असहयोग आंदोलन और खिलाफत आंदोलन: भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के विकास में एक नवीन चरण

प्रश्न: यह तर्क क्यों दिया जाता है कि असहयोग आंदोलन और खिलाफत आंदोलन ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के विकास में एक नवीन चरण का प्रतिनिधित्व किया?

दृष्टिकोण

  • असहयोग और खिलाफत आंदोलन के प्रारंभ हेतु उत्तरदायी घटनाओं को चिन्हित कीजिए।
  • इन आन्दोलनों के दौरान घटित प्रमुख घटनाओं पर प्रकाश डालिए।
  • इन दोनों आन्दोलनों के महत्व का विश्लेषण कीजिए और स्पष्ट रूप से वर्णन कीजिए कि किस प्रकार इन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन के एक नवीन चरण का प्रारंभ किया।

उत्तर

खिलाफत आंदोलन एवं असहयोग आंदोलन भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के एक महत्वपूर्ण चरण के प्रारंभ को चिन्हित करता है। ये दोनों आन्दोलन, स्वदेशी आंदोलन (1905), होमरूल लीग (1916), चंपारण सत्याग्रह (1917) आदि द्वारा प्रारम्भ राष्ट्रवादी आंदोलनों की चरम परिणति थे। राष्ट्रवादियों को प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति के पश्चात अंग्रेजी सरकार द्वारा प्रमुख रियायतें प्रदान किए जाने की आशा थी, परंतु मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार इस संदर्भ में अपर्याप्त सिद्ध हुआ। रॉलेट अधिनियम द्वारा व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन किया गया और जलियांवालाबाग नरसंहार ने भारत में ब्रिटिश शासन की वास्तविक प्रकृति को उजागर किया।

खिलाफत आंदोलन एक अखिल-इस्लामिक आंदोलन था, जिसका नेतृत्व अली बंधुओं द्वारा किया गया था। इस आन्दोलन का उद्देश्य प्रथम विश्व युद्ध में तुर्की की पराजय के पश्चात तुर्की के खलीफा (मुस्लिमों के धार्मिक प्रमुख) के पद को पुनःस्थापित करना था। अतः महात्मा गांधी ने अखिल भारतीय खिलाफत समिति के अध्यक्ष का पद स्वीकार कर इस आन्दोलन को अपना समर्थन दिया। खिलाफत के मुद्दे, संवैधानिक सुधारों एवं पंजाब में हुए अन्यायपूर्ण कृत्यों आदि मुद्दों को लेकर खिलाफत समिति ने 1 अगस्त, 1920 को असहयोग आंदोलन प्रारंभ कर दिया।

असहयोग आंदोलन के दौरान जनसामान्य ने विविध प्रकार से विरोध प्रदर्शन किए, जैसे लोगों ने सरकारी संस्थानों, विदेशी वस्तुओं एवं विधानमंडलों का बहिष्कार किया। इस दौरान महात्मा गांधी एवं अली बंधुओं ने देश-भर में यात्राएं की और जनसामान्य को संबोधित किया। कई किसान आंदोलन, करों की अदायगी न करने से संबंधित आंदोलन, ग्राम विकास कार्यक्रम इत्यादि असहयोग आंदोलन से संबद्ध थे।

इन दोनों आन्दोलनों को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में एक नए चरण के प्रारंभ के रूप में जाना जाता है, क्योंकि: 

  • राष्ट्रीय आंदोलन स्थायी रूप से जनसामान्य तक प्रसारित हुआ- नरमपंथियों या क्रांतिकारी उग्रवादियों के विपरीत, ये आंदोलन जनसामान्य की क्षमता में विश्वास करते थे। किसानों, पेशेवरों, शहरी लोगों के अतिरिक्त महिलाओं की सहभागिता ने स्वतंत्रता संघर्ष को एक अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान किया।
  • हिंदू-मुस्लिम एकता का स्वर्णिम युग- राष्ट्रीय आंदोलन में शिक्षित, उदार मुस्लिमों का प्रवेश तथा कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग के मध्य सम्पन्न लखनऊ समझौते ने हिन्दू-मुस्लिम एकता को सुदृढ़ता प्रदान करने में सहायता की और अंग्रेजों के समक्ष साझा मांगें प्रस्तुत की गईं।
  • कांग्रेस का पुनर्गठन हुआ- कांग्रेस के नागपुर अधिवेशन में कांग्रेस को ग्रामीण स्तर तक पुनर्गठित किया गया। अंततः इससे समाज के सभी वर्गों में जागरूकता एवं राष्ट्रवादी भावनाओं को उत्पन्न करने में सहायता मिली।
  • जनसमूह दमन को सहने हेतु प्रेरित हुआ- आंदोलन के दौरान गंभीर दमन और पुलिस द्वारा क्रूरता का प्रदर्शन किया गया, जिसका जनता ने साहसपूर्वक सामना किया। इसने स्वतंत्रता संघर्ष के लिए जनता की क्षमता का प्रदर्शन किया।
  • सामाजिक कुरीतियों के विषय में जागरूकता का विस्तार हुआ- गांधी जी के नेतृत्व में, इन आंदोलनों में भी अस्पृश्यता के विरुद्ध आवाज उठाई गई तथा खादी एवं स्वदेशी शिक्षा के प्रसार के माध्यम से आत्मनिर्भरता प्राप्त करने का प्रयत्न किया गया।
  • अहिंसा का संदेश प्रसारित हुआ- आंदोलनों को दबाने हेतु प्रशासन द्वारा वृहत स्तर पर दमनकारी नीतियों का प्रयोग किया गया, इसके बावजूद ये आंदोलन अहिंसक बने रहे। यह 1947 में स्वतंत्रता प्राप्ति तक भारतीय स्वतंत्रता संघर्ष की एक प्रमुख विशिष्टता बनी रही।

हालांकि, खिलाफत आंदोलन तथा असहयोग आन्दोलन को आकस्मिक रूप से समाप्त कर दिया गया, परंतु इन्होंने राष्ट्रीय आन्दोलन को एक नई दिशा एवं शक्ति प्रदान की, जिसके परिणामस्वरूप 1947 में भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई।

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