केस स्टडीज : भारत में निर्मित शौचालयों के उपयोग और अंगीकरण

प्रश्न: आप एक ऐसे जिले में जन स्वास्थ्य अधिकारी के रूप में कार्यरत है, जो खुले में शौच मुक्त (ODE) का दर्जा प्राप्त करने में पिछड़ रहा है। जल एवं सैनिटेशन (स्वच्छता) सेवाओं तक पर्याप्त पहुंच सुनिश्चित करने के बाद भी, उनके उपयोग में वृद्धि नहीं हुई है और जिले में खुले में शौच की प्रथा जारी है। सरकार द्वारा इनके विस्तार के संबंध में किए गए गंभीर प्रयासों के बावजूद, लोगों द्वारा सुरक्षित स्वच्छता प्रथाओं को नहीं अपनाया गया है। फलस्वरूप, हाल ही में जीवाणुजनित संदूषण और जल जनित बीमारियों के विभिन्न उदाहरण सामने आए हैं। ऐसे परिदृश्य में :

(a) भारत में निर्मित शौचालयों के उपयोग और अंगीकरण की निम्न दर के पीछे उत्तरदायी कारणों का परीक्षण कीजिए ?

(b) प्रभावी सूचना, शिक्षा एवं संचार (IEC) रणनीति तैयार करते समय ध्यान में रखे जाने वाले सिद्धांतों पर प्रकाश डालते हुए, इस समस्या का समाधान करने हेतु एक कार्य योजना तैयार कीजिए।

दृष्टिकोण:

  • दिए गए मामले की संक्षिप्त व्याख्या कीजिए और निहित मुद्दों का उल्लेख कीजिए।
  • भारत में शौचालय के प्रयोग और अंगीकरण की निम्न दर के कारणों की चर्चा कीजिए।
  • प्रभावी IEC रणनीति और एक कार्य योजना तैयार करते समय विचार किए जाने वाले सिद्धांतों का उल्लेख कीजिए। 
  • एक उपयुक्त निष्कर्ष दीजिए।

उत्तर:

  • उपर्युक्त मामले में, जल एवं स्वच्छता (सैनिटेशन) के प्रभावी प्रावधानों के बावजूद जिला खुले में शौच से मुक्त (ODF) का दर्जा प्राप्त करने में पिछड़ रहा है। क्षेत्र में सुरक्षित स्वास्थ्य पद्धतियों को अपनाने की निम्न दर से जल जनित रोगों के प्रकोप में वृद्धि हुई है। इस प्रकार, इस क्षेत्र में लोगों के व्यवहार में परिवर्तन लाने के लिए प्रभावी संचार की आवश्यकता है।

स्वच्छता संबंधी प्रथाओं में सुधार के उद्देश्य से आरंभ कोई भी प्रयास 3 व्यापक स्तंभों पर आधारित होता है:

  • अवसंरचना निर्माण और उसका रखरखाव
  • उनके उपयोग को अपनाने के लिए लोगों को प्रेरित करना
  • उपयोग को बनाए रखना

केस स्टडी अंतिम दो बिंदुओं के सन्दर्भ में चुनौतियां प्रस्तुत करती है।

(a) भारत में निर्मित शौचालयों के प्रयोग और अपनाने की निम्न दर के कारण

  • शुद्धता और प्रदूषण की धारणा: घर के भीतर शौचालय को अस्वच्छ और अपवित्र माना जाता है, जो घर की पवित्रता को भंग करता है।
  • सामाजिक रूप से स्वीकार्य और गहन रूप से प्रचलित प्रथा: खुले में शौच पीढ़ियों से स्वीकार्य होने और जीवन में बाल्यावस्था से ही अपनाए जाने के कारण अधिकांश लोग इसके अभ्यस्त हो गए हैं। अन्य समूहों को शौचालय प्रयोग करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है, लेकिन बुजुर्ग सदस्यों की धारणा को परिवर्तित करना अत्यंत कठिन है।
  • निम्नस्तरीय अवसंरचना: प्रायः निर्मित शौचालयों में पर्याप्त स्थान, वायुसंचार एवं प्रकाश और पर्याप्त जल की आपूर्ति का अभाव होता है। यह उपयोगकर्ताओं को खुले में शौच करने के लिए प्रेरित करता है।
  • शौचालय के उपयोग और खुले में शौच के स्वास्थ्य संबंधी नकारात्मक प्रभावों के संबंध में, विशेष रूप से बच्चों में, जागरुकता का अभाव है।
  • सामाजीकरण भी शौचालय के निम्न उपयोग में योगदान देने वाला एक अन्य महत्वपूर्ण कारक है, विशेष रूप से घर की चार दीवारों तक सीमित रहने वाली महिलाओं के लिए।

(b) लोगों के मध्य स्वच्छता संबंधी व्यवहार को प्रोत्साहित करने तथा इसे बनाए रखने के लिए एक प्रभावी IEC रणनीति की आवश्यकता है। IEC रणनीति बनाते समय निम्नलिखित सिद्धांतों को ध्यान में रखना चाहिए:

  • सहभागिता और समावेशी दृष्टिकोण के अंतर्गत समुदायों और जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले संगठनों को शामिल किया जाना।
  • लक्षित अंतर्वैयक्तिक संचार किसी भी प्रभावी IEC रणनीति का आधारभूत स्तंभ होता है, क्योंकि यह लोगों को संगठित करने, वार्ता करने और खुले में शौच की प्रथाओं के संबंध में लोगों को प्रेरित करने में सहायता करता है।
  • स्वीकार्यता: संदेशों/सूचनाओं को एक दृढ़ भावनात्मक अपील के साथ डिज़ाइन किया जाना चाहिए, जो सभी भाषाई और सांस्कृतिक समूहों के मध्य स्पष्ट हो और भ्रांतियां उत्पन्न न करे।
  • राज्य, जिला, ब्लॉक और ग्राम स्तर पर सभी हितधारकों का क्षमता निर्माण।
  • संबंधित मुद्दे को लोगों के समक्ष लाना तथा सुरक्षित स्वच्छता प्रथाओं के अभाव और जीवाणुजनित संदूषण एवं जल जनित रोगों के मध्य प्रत्यक्ष संबंधों के बारे में लोगों को समझाना।
  • सकारात्मक प्रयास: सफल परिवारों को विभिन्न मंचों पर पुरस्कृत करना और स्वच्छता को संधारणीय बनाने में लज्जित/अवपीड़ित करने जैसे मानकों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।
  • IEC रणनीति का साक्ष्य-आधारित फीडबैक प्रदान करने के लिए ICT उपकरणों का प्रयोग करते हुए गतिविधियों की प्रभावी निगरानी और आवधिक मूल्यांकन (M&E)।

उपर्युक्त सिद्धांतों को अपनाए जाने के साथ, निर्मित शौचालयों के उपयोग को बढ़ाने के लिए एक कार्य योजना के रूप में निम्नलिखित घटकों को शामिल किया जाना चाहिए:

  • समान विचारधारा वाले संगठनों एवं समुदाय के साथ गठजोड़ का निर्माण।
  • प्रेरकों की गुणवत्ता में सुधार करने के लिए समुदाय समन्वयक को प्रशिक्षण प्रदान करना। 
  • विभिन्न चैनलों जैसे कि नुक्कड़ नाटकों, पारंपरिक मेलों और त्यौहारों, सामूहिक अपील के लिए स्थानीय रेडियो आदि के माध्यम से IEC (सूचना, शिक्षा और संचार) गतिविधियों को बढ़ावा देना।
  • पंचायतों द्वारा कार्यान्वयन में तब तक एक अग्रणी भूमिका का निर्वहन किया जाना जब तक गांव में स्वच्छता संबंधी प्रथाएं एक आदत में परिवर्तित न हो जाएं। स्कूली शिक्षा के साथ स्वच्छता संबंधी जागरुकता को शामिल किए जाने से छात्रों के व्यवहार में परिवर्तन हो सकता है और वे परिवर्तन का माध्यम बन सकते हैं।
  • ODF स्टेटस के पश्चात भी IEC गतिविधियों को निरंतर जारी रखना, ताकि पूर्व की दशा को पुनः आने से रोका जा सके तथा परिवर्तन को संधारणीय बनाया जा सके।
  • शौचालय के उपयोग को चिन्हित करना तथा आंकड़ों का उपयोग कर क्षेत्र-आधारित रणनीति विकसित करने के लिए जिला स्तर पर राज्य के विभिन्न विभागों के मध्य अभिसरण।
  • शौचालय निर्माण, इनके उपयोग को अपनाने तथा अपशिष्ट प्रबंधन गतिविधियों को शामिल करते हुए एक स्थायी तंत्र के निर्माण को सुनिश्चित करने हेतु वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करना।

खुले में शौच के कारण स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों को प्रदर्शित करना और इस संबंध में शिक्षित करना लोगों की अभिवृत्ति में संज्ञानात्मक परिवर्तन लाने के लिए आवश्यक है। भावात्मक घटक को यह सुनिश्चित करते हुए लक्षित किया जाना चाहिए कि IEC गतिविधियों का फोकस हास्य, उत्सुकता संबंधी तत्वों पर हो तथा ये मानवीय भावनाओं जैसे बच्चों और परिवार के सदस्यों के प्रति प्रेम, सामाजिक स्थिति और सम्मान आदि से सम्बंधित आकर्षण रखती हों; इससे अधिक स्थायी प्रभाव उत्पन्न किया जा सकता है। व्यवहार परिवर्तन केवल तभी स्थायी हो सकता है जब सम्बंधित सामूहिक कार्यवाही प्रचलित शौच प्रथाओं के प्रतिकूल परिणामों के सन्दर्भ में समुदाय की आत्मानुभूति से उत्पन्न हुई हो।

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