MSME क्षेत्र : इस क्षेत्र के समक्ष मौजूद चुनौतियां

प्रश्न: स्पष्ट कीजिए कि क्यों सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSME) क्षेत्रक को भारतीय अर्थव्यवस्था का ‘ग्रोथ इंजन’ (वृद्धि इंजन) माना जाता है। भारत में MSMEs के लिए समग्र व्यावसायिक परिवेश में सुधार लाने हेतु आवश्यक महत्वपूर्ण सुधारों का सुझाव दीजिए।

दृष्टिकोण:

  • MSME क्षेत्रक को भारतीय अर्थव्यवस्था के वृद्धि इंजन के रूप में माने जाने के कारणों पर प्रकाश डालिए।
  • इस क्षेत्र के समक्ष मौजूद चुनौतियों का संक्षिप्त वर्णन कीजिए।
  • भारत में MSME क्षेत्रक हेतु समग्र व्यावसायिक परिवेश में सुधार के लिए सुधारात्मक उपायों का सुझाव दीजिए।

उत्तर:

लगभग 63.38 मिलियन उद्यमों के विशाल नेटवर्क के साथ MSME क्षेत्रक विनिर्माण क्षेत्र में लगभग 45 प्रतिशत, निर्यात में 40 प्रतिशत से अधिक और GDP में 28 प्रतिशत से अधिक का योगदान करता है। इसके अतिरिक्त, MSMEs लगभग 111 मिलियन लोगों के लिए रोजगार के अवसरों का सृजन करते हैं। यह क्षेत्रक सामान्य उपभोक्ता वस्तुओं से लेकर उच्च-परिशुद्धता और परिष्कृत तैयार उत्पादों तक की एक विस्तृत श्रृंखला का उत्पादन करता है। व्यावसायिक नवाचारों के माध्यम से उद्यमी आधार के विस्तार में भी इसका महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आर्थिक विकास पर इसके प्रभावशाली गुणक प्रभाव और उद्योग के साथ इसके अग्र एवं पश्च संबंधों के कारण इसे भारतीय अर्थव्यवस्था का ‘वृद्धि इंजन’ माना जाता है।

हालांकि, भारत में MSMEs को विभिन्न बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जैसे – ऋण की उच्च लागत, नई तकनीक और विपणन तक अल्प पहुंच, अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक अपर्याप्त पहुंच, कुशल श्रमबल का अभाव, अपर्याप्त अवसंरचना तथा कराधान, श्रम कानूनों एवं व्यवसाय के अनुकूल परिवेश से संबंधित विनियामकीय मुद्दे आदि।

इस संदर्भ में, यू.के.सिन्हा समिति की रिपोर्ट की अनुशंसाओं के अनुसार, MSMEs के लिए व्यावसायिक परिवेश में सुधार हेतु निम्नलिखित प्रमुख उपाय किए जाने की आवश्यकता है:

  • बोझिल पंजीकरण प्रक्रिया का समाधान करना और खरीद, सरकार प्रायोजित लाभों को ग्रहण करने इत्यादि हेतु विशिष्ट उद्यम पहचानकर्ता (Unique Enterprise ldentifier: UEI) जैसे- PAN के उपयोग को प्रोत्साहित करना।
  • उद्यमियों की क्षमता के निर्माण के लिए प्रत्येक जिले में उद्यम विकास केंद्र (EDCs) स्थापित करना।
  • MSME संकुलों द्वारा नवप्रवर्तन अवसंरचना से युक्त कंपनियों, अनुसंधान एवं विकास संस्थानों और विश्वविद्यालयों के साथ सहयोग किया जाना।
  • MSMEs की सुभेद्यता और आकार को ध्यान में रखते हुए, दिवालिया संहिता/प्रत्यायोजित विधायन द्वारा मध्यस्थता, ऋण परामर्श जैसी आउट-ऑफ-कोर्ट (न्यायालय से बाहर) सहायता का प्रावधान किया जाना।
  • ऋण-परिचालन लागत को प्रभावी रूप से कम करने और साथ ही सूचनाओं संबंधी विषमताओं की समस्या का समाधान करने हेतु एक डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का निर्माण किया जाना, जिससे ऋण तक पहुंच में सुधार होगा।
  • सुसंगत नीतिगत दृष्टिकोण और समान निगरानी की सुविधा हेतु MSMEs के लिए एक राष्ट्रीय परिषद का निर्माण किया जाना चाहिए।
  • सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम विकास (MSMED) अधिनियम, 2006 में भी संशोधन करते हुए इसमें मुख्य बल बाजार की सुविधा एवं व्यवसाय करने में सुगमता पर दिया जाना।

यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि MSMEs अर्थव्यवस्था में जारी संरचनात्मक परिवर्तनों (जैसे GST) के साथ स्वयं को संयोजित कर सकें एवं उनको स्वीकार कर सकें तथा डिजिटलीकरण में हो रही प्रगति से पूर्णतया लाभान्वित हो सकें। इससे इस क्षेत्रक के लिए लागत और प्रयुक्त समय में भी कमी आएगी तथा व्यवसाय करने की सुगमता में अधिक वृद्धि होगी।

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