बहुपक्षीय नियम-आधारित व्यापार प्रणाली : चुनौतियों एवम समाधान

प्रश्न: बहुपक्षीय नियम-आधारित व्यापार प्रणाली द्वारा सामना की जा रही चुनौतियों का विवरण प्रस्तुत कीजिए। WTO पर विशेष बल देते हुए, चर्चा कीजिए कि किस प्रकार इन चुनौतियों का सफलतापूर्वक समाधान किया जा सकता है। (150 words) 

दृष्टिकोण

  • बहुपक्षीय नियम-आधारित व्यापार प्रणाली का संक्षेप में विवरण प्रस्तुत करते हुए उत्तर प्रारंभ कीजिए।
  • बहुपक्षीय नियम-आधारित व्यापार प्रणाली के समक्ष विद्यमान चुनौतियों का उल्लेख कीजिए।
  • चर्चा कीजिए कि किस प्रकार इन चुनौतियों का सफलतापूर्वक समाधान किया जा सकता है।

उत्तर

बहुपक्षीय नियम-आधारित व्यापार प्रणाली उन तंत्रों को संदर्भित करती है जो अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में पारदर्शिता, स्थिरता और पूर्वानुमेयता (predictability) पर बल देते हैं और एक गैर-भेदभावपूर्ण, मुक्त और समावेशी प्रणाली को स्थापित करने का प्रयास करते हैं।

यद्यपि, हाल के दिनों में अमेरिका और चीन जैसे देशों द्वारा प्रशुल्क वृद्धि में एकतरफा नियम अपनाने और विवादास्पद मुद्दों पर वार्ता करने में विफलता के कारण व्यापार बहुपक्षीयता के समक्ष संकट की स्थिति उत्पन्न हुई है। बहुपक्षीय नियम-आधारित व्यापार प्रणाली के समक्ष विद्यमान चुनौतियों में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • बढ़ता व्यापार संरक्षणवाद: अमेरिका द्वारा यूरोप, चीन और भारत पर प्रशुल्क आरोपित करने के एकतरफा नीतिगत निर्णय ने वैश्विक व्यापार में अनिश्चितता को बढ़ावा दिया है। शासन सम्बन्धी मुद्दे: बहुपक्षीय वार्ता अवरुद्ध हुई है और विवाद निपटान प्रणाली बाधित हुई है। उदाहरण के लिए, 17 वर्षों से जारी वार्ता के पश्चात् भी दोहा दौर के संवाद में गतिरोध बना हुआ है।
  • बढ़ता क्षेत्रवाद: क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (RCEP) और अफ्रीकी महाद्वीपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र जैसे द्विपक्षीय और क्षेत्रीय व्यापार संघों के उद्भव ने तय व्यापार नियमों के साथ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा दिया है और बहुपक्षीय मंचों में विद्यमान मुद्दों से ध्यान हटाया है।
  • बढ़ता हुआ डिजिटलीकरण, व्यापार प्रणालियों को परिवर्तित कर रहा है; हालांकि मौजूदा व्यापार प्रणाली में इसे शामिल नहीं किया जाता है। इससे देशों के मध्य असहमति उत्पन्न हुई है, जैसे- डेटा स्थानीयकरण और ई-कॉमर्स पर भारत की नीति पर भारत और अमेरिका के मध्य मतभेद।
  • परिवर्तनशील परिदृश्य: सेवाओं में व्यापार जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में नियमों का वैश्विक अर्थव्यवस्था में हुए परिवर्तन के साथ सामंजस्य नहीं हो सका है। साथ ही, वीजा व्यवस्था पर अत्यधिक प्रतिबंध और कठोर आव्रजन कानूनों के कारण सेवा व्यापार संबंधी संरक्षणवाद में भी वृद्धि हुई है।
  • बौद्धिक सम्पदा अधिकार (IPR), फाइटो-सैनिटरी उपायों जैसी गैर-प्रशुल्क बाधाओं को लागू करना भी भारत-अमेरिका और भारत-यूरोप के मध्य विवाद का एक विषय बना हुआ है।
  • विकसित देशों द्वारा कृषि सब्सिडी: कृषि सब्सिडी को कम करने के विषय पर अमेरिका सहित विकसित देशों का प्रतिरोध विकासशील देशों के बाजार तक उनकी पहुंच को सीमित करता है।
  • स्वदेशी औद्योगिक क्षेत्रों को बढ़ता सरकारी समर्थन: उदाहरण के लिए, घरेलू सौर उद्योग के लिए भारत के समर्थन को अमेरिका द्वारा विश्व व्यापार संगठन में चुनौती दी गई है।
  • व्यापारिक बाधाओं से उत्पन्न बाजार विकृतियाँ (Market distortions) जैसे कृषि-खाद्य उत्पादों पर अधिक प्रशुल्क, जो विकसित देशों के बाजार तक विकासशील देशों की पहुँच को प्रतिबंधित करता है।

विश्व व्यापार संगठन ने 1996 में अपनी स्थापना के पश्चात् से ही व्यापार नियमों को स्थापित करने और अप्रत्याशितता (unpredictability) को कम करने हेतु बेहतर प्रयास किए हैं। इन नियमों ने वैश्विक व्यापार में वृद्धि, निर्धनता उन्मूलन और सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। हालांकि, उपर्युक्त चुनौतियों के आलोक में निम्नलिखित कदम उठाए जाने की आवश्यकता है:

  • समयबद्ध वार्ता: वार्ताओं के समयबद्ध समापन को सुनिश्चित करने हेतु विश्व व्यापार संगठन के निर्णय निर्माण की संरचना पर पुनः विचार किए जाने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, सर्वसम्मति के अभाव में आम सहमति (consensus) से उद्देश्यों को बेहतर तरीके से पूरा किया जा सकता है।
  • इसके अतिरिक्त, बहुपक्षीय वार्ताओं में स्पष्ट दिशा-निर्देशों की आवश्यकता होती है ताकि किसी दिए गए मुद्दे पर वार्ता बहुत लंबे समय तक न खिंच सके।
  • इसी प्रकार स्वतंत्र पैनलों का प्रावधान किया जा सकता है जो मध्यस्थ की भूमिका निभा सकते हैं और नियम आधारित विश्व व्यापार आदेश के लिए प्रतिस्पर्धी दावों का मूल्यांकन कर सकते हैं।
  • WTO की दंडात्मक शक्तियां: WTO को अपने निर्देशों के जानबूझकर गैर-अनुपालन की घटनाओं को रोकने के लिए पर्याप्त दंडात्मक शक्तियां प्रदान की जानी चाहिए।
  • सब्सिडी का अग्रसक्रिय प्रकटीकरण: विश्व व्यापार संगठन के सदस्यों को सदस्य देशों के मध्य विश्वास और पारदर्शिता को और अधिक विकसित करने हेतु अपने स्तर पर सब्सिडी का अग्रसक्रिय प्रकटीकरण करना चाहिए।
  • नियुक्ति प्रक्रिया से सम्बंधित विवाद निपटान तंत्र को राजनीतिक नियंत्रण से स्वतंत्र होना चाहिए।
  • विश्व व्यापार संगठन के विवाद निपटान तंत्र द्वारा बाहर के विवादों का समाधान करने हेतु द्विपक्षीय और बहुपक्षीय वार्ता को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • डिजिटलाइजेशन, ई-कॉमर्स आदि जैसे क्षेत्रों को वार्ता के अंतर्गत शामिल किया जाए और व्यापार नियमों को उन्नत करते हुए व्यापार की वास्तविकताओं को परिवर्तित किया जाना चाहिए।

एक नियम-आधारित व्यापार व्यवस्था से सभी देश लाभान्वित होते हैं, अत: आवश्यकता इस बात की है कि भारत जैसे देशों को कुछ शक्तिशाली देशों की हठधर्मिता (intransigence) के कारण मौजूदा संकट से बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली के संरक्षण हेतु अन्य लाभार्थियों के साथ समान रूप से कार्य करना चाहिए। मई 2019 में नई दिल्ली में WTO की लघु मंत्रिस्तरीय बैठक इस संदर्भ में सही दिशा में उठाया गया एक कदम था।

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