मरुस्थल निर्माण : कारक और अवस्थिति का महत्व

प्रश्न : उदाहरण प्रस्तुत करते हुए, मरुस्थल निर्माण के एक कारक के रूप में अवस्थिति के महत्व पर प्रकाश डालिए।

दृष्टिकोण:

  • मरुस्थल को परिभाषित कीजिए और इसके विस्तार क्षेत्र आदि के संदर्भ में कुछ अतिरिक्त जानकारी प्रदान कीजिए।
  • चर्चा कीजिए कि मरुस्थल के निर्माण में अवस्थिति किस प्रकार एक महत्वपूर्ण कारक है।
  • आवश्यकतानुसार उचित उदाहरण प्रस्तुत कीजिए।
  • उन मरुस्थलों का संक्षेप में उल्लेख कीजिए जिनका निर्माण अवस्थिति के अतिरिक्त अन्य कारकों के परिणामस्वरूप हुआ।

उत्तरः

मरुस्थल उन क्षेत्रों को संदर्भित करता है जहां अत्यंत न्यून वर्षा ( प्रतिवर्ष 25 से.मी.से कम) होती है तथा जहाँ पादपों व जंतुओं के जीवन निर्वाह के लिए अनुकूल परिस्थितियां विद्यमान नहीं होती हैं। मरुस्थल विश्व के 13वें क्षेत्र पर विस्तृत हैं और लगभग एक अरब लोग इन क्षेत्रों में निवास करते हैं। मरुस्थल शीत अथवा उष्ण प्रकार के हो सकते हैं, वे पहाड़ी या चट्टानों के शुष्क विस्तार, रेतीले अथवा लवणीय हो सकते हैं।

किसी मरुस्थल के निर्माण में अवस्थिति एक महत्वपूर्ण कारक है, जैसा कि निम्नलिखित उदाहरणों से देखा जा सकता है:

  • 15 से 30 डिग्री उत्तर तथा दक्षिण अक्षांशों के मध्य विस्तारित महाद्वीपों के उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में स्थित मरुस्थल: इस क्षेत्र में प्रवाहित अवरोही पवनें मेघों के निर्माण में अवरोध उत्पन्न करती हैं, इसलिए यहाँ अत्यंत न्यून वर्षा होती है जिसके परिणामस्वरूप उष्ण व शुष्क मरुस्थलों का निर्माण होता है। उदाहरण के लिए, उत्तरी अफ्रीका में सहारा मरुस्थल, दक्षिणी अफ्रीका का कालाहारी मरुस्थल इत्यादि।
  • ठंडी धाराओं के निकट पश्चिमी तटीय क्षेत्रों में अवस्थित मरुस्थल (तटीय मरुस्थल): तटवर्ती क्षेत्रों के समानांतर प्रवाहित शीत धाराओं के शुष्क प्रभाव के कारण यहाँ वार्षिक रूप से केवल आधा इंच से अधिक वर्षा नही होती है। उदाहरण के लिए, चिली तट के साथ पेरू की ठंडी धाराओं के कारण अटाकामा मरुस्थल का निर्माण।
  • कुछ पर्वतीय श्रृंखलाओं की पवनाविमुख ढलानों अथवा वृष्टि-छाया क्षेत्रों के निकट अवस्थित मरुस्थल (वृष्टि-छाया मरुस्थल): जब आर्द्रता युक्त पवन एक पर्वत श्रृंखला से टकराती है तो यह पवनाभिमुख ढलानों पर आर्द्रता उत्पन्न करती है। इस प्रकार जब पवन पर्वत की चोटी के ऊपर प्रवाहित होती है तो अत्यंत कम आर्द्रता उत्पन्न करती है और पवनाविमुख ढालों पर अवरोहित होने लगती है। अवरोही पवनें गर्म हो जाती हैं, जिससे मेघों का निर्माण कठिन हो जाता है और उस क्षेत्र की शुष्कता में वृद्धि हो जाती है। उदाहरण के लिए- मोजावे मरुस्थल, कैलिफोर्निया की डेथ वैली।
  • समुद्र से दूरी पर अवस्थित (अंतर्देशीय मरुभूमि): ये प्रमुख रूप से मध्य अक्षांशों में पाए जाते हैं और मुख्य रूप से महाद्वीपीयता के कारण वर्षण विहीन होते हैं ,क्योंकि जब तक तटीय क्षेत्रों से वायु राशियां आंतरिक क्षेत्रों तक पहुँचती हैं, उनकी आर्द्रता समाप्त हो जाती है। उदाहरण के लिए: चीन और मंगोलिया में अवस्थित गोबी मरुस्थल।
  • ध्रुवों के निकट अवस्थित (ध्रुवीय मरुस्थल): ये आर्कटिक (जैसे उत्तरी ग्रीनलैंड) और अंटार्कटिक के निकट पाए जाते हैं। इन ठंडे मरुस्थलों में अत्यंत न्यून वर्षा होती है और यहाँ प्रचुर मात्रा में जल पाया जाता है, जिसमें से अधिकांश जल ग्लेशियर और हिम चादरों के रूप में वर्ष भर जमा रहता है।

मरुस्थलीय भू-दृश्यों का निर्माण विभिन्न अन्य कारकों के कारण भी हो सकता है, जैसे नदी के प्रवाह-मार्ग में परिवर्तन, अनुर्वर भूमि अथवा बीहड़ों के कारण, जलवायु परिवर्तन तथा मानवीय कारक जैसे अति चारण, वनों की कटाई और निम्न स्तरीय कृषि पद्धतियों के कारण इत्यादि।

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