अफ्रीका में चीन का आर्थिक प्रभुत्व : भारत द्वारा अफ्रीका के साथ संलग्नता

प्रश्न: इस तथ्य को देखते हुए कि भारत, चीन के वित्तीय प्रभुत्व की बराबरी नहीं कर सकता, यह देखा जा रहा है कि भारत ऐसे विविध तरीके अपना रहा है जिसके तहत यह अफ्रीका में सहयोग में वृद्धि और अपनी कूटनीतिक सक्रियता को बढ़ावा दे सके। चर्चा कीजिए। (250 शब्द)

दृष्टिकोण

  • प्रस्तावना में संक्षेप में समझाइये कि अफ्रीका में चीन का आर्थिक प्रभुत्व कैसे अधिक है।
  • उन तरीकों की चर्चा कीजिए जिनके माध्यम से भारत द्वारा अफ्रीका के साथ संलग्नता में विविधता लायी जा रही है ताकि वह अफ्रीका में एक विश्वसनीय भागीदार बना रहे।
  • संक्षिप्त निष्कर्ष दीजिए।

उत्तर

विगत कुछ वर्षों से भारत एवं चीन दोनों के द्वारा अफ्रीका को एक अवसर के रूप में देखा जा रहा है। हालाँकि भारत, चीन के वित्तीय प्रभुत्व की बराबरी नहीं कर सकता क्योंकि अफ्रीका में चीन के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) का हिस्सा 2009 के 9 बिलियन डॉलर से बढ़कर 2014 में 32 बिलियन डॉलर हो गया है, जबकि इसी अवधि के दौरान भारतीय FDI के हिस्से में केवल 12 बिलियन से 15 बिलियन डॉलर की निम्न वृद्धि हुई है।

जहाँ चीन का दृष्टिकोण अधिक पारंपरिक है (यथा संसाधन-निष्कर्षण, अवसंरचनात्मक विकास, सैन्य रूपांतरण हेतु उपकरण उपलब्ध करवाना और उच्च-स्तरीय पूंजी निर्माण), वहीं भारत निम्नलिखित तरीकों से अफ्रीका के साथ अपनी संलग्नता को विविधता प्रदान कर रहा है:

  • भारत, भारतीय तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग, टीम 9, पैन अफ्रीकन ई-नेटवर्क इत्यादि पहलों के माध्यम से विकासात्मक सहयोग को बढ़ावा दे रहा है, जिसका लक्ष्य संस्थागत एवं मानव क्षमता का निर्माण तथा कौशल एवं ज्ञान का हस्तांतरण करना है।
  • अफ्रीका की उत्पादक क्षमताओं में वृद्धि: उदाहरण के लिए, भारत, जापान और कई अफ्रीकी देशों ने एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर (AAGC) नामक एक त्रिपक्षीय पहल का आरंभ किया है। इसका उद्देश्य एशिया और अफ्रीका के विकास हेतु ‘औद्योगिक गलियारे’ एवं ‘संस्थागत नेटवर्क’ का विकास करना है।
  • उप-राष्ट्रीय संगठनों एवं राज्यों के स्तर पर स्वतंत्र संबंधों का निर्माण करना: उदाहरणार्थ, केरल अपने प्रसंस्करण संयंत्रों हेतु अफ्रीकी देशों से काजू आयात करने की योजना बना रहा है। इसी प्रकार इथियोपिया और दक्षिण अफ्रीका कुदुम्बश्री नामक स्व-सहायता समूह के साथ मिलकर कार्य कर रहे हैं ताकि अपने-अपने देश में इस प्रकार के मॉडल का स्थानीयकरण कर सकें एवं इसे अपनाये जाने का मार्ग प्रशस्त कर सकें।
  • लघु एवं मध्यम आकार के उद्यमों में निवेश: हालांकि, सरकार का समर्थन नेटवर्क निर्माण, मेजबान सरकारों के साथ संपर्क स्थापित करने या वाणिज्य-दूतावास (कांसुलर) संबंधी सहयोग तक ही सीमित है।
  • लोगों में आपसी सम्पर्क (पीपल-टू-पीपल कनेक्शन) को अत्यधिक सुदृढ़ करना: इसके लिए पूर्वी अफ्रीकी देशों और हिंद महासागर के द्वीपीय देशों के मध्य सीमा पार संबंधों में वृद्धि, अधिक निवेश उन्मुखी व्यापार एवं व्यावसायिक अवसर, सीधी उड़ानों के माध्यम से वायु कनेक्टिविटी को बढ़ावा देना इत्यादि उपाय अपनाये जा रहे हैं।
  • सांस्कृतिक संबंधों का पुरुत्थान करना: संस्कृति मंत्रालय की एक पहल प्रोजेक्ट ‘मौसम’ के माध्यम से पूर्वी अफ्रीका के साथ सांस्कृतिक संबंधों का पुरुत्थान किया जाना है। इसका उद्देश्य हिंद महासागर के राष्ट्रों के साथ समाप्त हो चुके संबंधों को पुनर्जीवित करना है।
  • निरंतर उच्च स्तरीय यात्राएं: महाद्वीप की राजनयिक उपेक्षा संबंधी मुद्दों का समाधान करने हेतु विगत चार वर्षों के दौरान राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री द्वारा अफ्रीका में 23 यात्राएँ की गयी है। इसके साथ ही अफ्रीका में 18 नए दूतावासों को स्थापित किए जाने की घोषणा की गई है।
  • रणनीतिक साझेदारी: प्रधानमंत्री मोदी की रवांडा यात्रा, पूर्वी अफ्रीका के तेजी से विकसित होते इस राष्ट्र में किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा थी। भारत ने विगत वर्ष रवांडा के साथ अपने संबंधों को रणनीतिक साझेदारी के स्तर पर उन्नत किया है।
  • अन्य पहले जैसे कि कन्वेंशन सेंटर्स का निर्माण, संसद भवन का निर्माण, ग्रामीण विद्युतीकरण का संचालन इत्यादि। अतः, अफ्रीका के प्रति भारत का दृष्टिकोण मांग-संचालित एवं पारस्परिक लाभ पर आधारित है।

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