिश, सोशल मीडिया और वीडियो गेम की भूमिका निम्नानुसार है:

  • परवरिश: माता-पिता की सहायता और परवरिश करने वाला परिवार मानसिक स्वास्थ्य की समस्याओं को दूर करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। पहला चरण परिवार में उदार वातावरण के साथ आरंभ होता है, जिसमें नवयुवक/नवयुवतियाँ व किशोर अपने माता-पिता के साथ मुक्त रूप से चर्चा परिचर्चा कर सकते हों। इसके अतिरिक्त, माता-पिता को यह भी समझना चाहिए कि मित्रसमूह के दबाव और परीक्षा परिणामों व प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रदर्शन के लिए दबाव बनाने से युवा मस्तिष्क प्रभावित हो सकते हैं और आत्महत्या की दर बढ़ सकती है। इस प्रकार मानसिक स्वास्थ्य के उपचार से जुड़ी मान्यताओं को खारिज करने के अतिरिक्त ऐसे अनुकूल वातावरण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए जिसमें युवा पीढ़ी मुद्दों पर चर्चा करने के लिए प्रोत्साहित हो सके।
  • सोशल मीडिया: सोशल मीडिया की लत अन्य लोगों के प्रति हमारे व्यवहार को बदलने और अपने आपको विलग कर लेने के लिए उत्तरदायी एक प्रमुख कारक है। यद्यपि सोशल मीडिया लोगों से जुड़ने और जानकारी एकत्रित करने का एक अच्छा मंच है, तथापि इस पर अति-निर्भरता और इसका अति-उपयोग लत बन जाता है। इससे वयस्कों और किशोरों की संज्ञानात्मक क्षमता प्रभावित होती है। इसके अलावा, ट्रोलिंग, साइबर बुलीइंग, दूसरों लोगों के संबंध में धारणाएं, निरंतर पोस्ट या अपलोड करने की आवश्यकता जैसी प्रवृत्तियाँ मन को और भी अलग-थलग कर देती हैं; साथ ही पढ़ने, खेलने या प्रकृति के साथ समय व्यतीत करने जैसी अच्छी आदतों को भी सीमित कर देती हैं। सोशल मीडिया का व्यवहार सीमित किया जाना चाहिए और सभी स्कूलों, कॉलेजों और अन्य कार्य स्थलों पर इनका उपयोग सीमित करने के लिए संवेदीकरण अभियान चलाया जाना चाहिए।
  • वीडियो गेम: WHO के अनुसार, वीडियो-गेमिंग विकार “अनवरत या आवर्ती गेमिंग व्यवहार का पैटर्न है” जिसमें लोग अपने गेमिंग व्यवहार पर नियंत्रण खो देते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उनका पारिवारिक संबंध और सामाजिक जीवन पंगु या बाधित हो जाता है। WHO ने गेमिंग विकार को एक अलग लत के रूप में वर्गीकृत करने की अनुशंसा की है। हम इसे ब्लू व्हेल चैलेंज गेम जैसे उदाहरण से समझ सकते हैं, जो अपने आप को हानि पहुंचाने और आत्महत्या के प्रयास के रूप में गंभीर मानसिक स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न करता था।

इसलिए यह महत्वपूर्ण है कि त्रुटिपूर्ण धारणाओं के चलते मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को खारिज न किया जाए और यह समझा जाए कि लांछनीकरण से केवल अवसाद की यह मूक महामारी बदतर ही होगी। इसके अतिरिक्त, अवसाद, आत्महत्या और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति दृष्टिकोण पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करने वाली राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य नीति, 2014 का उचित कार्यान्वयन सुनिश्चित करने से भी इन चुनौतियों को दूर करने में सहायता मिलेगी।

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